राजनीति
राजनीति का शिखर – अटल बिहारी वाजपेयी (1924-2018)

प्रसंग
  • इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि भारत में कुछ ही ऐसे पुरुष हुए हैं जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी की तरह असाधारण जीवन जिया है।
  • एक सच्चे भारत रत्न

आधुनिक भारत में अटल बिहारी वाजपेयी के महत्व को वास्तव में समझने के लिए, आपको नब्बे के दशक के मध्य में हमारे देश में मौजूद राजनीति की स्थिति पर विचार करना चाहिए।

भारतीय मतदाता एक दशक से भी ज्यादा समय से अपने राजनीतिक नेतृत्व से निराश थे – राजीव गांधी के प्रधानमंत्री के रूप में जनता के प्रयोग से लेकर और वी पी सिंह और चंद्रशेखर के दिनों तक। राजीव गांधी की दुखद मौत ने कांग्रेस को नेत्रत्वहीन और आंतरिक द्वंद्व से जूझने के लिए छोड़ दिया। पुरानी भव्य पार्टी की दरबारी पद्धतियों  ने नरसिम्हा राव सरकार को इतना ज्यादा लाचार कर दिया था कि सरकार द्वारा आंशिक रूप से सफल आर्थिक सुधारों को लागू करने में सफल रही थी, जनता को पूरा माहौल संदिग्ध लग रहा था और देश किस तरफ जा रहा था इस पर भी सवाल था, साथ ही उम्मीद पर खरी न उतर पायी सरकार को खारिज कर दिया था।

उस समय भारतवासियों के लिए यह बिलकुल मुमकिन नहीं था की वे अपने आपको ग्वालियर के कवि से प्यार में पड़ने से रोक पाते। उनकी रोबदार भाषण कला- जिसे उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में अपने बेहद छोटे प्रथम कार्यकाल के अंत में अपने इस्तीफे की घोषणा करते हुए भाषण में दिखाया था- डरावनी राजनीतिक कड़वाहट के विपरीत थी और अकल्पनीय रूप से अपने राजनीतिक विरोधियों की तुलना में उन्होंने कहीं ज्यादा दिल जीत लिए थे जिसकी किसी को कल्पना भी नहीं थी।

जिस तरह के अंदाज़ में  उस दिन अटल जी को देखा गया था उससे भारत को आशा की एक किरण मिली – जिसकी वजह से उन्हे 1998 में वापस आने का मौका मिला।

अगले छह सालों तक अटल जी ने देश को एक स्थिर और आगे सोचने वाली सरकार प्रदान की। उन्होंने पोखरण परमाणु परीक्षण किये, कारगिल युद्ध के माध्यम से देश का नेतृत्व किया, भारत की विदेशी नीति का आधुनिकीकरण किया और देश के अब तक देखे गए सबसे व्यापक बुनियादी ढाँचे की उन्नति का कार्यक्रम शुरू किया।

असाधारण राजनीतिक स्वाभाविकता और साहसी निर्णय लेने के लिए उनके साहस से धन्य, उनका कार्यकाल भव्य राजनीतिक भावों और कल्पनाशील चालों से सुशोभित था, उनकी सफलता और विफलता के बावजूद, जनता में उनकी लोकप्रियता को बढ़ाने का कार्य किया। लाहौर बस की सवारी, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का राष्ट्रपति बनना और पोखरण परमाणु परीक्षण आदि उनकी केवल राजनीतिक अभिव्यक्ति नहीं थे बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के साक्ष्य भी थे जिसने कमजोर रास्तों पर बड़े जोखिम लेकर चलने का साहस किया था।

शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनकी सरकार ने वास्तव में आर्थिक सुधार आधारित एजेंडा अपनाया था, जिसने भारतीय उद्यमों के पैरों में पड़ी बेड़ियों को तोड़ दिया और उनको भारत में उभरने के लिए एक आर्थिक पावरहाउस के रूप में कार्य किया। उनके समय के लगभग हर अर्थशास्त्री आपको यही बताएगा कि वाजपेई सरकार की वित्तीय प्रबंधन और आर्थिक नीतियों से ही संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (एनडीए) के प्रारंभिक वर्षों के दौरान आर्थिक उछाल को देखा गया था। इस आर्थिक उछाल के लिए देश धन्यवाद देता है।

