राजनीति
अटल बिहारी वाजपेयी, एक ऐसे व्यक्ति जिन्होंने बीजेपी और भारतीयता को प्रमुखता प्रदान की

प्रसंग

क्या 1998 से 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी को विशेष रूप से केंद्र में भारत के प्रथम पूर्णकालिक गैर-कांग्रेसी गठबंधन के प्रमुख के रूप में याद किया जाएगा?


कुछ लोग कहेंगे कि यह उनकी महान भाषण कला एवं कविता थी जिसने दिल के तारों को छुआ और उन्हें सबसे अलग स्थान दिया। अन्य लोग उनके सरल स्वभाव,अनौपचारिक व्यक्तित्वऔर विचारधारात्मक विभाजन में राजनेताओं एवं लोगों से अपील करने की क्षमता की चर्चा करेंगे।रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ और राष्ट्रवादी1998 में परमाणु परीक्षण की दहलीज पार करने के उनके साहसी निर्णय, अदालत की अंतर्राष्ट्रीय निंदा और फिर भी भारत के अमेरिकी संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने की उनकी सर्वोच्च उपलब्धि के रूप में जिक्र करेंगे।

फिर भी अन्य लोग निजीकरण, वित्तीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियमऔर कोयले एवं बिजली क्षेत्रों के उद्घाटन के साथ आर्थिक सुधारोंके संदर्भ में महत्वपूर्ण मील के पत्थर के रूप में उनकेसराहनीय तारकीय(प्रसिद्ध) रिकॉर्ड को उजागर करेंगे।विकास में उल्लेखनीय वृद्धि और मुद्रास्फीति में गिरावट के साथ,2004 में उन्होंने एक उच्चतम बिंदु पर सरकार छोड़ दी, जो उनके नेतृत्व में आर्थिक प्रबंधन की गुणवत्ता के बारे में बहुत कुछ कहता है। गठबंधन के प्रबंधन के 10 वर्षों के बाद भी 2014 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) द्वारा छोड़ी गई गड़बड़ी के साथ कोई भी इसका विरोध कर सकता है।

इन तत्वों में से प्रत्येक ने वाजपेयी रहस्य के निर्माण में अपना किरदार निभाया और नेहरू-शैली की हैसियत का दावा किया, लेकिन एक ऐसा क्षेत्र जहाँ कोई भी कभी भी अपना योगदान कम नहीं कर सकता है, वह है उनका सरल स्वभाव उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की राजनीतिक अस्पृश्यता (छुआछूत) को समाप्त कर दिया और इस प्रक्रिया में, राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस के लिए देश का एकमात्र असली वैकल्पिक नेता के रूप में स्थापित किया।

क्या वाजपेयी ने 1998-1999 में बीजेपी की अस्पृश्यता को समाप्त नहीं किया था,यह असंभव है क्योंकि बीजेपी आज नरेंद्र मोदी को सबसे ऊँचे राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में पेश कर सकती थी।लालकृष्ण आडवाणी ने 1980 के दशक में अपनी रथ यात्रा और हिंदू आंदोलन जो 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के साथ समाप्त हुआ, के साथ कांग्रेस के बाद सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए बीजेपी का निर्माण किया, लेकिन इस विकास के बाद पार्टी की अस्पृश्यता को समाप्त करने के लिए वाजपेयी की जरूरत थी। वाजपेयी के अलावा कोई भी नहीं – राम जन्मभूमि आंदोलन से उनके दूर रहने के रवैये के साथ –जो इसआंदोलन कोबंदकर सकता था। यह अकारण ही नहीं है कि आज भीजब उनकी सर्वोच्चता स्थापित की जाती है, तो मोदी खुद कोवाजपेयी के रंगों में रंगना पसंद करते हैं।

