राजनीति
भाजपा की गौरक्षा नीति तब तक सफल नहीं होगी जब तक यह ‘काउनोमिक्स’ को न समझे

 आशुचित्र- गायों की सुरक्षा कतई गलत नहीं है लेकिन प्रतिबंध के लिए ज़िम्मेदारी  से भागना समस्या है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का प्रशासन को आवारा गायों की देखभाल करने का निर्देश इस बात को स्पष्ट करता है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का गौ रक्षा का तरीका तब तक अलाभकारी है जब तक कि गायों की पूरे जीवनकाल में देखभाल न की जाए। गायों की रक्षा के लिए हिंदी भाषी इलाकों में नए राजनीतिक दबाव धन्यवाद के पात्र हैं क्योंकि ये गायों के गैर-कानूनी व्यापार को खत्म करने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं।

वर्तमान की गौ अर्थव्यवस्था कुछ हद तक गैर-कानूनी है क्योंकि यदि गौ हत्या पर प्रतिबंध लगा दिया तो व्यवसायिक रूप से गाय का उपयोगी जीवन खत्म होने के बाद उसकी देखभाल कोई नहीं करता। कुछ गौशाला तथा कुछ हिंदू गौ आवास के लिए वित्तीय सहायता करते भी हैं लेकिन यह आवश्यकता की तुलना में बहुत छोटा प्रयास है। इस कारण यहाँ अनदेखी तथा अनसुना करने वाले हालात हैं। एक बार गाय ने दूध देना बंद कर दिया तो उसका मालिक उसकी देखभाल करना बंद कर देता है तथा उसे एक बिचौलिए को बेच देता है जो गायों की तस्करी करता है और उसकी हत्या के लिए देश के अंदर चल रहे अवैध कसाईखानों में अथवा नेपाल और बांग्लादेश की सीमा पर स्थित कसाईखानों में बेच देता है। इसमें कई बलशाली धूर्त पैसों के बदले गायों को आगे पहुँचाने का जिम्मा लेते हैं। बीच में कहीं इस व्यवस्था का टूटना गायों को लेकर हिंसा का प्रमुख कारण बनता है।

गुप्त तरीके से चल रहे इस प्रारूप में गायों के मालिकों की मिलीभगत होती है। कई लोग गायों को खुला छोड़ देते हैं तथा गायों का झुंड गाँव में घूमता रहता है और फसल को नष्ट करता है। राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश में गाँव वाले रात भर जाग कर पहरा देते हैं ताकि ये झुंड उनकी फसलें नष्ट न करें। बिना किसी उचित योजना के गौ रक्षा उनके लिए बोझ है।

किसी भी तरह से गौ मांस खाने वालों की बातें नहीं मानी जा सकती जो खाने के अधिकार की बात कहते हैं तथा उनके अनुसार जिन्हें खाने में हिचक नहीं है उन पर यह रक्षा का नियम जबरदस्ती थोपा जा रहा है। यह किसी भी राज्य के लिए तर्कसंगत है कि लोगों की भावनाओं का ध्यान रखते हुए या किसी अन्य कारण से वह कुछ पशुओं के वध पर रोक लगा सकता है। कुछ समय पहले टाइम्स ऑफ इंडिया  में समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता ने लिखा था कि कई देशों ने कुछ पशुओं के मांस पर प्रतिबंध लगा रखा है (जर्मनी, ब्रिटेन, आयरलैंड, फ्रांस में कुत्ते के मांस पर), भले ही इसका कारण धार्मिक न हो। और “जब कानून किसी भी पशु के सेवन, वध पर प्रतिबंध लगाता है तो वह बिना किसी अपवाद के प्रत्येक नागरिक पर लागू होता है।”

गाय के वध पर प्रतिबंध उतना अनुचित नहीं है जितना कुछ लोग बताते हैं। प्रतिबंध के परिणाम सोचे बिना इसे लागू करने के लिए इसमें निवेश करना अनुचित है। गायों के जन्म से लेकर मृत्यु तक उनकी देखभाल करने के लिए एक नई कानूनी योजना की आवश्यकता है। यदि यह नहीं हुआ तो यह भाजपा के लिए भी महंगा पड़ेगा तथा जिले के अधिकारियों को गायों की देखभाल का आदेश देने से इस समस्या का हल नहीं निकलेगा। रिपोर्ट आई थी कि आवारा गायों की विद्यालयों में आवास की व्यवस्था की गई है। यह लंबे समय तक हल नहीं हो सकता जब तक कि हम बच्चों को शिक्षा से दूर कर उन्हें गायों की देखभाल के लिए विद्यालय भेजें।

तो समग्र गौ रक्षण अर्थव्यवस्था कैसी होनी चाहिए? इसके कई उत्तर हो सकते हैं लेकिन हमें निम्न बिंदुओं पर विचार करने की आवश्यकता है-

पहला, झुंड में संख्या। यह मानते हुए कि राज्य तथा नागरिकों को गायों की सेवा उनके मोक्ष तक करनी चाहिए ऐसे में गायों की संख्या में अत्यधिक बढ़ोतरी करना मूर्खता होगी। हमें उतनी संख्या ही रखनी होगी जिसकी रक्षा की जा सके तथा आर्थिक रूप से सुलभ हो। जिस तरह इंसान एक अच्छे स्तर की समृद्धि हासिल करने के बाद जनसंख्या को नियंत्रित कर लेता है इसके विपरीत यदि पशुओं को बेहतर सुविधाएँ मिलेंगी तो उनकी संख्या में अधिक बढ़ोतरी होती है। अत: हमें पशुओं की संख्या निर्धारित करनी होगी। जितनी संख्या हम चाहते हैं हमें उतने ही पशुओं का जन्म होने देना चाहिए।

