राजनीति
1943 का बंगाल अकाल: इस प्रलय की माफ़ी लंदन में लम्बे समय से रुकी हुई है

प्रसंग
  •  अंग्रेज़ों की वजह से 1943 में बंगाल का अकाल पड़ा  
  • अंग्रेज़ों के लिए बंगाल अकाल की सत्तरवीं सालगिरह इस विनाश का कारण खुद को मानने का उपयुक्त समय है। और वह इसका भुगतान करना शुरू करें।

बंगाल का प्रलयकारी अकाल, जिसने 3.7 लाख लोगों को धरती से खत्म कर दिया (कईयों ने संख्या और ज्यादा लिखी), के बारे में बहुत कुछ लिखा गया हैI अकाल के कई उल्लेखों में विंस्टन चर्चिल की कई आपराधिक गतिविधियों के बारे में विस्तृत सबूत मिले हैं, साथ ही अकाल को होने देने और लाखों लोगों को मरने देने के लिए छोड़ देने के भी साबूत मिले हैं क्योंकि वह नस्लवादी, गोरे सर्वोच्च्तावादी होने के साथ ही उनसे नफरत करते थेI हालाँकि कभी भी इस अंग्रेज निर्मित त्रासदी को भरा नहीं जा सकता जिसने बंगाल को खत्म कर दिया, कम से कम विंस्टन चर्चिल के उत्तराधिकारियों द्वारा तो  नहीं- और वह अंग्रेजों द्वारा भारत से लूटे गये धन का लगातार आनंद ले रहे हैं- जो उस मानवता के खिलाफ भयानक अपराध और भुगतान करने के लिए माफ़ी मांगता हैI

अनगिनत इतिहासकारों, अर्थशास्त्रियों और शोधकर्ताओं ने इस अकाल को मानव निर्मित बताया और कई करणों के संयोजन को इसके लिए जिम्मेदार ठहरायाI जबकि, बंगाल में थोड़ी फसल के खराब होने, तूफ़ान से राज्य के हिस्सों और खड़ी फसलों को नुकसान हुआ, क्षेत्र में फफुन्दीय संक्रमण से धान की फसल बर्बाद हो गयीं जिसने अकाल में योगदान दिया, अंग्रेज प्रशासन द्वारा सहायता प्रदान करने से मन कर देना, और भारत से अनाज को यूरोप में अंग्रेज सैनिकों के लिए भेजना भयंकर त्रासदी का कारण बना I

यह बिना कारण नहीं है कि तत्कालीन ब्रिटिश प्रीमियर चर्चिल के उपर अकाल का दोषी होने का ठीकरा फोड़ दिया गया. जब 1943 के मध्य में अकाल की रिपोर्ट उनके पास पहुँचने लगी तो उन्होंने लियोपोल्ड आर्मी के सचिव से काले लोगों के प्रति अपनी लायी गयी घृणा को बरकरार रखते हुए से कहा, मैं भारतियों से नफरत करता हूँ, वह जानवर हैं और जानवर जैसे धर्म को मानते हैं’I दूसरे मौके पर उन्होंने युद्ध के मंत्रिमंडल को बताया, ‘अकाल उनकी (भारतियों) खुद की गलती, जानवरों की तरह वंशवृद्धि करने के कारण से हुआ है’I

चर्चिल, गोरे सर्वोच्च्वादी, पक्के उपनिवेशवादी और साम्राज्यवादी थे जिन्होंने असल में अंग्रेज अफसरों को भारत में सहायता प्रदान करने से रोकाI उनकी जटिलता की सीमा का अंदाजा उस फाइल में दर्ज टिप्पणी से लगाया जा सकता है जिसमें अंग्रेज प्रशासन ने बंगाल में भुखमरी के कारण हुई मौतों की संख्या के बारे में चिंता प्रकट की थीI आखिर में उन्होंने लापरवाही से लिखा, ‘उस मामले में अभी तक (मोहनदास) गाँधी की मृत्यु क्यों नहीं हुई?’

