राजनीति
अयोध्या मामले में अदालत का निर्णय जैसे ज़िद्दी बच्चों को बुज़ुर्गों का फैसला

प्रसंग- अयोध्या मामले में अदालत के निर्णय के बाद

ज़िद्दी बच्चों के देर से चल रहे झगड़े को जैसे तजुर्बेकार बुज़ुर्ग खाट पर बैठे देखें। बुलाकर उन्हें देर तक सुनें। खुद को सच और दूसरे को झूठ साबित करने पर आमादा बच्चे अपनी बातें कहें। बुज़ुर्ग मामले की तह में जाएँ और तफसील से सच को सच बताकर समझाएँ। यानी सबूत की बुनियाद पर एक असरदार उम्दा फैसला दे दें। आज का दिन एक ऐसे ही फैसले को सुनने का दिन था, जिसमें न किसी की हार हुई, न जीत।

अदालत का काम था सच को सामने लाना। वह भी ऐसे समय जब हमारा सेक्युलर समय झूठ की कई परतों में साँस ले रहा है। राजनीति और समाज में सच की जितनी महिमा गाई जाती है, हकीकत में वह एक दिखावा है। सच को न कोई सुनना चाहता, न कोई कहना चाहता। आइने की तरह साफ होने के बावजूद सच को कहने और सुनने की हमारी सामर्थ्य शून्य हो रही है, यह समाज के लिए बड़ी चिंता का विषय होना चाहिए।

यह किसी दूरदराज इलाके के टूटे मंदिर के अवशेषों पर बनी किसी इमारत का मामला नहीं था, जिसके बारे में ज्यादातर लोगों को कुछ पता न हो। यह देश हजारों साल पुराना है। इसका सच भी उतना ही पुराना है। सच समय की कई पुरानी परतों में दफन है। समय की गहराई में अनगिनत परतों में सच छिपा और दबा हुआ है, जिसके बेहिसाब सबूत हैं। अयोध्या इस देश की आत्मा है। राम इस देश के आत्म तत्व हैं। लेकिन जिद्दी बच्चों का क्या, उन्हें नहीं मानना तो नहीं मानना!

गुरु नानकदेव के 550 वें प्रकाश पर्व के मौके पर पाँच जज जैसे गुरू गोविंदसिंह के पंज प्यारों की तरह सामने आए। खाट पर बैठे पाँच सम्मानित अनुभवी बुजुर्ग, जो 40 दिन तक लगातार इन ज़िद्दी बच्चों को सुन रहे थे। लेकिन जज बनने के पहले से यह खटपट उनके कानों में गूंज ही रही होगी। आखिर मामला आजादी के पहले से ही चल रहा था। उन्हें सबूतों के आधार पर निर्णय देना था। सच को सामने लाना था। किसी को खुश नहीं करना था, न किसी को दुखी देखना था। सच्चा सुख सच को स्वीकार करने में है।

अयोध्या के समय की परतों के नीचे दफन सबूत पुरातत्व वाले लेकर आए। इनके आधार पर अदालत ने पाया कि वह ढांचा किसी समतल जमीन पर नहीं खड़ा था, जिसके नीचे मुर्दा मिट्‌टी और मलबे का ढेर हो। वह एक टीले के ऊपर खड़ा किया गया ढांचा था और टीले के भीतर परतों में दफन इतिहास के पास कहने को बहुत कुछ था। टीले के भीतर कई सदियों की कई परतों में मंदिर के अवशेष कुछ कह रहे थे, जिन्हें इंसाफ की कुर्सी पर बैठे पंज प्यारों ने बड़े आराम से सुना। गौर किया।

आज़ादी के बाद इसी सच पर परदा डालकर रखा गया। सेक्युलर परदे में सच को छुपाना सियासत के लिए सुविधाजनक था। इतिहास के सच का जिक्र ही मत करो और करो तो मनमाफिक करो।

बेरहम लुटेरों और हमलावरों को सुलतान और बादशाह कहकर इज्ज़त से इतिहास की किताबों में पढ़ाओ। छत्रपति शिवाजी, संभाजी, महाराणा प्रताप, दुर्गावती और सुहेल देव के किस्सों को हाशिए पर डाल दो। महान् सिख गुरुओं के रोंगटे खड़े कर देने वाले त्याग और बलिदान की महिमा गाने की क्या ज़रूरत है, वह तो उनकी मुगलों के साथ एक राजनीतिक रंजिश थी।

