राजनीति
राजस्थान चुनावी रणभूमि: सात कारक क्यों भाजपा फिर से कर सकती है राजस्थान पर कब्जा
राजस्थान चुनावी रणभूमि

प्रसंग
  • चुनावी सरगर्मियाँ जोरों पर हैं। भाजपा फिर से उसी तरह वापसी करने की कोशिश कर रही है जिस तरह से सन् 2012 में पंजाब में अकाली दल और सन् 2016 में तमिलनाडु में अम्मा ने की थी

आमतौर पर ऐसा सुनने को मिल रहा है कि भाजपा मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में तो अपना सिक्का जमाए रख सकती है लेकिन राजस्थान में इसके हारने की उम्मीद है। शुरूआती सर्वेक्षणों ने एकसाथ इस नतीजे की ओर इशारा किया है। राज्य के मतदाता मौजूदा सरकारों को सत्ता से बेदखल करना चाहते हैं। राज्य चुनाव जीतने वाली पार्टी आमतौर पर लोकसभा चुनाव भी जीतती है, जिससे मोदी-शाह जोड़ी पर दाव लग गया है। भाजपा की राज्य और केन्द्र सरकार ने इस लोकप्रिय धारणा को गलत ठहराने और राज्य में फिर से अपनी लहर को वापस लाने के लिए कमर कस ली है। कई ऐसे कारक हैं जो भाजपा के पक्ष में काफी फायदेमंद साबित हो सकते हैं।

  1. राज्य में मोदी बहुत लोकप्रिय हैं

राजस्थान में मोदी लहर काफी मजबूत है। 2014 के राष्ट्रीय चुनावों में, चुनाव के बाद सीएसडीएस द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार, भाजपा के 42 फीसदी मतदाताओं ने कहा था कि अगर नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार न होते तो वे पार्टी को वोट न देते, जबकि पार्टी का राष्ट्रीय औसत केवल 27 प्रतिशत था। ‘इंडिया टुडे’ द्वारा 7 सितंबर 2018 को जारी एक्सिस पॉलिटिकल स्टॉक एक्सचेंज के अनुसार, 57 फीसदी उत्तरदाता नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं जबकि 35 फीसदी लोगों ने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में देखने की इच्छा जताई। नरेन्द्र मोदी, राहुल गांधी पर 22 फीसदी बढ़त बनाए हुए हैं। करीब 46 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने मोदी के प्रदर्शन को “गुड” रेटिंग दी जबकि करीब 12 प्रतिशत ने इसको “औसत” बताया। इन नतीजों से पता चलता है कि मोदी ने अपने प्रदर्शन से काफी हद तक जनता को संतुष्ट कर लिया है। हाल ही के कर्नाटक चुनावों में हम लोगों ने देखा है किस तरह से आखिरी 10 दिनों में मोदी के चुनाव प्रचार से भाजपा को 2 प्रतिशत से 3 प्रतिशत की सकारात्मक बढ़त हासिल हुई थी, जिसकी वजह से यह सबसे बड़ी पार्टी बनीI

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  1. महिला मतदाताओं का उभरना

महिला मतदाता बड़ी संख्या में उभरकर आ रही हैं और राज्य की इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया में स्वतंत्र रूप से भाग ले रही हैं। 2013 में पहली बार महिलाओं का मतदान पुरुषों की तुलना में अधिक (75.6 प्रतिशत बनाम 74.9 प्रतिशत) था और बीजेपी ने किसी भी राजनीतिक दल द्वारा अब तक की सबसे ज्यादा सीटें हासिल करके इतिहास बनाया था। जिस वजह से वसुंधरा राजे को एक शानदार जीत हासिल हुई थी। राजे भारत की उन दो महिला मुख्यमंत्रियों में से एक हैं जो भारत की शीर्ष 5 महिला राजनेताओं में से एक में गिनी जाती हैं। महिला उन्मुख योजनाओं के कारण वसुंधरा राजे की लोकप्रियता बढ़ी है। अपने आत्मविश्वासी व्यक्तित्व, शाहीपन, परिवर्तनीय दृष्टि और प्रशासनिक क्षमता के कारण वह राजस्थानी महिलाओं के लिए एक आदर्श के रूप में उभरी हैं। उज्ज्वला योजना की लोकप्रियता महिला मतदाताओं को प्रेरित करने वाला एक और कारक हो सकता है।

