राजनीति
अयोध्या: क्या तुलसीदास के आँसू व्यर्थ जाएंगे?

प्रसंग
  • अयोध्या राजनीतिक शक्ति या इतिहास का विषय नहीं है, बल्कि परंपरा, निरंतरता और आस्था का विषय है।
  • यदि एक अनुभूति है कि इस भूमि पर कोई भी धर्म नहीं है, बल्कि एक साधारण जीवन पद्धति है, तो शायद अयोध्या मुद्दे का उत्तर हमारी सोच से कहीं अधिक निकट हो सकता है।
  • और शायद, बस शायद, हम तुलसी दास जी के आंसुओं को पोछ सकें।

जैसे ही अयोध्या मुद्दा भारत के सर्वोच्च न्यायालय में संभावित रूप से अंतिम चरण में प्रवेश करता है, शायद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारतीयों की एक भारी बाहुल्यता के साथ बस यही मुद्दा इतने व्यापक रूप से गुंजायमान क्यों है। अलग-अलग लोग इसे अलग-अलग तरीकों से देखते हैं: उदाहरण के लिए, कुछ लोग इसे एक साधारण भूमि विवाद मानते हैं। कुछ अन्य लोग इसे कुटिल, राजनीतिक रंग में रंगना चाहते हैं। कुछ का मानना है कि अयोध्या मुद्दा एक गहरी, चोटिल सभ्यता का प्रतीक है, कुछ अन्य लोगों के लिए यह 1947 के विभाजन का अंतिम अधूरा कार्य है। फिर भी, इन धारणाओं से परे एक सरल सत्य है जो अब तक आधी सहस्राब्दी से अखंडित रहा है: कि, अयोध्या में भगवान राम के जन्मस्थान पर सन 1528 में एक मंदिर के विनाश की कहानी ने एक भव्य मंथन को जन्म दिया – एक ऐसा मंथन जो अभी भी हमारे पूरे समाज में भारी लहरें पैदा करता है।सबसे पहले ये लहरें भारत के गंगा तटीय मैदानों में सभी सामाजिक, राजनीतिक, वाणिज्यिक और आध्यात्मिक क्षेत्रों में फैलीं और इसके बाद महाद्वीप के बाकी हिस्सों मे फैल गईं।इस प्रक्रिया में, इस घटना ने प्रतिक्रियाओं की एक श्रृंखला उत्पन्न की, जिसे हमने अभी तक पूरी तरह से समझा नहीं है।यह एक लंबी कहानी भी है जो बाबरी मस्जिद के निर्माण से पहले, एक हजार साल पहले तमिलनाडु में शुरू हुई थी। वहाँ से, यह चोल राजा के साथ बंगाल गयी, गज़नवी साम्राज्य के हमलों से दुबक गयी, दिल्ली सल्तनत की स्थापना की साक्षी बनी, बाबर और उसके वंशजों का पीछा किया, करुणा में कुछ आँसू बहाये और यहाँ तक कि आधुनिकता का स्वागत भी किया।यह हमारे डिजिटल युग में समाप्त होती है, जिसमें अंतिम अध्याय लिखे जाने का इंतजार है।

यद्यपि हमारी कहानी दार्शनिक-संत रामानुज के साथ शुरू होती है, जो 11 वीं शताब्दी की शुरुआत में तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदुर में पैदा हुए थे। यह दक्षिण में चोल प्रभुत्व का समय था, जिसमें मेधावी राजाओं की एक पंक्ति इतिहास में अपना नाम दर्ज करने के लिए तैयार थी। देखा जाए तो, कि इस समय गंगा के भारतीय मैदान पुराने गुर्जर-प्रतिहार, राष्ट्रकूट और पाल साम्राज्यों के पतन के बाद एक एक पुनर्स्थापना की बाट जोह रहे थे, जबकि साथ ही साथ गजनी के मोहम्मद द्वारा क्रूर,आवर्ती लूटपाट का दंश भी झेल रहे थे।मालवा पठार के राजा भोज, जो पेशावर-अट्टोक क्षेत्र के राजाओं में से थे – जैसे जयपाल और उनके बेटे आनंदपाल, और कई छोटे राज-मुकुट थे।लेकिन तमिलनाडु गज़नवी साम्राज्य के प्रकोप से प्रभावित होने के लिए इन भूमियों से बहुत दूर था।इसके बजाय, जैसा कि शांति और समृद्धि के युग के दौरान अक्सर होता है, कोरोमंडल तट एक नई सोच का गढ़ बन गया। उस नए विचार के आधार थे रामानुजम; एक व्यक्ति जिसने भक्ति मेंवेदान्त दर्शन का, या तार्किक, संरचित और उचित ढांचे में भक्तिवाद का सफलतापूर्वक विलय किया। आज हम उनके दर्शन को योग्य अद्वैतवाद या अधिक लोकप्रिय रूप से ‘श्री वैष्णववाद’ कहते हैं।उनके लिए, यह एक विविध समाज की विभिन्न आवश्यकताओं के लिए एक आदर्श समाधान था।

