राजनीति
भारत पर दवाब बनाने के लिए अमेरिका का सहारा लेने वाली टेक कंपनियों को जवाब देने का समय

प्रसंग
  • भारत को भारत में भारतीय डेटा को संग्रहीत करने की आवश्यकता को मंद करने या खत्म करने के लिए अमेरिका से दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
  • भारत को दबाव में झुकना नहीं चाहिए। 
  • मुद्दा यह नहीं है कि डाटा विशेष रूप से कहाँ रखा जाता है, बल्कि यह है कि क्या भारत को अन्य कानूनी बाधाओं के बिना इस डाटा तक सीधी पहुँच प्राप्त हो सकती है या नहीं।

एक वास्तविक खतरा है कि अमेरिकी राजनीतिक और व्यावसायिक दबाव के तहत भारत पीछे हटना शुरू कर देगा या काफी हद तक इस आवश्यकता पर जोर नहीं देगा कि भारतीय ग्राहकों का डेटा भारत में ही संग्रहीत होना चाहिए।

रिज़र्व बैंक ने अप्रैल में पेमेंट फर्मों से “स्वतंत्र नियामक पहुँच” की सुविधा के लिए भारत में अपने ग्राहक डेटा को संग्रहीत करने के लिए कहा था।

पिछले महीने, डेटा गोपनीयता पर बी एन श्रीकृष्ण पैनल ने यह प्रस्ताव देते हुए, कि सभी “महत्वपूर्ण व्यक्तिगत डेटा” को देश के भीतर ही संग्रहीत किया जाए और इस्तेमाल किया जाए, भारतीय ग्राहकों का डाटा एकत्र करने वाली सभी कंपनियों के लिए लगभग ऐसी ही अनिवार्यताएं लागू की थीं।

जबकि मास्टरकार्ड, वीज़ा और पेपाल जैसी भुगतान फ़र्में स्थानीय मानदंडों का प्रभाव कम करने के लिए रिज़र्व बैंक के साथ लामबंद हो गयी हैं, वहीं ऐमेजॉन और माइक्रोसॉफ्ट समेत प्रौद्योगिकी उद्योग की बड़ी कंपनियों ने राजनीतिक और व्यापारिक स्तरों पर अपने लॉबिंग के प्रयासों को आगे बढ़ाया है, जिसका मतलब है कि अंततः अंकल सैम (अमेरिका) अपने तकनीकी दिग्गजों की तरफ से मोर्चा संभालेंगे।

ऐसा नहीं है कि तकनीकी दिग्गजों के पास तर्क नहीं है। वे तर्क दे सकते हैं कि भारत में सभी सर्वरों के स्थापन से लागत में वृद्धि होगी (उदाहरण के लिए भारत में बिजली और रियल स्टेट कीमतें बहुत अधिक हैं), और गोपनीयता को प्रभावित करते हुए, कानून और व्यवस्था एवं सुरक्षा चिंताओं के आधार पर यूज़र डेटा प्राप्त करने की सरकार द्वारा मांग की जा सकती है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में मोज़िला के अम्बा काक ने कहा कि “डेटा स्थानीकरण सिर्फ एक व्यापारिक मामला नहीं है, यह संभावित रूप से सरकारी निगरानी को आसान बनाता है, जो चिंता का विषय है।”

पेमेन्ट्स डेटा लोकेशन मुद्दे पर पेटीएम जो कि काफी हद तक सॉफ्टबैंक और अलीबाबा द्वारा चलायी जा रही है, ने अपनी सहमति दिखाई है वहीं दूसरी ओर अमेरिका की बड़ी कम्पनियाँ इसका विरोध कर रही हैं। अनकहा आरोप यह है कि रिजर्व बैंक कानून पेटीएम के अनुकूल है, क्योंकि इसका डेटा पहले से ही भारत में स्थित है।

लेकिन पेटीएम का दूसरी कंपनियों के साथ जुडने के मुद्दे पर ध्यान देना मुद्दे से भटकना है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि भारत में सर्वर लगाने के लिए भारत के निवासियों की व्यक्तिगत जानकारी इकट्ठा करने के मुद्दे पर संभावित कानून कौन जीतता है या कौन हारता है क्योंकि असली मुद्दा तो संप्रभु क्षेत्राधिकार का है।

भारतीय डेटा भारत और भारतीयों से संबंधित है। यह विदेशी अधिकार क्षेत्र के अधीन नहीं हो सकता है। मुद्दा यह नहीं है कि डाटा विशेष रूप से कहाँ रखा जाता है, बल्कि यह है कि क्या भारत को अन्य कानूनी बाधाओं के बिना इस डाटा तक सीधी पहुँच प्राप्त हो सकती है या नहीं। यदि भारतीय रिजर्व बैंक अमेरिकी अदालतों का दरवाजा खटखटाए बिना भारतीय भुगतान फर्मों का डेटा नहीं पा सकती है, तो यह किस तरह का नेतृत्व कर सकती है?