  1. कांग्रेस के सीएम उम्मीदवार पर भ्रम

कांग्रेस हाई कमांड ने “सामूहिक नेतृत्व” के तहत चुनाव लड़ने का फैसला किया है। भले ही अशोक गेहलोत पिछले दो चुनावों में पार्टी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार रहे हों, यह गुजरात में पार्टी के अच्छे प्रदर्शन के कारण किया गया है और कांग्रेस नेताओं के बीच 35 प्रतिशत का नेतृत्व कर रहा है। सचिन पायलट, जिन्हें पार्टी को मिली उप-चुनाव जीत के का श्रेय दिया जाता है, भी मुख्यमंत्री पद के लिए एक बड़े दावेदार माने जा रहे हैं। पायलट गुज्जर समुदाय से संबंधित है, जो राज्य की 9 प्रतिशत आबादी का हिस्सा है और गेहलोत माली समुदाय (4 प्रतिशत) से संबंधित है। तो ऐसे समय में जब चुनाव किसी एक चेहरे को सामने रखकर लड़े जा रहे हैं, तब कोई निश्चित उम्मीदवार नहीं होने से पार्टी के चुनाव जीतने की संभावनाओं को नुकसान पहुंच सकता है। इस भ्रम के कारण, राजे को इंडिया टुडे-एक्सिस के पॉलिटिक स्टॉक एक्सचेंज में गहलोत के साथ बराबरी पर 35 प्रतिशत की लोकप्रियता प्राप्त हुई है।

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  1. किरोड़ी लाल मीणा की वापसी

विधानसभा चुनाव से पहले विधायक किरोड़ी लाल मीणा की वापसी भाजपा के लिए बहुत ही फायदेमंद है। पांच बार विधायक रह चुके और दो बार सांसद रह चुके मीणा एक प्रभावशाली नेता हैं और पूर्वी राजस्थान के 11 जिलों में 28 विधानसभा सीटों पर उनके समर्थकों की महत्वपूर्ण उपस्थिति है।राजे के साथ मतभेद होने के बाद, 2008 में उन्होंने भाजपा पार्टी छोड़ दी थी और राष्ट्रीय पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष बन गए थे।भले ही प्रबल भाजपा लहर ने राज्य पर जीत हासिल की थी फिर भी 2013 में पार्टी ने चार सीटें जीती / 4.3 प्रतिशत वोट जीते थे। पारंपरिक तीसरी पार्टी -बहुजन समाज पार्टी की तुलना में यह 1 प्रतिशत अधिक था।यदि कांग्रेस-बसपा गठबंधन राज्य में क्रियाशील हो जाता है तो यह भाजपा की शक्ति को कम करेगा।

  1. हाल के चुनावों की शुरुआत में कांग्रेस रही कमज़ोर

हाल के चुनावों की शुरुआत में कांग्रेस भी क्षीण हो रही है और अपना रास्ता साफ़ करने में असमर्थ है। गुजरात और कर्नाटक में सभी सकारात्मक संकेत मिलने के बावजूद भी पार्टी चुनाव जीतने में नाकाम रही। जबकि गुजरात और कर्नाटक के नतीजे औसत कांग्रेस कार्यकर्ता का मनोबल बढ़ा सकते थे, तथ्य यह है कि अंत में मोदी ने आकर सबसे अधिक वोट प्राप्त किए जो कि पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए बहुत ही निराशाजनक बात है। राहुल के लिए एक और चुनौती यह होगी कि कैसे वह उन तीन राज्यों के लिए समय निर्धारित करेंगे जिनमें एक ही समय में चुनाव होने हैं।