यह इस प्रकार विडंबनापूर्ण है कि एक नौजवान के रूप मेंयह तमिल ब्राह्मण तमिलनाडु के कांची में एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय में अद्वैत वेदांत का छात्र था।शुद्ध तर्क का यह विद्यालय एक पूर्व विचारक और साधक शंकर द्वारा स्थापित किया गया था, जिन्होंने भी विभिन्न ग्रन्थों के सार को एक तर्कसंगत एकरूप में मिलाकर इस भ्रमित भूमि की विखंडनशील प्रवृत्तियों को कम करने की कोशिश की थी। शंकर के लिए, यदि सबकुछ ‘एक’ था, एवं वह ‘एक’ और कुछ नहीं बल्कि सिर्फ सत्य था,तो आपको एक व्यक्ति को बेहतर बनाने की आवश्यकता थी और इस प्रकार समाज को बेहतर बनाने की आवश्यकता थी,और इस तरह की एकता के तर्क का प्रदर्शन करना था।लेकिनरामानुज नामक एक उज्ज्वल, युवा छात्र ने भिन्न रूप से विचार किया।उनके लिए, मोक्ष की एक प्रमुखता थी जो भव्य, शंकर मार्ग द्वारा सामाजिक सद्भाव के अनुसन्धानों का स्थान लेती है।उनके लिए, समाज की मूल इकाई थी: एक व्यक्ति – एक साधारण, विनम्र आत्मा,जिसे जीवन नामक इस कष्टप्रद मार्ग से गुजरने के लिए उड्डीयमान आध्यात्मिक भँवरों की तुलना में कुछ ज्यादा की आवश्यकता थी।यह एक उतना भी विरोधाभासी सिद्धान्त नहीं था जितना शायद कुछ लोग सोच सकते हैं, कि जबकि शंकर का ध्यान उन व्यक्तियों पर था जो प्राचीन तरीकों को पढ़ाते और अभ्यास करते थे, जिसका अर्थ था पुरोहित वर्ग, वहीं रामानुज शंकर के अद्वैतवाद को एक कदम और आगे ले गए और इसे एक व्यापक आधार पर लागू किया।इस प्रकार रामानुज के लिए, कोई भी अस्पष्टता नहीं थी, जैसा कि संभवतः वह धार्मिक संतों की एक समतुल्य पुरानी तमिल परंपरा द्वारा प्रभावित थे।उनके विचार में, एकता की अवधारणा को आम जनता द्वारा स्वीकृति के लिए एक मूर्त रूप की आवश्यकता थी।