इसलिए, जब अमेरिकी राजनीतिक दबाव अपने तकनीकी दिग्गजों की सहायता के लिए आगे आता है, तो भारत को अपने तर्कों को मजबूत और तैयार रखने की आवश्यकता है। इसे दूसरे पक्ष से निम्नलिखित प्रश्न पूछने चाहिएः

पहला, यदि डेटा सर्वर अमेरिका में हैं, तो क्या संबंधित कंपनियां गारंटी दे सकती हैं कि डेटा को भारतीय ग्राहक या सरकारी सहमति के बिना स्थानीय कानून प्रवर्तन के साथ साझा नहीं किया जाएगा ? इसके अलावा, यदि भारतीय अदालतों और / या सरकार को डेटा की जरूरत पड़ी तो क्या अमेरिकी कानून आड़े आएगा ? इन सवालों के संतोषजनक उत्तरों के बिना इस मुद्दे पर कोई समझौता नहीं हो सकता है। यदि उत्तर यह है कि अमेरिकी सर्वर पर उपलब्ध भारतीय डेटा पर भारत की सीधी पहुँच अप्रतिबंधित होगी और वह अनुपालन को लागू कर सकता है, तो हम हमेशा समझौता कर सकते हैं। लेकिन कोई नहीं कह सकता है कि अमेरिका इस पर पूरी तरह से सहमत होगा। विचार कीजिए कि विजय माल्या के संदर्भ में यूनाइटेड किंगडम के साथ हमें कितनी परेशानी हो रही है, जहाँ हमें उनकी अदालतों को माल्या के आर्थिक धोखाधड़ी के कथित अपराध के बारे में नहीं बल्कि हमारी जेलों की परिस्थितियों के बारे में संतुष्ट करना पड़ रहा है।

दूसरा गोपनीयता का मुद्दा भारत और अमेरिका दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। एक बार भारतीय गोपनीयता कानूनों में सख्ती अपनाए जाने के बाद अमेरिकी गोपनीयता कानूनों द्वारा भारतीय गोपनीयता कानूनों का उल्लंघन करने का कोई कारण नहीं होगा।

तीसरा, लागत चिंताएं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन यह स्थानीयकरण के सभी रूपों के खिलाफ एक तर्क है। हमें इस प्रश्न पर प्रतिक्रिया देनी चाहिए: देश-विदेश में स्थित आईटी कंपनियों में भारतीय इंजीनियरों को रोजगार देना सस्ता है, तो भारतीय तकनीकी कंपनियों में प्रतिभाशाली व्यक्तियों के मुक्त आवागमन पर प्रतिबंध क्यों? यदि अमेरिका कानून बना सकता है कि क्या आउटसोर्स किया जा सकता है क्या नहीं, तो क्या भारतीय डेटा पर भी ठीक यही तर्क लागू नहीं होता है? वास्तव में हमारे दृष्टिकोण से डेटा अवस्थिति स्थानीय नौकरी सृजन के स्रोत के रूप में देखी जानी चाहिए, जिस प्रकार अमेरिका एच1-बी वीजा के लिए उच्च शुल्क लेता है और इस पर जोर देता है कि यहाँ तक कि भारतीय कंपनियों को भी अमेरिकी एफएटीसीए कानूनों (विदेशी खाता टैक्स अनुपालन अधिनियम) का अनुपालन करने में कीमत चुकानी चाहिए।

भारत को सतर्क रहना चाहिए और अमेरिकी सरकार तथा तकनीकी दिग्गजों के दबाव में नहीं आना चाहिए क्योंकि वे डाटा को अपने पास बनाए रखने के फायदे के चलते भारत पर दबाव बनाएंगे। उपरोक्त तर्क इसके मामले को मजबूत करेंगे।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वह @TheJaggi पर ट्वीट करते हैं।