राजनीति
भाजपा को तगड़ी शल्य क्रिया की ज़रूरत, दिल्ली विधानसभा चुनाव के कुछ सबक

शाहीनबाग की छाया में दिल्ली का चुनाव बहुत गरमागरम था। आक्रामक प्रचार में वैचारिक रूप से भटक चुकी और 2019 के लोकसभा चुनाव में हाशिए पर डाल दी गई डरी-सहमी कांग्रेस हथियार डाले ही दिखाई दी। उसे तो शून्य पर टिकना ही था। भाजपा ने जिन मुद्दों को सबसे ऊपर रखा, वे नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) से लेकर कश्मीर के कायाकल्प और मंदिर के निर्णय से जुड़े थे।

सीधे तौर पर ये सारे मसले राष्ट्रीय हितों से जुड़े थे, जिन पर पूरा देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ पहले से एकजुट है। दिल्ली भी इसमें शामिल है, क्योंकि लोकसभा चुनाव में दिल्ली ने भी अपनी ताकत मोदी को दी।

यह सीधी लड़ाई छोटी दिल्ली से बड़ी दिल्ली के बीच थी। एक दिल्ली अरविंद केजरीवाल की। दूसरी दिल्ली मोदी की। केजरीवाल मोदी के गुजरात मॉडल की तरह ही विकास का एक दिल्ली मॉडल चर्चा में लाने में सफल रहे।

दिल्ली से बाहर केजरीवाल के जिन कामों की सराहना हुई है, उनमें सरकारी स्कूलों का कायाकल्प और मोहल्ला क्लिनिक का प्रयोग है, जो जनस्वास्थ्य की दृष्टि से उनका मौलिक प्रयोग माना गया। पिछली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद केजरीवाल ने जिस एक ज़रूरी गलती को सुधारा था, वह थी अनावश्यक बयानबाजी और आरोप लगाने की उनकी पुरानी बुरी आदत। इसे लेकर माफी मांगनी पड़ी थी।

लेकिन वे संभल गए और अपना पूरा समय दिल्ली में आम लोगों की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने में लगाया। इस चुनाव में आते-आते स्कूल और क्लिनिक के उनके प्रयोग देश भर में चर्चा में आ चुके थे। आम वोटरों के लिए सबसे ज्यादा निकटता से प्रभावित करने वाले यही मसले थे, जिनके सहारे वे प्रचार में जुटे।

सबसे महत्वपूर्ण मुख्यमंत्री पद के लिए वे आम आदमी पार्टी का एक आजमाया हुआ निर्विवाद चेहरा थे। मुख्य मुकाबले में थी भाजपा, जिसके पास ऐसा कोई चेहरा नहीं था, जो केजरीवाल का मजबूत विकल्प हो सकता। इसलिए पूरा चुनाव भाजपा की केंद्रीय राजनीति के कर्णधारों ने लड़ा- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह।

मुद्दे भी उनके ही थे, केजरीवाल की दिल्ली के नहीं, जहां वे एक स्वयंसिद्ध मॉडल के रूप में गली-गली में अपनी पैठ जमा चुके थे। मनोज तिवारी गाने-बजाने के मंचों पर भोजपुरी का एक लोकप्रिय चेहरा हो सकते हैं, लेकिन अब दिखावटी सामान का समय गया।

गुजरात के बाद केंद्र की सरकार में आने के बाद नरेंद्र मोदी और कुछ हद तक अपने सीमित संसाधनों और अधिकारों के साथ दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने यह सिद्ध किया है कि परफार्मेंस वाले लोग ही आगे जाएंगे। वे केजरीवाल की तरह आंदोलनों की राजनीति के नए प्रयोग से निकले हों या मोदी की तरह परंपरागत राजनीति में भाजपा में अवतरित हुए हों।

दिल्ली के प्रत्याशित परिणामों के सबक गहरे हैं। पार्टियों, नेताओं और जनता के लिए कुछ सबक इस प्रकार हैं-