सीधे शब्दों में कहें तो युवा पुरोहित ने दिखाया कि यदि वास्तव में सब कुछ ‘एक’ था, जैसा कि शंकर ने कुछ शताब्दियों पहले एक अधिक नैदानिक और अमूर्त भावना में सिद्ध किया था, तो वह ‘एक’ थे भगवान विष्णु और उनके अवतार;और वह एक था, इस देवता के लिए अनर्ह भक्ति में पड़ा मोक्ष का मार्ग। रामानुज निश्चित रूप से यह मामला बनाने वाले पहले व्यक्ति नहीं थे, लेकिन इसे उन्होंने सर्वश्रेष्ठ बनाया और इस कदर प्रभावशाली बनाया कि उनके सिद्धांतों ने ‘राम एक आदर्श व्यक्ति’ को राम ‘एक’ ईश्वर में अपरिवर्तनीय ढंग से परिणत करने के लिए अंतिम आधार प्रदान किया।माना कि, भारत में गंगा के मैदानों में राम की उपासना विधि बहुत लंबे समय तक विद्यमान थी, ठीक वैसे ही जैसे कृष्ण की, लेकिन इसे विष्णु-आधारित भक्तिवाद के सभी मूल देवताओं में संगठित, आध्यात्मिक प्रगमन के अगले तार्किक कदम की अनुमति के लिए रामानुज की आधारभूत, दार्शनिक संरचना व्यवस्था की आवश्यकता थी।

तो यह अवधारणा थी जिसने तमिलनाडु से उत्तर तक विस्तृत तटीय मैदानों में अपना मार्ग बनाया और एक आध्यात्मिक व्यवस्था,और फिर यह एक मानक बन गया जिसकी उसके बाद से सबने पालना  की,की स्थापना को विनियमित किया।जो आश्चर्यजनक है और दुर्लभ रूप से लिखा गया है वह है जिस तरह से उत्तर भारत एक साहसी सैन्य अभियान द्वारा इस नए अभियान के लिए खोला गया था। सन 1019 में प्रसिद्ध राजा राजा के पुत्र राजा राजेंद्र चोल ने तटीय आंध्रा, उड़ीसा, अधिकांश बंगाल और छत्तीसगढ़ एवं मध्यप्रदेश के कुछ हिस्सों पर नियंत्रण करने के साथ एक महान तमिल सेना का नेतृत्व किया। यहाँ तक कि पुरालेख संबंधी व्याख्याएँ भी व्यक्त करती हैं कि उन्होंने गंगा की घाटी में चित्रकूट – राम महाकाव्य के समानार्थी एक स्थान – तक अपना मार्ग प्रशस्त किया था। वह इतने सफल थे कि 12 वीं सदी के अंत तक राजा कुलोत्तुंगा के शासनकाल के दौरान इन भूमियों ने अगली दो सदियों तक चोल साम्राज्य को श्रद्धांजलि अर्पित की। अविश्वसनीय है लेकिन सच है कि गहन दक्षिण के एक राजा ने गंगा के मैदानी इलाकों की भूमियों तक विजय प्राप्त की और हमारे इतिहास में एक अद्वितीय साहस का परिचय दिया। लेकिन ऐसा हुआ था।

निस्संदेह रूप से, इस मार्ग के द्वारा रामानुज की शिक्षाओं के हस्तांतरण के बारे में यहाँ मैं जो कुछ भी लिख रहा हूँ, वह सिर्फ अनुमान है क्योंकि हमारे पास इस मामले को सिद्ध करने या अस्वीकार करने के लिए कोई डेटा उपलब्ध नहीं है। लेकिन साथ ही इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि यदि कोई भी व्यक्ति मध्ययुगीन भक्ति के विभिन्न तरीकों की जड़ों का पता लगाता तो ऐसी अधिकांश जड़ें उसे वापस रामानुज तक ले जातीं। और चाहे कुछ भी हो, यदि इतिहास ने हमें कुछ भी सिखाया है तो यह वह है कि जहां सैन्य विजय जाती है, व्यापार इसके पीछे-पीछे आता है; और जहां व्यापार जाता है,वहाँ इंजीलवाद निकट से पीछा करता है।यह मानव संपर्क की प्रकृति है।