लेकिन वाजपेयी की सच्ची अपील प्रधानमंत्री के रूप में उनकी उपलब्धियों से परे चली गई, जो कि किसी भी राजनैतिक विश्लेषण से आँकी नहीं जा सकती थी।

अब यह कल्पना करना मुश्किल हो सकता है लेकिन शुरुआत से मध्य नब्बे के दशक के दौरान, राम मंदिर आंदोलन के माध्यम से भाजपा के उदय पर राजनीतिक टिप्पणीकारों के बीच सामान्य विचाप यह था कि यह एक पतन के अलावा और कुछ भी नहीं था। दरबार और उसके दरबारियों की अपेक्षाएं यह थीं कि पार्टी की मांग खत्म हो जाएगी क्योंकि राम मंदिर का मुद्दा के समय के साथ ठंडा हो पड़ जाएगा और कांग्रेस वापस वहीं आ जाएगी जहां वे हैं। यह विश्वास इस धारणा से भी आया कि भाजपा की अपील कभी भी अपने पारंपरिक आधार से अधिक नहीं होगी और इसकी मानी जाने वाली ‘कट्टरपंथी’ प्रवृत्तियां इसे एक विषाक्त गठबंधन साथी बना देंगी।

ऐसा भी हुआ कि वाजपेई ने भाजपा के विरोधियों को सबसे ज्यादा परेशान किया था। पार्टी की समय के साथ लोकप्रियता कम होनी चाहिए , लेकिन वाजपेई के चमत्कारिक व्यक्तित्व ने पार्टी को विश्वसनीयता प्रदान की और देश को एक राष्ट्रव्यापी नेता दिया। उनके उदार स्वभाव और मीठे शब्दों ने हमेशा पार्टी को विपक्ष के हमलों और प्रतिक्रिया के विरुद्ध महफ़ूज़ रखा।

इसके अतिरिक्त, उनकी तेज राजनयिक प्रवृत्तियों और बड़ा सपना देखने की नजर तथा उनके साथी लाल कृष्ण आडवाणी के असाधारण संगठनात्मक कौशल के साथ संयुक्त, ने भाजपा को गठबंधन युग में चुपचाप चलने और भारत की राजनीतिक परिदृश्य में दूसरे ध्रुव के रूप में अपनी स्थिति को मजबूत करने में सक्षम बनाया।

ऐसा भी हुआ कि वाजपेई ने भाजपा के विरोधियों को सबसे ज्यादा परेशान किया था। पार्टी के समय के साथ बिगड़ने की अपील की बजाय, वाजपेई के चमत्कारिक व्यक्तित्व ने दोनों को विश्वसनीयता प्रदान की और देश को एक राष्ट्रव्यापी नेता दिया। जब भी पार्टी में उनके लिए अपशब्दों का प्रयोग किया जाता तो वे उनके उदार स्वभाव और मीठे शब्दों ने पार्टी को एक शांति और सहजता प्रदान की।

इसके अतिरिक्त, उनकी तेज राजनयिक प्रवृत्तियों और बड़ा सपना देखने की नजर तथा उनके साथी लाल कृष्ण आडवाणी के असाधारण संगठनात्मक कौशल के साथ संयुक्त, ने भाजपा को गठबंधन युग में चुपचाप चलने और भारत की राजनीतिक परिदृश्य में दूसरे ध्रुव के रूप में अपनी स्थिति को मजबूत करने में सक्षम बनाया।

2004 के चुनावों में हारने और आधुनिक भारतीय इतिहास में विवादास्पद रूप से सबसे भ्रष्ट सरकार कहे जाने के बावजूद जब वाजपेई ने कार्यालय छोड़ दिया तो उनकी गतिविधियों ने यह सुनिश्चित कर दिया कि उनकी पार्टी देशव्यापी है।

यहाँ तक कि सार्वजनिक जीवन से दूर होने के बाद भी, लोगों के दिलों से उनकी यादें न मिट सकीं। वितरण के कुशल कार्यों ने वाजपेई को सफल बना दिया। इस कारण तथा जिस दर्द को देश नें 2004 में सहन किया, से वाजपेई के पूर्व-समीक्षकों को मजबूर होना पड़ा।

