राजनीति
भाजपा का नागरिकता संशोधन विधेयक मूल हिंदू मतदाता को सही संकेत देता है

आशुचित्र- 

  • यह विधेयक पारित हो पाएगा या नहीं, यह और बात है परंतु यह भाजपा के आधार को मज़बूत अवश्य करेगा।
  • यह पहला प्रमुख विधेयक है जो विशेषकर हिंदुओं के हित में है।

संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) में नागरिकता (संशोधन) विधेयक पर सभी विरोधी संशोधन नकारे गए और अब इस विधेयक का प्रारूप जेपीसी द्वारा तैयार किए जाने के बाद लोकसभा में प्रस्तुत किया जाएगा। संभवतः भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपने कार्यकाल में अपने मूल मतदाताओं को प्रसन्न करने के लिए कुछ किया। यह विधेयक पड़ोसी देशों के प्रताड़ित हिंदुओं व अन्य अल्पसंख्यकों को नागरिकता देगा, जो कि भाजपा के घोषणा-पत्र के प्रमुख वादों में से एक था।

राज्य सभा में विपक्ष की बहुसंख्या को देखते हुए इस विधेयक का पारित होना बहुत कठिन है जो पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आकर छः वर्षों से भारत में रह रहे लोगों को नागरिकता देगा। विपक्ष का विरोध इस बात पर है कि इस विधेयक में अल्पसंख्यकों में हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई समुदायो के ही नाम हैं।

मुस्लिम समुदाय का नाम न होना विरोध का कारण नहीं होना चाहिए क्योंकि इन तीनों देशों में कहीं भी मुस्लिम अल्पसंख्यक नहीं हैं और विधेयक का उद्देश्य प्रताड़ित अल्पसंख्यकों की सहायता करना है, न कि आर्थिक कारणों से आए प्रवासियों का। लेकिन भारत में अल्पसंख्यक राजनीति की ऐसी स्थिति है कि सामान्य बोध पर अपवर्जन भी कलह का कारण बन गया है।

इस विधेयक का विरोध असम और अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों में भी हो रहा है जिनका मानना है कि बांग्लादेश से आए प्रवासी जनसांख्यिकी परिवर्तन का कारण बनेंगे और अंततः स्थानीयों से अधिक जनसंख्या उनकी हो जाएगी। भाजपा को यहाँ कुछ करना होगा, विशेषकर असम में जहाँ यह सत्ता में भी है। इसे यह वादा करना होगा कि नागरिकता मिलने पर कुछ लोगों को दूसरे राज्यों में भी बसाया जाएगा।

स्थानीय असमी न सिर्फ बांग्लादेशी मुस्लिमों, बल्कि बांग्लादेशी हिंदुओं को भी वापस भेजना चाहते हैं जो 1971 के बाद भारत में आ बसे थे लेकिन भाजपा इससे सहमत नहीं है। यह सिर्फ आर्थिक प्रवासियों को वापस भेजना चाहती है न कि प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को।

अगर यह विधेयक शीतकालीन सत्र में प्रस्तुत किया जा सकेगा तो लोकसभा में भाजपा की बहुसंख्या के कारण पारित हो जाएगा पर राज्य सभा में इसका पारित होना मुश्किल है। भाजपा मात्र इसके 73 सांसदों, शिव सेना के तीन, अकाली दल के तीन और आरपीआई जैसी कुछ एक सीट वाली पार्टियों के मत अपने पक्ष में गिन सकती है। एनडीए का भाग होने के बावजूद नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड), जो अभी भी अल्पसंख्यक मतों पर केंद्रित है, को मनाना मुश्किल होगा। भाजपा को इस विधेयक को पारित कराने के लिए कम से कम 40-45 और सांसदों की आवश्यकता है।

प्रश्न यह है कि क्या एआईएडीएमके (13 सांसद), बीजेडी (नौ), टीआरएस (छः) और वाईएसआर कांग्रेस (दो) को भाजपा मना पाएगी। राज्य सभा के कुछ मनोनीत सदस्य भी भाजपा का समर्थन कर सकते हैं। इसके बाद भी बहुमत का आँकड़ा दूर लग रहा है।

लेकिन विजय या गतिरोध की सूरत में एक चीज़ स्पष्ट है कि यह भाजपा के आधार में ऊर्जा का संचार करेगा। यह पहला प्रमुख विधेयक है जो विशेषकर हिंदुओं के हित में है। कांग्रेस का प्रतिरोध अपने मुस्लिम मतदाताओं के तुष्टीकरण के लिए है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।