इसके बाद तेजी से एक अन्य दिलचस्प विकास हुआ जब अगली दो से तीन शताब्दियों में रामायण का दो मोर्चों पर समानान्तर विकास हुआ: जबकि वाल्मीकि रामायण को संस्कृत से कई स्थानीय भाषाओं में अनुवादित किया गया, वहीं रामायण की प्रकृति में भी बदलाव आया – एक महाकाव्य से एक आध्यात्मिक पाठ में। यह इतनी भी अजीब प्रक्रिया नहीं है जितनी कोई कल्पना कर सकता है क्योंकि यदि ईश्वर है तो यह अनिवार्य ही है कि एक कहानी हो और एक मजबूत आध्यात्मिक आधार हो जो उस देवता की सम्पूर्ण भक्ति के लिए स्पष्ट कारण प्रदान करे।और यह तर्क ब्रह्मांड पुराण नामक एक पुराण में प्रस्तुत किया गया था।बहुत से लोग यह नहीं जानते कि यह पुराण ललिता सहस्रनाम का मूल स्रोत है, जो कि देवी माँ की छंदबद्ध आराधना है और जिसे आज भी अधिकांश बच्चों को सिखाया जाता है। जबकि इसका मूल काफी प्राचीन है, वहीं वर्तमान में इस्तेमाल की जाने वाली इसकी अंतिम संरचना ने संभवतः 15 वीं शताब्दी में अपना अंतिम स्वरूप प्राप्त किया था। जिसकी रचनाकारिता का श्रेय पंजाब के एक धार्मिक संत रामानन्द को दिया जाता है। लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस पुराण में वाल्मीकि की कविता की पहली और सबसे प्रसिद्ध आध्यात्मिक व्याख्या भी शामिल है, जिसे आध्यात्म रामायण कहा जाता है – जो कि छंदों का एक समूह है जिसने पूरी धरती पर दर्जनों धार्मिक साधुओं को श्री वैष्णववाद को अपनी स्थानीय भाषा के संस्करणों में प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित किया।

इन संयुक्त प्रभावों का असर रोमांचकारी था:सल्तनत क्षेत्रों में जातीय बंदिशों की पुरानीप्रथाओंको कोई उत्साही प्रचारक नहींथा,और दक्कन में पारंपरिक सत्ताधारीघरानोंकी पकड़ भी कमजोर हो गयी थी, जिससे लोकप्रिय पसंद की विभिन्न भाषाओं में मोक्षको अंतिम व्यक्ति तक स्वतंत्र रूप से विचरण करने की अनुमति थी।12वीं और 16वीं सदी के बीच इस महाकाव्य का व्यापक रूप से बोली जाने वाली प्रत्येक प्रमुख क्षेत्रीय भाषाका अपन एक अलग ही भाव था – एक आदर्श भगवान् तुल्य राजा जिन्होंने असुर और अन्याय के खिलाफ लड़ा और जीता: तेलुगू, बंगाली, ओडिया, असमिया, कन्नड़, मलयालम व अन्य भाषाओं में योग्य कवियों और संतों ने कई ग्रन्थ लिखे जिसमें राम के वीरतापूर्ण और धार्मिक पहलुओं को दर्शाया। ऐसा लगता है कि मानो एक भूमि, उद्धारकर्ता और नायक की तलाश में हो और अंत में उसे पा लिया हो।

स्वाभाविक रूप से, इस नई औरअतुलनीय लोकप्रियता के लिए एक व्यावहारिक पहलू भी था, जिसे संतों और सुधारकों ने खुशी से अपने लेखों में दर्शाया : समाज में सद्भाव और समानता।जो,हम नहीं भूल सकते वह यह कि मुस्लिम हमलों के साथ, इतिहास में पहली बार इस भूमि का संगठित रूप से एवं बलपूर्वक धर्मांतरणकिया गया था। अपने कई पारंपरिक वर्गों और बहिष्कार की प्रथाओं की वजह से, इस प्रान्त ने एक बहुत बड़े समुदाय  को आकर्षित करने के लिए काफी कुछ रख रखा था। इस प्रकार, जब इन हमलों के तहत पुरानी सामाजिक व्यवस्था चकनाचूर हुई थी, तो यह दुनिया के अंत की तरह लग रहा होगा। औरशायद, यह तब तकथा जब तक कि रामानुज का संदेश सबसे दूर तकनहीं फैल गया था: कि सब एक है। इस मंथन के परिणामस्वरूपरविदास, कबीर, नानक, रामानंद और कई अन्य लोगों के नेतृत्व मेंभक्ति आंदोलन का उदय हुआ। हम यह नहीं कह सकते कि वे रामानुज के तार्किक प्रमाणों के बारे में जानते थे या नहीं, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि आखिरकार विश्वास का एक सरल, प्रयोग योग्य रूप था, जो आश्चर्यजनक रूप से मुसलमानों की पेशकश से बहुत अलग नहीं था: सभी जीवित प्राणियों के बीचएकता, शांति, भाईचारा और एक जन्मजात साधारणता। शायद, उन्हें अंदर से एहसास था कि यदि वे तलवारों और भाले से लड़ नहीं सकते थे जो की वे सच में नहीं कर सकते थे तो अपने संस्कृति और रहन सहन का बचाव ही उनका सबसे बड़ा कवच (बचाव) थी। यह रामऔर उनके भक्त-संतों के समूह द्वारा प्रदान किया गया था।

