राजनीति
राफेल सौदे पर राहुल गांधी के प्रपंच का खण्डन

प्रसंग
  • राहुल गांधी ने राफेल सौदे के बारे में रक्षा मंत्री पर “झूठ” बोलने का आरोप लगाने के बाद लोकसभा में हँगामा खड़ा कर दिया।
  • यहाँ, हम सौदे के बारे में उनके दावों का ‘तथ्य’ परीक्षण कर रहे हैं एवं उनके तथा उनकी पार्टी द्वारा किए जा रहे प्रपंच का खंडन कर रहे हैं।

विकृतियों के नागवार घालमेल को, मिथ्या-प्रस्तुतियों को और सफ़ेद झूठों को एक आडंबरी राजनेता के रूप में एक सिद्धान्तहीन शोमैन द्वारा प्रसारित किया जा रहा है।  शायद इस तरह से शशि थरूर ने संसद में राफेल सौदे पर राहुल गांधी के दावों का वर्णन किया होता, यदि वह एक स्वतंत्र टिप्पणीकार होते। लेकिन पार्टी के एक वफादार के रूप में वह 48 वर्षीय “युवा आइकन” की बस प्रशंसा करते रहे हैं।

20 जुलाई को संसद को संबोधित करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राफेल सौदे पर आक्रामकता के साथ आलोचनात्मक हो गए और जोर देकर कहा कि यह सौदा कांग्रेस के लक्ष्य की तुलना में बहुत अधिक खर्चीला था। गांधी ने रक्षा मंत्री पर भी देश से झूठ बोलने का आरोप लगाया, जब रक्षामंत्री ने फ्रांस के साथ एक गुप्त समझौते का हवाला देते हुए सौदे के बारे में ब्योरा देने से इनकार कर दिया था। फिर उन्होंने कहने की हद कर दी कि फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने व्यक्तिगत रूप से उनसे कहा था कि ऐसा कोई समझौता अस्तित्व में नहीं था।

गांधी द्वारा लोकसभा में लगाए गये आरोप गंभीर हैं। इस तरह के आरोपों को तथ्यों के समर्थन की आवश्यकता होती है, लेकिन नेहरू-गांधी परिवार के वंशज ने अब तक कोई भी तथ्य प्रस्तुत नहीं किए हैं। उन्होंने अपने दावों के समर्थन में किसी स्रोत का भी विवरण नहीं दिया था। यहाँ कांग्रेस और उसके अध्यक्ष द्वारा गढ़ी गई कहानियों के तथ्यों पर चर्चा करने और उनका खण्डन करने का प्रयास किया गया है।

प्रस्तावना

2001 में भारतीय वायुसेना (आईएएफ) ने 126 मीडियम मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) की अपनी आवश्यकता व्यक्त की, जिनमें से 18 विमानों को उड़ान भरने के लिए तैयार स्थिति में आयात किया जाना था जबकि बाकी के 108 विमान प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण के माध्यम से हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) द्वारा निर्मित किए जाने थे। 2007 में प्रस्तावों के एक अनुरोध के जवाब में छह निर्माताओं ने अपन-अपने प्रस्ताव प्रस्तुत किए और अंतिम प्रतियोगिता राफेल एवं यूरोफाइटर टाइफून पर आ टिकी। राफेल अंतिम विजेता के रूप में उभरा और 31 जनवरी 2012 को घोषणा की गई, जिसके बाद बातचीत शुरू हुई।

2012 से 2014 तक बातचीत असफल रही

2012-14 के दौरान बातचीत में मुख्य रूप से दो मुद्दों के कारण एक बाधा पहुंची:

  1. राफेल के निर्माता डसॉल्ट, एचएएल द्वारा भारत में 108 शेष विमानों के निर्माण की गारंटी नहीं दे रहे थे, क्योंकि मीडिया रिपोर्टों के चलते वे एचएएल की क्षमताओं के बारे में आश्वस्त नहीं थे।
  2. भारत प्रौद्योगिकी का पूर्ण हस्तांतरण चाहता था, जबकि फ्रांस विमानों के लाइसेंस प्राप्त उत्पादन के लिए सीमित प्रौद्योगिकी को स्थानांतरित करने के लिए तैयार था, न कि डिजाइन प्रौद्योगिकी को।