  1. भाजपा ने सफलतापूर्वक जातियों का गठबंधन किया

वर्ष 1991 में भाजपा ने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान तीनों राज्यों में सरकार बनाई थी। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद इन सरकारों को पी. वी. नरसिम्हा राव द्वारा खारिज कर दिया गया था। जब भाजपा उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में हार गई थी तो तुलनात्मक रूप से राज्य में उच्च अल्पसंख्यक आबादी के बावजूद भी यह 1993 के पुनर्निर्वाचन में राजस्थान में फिर से वापस आईI पिछले कुछ वर्षों में पार्टी ने अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के बीच अपना वर्चस्व बढ़ाया है जो परंपरागत रूप से कांग्रेस का समर्थन करती थीं। यह अपनी नगरीय पार्टी छवि को बहाल करने में भी सफल रही है, क्योंकि राज्य में ग्रामीण सीटों (200 में से 175) की संख्या अधिक है।

  1. भाजपा का प्रतिधारण अनुपात बढ़ रहा है

भाजपा का प्रतिधारण अनुपात, जो कि इसकी एकचुनाव से दूसरे चुनाव तक सीटों को बनाए रखने की क्षमता है, 1993-98 में 16 प्रतिशत से लगातार बढ़कर 2008-13 में 65 प्रतिशत हो गया है।जबकि कांग्रेस के लिए इसी अवधि के दौरान यह 56 प्रतिशत से घटकर 5 प्रतिशत हो गया है।इसका मतलब है कि भाजपा का प्रदर्शन अधिक स्थिर है जबकि कांग्रेस पार्टी का अधिक परिवर्तनशील है।0.50 (बदतर, 1998) से लेकर 1.8 (सर्वश्रेष्ठ, 2013) तक के दायरे में भाजपा का सीट-शेयर अनुपात से लेकर वोट-शेयर अनुपात भी बेहतर है, जबकि कांग्रेस का यह अनुपात 0.32 (बदतर, 2013) से लेकर 1.7 (सर्वश्रेष्ठ, 1998) के दायरे में है।यहाँ तक कि जब कांग्रेस विजयी हुई है, तब भी सीट-शेयर से लेकर वोट शेयर अनुपात में गिरावट देखी जा रही है, हिंदुस्तान टाइम्स के विश्लेषण के अनुसार जो1998 में 1.7 से घटकर 2008 में 1.3 हो गई थी।

जनमत सर्वेक्षण क्या कह रहे हैं?

एबीपी-सी के जनमत सर्वेक्षण ने 200 सीटों में से 130 सीटों के साथ कांग्रेस की जीत की भविष्यवाणी की है, जबकि इंडिया टुडे-एक्सिस ने भी सुझाव दिया है कि 48 प्रतिशत उत्तरदाताओं को राज्य के नेतृत्व में बदलाव चाहिए।सार्वजनिक भविष्यवाणी मंच क्रॉउडविज़्डम ने कांग्रेस के साथ एक त्रिशंकु विधानसभा की भविष्यवाणी की है, जिसके अनुसार 96 सीटों के साथ कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बताई गयी है जबकिभाजपा को 91 सीटें, बसपाकोचार और अन्य कोनौ सीटें प्राप्त होंगी।

सीधे-सीधे कह जाए तो, चुनावी सरगर्मियाँ जोरों पर हैं। भाजपा फिर से उसी तरह वापसी करने की कोशिश कर रही है जिस तरह से सन् 2012 में पंजाब में अकाली दल और सन् 2016 में तमिलनाडु में अम्मा (जयललिता) ने की थी।

अमिताभ तिवारी एक पूर्व कॉर्पोरेट और निवेशबैंकर हैं जो अब राजनीति और चुनावों में अपनी विशेष रुचि ले रहे हैं। उपरोक्त विचारउनके व्यक्तिगत हैं। इनका ट्विटर हैंडल @politicalbaaba है।