इस बिंदु पर, हम अनुमान लगा सकते हैं कि अगर बाबर ने भारत पर सफलतापूर्वक हमला न किया होता तो दुनिया कैसे बदलती। लेकिन वास्तव में, अनुमान सच्चाई का कोई विकल्प नहीं है, जो यह है कि फरगाना का एक महत्वाकांक्षी योद्धा 1526 में दिल्ली के सिंहासन पर कब्जा करने में कामयाब रहा। अब, जीत परविजेता की पहली प्राथमिकता नियंत्रण सुनिश्चित करना है, ताकि वह पूरी तरह ऐच्छिक लाभ ले सके। इसका सबसे अच्छा विकल्प डर पैदा करना हैऔर ऐसा करने का सबसे अच्छा तरीका एक प्रतीकात्मक अधिनियम को लागू करना है जो इसे स्थानीय लोगों के लिए विशेष रूप से स्पष्ट करता है, कि पुराने नियम कानून अब नहीं चलते। इससे संबंधित एक मामला बगदाद काताजा दृश्य है जब 2003 में अमेरिकी सेना ने शहर में प्रवेश किया तो सद्दाम हुसैन की मूर्ति को नीचे गिरा दिया गया। बाबर कोई अलग नहीं थेऔर इसके लिए, उन्होंने एक शक्तिशाली सांकेतिक बिंदुके माध्यम से अपनी बात कहना चुना। एक बेहद कठोर और दर्दनाक बिंदु, जिसने अपने उद्देश्य को इतने प्रभावी ढंग से पूरा किया, कि तीन सदियों तक इन मैदानी इलाकों में सच्चे विद्रोह की कोई आवाज कभी नहीं सुनाई दी। विनाश कितना प्रभावी था।

तो सोचिये किस तरह से बाबर 1528 के गंगा के मैदानी इलाकों में गंदी, कीचड़युक्त और नम भूमि, जिसे वह विशेष रूप से पसंद नहीं करते थे,लेकिन जो उनके द्वारा अब तक सोचा  गये का अकेला साम्राज्य था जिस पर वह कब्ज़ा करना चाहता था – मंदिर और उसके परिसर को पुजारियों एवं संरक्षकों द्वारा साफ कराते हुए मीर बाकी की कल्पना करें। चिल्लाती हुई भीड़ कोनियंत्रित करते हुए उनके लोगें की कल्पना करें। और कल्पना करें उस चीख-पुकार की, जब हथौड़े चलने शुरू हो गये और मंदिर चकनाचूर हो गया। या उससे बहेतर है कीइस बारे में न सोचें क्यूंकि ऐसी कल्पना भी नहीं की जा सकती लेकिन फिर भी यह सब कुछ इस लिए संधर्भ में कहा जा रहा है कि तुलसीदास का जन्म हुआ था।

