राजनीति
2018 विधान सभा चुनाव- क्या नोटा ने हराया भाजपा को?

आशुचित्र-

  • यह तर्क कितना सही है कि राजस्थान और मध्यप्रदेश के क़रीबी मुक़ाबले में नोटा को मिले वोट भाजपा की हार के लिए निर्णायक रहे?
  • यदि श्रेष्ठ परिस्थितियाँ भी देखी जाएँ और देखा जाए कि यदि नोटा का असर इतना नहीं होता तो भी भाजपा की स्थिति इतनी अच्छी नहीं दिखती।

कहा जाता है कि जीत का श्रेय लेने सैकड़ों लोग होते हैं किंतु हार की ज़िम्मेदारी लेने कोई नहीं आता। 11 नवंबर को आए परिणामों में देश के तीन बड़े हिंदी भाषी राज्यों में कांग्रेस ने भाजपा को शिकस्त दी है।

छत्तीसगढ़ में भाजपा 90 में से 15 सीटों पर ही सिमट गई। वहीं पूर्व में भाजपा सम्मानजनक बहुमत का अनुमान लगा रही थी। मध्यप्रदेश में 15 सालों तक सत्ता में रहने के बाद भी कड़े मुक़ाबले में भाजपा 109 सीटें जीतने में सफल रही। वहीं कांग्रेस ने 114 सीटों पर जीत दर्ज की। वहीं राजस्थान में भी राजनीति विशेषज्ञों ने भाजपा की बुरी हार की आशंका जताई थी किंतु वहाँ भी भाजपा सम्मानजनक प्रदर्शन कर 73 सीटें जीतने में सफल रही। वहीं कांग्रेस ने 99 सीटों पर विजय हासिल की।

भाजपा के समर्थक इस मुक़ाबले को 2-1 से जीतने का अनुमान लगा रहे थे, इसके विपरीत भाजपा 0-3 की पराजय झेल बैठी।

इस परिस्थिति में कुछ सवालों के उत्तर ढूँढने की आवश्यकता को जन्म दे दिया है। एक और बिंदु यहाँ रेखांकित करना होगा, ऐसे मतदाता जिन्होंने नोटा(इनमें से कोई नहीं) बटन दबाना उचित समझा।
ऑनलाइन विशेषज्ञों में यह बात आम हो रही है कि नोटा ने भाजपा को हराया। मगर क्या यह सत्य है?

जहाँ तक छत्तीसगढ़ की बात है, यहाँ भाजपा की शिकस्त बुरी तरह रही, तो इस पर हम बात नहीं करेंगे किन्तु राजस्थान तथा मध्यप्रदेश में, जहाँ क़रीबी मुक़ाबला था, वहाँ इस पर ध्यान केंद्रित करना होगा।

राजस्थान में भाजपा का मतों में हिस्सा 38.8 प्रतिशत रहा, जो कि कांग्रेस से केवल 0.5 प्रतिशत कम है। यहाँ नोटा का वोट प्रतिशत 1.3 रहा। यदि नोटा को मिले मत भाजपा को मिले मत से जोड़ें तो भाजपा का मत प्रतिशत कांग्रेस के मत प्रतिशत से 0.8 प्रतिशत अधिक हो सकता था। लेकिन यदि इसका विश्लेषण करें तो और अधिक रोचक तथ्य सामने आते हैं। राजस्थान में 18 सीटें ऐसी हैं जहाँ हार- जीत का अंतर 3000 से भी कम मतों का है। इनमें से भाजपा ने 10 पर जीत दर्ज की है वहीं 8 पर हार। सात सीटों में हार – जीत के अंतर से अधिक मत नोटा को मिले हैं।
चोहटन विधानसभा सीट के परिणामों को देखें, तो भाजपा यहाँ 3000 मतों से अधिक (4,262) मतों से पराजित हुई है, वहीं नोटा को 5,391 मत मिले हैं।

यदि नोटा के सभी मत भाजपा को प्राप्त मतों में जोड़े जाएँ तो भाजपा 8 अधिक सीटों पर जीत हासिल कर सकती थी और 73 से बढ़कर 81 का आँकड़ा छू सकती थी तथा कांग्रेस 90 के आँकड़े पर आ सकती थी लेकिन फिर भी भाजपा से आगे ही रहती।

यदि हम सोचें कि नोटा को मिले सभी मत भाजपा के ही समर्थकों के हैं तो यह हास्यास्पद होगा। और हमने उन 10 सीटों पर अभी बात नहीं की है जहाँ पर क़रीबी मुक़ाबले में भाजपा ने कांग्रेस को शिकस्त दी तथा कुछ जगहों पर कांग्रेस की हार का अंतर भी नोटा को मिले मतों से कम ही रहा। लेकिन यदि सर्वश्रेष्ठ परिस्थिति भी होती तो भाजपा 81 सीटें जीत सकती थी तब भी कांग्रेस 90 सीटों पर जीत सकती थी। इसका यह आशय है कि नोटा ने भाजपा को नहीं हराया।