हालांकि ये दो प्राथमिक कारण थे, वहीं एक और कारण भी था: लागत।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार विमान की वास्तविक लागत और भारत सरकार जिस लागत पर विचार कर रही थी, उन दोनों लागतों के बीच विसंगतियां थीं। इंस्टीट्यूट ऑफ पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट स्टडीज के वरिष्ठ सदस्य अभिजीत अय्यर-मित्रा ने स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन किया कि सरकार के 82.5 मिलियन डॉलर के दावों के मुकाबले विमान की लागत 212 मिलियन डॉलर से कम नहीं हो सकती थी।

इकनोमिक टाइम्स के एक लेख में, अय्यर-मित्रा लिखते हैं, मीडिया रिपोर्टों के अनुसार 2013 तक  एक यूनिट पर व्यय 82.5 मिलियन डालर से बढ़कर 119 मिलियन डालर हो गया और 2014 तक यही 238 मिलियन डालर तक पहुँच गया.अय्यर-मित्रा यह भी लिखते हैं कि 126 लड़ाकू विमानों के लिए 30 बिलियन डालर के अनुबंध का सामना करना  अपने आप में कई सालों के लिए हमारे पूंजी निवेश को बर्बाद कर सकता था(क्यूंकि किसी ने भी पिछली सरकार में खर्चों और निधि पर कोई जाँच नहीं की), विभिन्न कंपनियों से रेट न लेना आर्थिक द्रष्टिकोण से सबसे गलत काम था।

इस तरह से पिछली सरकार में 2014 तक संधि का अंत हुआ।

नरेन्द्र मोदी की राफेल संधि

नरेन्द्र मोदी ने अप्रैल 2015 में अपने फ्रांस दौरे पर एक प्रेस कांफ्रेंस में फ्रेंच राष्ट्रपति की उपस्थिति में दोनों सरकारों के बीच उस संधि का ऐलान किया जिसमें 36 राफेल विमान ख़रीदे जाने थे। इस संधि पर सितम्बर 2016 में हस्ताक्षर हुए। इस से पहले की गयी 126 विमानों के लिए की गयी ऍमऍमआरसीऐ संधि का अंत हुआ।

यह रिपोर्ट किया गया की इस संधि के 36 महीनों के अन्दर विमानों की लेनदेन शुरू हो जाएगी और नई रिपोर्टों के अनुसार पहले विमान 2019 में मिलने की उम्मीद है जैसा की तय हुआ था। यह आई-ए-एफ के पास लड़कूं विमाओं की कमी को दिखता है क्यूंकि इनकी संख्या पहले से ही कम है (जहाँ 42 चाहिए वहां केवल 32 हैं) और क्यूंकि पुराने होते लड़ाकू विमानों को हटाया जायेगा यह स्थिति अगले कुछ वर्षों में और गंभीर बन जाएगी जिसकी वजह से आई-ए-एफ को किसी भी सूरत में नए विमान चाहिए।

इस सौदे से एक राहत के रूप में देखा जा सकता है जिसने केवल दो स्क्वाड्रन की समय पर डिलीवरी सुनिश्चित नहीं की बल्कि भविष्य में और विमानों संभावनाएं खोल दी हैं।

 

राहुल गांधी के आरोपों की विवेचना

हालांकि यह पहली बार नहीं है कि गांधी या कांग्रेस ने राफेल सौदे के बारे में विवादित दावे किए हैं, लेकिन इस बार ध्यान देना इसलिए जरूरी है क्योंकि आरोपों को एक नए स्तर पर ले जाया गया था। गांधी ने आरोप लगाया कि:

  1. मोदी सरकार ने राफलेस को अत्यधिक दर पर खरीदा

२. रक्षा मंत्री ने गोपनीयता समझौते के बारे में झूठ बोला जिसका सहारा लेकरउन्होंने सौदे के बारे में ब्योरा देने से इंकार किया
3. फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने व्यक्तिगत रूप से उनसे कहा कि ऐसा कोई गोपनीयता समझौता अस्तित्व में नहीं था

