राजनीति
2019 में भाजपा अभी भी केंद्र के लिए पहली पसंद, सप्त बिंदुओं पर देना होगा ध्यान

आशुचित्र- 2019 का चुनाव भाजपा अभी नहीं हारी है, इसलिए हाल ही में मिली हार से पार्टी तथा उसके समर्थकों को नकारत्मक विचार नहीं लाने चाहिए।

कुछ ही दिनों पहले भारतीय गणराज्य के 5 राज्यों में चुनावी उत्सव संपन्न हुआ है तथा हमेशा की तरह ही इस दौरान राजनीतिक और मीडिया मंचों पर ज़बरदस्त शोर-शराबा रहा है। समाचार-पत्रों तथा टीवी चैनलों में राजनीतिक पंडितों द्वारा तत्क्षण उपदेश देना उनके लिए भले ही आवश्यक है, किंतु हमारे लिए इन घोषणाओं पर सावधानीपूर्वक प्रतिक्रिया देने से पूर्व खुद चिंतन करना भी आवयशक है।

कुछ ऐसी घटनाएँ जो तख्तापलट के लिए मील का पत्थर साबित हुईं तथा जिन्होंने बड़े परिवर्तन किए, जैसे कि फ्रांस की क्रांति (या रूस की क्रांति) के समीक्षकों की भाँति, यह समीक्षक भी अपने अन्य सहकर्मियों के साथ मई 2014 में अति उत्साहित था। निस्संदेह हमने उतना नहीं देखा कि कवि वर्ड्सवर्थ के कथन कह सकें, “उस प्रभात में जीवित रहना परमानंद था और उसे जवानी में देखना स्वर्ग के समान।”

यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान अपराध तथा भ्रष्टाचार से भारी नीरसता पसरी हुई थी तथा उसके बाद रायसीना पहाड़ी में करिश्माई नेता नरेंद्र मोदी के अंतर्गत नए दल का आना, ताज़ा हवा में साँस लेने की भाँति जैसा प्रतीत हो रहा था।

वहीं इस प्रकार की अतिशय उम्मीदों ने कई क्षेत्रों में निराशा भी भर दी। उल्लेखनीय है कि नई सरकार ने ऐसे आवश्यक कदम उठाए जो बहुत समय से थमे हुए थे। इस नई सरकार का मूल्यांकन सकारात्मक ही रहा लेकिन बाद में कुछ बातें इसकी ही छवि पर खतरा बनकर आ गईं।

पिछले साढ़े चार सालों में पश्चिमी तथा राष्ट्रीय मीडिया के आलोचकों ने भगवा राज्य की राह में ऐसी अड़चनें उत्पन्न की कि शायद ही उसके मार्ग पर सुगमता दिखी हो। इससे पहले की सरकारों के सालों से छवि इतनी दागदार हो गई थी जिसकी सफाई आवश्यक थी। तथा इसमें ही मोदी और उनके सहयोगियों को मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
उनके द्वारा उठाए गए छोटे कदम भी राजनैतिक मंचों पर एक राजनैतिक विपक्ष की भाँति तथा संस्थागत व्यवस्थाओं के माध्यम से बहुत हद तक नाकाम किए गए।

समाजशास्त्री तथा इतिहासकार सदियों से कहते आ रहे हैं कि यदि कोई व्यवस्था अत्याधिक भ्रष्टाचारी तथा निष्क्रिय है तो उसके लिए छोटे अथवा आंशिक बदलाव कभी भी पूर्णतया उचित नहीं होंगे। इसका तात्पर्य पुराने आदेशों के हर तत्व में भीषण बदलाव करना कतई नहीं है। यदि नई सरकार समर्पित है, कुशल है तथा उसका ध्यान केंद्रित है तो गणतंत्र राष्ट्रों में कुछ आवश्यक बदलाव करना संभव है। इसके विपरीत यदि नई सरकार पुराने बर्बाद ढाँचे को बदलने में कुशल नहीं हैं, योग्य नहीं है, तो पुराना दलदल बना ही रहेगा।