अब मध्यप्रदेश की बात करते हैं जहाँ मुक़ाबला और ज़्यादा क़रीबी था, यहाँ भाजपा, कांग्रेस तथा नोटा का मत प्रतिशत क्रमश: 41, 40.9 और 1.4 प्रतिशत रहा। यदि नोटा के मत भाजपा के मतों में जोड़े जाएँ तो भाजपा थोड़ी बढ़त ले सकती थी। थोड़े अधिक स्पष्ट नज़रिए से हमें विश्लेषण करना चाहिए।

31 सीटों पर जीत का अंतर 3000 मतों से कम रहा। इनमें से भाजपा ने 16 पर जीत हासिल की तथा 15 पर शिकस्त। इनमें से केवल 10 सीटों पर भाजपा की हार का अंतर नोटा को मिले मतों से कम था।

यदि हम नोटा को मिले सारे मत भाजपा के मतों में जोड़ दें तो, वो 119 सीटें जीत सकती थी। वहीं कांग्रेस 104 पर आ सकती थी। यह भाजपा के लिए श्रेष्ठ परिस्थिति हो सकती थी किन्तु असंभव थी।

वहीं यदि माना जाए कि नोटा के केवल 50 प्रतिशत मत ही भाजपा प्राप्त करती तो भी भाजपा 6 सीटें अधिक जीत सकती थी जो आँकड़ा 115 तक पहुँच सकता था। वहीं कांग्रेस 108 के आँकड़े पर पहुँच सकती थी और सरकार भाजपा की हो सकती थी।

यदि हम यह मानें कि केवल एक तिहाई नोटा वोट ही भाजपा को प्राप्त होते, तो भाजपा 3 सीटें और अधिक जीत सकती थी जो कि आँकड़ा 112 तक पहुँचा देता और कांग्रेस 111 पर आ जाती।

यहाँ हमने यह माना है कि समस्त नोटा वोट केवल भाजपा को ही जाते और कांग्रेस को एक भी नहीं जाता साथ ही हमने उन 16 सीटों की बात भी नहीं की जहाँ पर क़रीबी मुक़ाबले में भाजपा जीती और कांग्रेस की हार का अंतर नोट को प्राप्त मतों से कम रहा।

नोटा के संदर्भ में बहुत ही सामान्य बात करें तो भी भाजपा केवल एक ही सीट की बढ़त बना पाती तो इस आधार पर हम यह नहीं कह सकते कि भाजपा की हार का कारण केवल नोटा ही रहा। और पार्टी को भी यही आधार मानकर गलती नहीं करनी चाहिए।

ईमानदारी से कहा जाए तो नोटा का कारण हार के मुख्य 5 कारणों में भी नहीं आता है। यहाँ एंटी इन्कम्बेंसी भी एक बड़ा कारण रहा लेकिन इसे हटाया जा सकता था यदि प्रत्याशियों के चयन में ज़मीनी कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रियाओं पर ध्यान दिया जाता। इसके विपरीत मुख्यमंत्री ने अपने मित्रों की बातें थोप दीं।

विदिशा की बात करें तो यहाँ पिछले चुनावों से भाजपा, आसान जीत दर्ज कर रही थी। यही सीट 15000 वोटों से भी अधिक अंतर से हार गई। मुख्यमंत्री चौहान ने अपने मित्र मुकेश टंडन को टिकट दिलाया और कास्ट फैक्टर तथा कार्यकर्ताओं की बातों की अनदेखी की।

उसी प्रकार, बिजावर में यदि कोई दो घंटे भी बिताता तो समझ जाता कि बबलू भैया की लोकप्रियता बहुत ज़्यादा थी लेकिन मुख्यमंत्री चौहान ने एक बाहरी व्यक्ति को प्रत्याशी बनाकर पेश किया। एक ऐसा व्यक्ति जो अत्याधिक एंटी इन्कम्बेंसी का शिकार हो रहा था। बबलू को समाजवादी पार्टी से प्रत्याशी बनाया गया और उन्होंने भाजपा के प्रत्याशी को 35000 मतों से पराजित किया। राजनगर जैसी सीटों पर हार का अंतर 700 से भी कम रहा। यहाँ पर भाजपा के ठाकुर प्रत्याशी जो पहले हारते आएँ हैं, उन्होंने यहाँ उन्होंने खुलकर बगावत की। ऐसे कई उदाहरण हैं।

इसी कारण से नोटा को दोष देने की बजाय, पार्टी तथा कार्यकर्ताओं को अपनी ऊर्जा अपने आधारों को सुधारने में लगानी चाहिए। यदि भाजपा इस समय, भोपाल में राज नहीं कर पा रही तो इसका कारण मुख्यत: वो खुद तथा जाते हुए मुख्यमंत्री शिवराज ही रहे।

अरिहंत स्वराज्य में डिजीटल सामग्री प्रबंधक हैं।