आगरे के ताजमहल के गुण गाओ, एलोरा के कैलाश मंदिर में क्या रखा है। राेजा इफ्तारी की रौनक ही ठीक है, होली-दिवाली भी कोई त्योहार हैं। हज की सब्सिडी का सरकारी सवाब कमाना ज्यादा ज़रूरी है, भगवान राम एक बदशक्ल टेंट में पड़े रहें क्या फर्क पड़ता है। कश्मीर की कश्मीरियत की फिक्र करो, लेकिन पंडितों के कत्लेआम और पलायन पर मौन व्रत उचित है। ऐसी आत्मघाती सियासत दुनिया के किसी ऐसे मुल्क में नहीं देखी गई, जो हजार साल की गुलामी से निकलकर आजादी की रोशनी में आया हो।

बेईमान इतिहासकारों ने बड़े हुनर से इतिहास का वह परदा तैयार किया, जिसे सेक्युलर सरकारों ने चादर की तरह फैलाया और देश पर चढ़ा दिया। उन्होंने देश को किसी सूफी की मजार समझ लिया। उन्होंने एक बड़े समझदार, मेहनतकश और हुनरमंद तबके को अल्पसंख्यक कहकर अलग बाड़े में धकेल दिया।

वोटों की ख्वाहिश ने सेक्युलर राजनीतिक दलों को जंगलों में शिकार के लिए घूमते लकड़बग्गों के झुंड में बदल दिया। अपने शिकार या शिकार के तगड़े हिस्से पर एकाधिकार जमाते बदशक्ल जानवर। शब्द कड़वे हैं। सच्चाई यही है। अब पूरे समाज के सामने भी है।

आधुनिक शिक्षा देकर अल्पसंख्यकों को समाज में बराबरी से जीने लायक भी बना दिया होता तो भी ठीक था। वे माइनॉरिटी के उस बड़े से बाड़े में  साल बाद भी आधुनिक शिक्षा और रोजगार से महरूम हैं। अपने असल इतिहास से कटे हुए। अपनी असली पहचान से बिल्कुल बेखबर।

कठमुल्लों के हाथों में जिनकी बागडोर है। और कश्मीर-अयोध्या में अटके किसी जिलानी-गिलानी को यह नहीं खटका कि कौम किधर घसीट दी गई है। वे तो अयोध्या में 2.77 एकड़ को जमीन का टुकड़ा मानकर हड़पने में ही अपना और अपनी कौम का वक्त बरबाद करते रहे। राम की विरासत से जुड़कर सबकुछ पा सकते थे। लेकिन यह अवसर भी उन्होंने खो दिया।

फिर भी अदालत का फैसला एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। सेक्युलर सियासत बेनकाब हो चुकी है। कश्मीर पर चढ़ी 370 की धूल झाड़ने के बाद अयोध्या पर आए इस फैसले ने सेक्युलर दलों और उनके महान् विचारकों को कहीं का नहीं छोड़ा है। सवा सौ करोड़ लोग हैरत से उन्हें देख रहे हैं, जो 70 साल से इन मसलों को मुंह में दबाए शिकार की तरह सबको भटका रहे थे। वोट बैंक के एटीएम कार्ड कालातीत हो चुके हैं। बैंक दिवालिया है। कोई सत्ता पर अपना हिस्सा भोग चुकने के बाद हाशिए पर हैं। कोई ठगे हुए खड़े हैं।

अयोध्या को ही लें। बड़ी चतुराई से सेक्युलकर ताकतों ने यह स्थापित करने की कोशिश की अयोध्या पर सारा जहर हिंदूवादी संगठनों का फैलाया हुआ है। यह आंदोलन तो विश्व हिंदू परिषद का है। भाजपा इसके सियासी फायदे लेती है। संघ परदे के पीछे से हवा देता है।

