राजनीति
भाजपा-असोम गण परिषद की संधि से नागरिकता संशोधन विधेयक पीछे नहीं छूटना चाहिए

आशुचित्र- सिर्फ एक चीज़ की जानी चाहए- मताधिकार से वंचित जिससे इस्लामियों समेत अवैध लोगों को हमारी राजनीतिक प्रक्रिया का पाँचवा स्तंभ बनने से रोका जा सके।

नागरिकता संशोधन विधेयक पर अनबन के बाद असोम गण परिषद (अगप) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने पुनः गठबंधन कर लिया है। भाजपा जो इन चुनावों में पूर्वोत्तर में वर्चस्व स्थापित करना चाहती है, उसके लिए यह गठबंधन आवश्यक है।

यह स्पष्ट नहीं है कि क्या इस संधि में अगप और बोडोलैन्ड पीपल्स फ्रंट से कोई समझौता निहित है जो इस विधेयक के लोकसभा में पारित होने से नाराज़ थे। क्या इस विधेयक को चुपचाप दरकिनार कर दिया जाएगा या असमियों को शांत करने के लिए चुनावों के बाद इसके संशोधित रूप को लाया जाएगा।

भाजपा की बड़ी गलती थी कि इसने आखिरी समय में अपनी घटक पार्टियों को समझाए बिना और राज्य के लोगों को इसका कारण स्पष्ट किए बिना इस विधेयक को लाने का प्रयास किया था। इससे भी बुरा यह था कि यह उस समय लाया गया जब राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के द्वारा अवैध अप्रवासियों की पहचान और उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया जारी है। यह विरोधात्मक संदेश था जहाँ पार्टी अध्यक्ष अवैध अप्रवासियों को वापस भेजने का वादा कर रहे थे और नागरिकता संशोधन अधिनियम पड़ोसी देशों के पीड़ित अल्पसंख्यों को नागरिकता दिलाने की बात कर रहा था। विधेयक में उल्लेखित है कि हिंदू, बौद्ध, सिख, जैन और ईसाई समुदायों के लोगों को त्वरित नागरिकता प्रदान की जाएगी।

लेकिन यह गलत होगा यदि विधेयक को अनौपचारिक ढंग से दरकिनार कर दिया जाएगा या इतना परिवर्तित कर दिया जाएगा कि यह बांग्लादेश के अवैध हिंदुओं को अपने दायरे से बाहर कर दे। यह विधेयक केवल बांग्लादेश के प्रताड़ित हिंदुओं के लिए ही आवश्यक नहीं है बल्कि इससे पाकिस्तान और अफगानिस्तान के हिंदू शरणार्थियों को भी संदेश जाएगा कि भारत उनका आश्रयदाता है।

असमी हितों, जहाँ भावनाएँ हैं कि 1971 से आए सभी अवैध प्रवासियों को वापस भेजा जाए और बंगाली बहुल वाले असम और पश्चिम बंगाल, जहाँ विधेयक के समर्थक हैं, का मिलान करना भाजपा के लिए कठिन कार्य है।

राजनीतिक दृष्टि से पश्चिम बंगाल में भाजपा की बढ़त के लिए विधेयक महत्त्वपूर्ण है जहाँ हिंदू शरणार्थियों ने अस्थायी आश्रय लिया है। बांग्लादेश से आए प्रताड़ित हिंदुओं को त्यागने से बेहतर है कि भाजपा इस विरोध के साथ आगे बढ़े।

आगे के लिए तीन रास्ते हैं, जैसा स्वराज्य में पहले भी बताया गया था-

पहला, जुलाई 2019 तक एनआरसी की प्रक्रिया समाप्त होने के बाद भाजपा पुनः विधेयक के प्रस्ताव को लाए, तब तक अवैध प्रवासियों की पहचान हो चुकी होगी।

दूसरा, अवैध प्रवासियों की पहचान के बाद जो योग्य हैं, यानि बांग्लादेश के प्रताड़ित हिंदू व अन्य अल्पसंख्यक- उन्हें नागरिकता प्रदान करने की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए।

तीसरा, जो असम में रह रहे हैं व नागरिकता के लिए योग्य हैं, उनमें से बड़े हिस्से को पाँच-छह अन्य राज्यों में जाने के लिए वित्तीय सहायता और रियायतें दी जानी चाहिए जिससे असम का बोझ कम हो।

अन्य अवैध प्रवासियों से मताधिकार छीन लेना चाहिए और अगर संभव हो तो उन्हें वापस भी भेज देना चाहिए। भारत में नागरिकता के अधिकार को अस्थायी कार्य अनुमति से अलग रखना चाहिए। जैसे भारत-नेपाल समझौता के अनुसार नेपाली भारत में कार्य कर सकते हैं और आसानी से घूम सकते हैं, वैसी ही संधि बांग्लादेश के साथ भी की जा सकती है। भारत-नेपाल मैत्री संधि 1950 के अनुच्छेद 7 के अनुसार भारत और नेपाल की सरकारों ने “दोनों देशों के नगरिकों को दोनों देशों में रहने, संपत्ति पर स्वामित्व अधिकार, व्यापार और वाणिज्य में भागीदारी और आसानी से घूमने जैसे विशेष अधिकारों” की स्वीकृति दी।

ऐसा कोई भी कारण नहीं है जिससे इसी प्रकार की संधि बांग्लादेश पर लागू न की जा सकती हो जिससे उसके नागरिक भारत में आकर कार्य कर सकेंगे, रह सकेंगे लेकिन उन्हें नागरिकता नहीं मिलेगी यदि वे नागरिकता संशोधन अधिनियम के तहत योग्य नहीं हैं तो। बांग्लादेश के साथ संधि में एक और बात जोड़ी जानी चाहिए कि इसके नागरिक भारत आने से पहले औपचारिक अनुमति लें। यह बिना दस्तावेज़ों के एक मुक्त प्रणाली नहीं हो सकती है।

भारत और असमियों को यह सपना देखना छोड़ देना चाहिए कि अवैध प्रवासियों को वापस भेज दिया जाएगा और वह भी तब जब बांग्लादेश उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।

सिर्फ एक चीज़ की जानी चाहिए- मताधिकार से वंचित जिससे इस्लामियों समेत अवैध लोगों को हमारी राजनीतिक प्रक्रिया का पाँचवा स्तंभ बनने से रोका जा सके।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।