एक ऐतिहासिक व्यक्ति के रूप में, हम मान सकते हैं कि 16वीं शताब्दी के मध्य में तुलसीदास का उद्भव धार्मिक संतों जैसे नानक और रविदास की पूर्वी पीढ़ी के बाद के समय के साथ मेल खाता है। लेकिन एक संत के रूप में वह कालनिरपेक्ष थे।वाल्मीकि द्वारा संस्कृत में लिखी रामकथा को और सरल भक्तिवाद को अपनी विशेष काव्यप्रतिभा सेसहजता के साथ संघटित करके तुलसीदास ने अपनी मूल भाषा अवधी में रामचरितमानस की रचना की। इस तरह की आकर्षक लोकप्रियता के साथ इसने तेजी से अन्य प्रचलित ग्रंथों का स्थान ले लिया, जिससे मैदानी लोगों को उनके आध्यात्मिक जीवन के लिए तुलसीदास के शब्दों से थोड़े से अधिक की आवश्यकता आन पड़ी। आम लोगों के बीच दैनिक अभिवादन के लिए हाथ जोड़कर “राम राम” कहते हुए देखकर आज भी आप इसका प्रभाव देख सकते हैं।

यह एक व्यक्ति की भक्ति का विशालप्रभाव ही है, जो इसे अविस्मयकारी बनाता है कि अयोध्या मामले पर 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले ने गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखी गई रचनाओं में से एक का निःसंकोच उद्धरण दिया था:  डोका शतकम या अधिक स्पष्ट रूप से श्रीतुलसी शतकम का।इसमें, कवि-संत तुलसीदास बाह्य आक्रांताओं द्वारा अपने प्रिय राम के मंदिर के विनाश पर विलाप करते हैं और शोकाकुल आत्म-साक्ष्य देते हैं, जिससे आगे उन हिस्सों में सामान्य व्यक्तियों के हृदयों में राम की प्रधानता का आंकलन एक अनावश्यक प्रयास बन जाता है।एक लंबे और विकासवादी परिवर्तन के अंतिम चरण पर भी ध्यान दें: एक आदर्श व्यक्ति, औरकुछ क्षेत्रों में एक ईश्वरीय-राजा राम को पूर्ण और अंतिम रूप से, एक महापुरुष से देवत्व तक प्रवर्तित किया गया था। मार्गजटिल थाः यीशु के बाद पहली सहस्राब्दी में किसी समय में शंकर द्वाराप्रदान की गई एकता की एक भावना,भक्ति के मार्ग के लिए प्रचलित वरीयताओं को सम्मिलित करने के लिए रामानुज द्वारा इसकाएक संशोधन, रामायण का कई स्थानीय भाषाओं में अनुवाद और अंत में वाल्मीकि केएक मूल महाकाव्य का आध्यात्मिक पाठ में परिवर्तन – कई शताब्दियों और प्राचीन भूमि के लाखों वर्ग मील को आपस में जोड़ती एक प्रक्रिया थी। इसलिए हाँ, हम इसके प्रभाव की वास्तविक सीमा का आंकलन करने में सिर्फ असफल हो सकते हैं, लेकिन तुलसीदास के गिरते हुए आँसूओं से हम एक या दो साक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं।

तुलसीदास विलाप करते हैं:

दल्यो मीरबाकी अवध मन्दिर रामसमाज ।

तुलसी रोवत हृदय हति त्राहि त्राहि रघुराज ॥ 90 ॥

अनुवाद: राम और उनके परिवार की मूर्तियों के साथ अयोध्या के मंदिर को नष्ट करतेहुए मीर बाकी की कल्पना करते हुए तुलसीदास अपनी छाती पीटते हैं और राम के लिए विलाप करते हैं: “हमें बचाओ! हमें बचाओ!” त्राहि त्राहि रघुराज

शतकम में ऐसी और भी पंक्तियाँ हैं, सभी लाचारी और संताप से भरी हुई हैं, लेकिन सुरक्षा की याचना करने वाली उपरोक्त पंक्ति उस सब को समझने के लिए पर्याप्त है जो इसके बाद से होता आया है। निष्कर्ष निकालने के लिए यह तार्किक है कि यदि यह याचनाएं गंगा के मैदानी भागों के हर व्यक्ति के कानों तक पहुँचीं, तो यह बाबर के पोते के कानों तक भी जरूर पहुँची होंगी। स्वाभाविक रूप से हम इसकी पुष्टि नहीं कर सकते लेकिन यह अनुमान लगाना कितना अकल्पनीय होगा कि वास्तव में यह वो रूदन ही था, जिसने सम्राट अकबर को एक शाही समझौता – दीन-ए-इलाही का कृत्रिम निर्माण करने के लिए प्रेरित किया? आखिरकार, अकबर स्वयं को एक भली तरह से जानकार (सूचित) व्यक्ति मानता था,जिसे समाज की गतिविधियों और रुख का अंदाज़ा रहता था। उत्तर: हम नहीं जानते, लेकिन ऐसा संभव है।