जबकि राम जन्मभूमि के लिए हिंदुओं का संघर्ष 400 सालों का है। प्राचीन मंदिर काे मलबे में बदलने के बाद खड़े ढाँचे के बावजूद उन तुर्कों और मुगलों की बेरहम हुकूमत में भी वे वहां आ-आकर राम को याद करना नहीं भूले। कभी चबूतरे पर, कभी भीतर। गोलियां खाईं, तलवारों से कटे। मगर आते रहे। तब तो कोई वीएचपी, कोई भाजपा, कोई आरएसएस नहीं थी।

देश के कोने-कोने में अनगिनत राजाओं के बनाए हुए मंदिर तोड़े गए। उन पर इबादतगाहें बना दी गईं या मलबे की शक्ल में छोड़ दिए गए। लेकिन अयोध्या में ढाँचे वाली जगह सुलगती रही। वह करोड़ों हिंदुओं के हृदय में थी।

सिर्फ हिंदू ही नहीं, जैनियों के पाँच तीर्थंकर यहीं के थे और बुद्ध भी यहाँ आए थे। गुरू गोविंदसिंह के कदमों के निशान भी अयोध्या की भूमि पर हैं। क्यों? कौन सा आकर्षण यहाँ इन महापुरुषों को खींच रहा था? क्या वह बदशक्ल ढाँचा, जो 400 साल पहले खड़ा कर दिया गया था। कतई नहीं। वह राम थे, जिनकी स्मृतियों से अयोध्या सात-आठ सौ साल की गुलामी के भीषण दौर में भी दिलों में धड़कती रही। यह एक स्वयंसिद्ध केस था, जिसे अदालत में आने की नौबत ही नहीं आनी थी।

तुर्कों और मुगलों के उस दुर्गम दौर में जब मंदिर तोड़े गए और इबादतगाहें बनाई गईं तब हर कहीं दूसरी घटना भी साथ ही घटती रही थी। वह थी बलपूर्वक या लालच देकर धर्मांतरण की। मंदिरों को इबादतगाह में बदला गया। मंदिर जाने वाले रामभरोसे को रिज़वान बनाया गया।

अयोध्या में 400 साल से हम कह रहे थे कि यहाँ मंदिर था। रिज़वान कह रहा है कि इबादतगाह थी। हमने याद दिलाया कि नहीं तुम भी रिजवान नहीं, रामभरोसे हो और वह मंदिर हम दोनों का ही था। हमारे पुरखों ने ही बनाया था। राम हमारे थे। अयोध्या हमारी थी। इबादतगाह जैसे आई, वैसे ही तुम्हारी पहचान बदल गई। थोड़ा ठहरो। खुद को पहचानो। भूली-भटकी याददाश्त पर जरा जोर डाल लो।

अदालत का यह फैसला भारत की भूली-बिसरी याददाश्त को झनझनाने का भी एक अवसर है। जिन्होंने अतीत में अपने मजहब बदले, उनकी जातीय स्मृति को जगाने का एक पुण्य अवसर। आज़ादी के बाद से सेक्युलर ताकतों ने उसी शानदार विरासत पर धूल डालकर रखी। सच को छिपाकर रखा गया।

इसका बुरा नतीजा यह हुआ कि वोट बैंक और अल्पसंख्यक कहकर अलग-थलग कर दिए गए लोग अपनी विरासत को हमलावर लुटेरों से जोड़ने लगे। उन्हें बाबर और औरंगजेब में अपने पुरखे नज़र आने लगे।

जबकि इन बेरहम बादशाहों ने हमारे पुरखों को ही मजहब बदलने के लिए मजबूर किया था। एक ढाँचा तो कुछ कह नहीं सकता था। जमीन के नीचे दफन असली सबूतों ने अपना पक्ष अदालत में रखा। भारत के करोड़ों लोग तो जागृत चेतना के हैं। वे तो सच के भीतर स्वयं झांक सकते हैं। देख सकते हैं। अपनी मूल पहचान को वे ही नहीं पहचानेंगे तो कौन पहचानेगा?

अदालत का फैसला अतीत के सबूतों पर आधारित है, जो वर्तमान में हमें ठिठककर सोचने और सबक लेने के लिए कह रहा है ताकि भारत के एक सुनहरे भविष्य की तरफ हम सब मिलकर एक साथ कदम आगे बढ़ा सकें। समय बदल रहा है। हम भी बदलें।