वाजपेयी को उनके कुछ समकालीन लोगों से अलग करने वाली एक और चीज अर्थशास्त्र पर उनकी राय वाम या केंद्र-वामपंथियों से अलग थी, खासकर उस समय जब संभवतः पी वी नरसिम्हा राव को छोड़कर लगभग अन्य प्रत्येक प्रधानमंत्री वाम या वामपंथ की तरफ झुकाव रखने वाले थे। यहाँ तक कि नरेंद्र मोदी, एक सुधारक के रूप में अपने मजबूत रिकॉर्ड के बावजूद, खुद को गरीबों के मसीहा के रूप में घोषित करना पसंद करते हैं, न कि आर्थिक उदारवादी के रूप में। अपने पहले अवतार में, जनसंघ निश्चित रूप से राइट विंग या सेंटर-राइट था, लेकिन 1980 के बाद, जब भाजपा, जनता पार्टी के गर्भ से उभरी, तो उसने गांधीवादी समाजवाद को अपनी परिभाषित विचारधारा के रूप में एक अस्पष्ट परिभाषा अपनाई। पार्टी के लिए मूल प्राथमिकता के रूप में आर्थिक सुधारों और निजीकरण को आगे बढ़ाने के लिए वाजपेयी की 1998-2004  की सरकार को छोड़ दिया गया था। इसमें, वाजपेयी अपनी संघी विचारधारा के साथ विरोधाभासी थे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) परिवार की आर्थिक विचारधारा स्वदेशी विचारों के साथ संयुक्त उपभोक्तावादविरोधी समाजवाद का एक अस्पष्ट मिश्रण है। देश के सबसे बड़े व्यापार संघ के प्रवर्तक के रूप मेंभारतीय मजदूर संघ पर शायद ही कभी मुक्त बाजारों और अहस्तक्षेप-नीति का पक्ष लेने का आरोप लगाया जा सकता है। 1999और 1998 के पोखरण परमाणु विस्फोटों के बादवाजपेयी ने पार्टी के लिएस्पष्ट आर्थिक विचारोंके किसी भीसंग्रह को तैयार नहीं किया, वाजपेयी ने निजी आर्थिक प्रतिबंधों को निजीकरण सहित आर्थिक सुधारों को अपनाने के लिए एक प्रोत्साहन के रूप में इस्तेमाल किया।

एक अर्थ में, वह 1998 में उस समय के व्यक्ति थे जैसे नारसिम्हा राव 1991 में थे, जब देश विदेशी दिवालियापन के करीब था। राव ने उस संकट को अर्थव्यवस्था में सुधार करने के अवसर के रूप में इस्तेमाल किया, इसी तरह वाजपेयी ने 1998 में किया थाऔर इस मामले में यह दोनों विशेषताओं या व्यवहार में एक समान थे। समर्थक बाजार होने परभी ध्यान नहीं दिया गया था, लेकिन दोनों ने इसे एक वास्तविकता के रूप मेंस्वीकार किया जब स्थिति ने इसकी अधिक की मांग की। वाजपेयी एक व्यावहारिक व्यक्ति थे।

अक्सर यह कहा जाता था कि वाजपेयी गलत पार्टी में सही व्यक्ति थे,लेकिन यह केवल आधा सच होगा।हो सकता है कि उनकी पार्टी में कई विचारधाराओं ने उन्हें सही पार्टी में गलत व्यक्ति के रूप में देखा हो, उनके कुछ आंतरिक आलोचकों ने उन्हें पार्टी का मॉस्क (मुखौटा) कहा, यह सच बात नहीं है।जबकि वह निश्चित रूप से एक उदारवादी थेऔर संघ के कुछ हिस्सों ने हिंदुत्व के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर संदेह व्यक्त किया, वाजपेयी कोर के लिए राष्ट्रवादी थे, जैसा कि पोखरण विस्फोटों से कारगिल युद्ध के नेतृत्व में बार-बार साबित भी हुआ था,जब भारत ने पाकिस्तान पर स्पष्ट राजनयिक जीत हासिल की थी।

मजबूत विचारधारात्मक प्रवृत्तियों वाली पार्टी में एक उदार व्यक्ति के रूप में, वह अपनी पार्टी में किसी और की तुलना में अपने प्रतिद्वंद्वियों के साथ समझौता कर सकते थे।यही कारण है कि 1980 के दशक में भाजपा की सत्ता बनाने में अपने बड़े योगदान के बावजूद आडवाणी ने उन्हें सत्ता में लाने के लिए पार्टी के प्रमुख के रूप में देखा था।

कुछ हद तक, वाजपेयी की उदारवादी छवि उनकी अपनी ही पहचान का विस्तार थी। आज आडवाणी और यहां तक कि मोदी के निष्ठुर व्यक्तित्व के विपरीत, वाजपेयी हमेशा अपने गंभीर व्यक्तित्व के लिए जाने जाते हैं और इतना ही नहीं उन्हे अपनी गलतियों का भी एहसास रहता था। उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी कभी भी उनके दुश्मन नहीं, बल्कि अलग-अलग दृष्टिकोण वाले लोग थे। वह प्रतिशोध राजनीति में अक्षम थे। वह अपने विरोधयों को नीचा दिखाने पर यकीं नहीं करते थे। उन्होने सोनिया गांधी और कांग्रेस पार्टी को बोफोर्स घोटालों के जंजालों से बच के निकालने दिया जहां पर उन्हे आसानी से घेरा जा सकता था।