सच चाहे कुछ भी हो,लेकिन एक सामंजस्यपूर्ण नया धर्म बनाने का अकबर का प्रयास एक चिरस्मरणीय विफलता के रूप में समाप्त हुआ। बिना किसी संरचना, संगठन या पवित्रशास्त्र के कोई भला और क्या उम्मीद कर सकता है?लेकिन यह हमारी कहानी के लिए सार्थक था, ऐसा आदर्शवादी व अपरिपक्व प्रयास करने वाला वह न तो पहला था और न ही आखिरी। सम्राट अशोक ने ऐसी ही कोशिश की थी। कन्नौज के पुष्यभूति राजा हर्षवर्धन ने भी कुछ ऐसा ही प्रयास किया था। एक तरह से, जवाहर लाल नेहरू ही उन नेताओं की लंबी लाइन में अकेले ऐसे नेता थे जो यह मानते थे कि सामाजिक कलह और विवाद को पीड़ानाशक, जातिगत समाधानों के पितृसुलभ अधिरोपण के माध्यम से हल किया जा सकता था। समस्या यह है कि इन लोगों ने धर्म को जीवन जीने के तरीके के बजाय एक विभाजित पहचान के रूप में देखाः एक ऐसी पहचान,जिसे वे मानते थे कि इसकी नयी नैतिक संहिता द्वारा प्रतिस्थापना हो सकती है। लेकिन उनमें से किसी ने भी समझा कि धर्म, या सही मायनों में कहा जाए तो आस्था या विश्वास, पहचान से कम संबन्धित था बल्कि दुखी दैनिक जीवन की उठापटक के समाधानों से ज्यादा संबन्धित था।

इस स्थिति में, धरती पर एक नयी नैतिक संहिता कैसे काम करती जब यह मनुष्य के उद्धार को दूर करती थी? क्या उन्होंने वास्तव में सोचा था कि थोड़े से और महान प्रतीत होने वाले नैतिक सत्य प्राचीन ग्रन्थों के लिए एक स्वीकार्य विकल्प होंगे? हिन्दू और मुस्लिम दोनों के लिए? आश्चर्यजनक रूप से, यह नहीं थे।

दूसरी ओर, महात्मा गाँधी रोजमर्रा की जिंदगी और सरल, सामाजिक व्यक्ति दोनों की एक अधिक प्रबुद्ध समझ रखते थे। उन्होंने जीवन चक्र में मुक्ति की आवश्यकता को पहचाना, और, अपने युग के कई अन्य लोगों की ही तरहएक राजनीतिक संरचना की आवश्यकता को भी पहचाना, जिसमें मोक्ष प्राप्ति और इसके आनुषंगिक धर्म संस्कारों को पूरी तरह से व्यक्तिगत परिरक्षण के रूप मेंछोडने के साथनैतिक संहिता को दंड संहिता के रूप में सहेजा गया। शायद नेहरू जैसे किसी उग्र अनीश्वरवादी के लिए यह अवधारणा कुछ खास मायने नहीं रखती थी, या शायद खूनी विभाजन की एक भयानक पृष्ठभूमि के विरुद्ध उन्होंने सामाजिक सद्भावना के विषय को पूरी तरह से प्रशासनिक परिभाषाओं में देखा था। किसी भी तरह से, दिसंबर 1949 मे बाबरी मस्जिद को सील करने के नेहरू के फैसले में लोकप्रिय भावनाओं को ध्यान में नहीं रखा गया, जब कुछ अज्ञात लोगों ने मस्जिद में घुसकर राम और सीता की मूर्तियाँ रख दी थीं। शायद, वह ध्यान नहीं दे सकते थे, या शायद वहध्यान देना ही नहीं चाहते थे, क्योंकि उनके हिसाब से तो वही बेहतर ज्ञाता थे। हम निश्चित रूप से इसे कभी नहीं जान पाएंगे। हम सब जानते हैं कि नेकनीयत पितृत्ववाद के एक और कृत्य ने एक समाधान को छोड़कर सबकुछ प्रदान किया था।अकबर की तरह नेहरू भी एक मूर्ख किसान के अंधविश्वास और अभिशाप के लिए तुलसीदास की व्यथा नहीं समझी, उन्होंने कभी नहीं समझा कि अयोध्या एक राजनीतिक शक्ति या ऐतिहासिक तथ्यों का मसला नहीं था बल्कि यह एक परंपरा, अखंडता और विश्वास का विषय था। और उस सरल सत्य को समझने में असमर्थता,हमारे वर्तमान सामाजिक विभाजन की जड़ों को झुठलाती है।