चर्चिल के समर्थकों ने कहा कि अक्सर अकाल प्राकृतिक आपदा के कारण होते हैं, जिन्हें रोका नहीं जा सकताI फसलों के तबाह होने को अकाल के सबसे बड़े योगदान के रूप में बताया गया; उन्होंने उस चक्रवात को भी दोषी ठहराया जिसकी वजह से तटीय बंगाल के बड़े हिस्से की कटी हुई घास और फसलों की बीमारी से खाद्दान की कमी हुई और अकाल पड़ाI हालाँकि चर्चिल के समर्थक इस तथ्य को नज़रंदाज़ कर देते हैं भारत में फसल विफलता के लिए लापरवाह अंग्रेज़ प्रशासन सबसे ज्यादा जिम्मेदार थाI

इतिहासकारों के अनुसार, अंग्रेजों ने भारत के बड्डे हिस्से में किसानों को अनाज और गेहूं उगाने पर पाबन्दी लगा दी, और इसकी जगह उन्हें नील और अफीम की खेती करने का हुक्म दिया, जिसे निर्यात किया जा सके और अंग्रेजों के खजाने के मोटी रकम कमाई जा सकेI इसी वजह से भारत में खाद्दान का उत्पादन काफी हद तक गिर गया, और जब बंगाल की धान की फसल ख़राब हुई तब कोई सहायक भण्डार नहीं थेI और अंग्रेज़ प्रशासन की नीतियों और ज्यादा कर की वजह से, किसान कर्ज में बहुत डूब गए और उन्हें अपने खेत बड़े जमींदारों (जोतेदारों) को बेचने पड़ेI अपने मुनाफे को बढ़ाने के लिए अंग्रेजों ने धनी जमींदारों को गरीबों का शोषण करने के लिए प्रोत्साहित कियाI

विदेशी शासक होने के नाते अंग्रेजों का उद्देश्य सिर्फ भारत को लूटना और अपने खजाने में इजाफा करना था, इन्होने कृषि उत्पादकता को बढ़ाने के लिए कुछ नहीं कियाI संयोग से 1770, 1783, 1866, 1973, 1892 और 1897 के अकालों के लिए अंग्रेज़ भी जिम्मेदार थे, जिसके दौरान 14 लाख जानें गयींI तेजी से गिरती कृषि पैदावार और बड़े पैमाने पर कम होता फसल क्षेत्र (क्योंकि किसानों को नील और अफीम की खेती करने के लिए बाध्य किया गया था) विनाश के लिए अपशिष्ट नुस्खा साबित हुआI अंग्रेज़ शासन के दौरान बंगाल चावल के आयातक (मुग़ल शासन के आखिरी दिनों तक) से चावल का निर्यातक बन गयाI अंग्रेजों के कई अधिनियमों, जैसे बंधों पर बड़े पैमाने पर बनी रेलवे लाइनों, जिससे प्राकृतिक बहाव कट जाता था और उपजाऊ जमीन का बड़ा हिस्सा बेकार हो जाता था, ने भी अकाल पड़ने के लिए परिस्थितियां बनायींI

1942 की शुरुआत में पहला कदम बर्मा में जापानियों का आक्रमण था, जिसने उस देश के पांच लाख भारतियों के पलायन की शुरुआत कीI अधिकांश बंगाल में बस गए, जिसने प्रान्त में पहले से ही कम संसाधनों पर बोझ डालाI अप्रैल 1942 के अंत में, सहयोगी सेनाओं को बर्मा से वापस बुला लिया गया था, और जैसे ही वह बंगाल की तरफ वापिस लौटे, सारी आपूर्ति और परिवहन उनकी तरफ मोड़ दी गयीI बर्मा के पतन की वजह से उस देश से चावल के निर्यात में कटौती हुई और बंगाल में चावल के दामों में भारी वृद्धि हुईI लेकिन अंग्रेजों ने सीलोन स्थित अपने सैनिकों के लिए चावल की आपूर्ति जारी रखीI

बंगाल न केवल बर्मा के शरणार्थियों और विभिन्न देशों के सहयोगी सैनिकों से भर गया था बल्कि पड़ोसी राज्यों के श्रमिक से लेकर सैन्य उत्पादन इकाईयों और एयरफील्ड के निर्माण जैसी कई सैन्य परियोजनाओं में काम करने वाले के स्टाफ से भी पटा हुआ थाI लेकिन खाद्द्दनों की सीमित आपूर्ति जिसमें से भी ज्यादातर सैनिकों को भेज दिया जाता था, दाम आसमान छूने लगेI अंग्रेजों ने युद्द के प्रयासों को वित्त पोषित करने के लिए मनमानी और विनाशकारी प्रणाली लागू की जिससे भारतीय मुद्रास्फीति को बढावा मिलाI इसके अलावा, बंगाल में बड़े पैमाने पर सैन्य सुविधाओं की परिणामी मांग के साथ कोलकाता में काम और आश्रय की तलाश में करीब दो लाख लोगों की भूमि और विस्थापन की मांग की गयीI