दूसरा, नर प्रजाति की समस्या। प्रकृति समान संख्या में नर और मादा पैदा करती है और नर बोवाई के अतिरिक्त कहीं उपयोगी नहीं है तथा इसी वजह से हमें इसका उत्तर ढूंढना होगा कि नर पशु का क्या किया जाए। लिंग परीक्षण इंसानों के लिए एक अच्छे कारण की वजह से प्रतिबंधित है लेकिन क्या यह पशुओं के लिए किया जा सकता है जिससे नर पशु के जन्म को रोका जा सके जो वध की आवश्यकता बने या फिर बैलों को उनकी वयस्कता में पेंशनभोगी की गौशाला में भेज दिया जाए।

तीसरा, अनुसंधान। यदि हम अधिक गौशालाओं में निवेश कर रहे हैं तो हमें दूध तथा चमड़े के अतिरिक्त गायों के उपयोग ढूंढने होंगे। यहाँ गाय प्राप्त वस्तुओं के अतिरिक्त उपयोग भी तलाशने की आवश्यकता है (मूत्र की चिकित्सीय उपयोगिता, गैस तथा ऊर्जा के लिए गोबर इत्यादि) तथा वृद्ध गायों की देखभाल में निवेश। साथ ही पशुचिकित्सा, दवाइयाँ तथा खाने में भी निवेश की आवश्यकता है जिससे वृद्ध पशु सुखद जीवन जी सकें।

चौथा, मृत्यु के बाद चमड़े तथा अन्य भागों का उपयोग। हिंदू मान्यता के अनुसार गाय का वध करने पर प्रतिबंध है लेकिन मृत्यु के बाद गाय के भागों के उपयोग पर नहीं। कुछ हिंदू गाय की मृत्यु के बाद उसे काटना चाहते होंगे तो इस पर पूरे समुदाय को कोई आपत्ति नहीं है। क्या देखभाल, पशुचिकित्सा तथा मृत पशुओं की चमड़ी निकालने हेतु मुस्लिम समुदाय के लोगों को शामिल नहीं किया जा सकता जिससे उन्हें भी फायदा हो सके? क्या यह सामुदायिक सद्भाव को बढ़ावा नहीं देगा? गौ रक्षण तथा मृत्यु के बाद गायों के निपटान के लिए दोनों समुदायों का योगदान जिंदा गायों को मारने में हाथ होने से अधिक बेहतर होगा जो कि 24 राज्यों में प्रतिबंधित है और हिंसा को बढ़ावा देता है।

पाँचवा, योजनाएँ तथा गायों की गणना। यदि प्रतिबंध लागू करना चाहते हैं तो गायों की संख्या के बारे में सटीक जानकारी होना आवश्यक है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो रक्षा समितियों का सामना कर पड़ सकता है जो कि कई बार हिंसक होता है। पुलिस भी देश की सारी गायों पर नज़र नहीं रख सकती। इसीलिए लाइसेंस तथा जन्म पंजीकरण महत्वपूर्ण है जिससे गाय के खरीददार उसे केवल उपयोगी जीवन हेतु खरीदने के लिए तथा उसके बाद अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटने के पहले दो बार सोचेंगे। हम हमारे वृद्ध पालतू कुत्तों को नहीं बेचते और न ही हम घर में दादी के साथ ऐसा करते हैं भले ही उनका खराब स्वास्थ्य घर पर आर्थिक बोझ बन गया हो। जो लोग गाय को अपनी माता बोलते हैं उन्हें गाय के साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा वे अपनी माँ के साथ करते हैं।

भले ही हमारे पास जीवित गायों की गणना का डाटा है (आखिरी बार 2014 में गणना की गई थी), यह तभी मायने रखेगा यदि यह गणना जिले के स्तर पर, गाँव के स्तर पर, उम्र तथा लिंग की जानकारी सहित की गई हो। यह गौशालाओं की संख्या तथा अन्य सेवाओं की आवश्यकता का अनुमान लगाने में सहायक होगा।

इस संदर्भ में गायों के लिए आधार क्रमांक का प्रावधान कतई हास्यास्पद नहीं है। यदि हम लाखों कारों, मोटरसाइकिलों का पंजीकरण प्रतिवर्ष करते हैं (करीब 20 मिलियन प्रतिवर्ष)  तथा उन्हें लाइसेंस उपलब्ध कराते हैं तो यह गायों के साथ क्यों नहीं हो सकता?

छठा, यह महत्त्वपुर्ण है। विरोधी प्रश्न करेंगे कि जब हम इतने गरीब हैं तो गायों पर इतना खर्च करने की क्या आवश्यकता है? इसका उत्तर है कि हम गायों पर गरीबों की सहायता के लिए ही खर्च कर रहे हैं। गायों के कारण ग्रामीण इलाक़ों में हज़ारों नए रोज़गार उत्पन्न होंगे तथा खुद की सेवाएँ और आपूर्ति की श्रृंखला बना सकते हैं। यह आर्थिक रूप से सहयोग करेगा।

यह दोहराना आवश्यक है- गायों की सुरक्षा कतई गलत नहीं है लेकिन प्रतिबंध के लिए ज़िम्मेदारी  से भागना समस्या है। भाजपा राजनीतिक मंच पर गायों के लिए अधिक कीमत देगी ताकि वोट ले सके और फिर उसे उन लोगों की ज़िंदगी खराब करने के लिए छोड़ देगी जिन्होंने गाय को आर्थिक लाभ के लिए खरीदा था।