राजनीति
हिंदू से ले कर कम्युनिस्ट तक सोमनाथ चटर्जी की राजनैतिक यात्रा

प्रसंग
  • यह ज्योति बसु का कपटपूर्ण प्रभाव था जिसने सोमनाथ चटर्जी की भूमिका और भावना को साम्यवाद के लिए प्रशस्त किया।

अगर यह जवाहरलाल नेहरू के लिए नहीं होता, तो पूर्व लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी, जिनका सोमवार की सुबह कोलकाता में निधन हो गया, एक कम्युनिस्ट नहीं होते। वास्तव में, वह सभी अनुमानों में एक धार्मिक व्यक्ति थे।

1948 में, जब नेहरू ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) पर प्रतिबंध लगा दिया और इसके नेताओं को जेल भेज दिया, तो प्रमुख न्यायवादी और अखिल भारतीय हिंदू महासभा के समर्थक निर्मल चंद्र चटर्जी ऑल इंडिया सिविल लिबर्टीज यूनियन का गठन करने और जेल गए हुए साम्यवादियों को बेहिचक रूप से अपनाने के लिए काफी उग्र हो गए। लंदन में बैरिस्टर का प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले और सोमनाथ चटर्जी के पिता निर्मल चटर्जी उस समय ज्योति बसु के करीबी हो गए। यह ज्योति बसु का कपटपूर्ण प्रभाव था जिसने सोमनाथ चटर्जी की भूमिका और भावना को साम्यवाद के लिए प्रशस्त किया।

निर्मल चटर्जी, जिन्होंने कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में भी कार्य किया, नेहरू के पक्के आलोचक थे और शायद यही कारण था जिसने उन्हें कम्युनिस्ट नेताओं की गिरफ्तारी का विरोध करने के लिए प्रेरित किया। वह एक धर्मनिष्ठ हिंदू भी थे और उनका मानना था कि कांग्रेस कभी भी हिंदुओं के हितों की रक्षा नहीं करेगी। अपनी पुस्तक ‘एवाकेनिंग ऑफ इन्डिया’ में, उन्होंने बच्चों को हिंदू ग्रंथों तथा भारत की प्राचीन विरासत की शिक्षा देने, और उन्हें देश की इंडिक संस्कृति और परंपराओं का गौरव समझाने के महत्व के बारे में लिखा है। वह श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जो कि उस समय की महासभा के उभरते हुए सितारे थे, के परिवार के करीबी थे।

निर्मल चटर्जी की पत्नी (और सोमनाथ की माँ) बिनपानी देवी एक धर्मनिष्ठ महिला थीं और उन्होंने अपने बेटों को बहुत ही कम उम्र से शास्त्रों की शिक्षा दी। उन्होंने बेटों को दैनिक पूजा और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने पर जोर दिया। इस प्रकार सोमनाथ शास्त्रों की शिक्षा ग्रहण करते हुए बड़े हो गए और एक व्यवहारिक हिंदू बन गए। उनके पिता ने एक बार अपने दोस्तों के सामने शेखी बघारते हुए कहा कि उनके छोटे बेटे (सोमनाथ) इतने धार्मिक हैं कि वे एक दिन हिंदू महासभा के निष्ठावान समर्थक बनेंगे।

लेकिन, जैसा कि वे कहते हैं, सौभाग्य से 1948 से ज्योति बसु ने निर्मल चटर्जी के करीब आना शुरू कर दिया। बसु, उनकी कम्यूनिस्ट महत्वाकाँक्षाओं के बावजूद, बहुत ही वर्ग-जागरूक व्यक्ति थे और उन्हें सभ्य चटर्जी परिवार के साथ रिश्ता बनाना आसान लगता था। उनकी समान सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के अलावा – बसु के पिता एक समृद्ध डॉक्टर थे और एक जमींदार घराने से नाता रखते थे, जैसा कि चटर्जी का परिवार था – दोनों ने लंदन में एक ही जगह बैरिस्टर का प्रशिक्षण प्राप्त किया। बसु का 1949 से ही चटर्जी के घर बार-बार आना जाना शुरू हो गया और युवा तथा प्रभावशाली सोमनाथ पर काम करना शुरू कर दिया, जो हाल ही में अपनी किशोरावस्था से बाहर आए थे।