1999 में, भारत और पाकिस्तान के बीच शांति लाने की उम्मीद से वे लाहौर को बस ले गए, लेकिन इसके बाद कारगिल युद्ध और भारतीय एयरलाइंस के विमान को हाइजैक कर लिया गया था। फिर भी, वह 2001 में आगरा में परवेज मुशर्रफ के साथ एक शिखर सम्मेलन आयोजित करने और शांति का सौदा करने के लिए कई शर्तोंपर सहमत हो गए। सौभाग्य से, आडवाणी ने अपना दम दिखाया और शिखर सम्मेलन एक तरफा उदारता से समाप्त नहीं हुआ। तथ्य यह है की वर्ष के अंत में भारतीय संसद पर हमला किया गया और वाजपेयी पाकिस्तान के प्रति अपने सरस रवैये को खत्म करने के लिए मजबूर हो गए। मोदी शान्ति के प्रस्ताव के साथ वाजपेयी के नक्शे कदम पर चल रहे हैं और पाकिस्तानी सेना से इन्हें भी एक बड़ा झटका लग सकता है।

कारगिल युद्ध में, भले ही भारत को पाकिस्तानी क्षेत्र में युद्ध करने का नैतिक अधिकार था, लेकिन वाजपेयी ने अपने सशस्त्र बलों को सीमा रेखा पार करने का आदेश नहीं दिया था। कंधार एयरलाइन हाइजैक में, उन्होंने अफगानिस्तान से भारतीय नागरिकों की सुरक्षित वापस लाने के लिए खतरनाक आतंकवादियों को रिहा करने का आदेश दिया था। हर किसी को यह स्वीकार करना होगा कि भारतीय संकट प्रबंधन समूह ने विमान को भारत से बाहर निकलने और अफगानिस्तान जाने की इजाजत देकर हाइजैक को न्यौता दिया था, हलकि यह एक दूसरी कहानी है।

कई मायनों में, हर कोई कह सकता है, कि वाजपेयी ने अपनी भावनाओं को न्यायशास्र के ऊपर रखा। लेकिन इस कमजोरी के लिए कोई भी उन्हें अकेले दोषी नहीं ठहरा सकता। यह नेहरू से मोदी तक भारत के डीएनए का हिस्सा और अभिन्न अंग रहा है।

यदि हम पिछली बातों के बारे में सोचें और वाजपेयी के सात दशकों से अधिक के राजनीतिक करियर को देखें, तो आजादी के बाद के शुरुआती वर्षों में रणनीतिक मामलों में नेहरूवादी भावनात्मकता के खिलाफ सबसे साहसिक आवाज के रूप में सबसे पहले और फिर भाजपा शिविर में नए नेहरू के रूप में, और इससे हम इस निष्कर्ष पर आ सकते हैं की: वह एक राष्ट्रवादी थे, लेकिन नितान्त नहीं। उनका उद्देश्यविलुप्त और खाली धर्मनिरपेक्षता तथा आक्रामक हिंदुत्व के बीच भारतीय आधार पर निहित भारतीयता के बारे में था । वह एक महान राजनेता थे, लेकिन गृणा की राजनीति नहीं करते थे। वह जीतने के लिए झुक भी सकते थे।

हलाकी, उनके राजनैतिक सफर के साथी का सम्मान करना चाहिए। आडवाणी के जमीनी स्तर के कामों के बिना वाजपेई द्वारा पार्टी बनाने की कल्पना भी करना मुश्किल होगा। इसके विपरीत एक कठिन विचारधारा और मृदु संयत के बीच वाजपेयी के लिए राजनीतिक गलियारों में अधिक स्वीकार्य होना आसान बन गया। अटल जी के बगल में आडवाणी की उपस्थिती ने ही उन्हे इस लायक बनाया की वह एक नेता के रूप में चुने जा सके।

21 वीं शताब्दी में भारत की सभ्यता और आर्थिक पुनरुत्थान के दिल में वाजपेयी की प्रशंसा करते समय हम उन्हें कभी भी भूल नहीं पाएंगे।

जगन्नाथ स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वह @TheJaggi पर ट्वीट करते हैं।