पूर्वी बंगाल से अंग्रेजों के भारत में जापानियों के आने से डर से अंग्रेजों ने ‘पृथ्वी नीति’ लागू की जिसकी वजह से जापानी सेना को खाने परिवहन की मनाही हो गयीI इस वजह से पूर्वी बंगाल में चावलों के भंडारों को जब्त कर नष्ट कर दिया गया और लोगों को भूखा मरने के लिए छोड़ दिया गयाI अंग्रेजों ने सभी नावों को जब्त कर लिया – 46000 से ज्यादा को- जिससे भोजन और लोगों की आवाजाही रुक गयीI किसान, व्यापारी, मछुआरे  और नाविक दरिद्र हो गये, और भोजन की आवाजाही के पूर्ण प्रतिबन्ध की वजह से भूख और भुखमरी के शिकार हुएI अंग्रेज़ प्रशासन ने लोगों द्वारा समाना की जा रही परेशानियों को सुनने का कोई प्रयास नहीं कियाI

बंगाल में भोजन की कमी को और बत्तर बनाते हुए दूसरे प्रान्तों ने बंगाल में भोजन की मांग के कारण खाद्य कीमतों में वृद्धि के भय से अपनी सीमाओं से बहार इसके निर्यात पर पाबन्दी लगा दी I दिल्ली में अंग्रेज़ शासकों ने इस तरह के प्रतिबंधों को हतोत्साहित करने और हटाने के लिए कुछ भी नहीं कियाI और 1942 के मध्य में अकाल के पहले संकेत उभरे, अंग्रेज़ शासन ने आवश्यक युद्ध उद्योगों में कारीगरों को सामान और सेवाओं के जरुरी वितरण की शुरुआत कीI भखे मर रहे लोगों से चावल को निजी और सरकारी युद्ध उद्योग, सैन्य और नागरिक निर्माण, कागज़, और कपड़ा मिलों, इंजीनियरिंग फर्म, रेलवे, कोयला खनन और सरकारी कारीगरों को विभिन्न स्तरों को स्थानांतरित कर दिया गयाI

इसी तरह, सैनिकों और राज्य के साथ-साथ निजी चिकत्सा देखभाल में सैनिकों और युद्ध के प्रयास से जुड़े लोगों के लिए प्राथमिकता दी गयी थी, और भूखे और बीमार लोगों को मक्खियों की तरह मारने के लिए छोड़ दिया गयाI

कई इतिहासकार भारत छोड़ो आन्दोलन तक पहुँचने वाली घटनाओं, और इस आन्दोलन को, अकाल में योगदान के रूप में देखते हैं I युद्ध में भारतीयों का पूरा सहयोग लेने के लिए चर्चिल ने युद्ध के बाद सत्ता के सीमित हस्तांतरण पर बातचीत करने के लिए स्टैफ़ोर्ड क्रिप्प्स (‘क्रिप्प्स मिशन’) के तहत एक टीम भेज दीI

मिशन असफल रहा और कांग्रेस ने भारत छोड़ो आन्दोलन शुरू किया I जेल में बंद कांग्रेस नेताओं ने अंग्रेजों को जवाब दिया, और आन्दोलन को निर्देशित करने के लिए कोई नेतृत्व नहीं होने के कारण यह जल्द ही युद्धकारी बन गया और जिसकी वजह से कारखानों, पुलों, टेलीग्राफ और रेलवे लाइनों की बड़े पैमाने पर तबाही हुई, जिससे ब्रिटिन के उद्योगों पर खतरा मंडराने लगाI ऐसा मन जाता है कि इसकी वजह से भारतियों के प्रति ब्रिटिश दृष्टिकोण सख्त हो गया और भूख से मर रहे लाखों लोगों के प्रति पहले से ही घृणा करने वाले चर्चिल को और बेपरवाह कर दियाI