वाजपेयी का कोई भी विश्लेषण, उन्हें एक मनभावक पहेली के रूप में प्रदर्शित करता है-वह हर किसी राजनेता से अलग थे, जिसे तोड़ा या मरोड़ा नहीं जा सकता था तथा जिसका केवल आनंद लिया जा सकता है।

एक राजनेता के रूप में, उनमें कभी भी असभ्य और निचली श्रेणी की गतिविधियों में रुचि नहीं दिखाई दी, जो कि उनके जैसे अन्य लोगों की लगभग दूसरी प्रकृति थी। फिर भी, मोहक भाषण देने की अपनी कला के साथ वह देश भर के लोगों से संबंध जोड़ने में कामयाब रहे, ऐसा पहले शायद ही कोई कर सका है।

एक समय में, वह चुनौती देने वाले पर राजनीतिक तंज कसकर बहुत जल्दी सोचने और राजनीतिक निर्णय लेने की क्षमता रखते थे। दुसरे क्षण, वे ऐसे ही किसी वार को अपनी मुस्कराहट के ज़रिये बेपरवाही से किनारे कर देते थे।

आजीवन स्वयंसेवक रह चुके और राम जन्मभूमि आंदोलन के चेहरे, वाजपेई एक आधुनिक भारत के लिए एक राजनीतिक संदेश तैयार करने के लिए सांस्कृतिक जड़ों के साथ अपनी वैचारिक खोज का समागम करने में कामयाब रहे, जिसने तब से इनकी पार्टी को परिभाषित किया है।

इसी कारणवश आम भारतीयों के मन में, उनके राजनीतिक करियर के बाद भी, उनकी छाप छूटी है।

वास्तव में, वाजपेयी द्वारा सार्वजनिक जीवन से पीछे हटने के एक दशक से भी अधिक समय बाद भी भारतीय राजनीति में किसी भी चर्चा से उनका नाम और यादें कभी दूर नहीं थीं। यूट्यूब और व्हाट्सएप के आगमन ने यह सुनिश्चित किया है कि उनके सबसे प्रसिद्ध भाषण और कविताएं नई भारतीय पीढ़ी के देखने और अनुभव करने के लिए उपलब्ध हैं, जो वे बड़ी संख्या में करते थे। देश के सबसे अच्छे प्रधानमंत्री के लगभग हर चुनाव में उनका नाम शीर्ष पर या बहुत करीब आ रहा है। दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों के उद्घाटन के दौरान उनके बारे में जिक्र करते हुए दर्शकों ने उन्हें उत्साह के साथ सम्मान दिया था।

अटल बिहारी वाजपेयी की ओर आम जनता की भावनाओं को देखते हुए ऐसा लग रहा है जैसे कि वह एक ऐसे राजनेता थे, जिन्हें लोग जाने के बाद भी भूल नहीं पाते और हमेशा याद किया करते हैं।

ऐसा शायद इसलिए था क्योंकि लोग अपने दिलों में महसूस करते हैं, कि उन्हें कभी भी समुचित अलविदा कहने का मौका नहीं मिला। 2004 में सत्ता में लौटने की प्रतीत अनिवार्यता ने एक भव्य विदाई के बारे में सोचा था और जब उस वर्ष मई में असंभव हुआ, तो अटलजी चुपचाप विपक्षी कुर्सियों पर जा बैठे और इससे पहले कि कोई जान भी पाटा, वे सार्वजनिक जीवन को अलविदा कर चुके थे।

इसलिए शायद, एक बार फिर उनकी लुभावनी आवाज सुनने की इच्छा है। या उनकी आँखों में उस चमक को देखने के लिए, जब वे अपने लुभावने भाषण देने आते थे।

यह अविश्वसनीय है कि भारत में कुछ ही ऐसे पुरुष हैं जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी की तरह जीवन व्यतीत किया हो – जो तीन बार प्रधानमंत्री रहे, कवि रहे, वक्ता रहे, स्वयंसेवक रहे और भारत रत्न से सम्मनित रहे।

उनकी शक्तिशाली उपलब्धि हमेशा असक्ति और वास्तविक स्नेह की प्रतीक रहेगी, जिसके साथ आम भारतीय कई वर्षों तक उन्हें याद रखेंगे।