4.रिलायंस परियोजना में गलत तरीके से हिस्सेदार था और उसके पास आवश्यक अनुभव भी नहीं था

नीचे गाँधी द्वारा लगाये गए आरोपों की एक एक कर के विवेचना की गयी है –

  1. अपनी पड़ताल में,अय्यर-मित्रा ने बताया कि राफेल के लिए सरकार की प्रति यूनिट लागत पुरानी मिराज विमान के लिए नई लागत से भी कम थी। वे आगे लिखते हैं “ की यह उपकरण की गुणवत्ता के बारे में काफी बात करता है और यह उन नई तकनीकी उपलब्धियों के बारे में भी बता करता है जो अभी तक नहीं थी”। और अगर कोई भी और सबूत चाहिए की राफेल ने सभी प्रतियोगिताओं में ख़राब प्रदर्शन क्यूँ किया है और उसे राज्य के अधिकतर प्रमुखों ने “पुरानी प्रौद्योगिकी” का दर्जा क्यूँ दिया है, मुझे नहीं लगता की इसके बाद किसी स्पष्टीकरण की ज़रूरत है।

भारत द्वारा लिया जा रहा राफेल पिछले शासन के तहत लिए जा रहे विमानों जैसा नहीं है। अब यह प्रति यूनिट $ 243 मिलियन में खरीदा जा रहा है, जो पहले की तुलना से केवल $ 5 मिलियन अधिक है जिसमें “पुरानी तकनीक” का इस्तेमाल किया गया था. यह विमान अपने साथ लाया है –

1) कम से कम तीन संशोधन जो कि भारत के अनुरूप हैं

2) प्रशिक्षण और पांच साल के रखरखाव पैकेज

3) 50 प्रतिशत ऑफसेट समझौते

अपने इकनोमिक टाइम्स के आर्टिकल में,अय्यर-मित्रा ने उस लागत की तुलना भी की जिस पर भारत विमान को खरीद रहा है और जिस पर अन्य देश इसे खरीद रहे हैं। उन्होंने बताया “मिस्र ने अपना प्रत्येक राफेल $ 246 मिलियन में खरीदा जबकि भारत ने केवल$ 243 मिलियन में खरीदा, जिसमें कतार के अपेक्षा में कम चीजें सम्मिलित थी लेकिन 50 प्रतिशत ओफ़्सेट और भारत के अनुरूप संशोधनों के साथ

  1. फ्रांस ने पहले भी सौदे का बचाव किया है, और अब उन्होंने गांधी के आरोपों पर ध्यान देते हुए और एक बयान जारी किया है जो कहता है – “फ्रांस और भारत ने 2008 में एक सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किये, जो कानूनी रूप से दोनों राज्यों को साझेदार द्वारा प्रदान की गई वर्गीकृत जानकारी की रक्षा के लिए बाध्य करता है”।

निर्मला सीतारामन ने भी गांधी के दावों को खारिज कर दिया और 25 जनवरी 2008 को कांग्रेस सरकार की सरकार द्वारा हस्ताक्षरित अंतर सरकारी समझौते के अनुच्छेद 10 का हवाला दिया। इसके अतिरिक्त, इस वर्ष फ्रांसीसी राष्ट्रपति की यात्रा के दौरान “वर्गीकृत या संरक्षित जानकारी के विनिमय और पारस्परिक संरक्षण” पर एक समझौते पर भी हस्ताक्षर किए गए थे।

3.जबकि फ्रांसीसी राष्ट्रपति द्वारा व्यक्तिगत रूप से कथित तौर पर कही गयी किसी बात का खंडन करने का कोई रास्ता नहीं है वहीं इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने वास्तव में सौदे के बारे में जानकारी साझा करने पर इंडिया टुडे को दिये एक इंटरव्यू में टिप्पणी की थी जो संसद में गांधी द्वारा कही बातों के समान ही थीं| टिप्पणी कांग्रेस द्वारा ट्वीट की गई थी, लेकिन फिर से, कांग्रेस ने संदर्भ से हटकर टिप्पणी की है।