मई 2014 में नई सरकार आने के बाद व्यस्थाएँ इसी प्रकार बदली हैं। कुछ बदलाव जो यह करना चाहते थे, उन्हें प्रयोगात्मक रूप से तथा अधूरे विश्वास से किया गया। इन बदलावों के बाद देखा जा सकता है कि नई सरकार द्वारा किए गए कुछ कार्य बहुत लोगों की चाहत के विरुद्ध हुए। वहीं कुछ कार्यों का उन ताकतों द्वारा विरोध किया गया जो कि राष्ट्रीय प्रशासनिक ढाँचे में क़तई बदलाव नहीं चाहते थे। यह सभी नई सरकार के रास्ते में बाधा उत्पन्न कर अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता से बेदख़ल की गई सरकार की मदद कर रहे थे।

कुछ माह पूर्व इस लेखक ने तख्तापलट के भिन्न पहलुओं तथा निजी स्वार्थ वाली ताकतों का क्रमबद्ध रूप से नई सरकार के विरुद्ध खड़े होना इत्यादि का अध्ययन किया था। इन ताकतों को दिखने लगा था कि इनके महत्त्वपूर्ण पद अब ख़तरे में हैं तो इन्होंने अपने अस्तित्व की रक्षा हेतु सभी प्रकार के उचित तथा अनुचित तरीके अपनाए जिनमें अधिकतर अनुचित ही थे।

यह बता देना आवश्यक है कि यह ताकतें अब मोदी सरकार के विरुद्ध एकजुट होकर खड़ी हो गई हैं। वे ताकतें निम्नलिखित हैं-

  • सभी स्तरों पर प्रशासनिक तंत्र के कुछ खंड, जिन्हें प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही हेतु हाल ही में उठाए गए कदमों से भय होने लगा था।
  • न्यायतंत्र में उच्च पदों पर बैठे कुछ लोग
  • बड़े व्यवसायी समूहों से लेकर क्षेत्रीय स्तर की किराना दुकानों तक कुछ धनाढ्य लोग जिन्होंने वित्तीय संस्थाओं के टैक्स अथवा अन्य वित्तीय संस्थाओं से बेईमानी की है।
  • ग्रामीण तथा जातीय वोट बैंकों के प्रतिनिधि जो अपने बिचौलिए की भूमिका को खत्म नहीं होने देना चाहते थे।
  • विदेशी संस्थाओं द्वारा पोषित किए जाने वाले धार्मिक संगठन, जो विदेशी संस्थाओं के लिए ही निष्ठावान हैं तथा वफ़ादारी रखते हैं।
  • तथाकथित बुद्धिजीवी एवं ऐसे संस्थानों के प्रबंधक जिन्हें पिछली सरकार द्वारा पोषित किया जा रहा था तथा संसाधन उपलब्ध कराए जा रहे थे उन्हें मई 2014 के बाद दरकिनार कर दिया गया।
  • छोटे तथा क्षेत्रीय राजनीतिक दल, जो अभी तक ताकतवर दलालों की तरह रहा करते थे तथा अत्यधिक जन तथा धन के नियंत्रक थे।

देखा जाए तो 2019 के आम चुनावों के प्रचार के दौरान भाजपा-एनडीए के रणनीतिज्ञों को इन ताकतों को निशाना बनाना चाहिए। उपर्युक्त ताकतों से देश की जनता को बहुत सारी शिकायतें हैं तथा कई दशकों से ज़मीनी स्तर पर इन ताकतों के लिए नाराज़गी पसरी हुई है। यहाँ आवश्यकता है कि इस नाराज़गी को राष्ट्रवादी ताकतों के हित के लिए प्रयोग किया जाए।