  • भाजपा ने पिछले एक साल में मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र को खो दिया है। दिल्ली में उसकी वापसी अभी बहुत दूर की कौड़ी है। खो चुके राज्यों में हार का पोस्टमार्टम किया जाना चाहिए, जो नहीं हुआ है। हार की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। घोटालों ने भी यहाँ बदनामी के बोझ बढ़ाए।
  • पश्चिम बंगाल में परीक्षा का एक और दौर बाकी है, जहाँ के मुद्दे और लीडर वही हैं, जो दिल्ली में थे। पश्चिम बंगाल के होने वाले चुनावों की रणनीति में सुधार तत्काल ज़रूरी है।
  • भाजपा को अपने राज्यों में ऐसा नया नेतृत्व चाहिए, जो मोदी और शाह के वृक्ष पर बेल की तरह न चढ़े बल्कि अपना स्वतंत्र वजूद बनाए। ईमानदार, युवा और जनता से जुड़ा हुआ ताकतवर नेतृत्व। ऐसे ऊर्जावान नेताओं की कमी नहीं है। लेकिन तिकड़मियों के कारण इन्हें आगे आने के मौके नहीं मिलते।
  • जनता अब सिर्फ परफार्मेंस चाहती है। उसे फिजूल भाषण, महंगे प्रचार और दिखावटी नेताओं से चिढ़ है। उसे विजन वाले नेता चाहिए जो एक बार कुर्सी पर आने के बाद कुछ ऐसा करें, जो स्थाई महत्व का हो। एक मुख्यमंत्री के रूप में अर्जुन सिंह को आज भी लोग याद करते हैं, जिन्होंने मध्यप्रदेश में कई बड़ी संस्थाएँ स्थापित कीं। जबकि वे बोलते बहुत कम थे। नारायणदत्त तिवारी का स्मरण भी इसी नाते किया जाता है।
  • अब परंपरागत शाेबाजी की राजनीति का दौर समाप्त समझा जाए। ऐसे नेताओं को लोग बिल्कुल पसंद नहीं कर रहे, जो किसी पारिवारिक  विरासत से आए हों या राजनीति में सफल होने के बाद अपने पत्नी-बच्चों को पदों या टिकट की कतार में खड़ा कर रहे हों।
  • एक बार विधायक, सांसद, मंत्री या मुख्यमंत्री बनने के बाद लोगों की चाहत अपने नेता में सादगी देखने की है। बड़ी गाड़ियाँ, काफिले, पोस्टर, बैनर, विज्ञापनों में उन्हें महान बनाने की कोशिश आम लोगों में मजाक का विषय बन चुकी है। सोशल मीडिया पर कुत्ते, बिल्ली के जन्मोत्सव के बैनर और उन्हें युवा ह्दय सम्राट, जन-जन के नेता जैसे तमगे टांगे जा रहे हैं।
  • लोग यह भी देख रहे हैं कि ऊँचे पदों पर आने के बाद आप कितने ईमानदार और जुझारू कार्यकर्ताओं को आगे ला पाए या सिर्फ अपने नाकाबिल और भ्रष्ट चहेतों को ही उपकृत करते रहे। नेतृत्व की दूसरी पंक्ति काे तैयार करना भी एक कुशल नेतृत्व से अपेक्षित है। लेकिन ज्यादातर नेता अपने लिए चुनौती मानकर अच्छे और संभावनावान नेताओं के पर कतरने को ही अपना राजनीतिक कौशल मानकर चलते हैं।
  • पदों पर आने के बाद जनता यह देखती है कि नौकरशाही में कितने अच्छे और ईमानदार अफसरों को अवसर दिया गया या केवल भ्रष्ट अफसरों से घिरे रहकर अपनी जयजयकार कराते रहे। ज्यादातर नेता अपने तात्कालिक फायदों के लिए चतुर, कमजोर और भ्रष्ट अफसरों को पास रखना अनुकूल समझते हैं। परिणाम घातक होते हैं।