इंटरव्यू में, इमैनुअल मैक्रॉन ने कहा कि जब किसी सौदे में बेहद संवेदनशील व्यावसायिक हित शामिल होते हैं तो इस तरह के समझौते का विवरण देना वांछनीय नहीं है। वाणिज्यिक समझौतों का विवरण प्रतिद्वंदी कंपनियों को पता नहीं लगने देना चाहिए क्योंकि ऐसा करना फर्मों के हितों में बाधा डाल सकता है और इसलिए गोपनीयता तर्कसंगत है|

उसी रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रपति ने कहा कि यदि मोदी सरकार गोपनीयता खण्ड के अंतर्गत आने वाले कुछ विवरणों को भ्रम दूर करने के लिए और राजनीतिक गतिरोधों को हल करने के लिए विपक्षी दलों के साथ साझा करना चाहती है तो फ्रांसीसी सरकार को इस पर कोई आपत्ति नहीं होगी|

यह स्पष्ट है कि फ्रांसीसी राष्ट्रपति के अनुसार यह भारत सरकार के स्वविवेक पर छोड़ दिया गया है और फ्रांस ने जानकारी को सार्वजनिक रूप से साझा करने का अधिकार नहीं दिया है| वे गोपनीयता को वरीयता देते हैं|

  1. स्वराज्य के लिए अपने लेख में मेजर जनरल मृणाल सुमन ने लिखा कि रिलायंस की भागीदारी और एचएएल के बहिष्कार के आसपास की आलोचना मूर्खतापूर्ण थी| उन्होंने इंगित किया कि रिलायंस ‘ऑफसेट दायित्वों’ में शामिल है न कि जहाजों के किसी भी प्रकार के संयुक्त उत्पादन में (सभी विमान भारत में कोई उत्पादन नहीं होने के कारण उड़ान भरने के लिए बिलकुल तैयार स्थिति में आ रहे हैं) और ऑफसेट दायित्वों को पूरा करने के लिए साझेदार का चुनाव पूरी तरह से राफेल के निर्माता डसॉल्ट पर निर्भर है| इस प्रकार डसॉल्ट रिलायंस (या किसी अन्य फर्म) को चुनने के लिए अच्छी तरह से अपने अधिकार क्षेत्र में है| उन्होंने यह भी बताया कि विदेशी निर्माणकर्ता भारत में सरकारी संस्थाओं की बजाय निजी संस्थाओं के साथ लंबे समय से साझेदारी करते रहे हैं| बोइंग-टाटा और महिंद्रा-लॉकहीड मार्टिन साझेदारी का उल्लेख यहां किया जा सकता है।

अनुभव के लिए, लेखक ने बताया कि रिलायंस 2015 से रक्षा उत्पादन में सक्रिय है और दुनिया भर के प्रमुख खिलाड़ियों के साथ महत्वपूर्ण साझेदारी रखता है और हाल ही में प्रमुख रक्षा परियोजनाओं का हिस्सा रहा है। इसलिए रिलायंस के पास वह आवश्यक क्षमता है कि जिस काम को यह शुरू करेगा उसे पूरा करके छोड़ेगा|

गांधी और कॉंग्रेस द्वारा प्रोत्साहित कहानी इस प्रकार झूठ और गलत सूचना के अभियानों की बुनियाद पर गढ़ी गयी| यह सोचनीय विषय है कि कैसे ग्रैंड ओल्ड पार्टी राजनीतिक मसाला पाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक अति अनिवार्य मुद्दे का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रही है| इसके अलावा कॉंग्रेस अध्यक्ष फ्रांस और फ्रांस के राष्ट्रपति को अपनी कहानी में इस हद तक घसीट रहे हैं कि फ्रांस को बार-बार स्पष्टीकरण देना पड़ रहा है| फिर यह कहना उचित है कि अपने राजनीतिक लाभ के लिए कॉंग्रेस न सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा को बल्कि भारत के अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को भी दांव पर लगा रही है|

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मधुर शर्मा दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के स्नातक छात्र हैं। वह @madhur_mrt पर ट्वीट करते हैं।

 

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