1942 के आखिर में और 1943 की शुरुआत में, वाइसराय लिनलिथगो, बंगाल के राज्यपाल जॉन हर्बर्ट, भारत में ब्रिटिश सेना के कमांडर-इन-चीफ जनरल औसिन्लेच्क, और यहाँ तक कि दक्षिणी-पूर्वी एशिया के ब्रिटिश सेना के सुप्रीम कमांडर लार्ड लुइस माउंटबैटन ने बंगाल के लिए लन्दन से खाद्य आयात करने के लिए अनुरोध किया I लेकिन चर्चिल के नीचे ब्रिटिश युद्ध केबिनेट ने लगातार उन अनुरोधों को बंद कर दिया और इसकी जगह बंगाल से सीलोन के चावल के आयात के लिए कहा गयाI ब्रिटिश युद्ध कैबिनेट ने संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा समेत कई देशों से खाद्य राहत के प्रस्तावों को भी अस्वीकार कर दिया। लेकिन चर्चिल के तहत ब्रिटिश युद्ध कैबिनेट ने लगातार उन अनुरोधों को बंद कर दिया और इसके बजाय, बंगाल से सिलोन के चावल के आयात के लिए कहा गया। ब्रिटिश युद्ध कैबिनेट ने संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा समेत कई देशों से खाद्य राहत के प्रस्तावों को भी अस्वीकार कर दिया। चर्चिल ने न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया से सिलोन, मध्य पूर्व, दक्षिण अफ्रीका और यूरोप में भोजन के पहले से मौजूद विशाल भंडार बढ़ाने के लिए खाद्य लदान का निर्देश दिया था, जब वह आसानी से बंगाल में भी एक हिस्सा भेज सकता था। ऐसा लगता है जैसे चर्चिल कुछ हद तक बंगाल को भूखे मरने को छोड़ने के लिए प्रतिबद्ध थाI

भुखमरी और कुपोषण के साथ मलेरिया, चेचक और हैजा जैसी बीमारियों के अनियंत्रित फैलाव और युद्ध प्रयास से अलग नागरिकों के लिए चिकित्सा देखभाल और दवाओं से वंचित होने के कारण लाखों मौतें होती रहीं। अकाल ने भी विकट सामाजिक संकट पैदा किया-लोगों के सामूहिक प्रवासन, लाखों परिवारों के विघटन, सैकड़ों हजारों अनाथ और विधवाओं या बच्चों और महिलाओं और लड़कियों को वेश्यावृत्ति में धकेल दियाI

चर्चिल के पक्ष समर्थकों, कुछ अंग्रेजों और अन्यों लोगों का तर्क है कि अकाल युद्ध का एक अनपेक्षित परिणाम था और यह प्राकृतिक आपदाओं, फसल विफलताओं, बाजार विफलताओं, और युद्ध के साथ ब्रिटिश युद्ध कैबिनेट की अति व्यवस्था का दुर्भाग्यपूर्ण संयोजन था, क्योंकि यह बंगाल के लाखों भूखे लोगों को राहत प्रदान करने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे सका। जो वे भूल जाते हैं वह यह कि अंग्रेजों ने उस समय बलपूर्वक भारत पर शासन किया था, और ब्रिटिश जनता के कल्याण की मुख्य जिम्मेदारी चर्चिल पर थी, जिन्होंने बंगाल को आसानी से राहत पहुँचाने के लिए कुछ भी नहीं किया था, जबकि वह ऐसा कर सकते थे। और ऐसा नहीं है कि ब्रिटिश नागरिक-जिन्होंने युद्ध के दौरान किसी भी समय भूखे होने के करीब, कहीं भी “असहिष्णुता” की कमी दिखाते हुए रोटी देखी थी।ब्रिटिश प्रीमियर की वजह से, ब्रिटिश युद्ध उद्यम और चर्चिल के लिए भारतियों ने अपने जीवन की कीमत चुकायी। अंग्रेजों की वजह से अकाल पड़ा, फिर चाहे उनकी अक्षमता या योजना द्वारा यह अकादमिक बहस की बात है। लेकिन अंग्रेजों के लिए बंगाल अकाल की सत्तरवीं सालगिरह इस विनाश का कारण खुद को मानने का उपयुक्त समय है। और वह इसका भुगतान करना शुरू करें।

अनुलेख: ब्रिटिश प्रधान मंत्री टोनी ब्लेयर ने 1840 के आयरिश आलू के अकाल में ब्रिटिश सहभागिता के लिए माफ़ी मांगी जिसकी वजह से 10 लाख लोग मरेI