सोमनाथ पर बसु की विद्वता और व्यक्तित्व का गहरा प्रभाव पड़ा (उस समय बसु करीब 35 वर्ष के थे)। एक अवसर पाकर, बसु ने सोमनाथ को उनकी इंडिक और धार्मिक जड़ों से दूर करना और सोमनाथ में कम्यूनिस्ट विचारधारा का पौधा लगाना प्रारंभ कर दिया। बसु ने सोमनाथ की अन्य कम्यूनिस्ट नेताओं से मुलाकात करवाई और उन्हें पार्टी की बैठकों में ले जाना शुरू किया। निर्मल चटर्जी, जो तब तक बसु के बहुत ही करीब आ चुके थे, ने कभी भी इसका विरोध नहीं किया। इस बात का भी तथ्य प्रस्तुत किया गया है कि जब निर्मल चटर्जी के एक मित्र ने इस बात पर प्रश्न उठाया तो निर्मल चटर्जी ने कहा कि उनका छोटा बेटा अपने लड़कपन के इस प्रभाव से आसानी से उभर जायेंगे। कितना गलत थे वे!

निर्मल चटर्जी ने 1952 में हुगली से महासाभा उम्मीदवार के रूप में भारत के पहले आम चुनावों में भाग लिया और आसानी से जीत गये। लेकिन उस समय तक, वे तथा उनके परिवार के सभी लोग बसु और उनके कम्युनिस्ट समूह के प्रभाव में थे। इतना कि उन्होंने 1957 में अपना लोकसभा कार्यकाल समाप्त होने के तुरंत बाद महाभा से इस्तीफा दे दिया। इस बीच, बसु के आग्रह पर सोमनाथ चटर्जी 1950 में कानून का अध्ययन करने के लिए लंदन गए थे। बसु ने सोमनाथ को ग्रेट ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं से मिलवाया (जिन्होंने बसु को भी प्रेरित किया था जब वह अपनी कानून की डिग्री पूरी कर रहे थे), विशेष रूप से रजनी पाल्मे दत्त। इंग्लैंड के कम्युनिस्टों ने उत्साहपूर्वक सोमनाथ चटर्जी को एक मजबूत कम्युनिस्ट के रूप में बदलने का बसु का अधूरा कार्य पूरा किया और जब सोमनाथ भारत लौट आए और कोलकाता में अपना कानून अभ्यास (वकालत) स्थापित किया, तो वह पहले ही पूरी तरह से प्रेरित थे। सोमनाथ 1968 में औपचारिक रूप से कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया में शामिल हो गए।

चटर्जी परिवार पर बसु का इतना अधिक प्रभाव था कि निर्मल चटर्जी ने 1963 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थन से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में बर्डवान से लोकसभा उपचुनाव लड़कर जीत लिया। निर्मल चटर्जी ने 1967 में एक बार फिर बर्डवान से एक सीपीआई समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और जीता। एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने का कारण यह था कि वह स्वयं को नास्तिक के रूप में परिवर्तित नहीं कर सके और महासाभा के सदस्य और एक भक्त हिंदू होने के बाद कम्युनिस्ट रैंक में शामिल हो गये।

1971 में निर्मल चटर्जी का निधन हो गया और उनके छोटे बेटे सोमनाथ, जो उस समय सीपीआईयू के सदस्य थे, ने उस वर्ष बर्दवान में आयोजित आम चुनावों में हिस्सा लिया और उस निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल की। और बाकी जैसाकि लोग कहते हैं, इतिहास है। सोमनाथ चटर्जी 2010 में अपनी मौत से पहले अपने सलाहकार (बसु) के करीबी रहे। पार्टी की अवहेलना करने के लिए सोमनाथ को सीपीआई (एम) से निष्कासित कर दिया गया और लोकसभा सभापति के रूप में बने रहे, इसके बाद भी इनकी मित्रता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। सीपीआई (एम) ने उनसे स्पीकर के रूप में पद छोड़ने के लिए कहा था, जब पार्टी ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन-1 भारत-अमेरिका परमाणु समझौते पर समर्थन वापस ले लिया था और लोकसभा में सरकार के खिलाफ वोट दिया था। बसु ने चटर्जी को पार्टी के अलोकप्रिय और कड़े आदेश का पालन करने की भी सलाह दी थी।

सोमनाथ चटर्जी, जिन्होंने जमींदारों के परिवार में विवाह किया था, की मृत्यु एक संपन्न क्लिनिक बेले वू में हुई| यह बेले वू बसु और मदर टेरेसा समेत गरीबी का आडम्बर करने वाली बंगाल की कई शख्शियतों के लिए पसंदीदा क्लीनिक था|

 

जयदीप मजूमदार स्वराज में एक सहयोगी संपादक हैं।