  • परंपरागत राजनीति से निकले नेताओं की इन कसौटियों पर नाकामी के कारण ही भाजपा ने तीन-तीन बार से जीते हुए राज्य खो दिए। अब इन राज्यों में तगड़ी शल्य क्रिया की ज़रूरत है। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में ऐसे कई उपेक्षित नेता और कार्यकर्ता मिल जाएंगे, जिन्हें 15 सालों तक हाशिए पर ही डालकर रखा गया। जबकि वे अच्छी छवि के थे। उनका जनाधार था। कई अफसर ऐसे मिल जाएंगे, जो लुटिया डुबोने का कारण बने, लेकिन मलाई छानते रहे।
  • एक विधायक या एक सांसद अपने इलाके के कुछ सरकारी स्कूलों का कायाकल्प स्थानीय धनपतियों की मदद से आराम से कर सकता है। एक अस्पताल को तो चमकदार बना ही सकता है, बशर्ते उसमें ऐसा करने का विजन और चाहत हो। लेकिन ज्यादातर तबादलों और खदानों से अपने खजाने भरने में लगते हैं। यह बहुत आम है। सब जानते हैं। आम लोग बिल्कुल पसंद नहीं करते।
  • कुछ बातें केजरीवाल से सीखने जैसी हैं और कुछ नरेंद्र मोदी से। दोनों ही बेहद आम परिवारों से निकलकर सिर्फ अपनी क्षमता और अपनी काबिलियत की दम पर वहाँ पहुँचे, जहाँ आज हैं। हरेक पार्टी के हर नेता को आगे बढ़ने के लिए इन दोनों से ही कुछ न कुछ सीखने की जरूरत है। सौ फीसदी अच्छा कोई नहीं है। सौ फीसदी बुरा भी कोई नहीं है।
  • हर एक राज्य के नई पीढ़ी के नेताओं को दिल्ली में वे प्रयोग देखना चाहिए, जो केजरीवाल ने स्कूलों और मोहल्ला क्लिनिकों में किए। गुजरात में भी ऐसे नवाचार कई किए गए, जिन्हें एक सक्सेस स्टोरी की तरह प्रयोग दर्शन के तहत देखा जाना जरूरी है। ऐसा करके हर सांसद और विधायक अपने लिए कोई सीख ग्रहण कर सकता है।
  • कैडर बेस पार्टियों को पंचायत और नगर पालिकाओं के स्तर पर नए नेतृत्व के लिए कुछ ट्रेनिंग मॉडयूल बनाने चाहिए, जिसमें वे यह बुनियादी पाठ पढ़ाएँ कि अगर वे पंच, पार्षद या विधायक बनते हैं तो उनसे कैसे काम की अपेक्षा होेगी और वो क्या होगा, जिससे उन्हें बचना बेहद ज़रूरी होगा।
  • ऐसे प्रशिक्षण के अभाव में पार्षद या विधायक बनने वाले ज्यादातर नेता अपने लिए मिले अवसरों को भाग्य का खेल या राजयोग समझकर सिर्फ दिखावे में पड़े रहकर पाँच साल गँवा देते हैं। वे माल कमाकर अगले टिकट की घात में तिकड़म और प्रपंचों में लगे रहते हैं। यह एक गलत शुरुआत होती है, जिस पर अब अंकुश आवश्यक है।
  • एक सबसे ज़रूरी सबक सबके लिए यह भी होना चाहिए कि जितना मुमकिन हो मुफ्तखोरी की योजनाओं और घोषणाओं पर दाव न लगाया जाए। जनता के लिए भी यह सबक है कि उस पर बिकाऊ होने का अपमानजनक तमगा न टांगा जाए। यह सीधी-सीधी रिश्वत है, जो वोट के बदले दी जा रही है। यह लोकतंत्र के लिए घातक है। सरकारों का काम प्रशासन की बुनियाद मजबूत करना होना चाहिए, जहाँ लोग अपनी ज़रूरतें पूरी करने में  खुद सक्षम हों। खैरात तो खैरात ही है!

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com