इतिहास ने समय-समय पर उदाहरण दिए हैं कि सालों से निजी जागीरों के मालिक तथा रुतबे वाली ताकतें अपने निजी स्वार्थ के लिए असत्य तथा बनावटी तरीकों का सहारा लेकर अपनी ताकत तथा विशेषाधिकारों को पोषित करती रही हैं, इन ताकतों से सख़्ती से निपटना आवश्यक है। इन ताकतों से शीर्ष नेतृत्व का किनारा कर लेना मूर्खता है।
हाल ही में प्रकाशित हुए मेरे एक लेख में इस बिंदु को मुख्य रूप से प्रदर्शित किया है।

भारत के संदर्भ में जॉर्ज ओर्वल द्वारा महाकाव्य में किया गया वर्णन याद किया जाना चाहिए। सन् 1947 से कांग्रेस के अंतर्गत इन क्षत्रपों ने देश के लोगों की मानसिकता पर भी राज जमा रखा था और इस हद तक जमा रखा था कि लोग उनके लिए दो और दो पाँच मानने को भी तैयार थे। वर्तमान सरकार के विपक्ष में मौजूद सोनिया गाँधी से लेकर यादव परिवार तथा मायावती के दल तक के लोगों की सामंती विचारधारा है, जिसका काफ़ी हद तक 20वीं तथा 21वीं शताब्दी में सामाजिक तथा राजनीतिक स्तर पर सफाया हो चुका है। भारतीय सभ्यता के बुद्धिजीवियों को मई 2019 तक इसे प्रमुख तौर पर रेखांकित करते रहना चाहिए।

इस लेख के उपसंहार में इस बात पर ज़ोर देना होगा कि भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को 2019 के पहले अपनी घोषणाएँ तथा योजनाएँ स्पष्ट रूप से प्रकट करनी होंगी। निम्नलिखित कुछ तर्कसंगत योजनाएँ हैं जिन्हें राष्ट्रवादी ताकतों को आम चुनावों के पहले स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करना चाहिए-

  1. प्रशासनिक तथा राजनैतिक जवाबदेही के साथ एक बेहतर शासन।
  2. सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय तथा न्यायतंत्र की अन्य संथाओं की सार्थक जवाबदेही।
  3. वित्तीय, व्यावसायिक तथा आर्थिक अपराधों के लिए कड़ा रुख़।
  4. रोज़गार के अवसर पैदा करने पर ज़ोर देते हुए अर्थवयवस्था में ज़बरदस्त सुधार।
  5. सशस्त्र बल, रक्षा तथा राष्ट्रीय सुरक्षा बालों को महत्त्व देना तथा सुनिश्चित करना कि प्रशासन व्यवस्था के किसी भी स्तर के कर्मचारी द्वारा देश के रक्षकों को नीचा न दिखाया जाए।
  6. भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति को सहेजना, प्रचार-प्रसार करना और राष्ट्र को पुन: जागृत करना।
  7. स्वास्थ्य तथा पर्यावरण के पतन की मुश्किलों से लड़ना।

मैं लंबे समय से ओगडन नैश का अनुसरण करता रहा हूँ, मुझे लगता है कि उनके अंतिम शब्द 10 जनपथ तथा 24 अकबर रोड के निवासियों के लिए और कहीं भी बैठे उनके साथियों के लिए ही होंगे-

“इन प्रजातांत्रिक राज्यों में मैं एक एकतंत्रीय व्यक्ति हूँ।
अनुवांशिक लक्षणों का एक उत्कृष्ट प्रदर्शन हूँ।
मेरा आसन इस समाज में सर्वोच्च है
इसके लिए मैं अपने पालकों से मिली गुणों की विरासत का ऋणी हूँ।”

यह कविता लुटियन ज़ोन की साजिशों का सार बताती है, वहीं किसी भी प्रकार से प्रधानमंत्री मोदी तथा उनके समूह पर कतई लागू नहीं होती। यह सभी बातें मोदी तथा उनके दल के लिए आवश्यक थीं जो बताती हैं कि अगले कुछ माह में उन्हें भारतीय जनता के समक्ष क्या और किस तरीके से लेकर जाना है ताकि उन्हें पुन: सत्ता मिल सके।

जय भट्टाचार्जी दिल्ली आधारित राजनीतिक एवं व्यापारिक विश्लेषक हैं।