तो एक आदर्श, एक नायक, एक दैवीय उद्धारकर्ता, भगवान, और सबसे महत्वपूर्ण – आशा के प्रतीक के रूप में सार्वजनिक चेतना में राम के महत्व कीयह है हमारी कहानी। इसमें कई परतें हैं, एक के ऊपर एक,सभी परतें वापस पहुँच रही है,हमारी भूमि की सर्वप्रथम उत्पत्ति तक, हमारी सभ्यता तक, और जीवनपद्धति तक– ये सभी इस पूरे समय और शून्य के साथ संयोजित हो चुके हैं,मानसिक शांति की तलाश में, एक छोटे से मानव के लिए और समाज में थोड़े से अनुसाशन के लिए। इतिहास है, आस्था है,और तत्वज्ञान भी है: तुलसीदास द्वारा रचित हर छंद का हर बच्चे द्वारा बोला गया हर मंत्र, परोक्ष रूप से तीन प्राचीन ग्रन्थों- वेद, उपनिषद और भगवत गीता की सर्वोच्चता की पुनः पुष्टि करता है। तब भक्ति की अभिव्यक्ति सिर्फ एक नहीं बल्कि मोक्ष के हर मार्ग को स्पष्ट करती है। यह हमारे समाज के एक प्रमुख तत्व के रूप में सामाजिक सुधार को भी दर्शाता है। नानक का आह्वान होता है, कबीर का भी, रामानुज का उनसे पहले, शंकर का उनसे पहले, और अन्य दूरस्थ लोगों का इनसे भी पहले और हर साँस एक अन्य पुरानी सच्चाई की पुष्टि करती है – कि सब एक है। इस बात को ध्यान में रखते हुए, कि अयोध्या में राम के जन्म स्थान को चिन्हित करने वाले मंदिर का मीरबाक़ी द्वारा विनाश एक अपेक्षाकृत हालिया घटना है, यदि हमें मौजूदा समय में एक समाधान तैयार करना है, तो हम अपने पिछले कई अचेतनपूर्ववृत्तोंको नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं।

इसलिए, सुप्रीम कोर्ट में चल रहे अदालत के मामले का महत्व है; और इसलिए भी, कि इस भूमि को बेहतर ढंग से समझने की आवश्यकता है, इससे पहले कि समझौते के नेकनीयत सुझावों की पेशकश की जाये- उदाहरण के लिए जैसे अयोध्या में एक मंदिर के बजायएक अस्पताल या स्कूल या एक अनाथालय का निर्माण सामाजिक सद्भावना को बेहतर कायम रखेगा, वगैरह। अंत में, जो कुछ भी कहा जाना बाकी है, वह यह है: अगर हमें यह एहसास हो सके कि इस देश में कोई धर्म नहीं है, बजाय इसके, यहाँ एक सरल जीवनपद्धति है, तो शायद, बस शायद, हम तुलसीदास के आँसू पोछ पाएँ। और यदि हम ऐसा करते हैं, तो उतना ही शायद अयोध्या मुद्दे का उत्तरहमारी सोच से कहीं अधिक निकट हो सकता है। तब तक, आइए देखते हैं कि कैसे राज उजागर होते हैं, जैसे ही एक अधूरी कहानी का अंतिम अध्याय अंततोगत्वा लिखा जाता है।

संदर्भ: 2010 में आया अयोध्या मामले पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला।