राजनीति
असम एनआरसी – सॉफ्ट स्टेट का लेबल हटाने का मौका
असम एनआरसी – सॉफ्ट स्टेट का लेबल हटाने का मौका

प्रसंग
  • प्रत्येक राष्ट्र के पास अपने कानूनों को लागू करने का अधिकार है।
  • कानून प्रवर्तन और मानवाधिकारों को एक कार्यशील लोकतंत्र में दिखना चाहिए कि यह एक “नरम राष्ट्र” नहीं है।

जब सिलोन (जिसे 1971 से श्रीलंका के नाम से जाना जाता है) 1948 में स्वतंत्र हुआ, तब इसका पहला काम एक नागरिकता कानून को लागू करना था, जो वहाँ “भारतीय तमिल” कहलाने वाली करीब 11.9 प्रतिशत आबादी को मताधिकार से वंचित कर रहा था। इस द्वीप पर हजारों सालों से रहने वाले “सीलोन तमिलों” के विपरीत (जो यहाँ की आबादी का 11 प्रतिशत हिस्सा थे) “भारतीय तमिल” वे लोग थे जो चाय और रबर उद्योगों के निर्माण में मजदूरी करने के लिए सन् 1830 में यहाँ आकर बस गए थे। चाय और रबर यहाँ के मुख्य निर्यात थे।

तीन से पाँच पीढ़ियों तक सीलोन में रहने के बाद, गलत नाम से पुकारे जाने वाले “भारतीय तमिलों” को भारतीय मूल से संबद्ध पाया गया। इसलिए जवाहर लाल नेहरू सरकार को करीब दस लाख लोगों के इस निर्वासन का जोरदार विरोध करना चाहिए था, जिनको करीब एक सदी तक सीलोन में रहने और काम करने के बाद भारत की ओर पलायन का सामना करना पड़ा था। जब मलय(सी) ने अपने चीनी अल्पसंख्यकों को अधिकार हीन करने का फैसला लिया, तब माओ ज़ेदोंग तथा च्यांग काई शेक दोनों ने साफ तौर पर कह दिया कि मलयान-चीनी का कोई भी निष्कासन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

भारत को लंबे समय से “नरम राष्ट्र” के रूप में देखा गया है जो अपने छोटे या बड़े नीतिगत विकल्पों को लागू करने में असमर्थ है। विदेशी नीति में, नेहरू के भारत ने शुरूआती महीनों में खुद को अपने पड़ोसियों के लिए एक नरम लक्ष्य बना लिया था। 1949 तक, सीलोन ने नागरिकता के लिए एक उच्च आय बार शुरू करके अपने नागरिकता कानून को कार्यान्वित किया, जिसे 100,000 से अधिक भारतीय तमिल (कुल में से दसवां हिस्सा) नहीं पूरा कर सकते।

जनवरी 1954 में नेहरू ने सीलोन के प्रधानमंत्री जॉन कोटेलवाला के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसके अनुसार भारत, भारतीय नागरिकता चुनने वाले किसी भी “भारतीय तमिल” के “प्रत्यावर्तन” को स्वीकार करने पर सहमत हो गया। हालांकि, भारत सरकार ने सीलोन में नागरिकता के लिए अर्हता प्राप्त न कर पाने वाले किसी भी तमिल को स्वतः नागरिकता प्रदान करने से इंकार कर दिया। नेहरू द्वारा प्रत्यावर्तन की इस स्वीकृति से सीलोन को अगले तीन दशकों तक 600,000 तमिलों को भारत की ओर खदेड़ने का रास्ता मिल गया।

“तमिलों” में एम जी रामचंद्रन का मलयाली परिवार भी शामिल था (स्वयं एमजीआर का जन्म कैंडी में हुआ था)। स्वदेश वापस लौटने वाले परिवारों को तमिलनाडु के विभिन्न हिस्सों में बसाया गया था, जहाँ उनका कोई मूल बारी नहीं रह गया था। एमजीआर एक शानदार तमिल फिल्म स्टार बने और फिर 10 साल तक तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप मे अपनी सेवा प्रदान की। एमजीआर श्रीलंकाई तमिलों के लिए ईलम के एक प्रमुख वकील भी बने।

सीलोन के नक्शेकदम पर चलते हुए बर्मा के जनरल ने विन ने 1962 में दूसरे सैन्य विद्रोह के तुरंत बात 26 वर्षीय शासनकाल को बर्मा के तानाशाह के रूप में शुरू किया, ने विन ने 400,000 भारतीयों को देश छोड़ने का आदेश देते हुए उनके कारोबारों को जब्त कर लिया। उस समय नेहरू चीन से युद्ध में हार से कमजोर और निराश थे, जो शायद ही इस पर विरोध जताने में सक्षम हो पाते।

आज म्यांमार की आबादी में केवल 2 प्रतिशत भारतीय हैं जबकि 1940 में यह 16 प्रतिशत थी, उस समय यंगून की आधी से ज्यादा आबादी भारतीय थी। ब्रिटिशों की विभाजनकारी नीति “फूट डालो राज करो” से यहाँ पर 1930 में भारतीय विरोधी दंगे हुए जिसके बाद भारतीयों का पलायन शुरू हो गया और फिर 1942 में जापान के हाथों ब्रिटिशों की हार तक करीब आधा मिलियन भारतीयों ने म्यांमार से पलायन कर लिया।

भारत के अतिरिक्त किसी अन्य देश ने बड़ी मात्रा में हुए धर्म या भाषा की विरासत से संबद्ध लोगों, जो औपनिवेशिक युग के दौरान प्रवास कर गए थे और किसी अन्य देश में कई पीढ़ियों तक निवास करते रहे, के प्रवासन को स्वीकार नहीं किया। सीलोन के 1949 नागरिकता अधिनियम को भारतीय और पाकिस्तानी निवासी अधिनियम संख्या 3 कहा जाता था। 1946 की जनगणना में सीलोन की आबादी का 6.1 प्रतिशत भाग “मूर” (मुस्लिम) के रूप में दर्ज किया गया, जिनमें से अधिकतर तमिल बोलते थे लेकिन वे अरब मूल के निवासी के रूप में स्वयं का वर्गीकरण करते थे। न किसी अरब राष्ट्र और न ही पाकिस्तान ने सीलोन से इन मुस्लिमों के “प्रत्यावर्तन”(वापस आगमन) के सिद्धांत को स्वीकार किया।

आजकल श्रीलंका की जनसंख्या में 12.6 प्रतिशत लोग हिन्दू हैं, 1946 में यह प्रतिशत 22.7 और 1953 में 23 था जो कि अब घट गया है, यह सब तमिल हिंदुओं के “प्रत्यावर्तन” के प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में है जिसे नेहरू और उनके वंशज रोकने में असफल रहे। इसके विपरीत, श्रीलंका की आबादी में आज 9.7 प्रतिशत मुसलमान शामिल हैं जबकि 1946 में यह प्रतिशत 6.1 था, जिसमें तेजी से वृद्धि हुई है। पाकिस्तान ने 1949 के कार्यकाल से उत्पन्न होने वाले “प्रत्यावर्तन” को स्वीकार नहीं किया।

सीलोन में कोटेलावाला और एस डब्ल्यू आर डी बंदरानाइक और वर्मा में नी विन के उदाहरण ने शायद युगांडा के तानाशाह इदी अमीन को 1972 में युगांडा के सभी 80,000 भारतीयों के निष्कासन के आदेश के लिए समर्थन दिया। उनमें से एक तिहाई से अधिक लोग ब्रिटेन, अन्य लोग कनाडा तथा अमेरिका चले गए और लगभग 4,500 लोगों ने भारत में शरण ली। केवल भारतीय ही कम से कम तीन अलग-अलग देशों से इस तरह के बड़े पैमाने पर हुए दोषपूर्ण निष्कासन से पीड़ित थे।

विडंबना यह है कि इदी अमीन के निष्कासन से ठीक पहले, 25-26 मार्च 1971 को “ऑपरेशन सर्चलाइट” के साथ शुरू होने वाले पूर्वी पाकिस्तान में नरसंहार के कारण भारत ने एक विकट शरणार्थी संकट का सामना किया। इसमें प्रारंभिक 48 घंटों में 10,000 लोगों, जिनमें मुख्य रूप से हिंदू और बंगाली राष्ट्रवादी मुस्लिम शामिल थे, को मौत के घाट उतार दिया गया था और रमना काली मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया था।

अगले कुछ महीनों तक पाकिस्तानी सेना तानाशाह याह्या खान के इस आदेश का पालन करने के लिए विवश रही, “3 मिलियन (30 लाख) बंगालियों को मार दो और बाकी मेरे हाथों मारे जाएंगे।” नरसंहार के चलते, प्रारंभिक दो महीनों में लगभग 1.5 मिलियन (15 लाख) बंगाली हिंदू और मुस्लिम पूर्वी पाकिस्तान से पलायन कर गए।  20 मई 1971 को, चुकनगर (खुलना जिला) में पाकिस्तानी सेना ने 10,000 हिंदू नागरिकों का वध उस समय कर दिया जब वे सुरक्षा की मांग के लिए भारत आ रहे थे। यह बीसवीं शताब्दी के सबसे रक्त-रंजित दिनों में से एक था।

दिसंबर 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध शुरू होने तक, कम से कम 10 मिलियन (एक करोड़) पूर्वी बंगालियों ने भारत में शरण प्राप्त करने की मांग की थी। 16 दिसंबर 1971 को भारत की जोरदार जीत के बावजूद भी तत्कालीन स्वतंत्र देश, बांग्लादेश में युद्ध के बाद की व्यवस्था में पूर्व बंगाली शरणार्थियों की वापसी के लिए कोई औपचारिक प्रक्रिया शामिल नहीं थी। कितने लोगों ने वापसी की है, इसकी सटीक गणना कभी नहीं हुई है।

संयुक्त राष्ट्र के जनसंख्या विवरण से बांग्लादेश के बारे में सब स्पष्ट हो जाता है। 1960 और 1965 के बीच पूर्वी पाकिस्तान की आबादी में 15.35 प्रतिशत की बढ़त हुई, जबकि 1955 और 1960 के बीच आबादी में 15.32 प्रतिशत की वृद्धि हुई, इसमें पहला आंकड़ा दूसरे आंकड़े से कुछ ही ज्यादा है। पूर्वी पाकिस्तान की आबादी में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है, जो कि 1965 और 1970 के बीच 15.73 प्रतिशत तक दर्ज की गई।

फिर भी, 1970 से 1975 के बीच, बांग्लादेश की आबादी में केवल 5.53 प्रतिशत की वृद्धि हुई। बांग्लादेश की 1970 की आबादी का कम से कम 10 प्रतिशत (यानि, 6.688 मिलियन लोग) 1975 की आबादी में नहीं गिना गया। पाकिस्तान के द्वारा किए गए नरसंहार ने 5,00,000 लोगों की हत्या की, लेकिन 1971 के बांग्लादेश के निर्माण के बाद 6.19 मिलियन लोग और भारत में (मुख्य रूप से असम और पश्चिम बंगाल) रहने लगे।

1970 तक, पूर्वी पाकिस्तान की आबादी पश्चिम पाकिस्तान की तुलना में 20 प्रतिशत अधिक थी। लेकिन 1971 में पूर्वी पाकिस्तान से भारत में बड़े पैमाने पर हुए प्रवासन का एक दुष्प्रभाव यह हुआ कि, 1975 तक बांग्लादेश की आबादी पाकिस्तान से सिर्फ 5.6 प्रतिशत अधिक रह गई, और एक दशक बाद इन दोनों देशों की आबादी एक समान हो गई।

विडंबना यह है कि भारत ने 1971 में मानवतावादी आधार पर पूर्व बंगाली शरणार्थियों का स्वागत किया, लेकिन उनके वापस न जाने से पड़ोसी देश के बीच सामाजिक-आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया जिससे 1971 के पलायन प्रारंभ हुआ। पश्चिम बंगाल, असम और भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य 1937 से 1962 के बीच के बर्मा से निकाले गए भारतीयों के ग्रहणकर्ता रहे हैं।

असम की आबादी में 1951 से 1961 तक (पूरे भारत में 22 प्रतिशत के मुकाबले) 36 प्रतिशत बढ़ोत्तरी हुई और 1961 से 1971 तक 35 प्रतिशत (पूरे भारत में 25 प्रतिशत के मुकाबले) के बीच बढ़ोत्तरी हुई। 1971 से 1978 के बीच असम में मतदाताओं की संख्या 50 प्रतिशत बढ़ गई, और 1971 से 1991 के बीच 89 प्रतिशत की वृद्धि हुई – 1951 से 1971 के बीच 51 प्रतिशत मतदाताओं की वृद्धि हुई और 1991 से 2011 तक 53 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई।

गरीब बांग्लादेशियों ने असम और पश्चिम बंगाल में प्रवेश किया, और कांग्रेस (और सीपीआई-एम) की सरकारों ने कोई कार्यवाही नहीं की या अप्रवासियों की घुसपैठ करने में मदद की। अपने राज्य में एक जनसांख्यिकीय अल्पसंख्यक समुदाय बनता देख असम के लोगों ने 1979 से 1985 के बीच में अवैध प्रवासियों की घुसपैठ के खिलाफ जोरदार विरोध करना आरंभ किया, जो 1937 से 1945 के बीच असम के विभाजन से पहले शुरू हुआ था जब बड़े पैमाने पर मुस्लिम लीग सत्ता में थी। (1938 में, जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस अध्यक्ष थे, तब उन्होंने सादुल्ला के नेतृत्व वाली असम सरकार को हटा दिया, और कांग्रेस के गोपीनाथ बोरदोलोई के हाथों में (आंशिक रूप से असम में मुस्लिमों के व्यापक पुनर्वास को रोकने के लिए) असम की सत्ता सौंपी – लेकिन एक साल बाद जब द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ तो इस सरकार ने भी अन्य कांग्रेस सरकारों के साथ इस्तीफा दे दिया)।

आखिरकार 1985 में राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार द्वारा हस्ताक्षर किए हुए असम समझौते द्वारा यह विरोध प्रदर्शन समाप्त हुआ। 25 मार्च 1971 की तिथि को वैध नागरिकों के लिए कट ऑफ तारीख के रूप में तय किया गया: जो भी इस तारीख से पहले राज्य में प्रवेश कर चुका था वह राज्य का एक वैध नागरिक माना जाएगा, जिसने उस तारीख के बाद भारत में प्रवेश किया था (“ऑपरेशन सर्चलाइट” की शुरुआत) उसे निश्चित रूप से बांग्लादेश बापस जाना ही होगा।

असम समझौता अवैध आप्रवासन को समाप्त करने के लिए किया गया था, लेकिन बाद की कांग्रेस सरकारों ने अवैध आप्रवासन की अनुमति जारी रखी क्योंकि यह चुनावी दृष्टिकोण से बहुत लुभावना था। 1985 के असम समझौते के प्रावधानों को लागू करने में 33 वर्ष लग गये, जो आंशिक रूप से 1983 में (इंदिरा गांधी सरकार द्वारा) “अवैध आप्रवासन (ट्रिब्यूनल द्वारा निर्धारण) अधिनियम” पारित होने का परिणाम था।

यह आईएमडीटी अधिनियम विशेष रूप से असम के लिए लिखा गया था, जिसे 1946 के भारत के विदेशी अधिनियम (जिसे पूरे देश में लागू किया गया था) का स्थान लेना था। आईएमडीटी ने, यह लागू करके कि कोई भी राशन कार्डधारक स्वतः ही भारतीय नागरिक समझा जाएगा, जो कि इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस द्वारा अवैध आप्रवासियों के वोट प्राप्त करने के लिए एक पारदर्शी जाल था, यह साबित करना लगभग असंभव बना दिया कि कोई एक विदेशी था। 2005 में, सरबानंद सोनोवाल (जो मई 2016 में असम के पहले भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री बने) द्वारा शुरू की गई कानूनी चुनौती के पक्ष में निर्णय देते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आईएमडीटी अधिनियम को असंवैधानिक बताते हुए समाप्त कर दिया।

आईएमडीटी अधिनियम को रद्द करने के एक दशक बाद, सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में असम के नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी) को अपडेट करने की निगरानी शुरू कर दी और जुलाई 2018 के अंत में अपडेट विधिवत पूरा हो गया। अवैध अप्रवासियों के “मानवाधिकार” के लिए बनावटी अपील के बावजूद एनआरसी प्रक्रिया केवल मूल कानून को लागू करने के लिए है। हर राष्ट्र के पास अपने कानूनों को लागू करने का अधिकार है।

अवैध नागरिकों के पास अपील करने का अधिकार होगा और वर्क परमिट प्राप्त करना उनको गैर-नागरिकों के रूप में निवास करने के लिए सक्षम बनाएगा। इस प्रकार कानून प्रवर्तन और मानवाधिकारों को एक कार्यशील लोकतंत्र में दिखना चाहिए कि यह एक “नरम राष्ट्र” नहीं है।

नोटः (सीलोन) श्रीलंका के यह आँकड़े 1971 के श्रीलंकाई जनगणना के दस्तावेज दि पापुलेशन ऑफ श्रीलंका” पर आधारित हैं, जिनको 1974 में  यूएन सीआईआआईसीईडी ( कमिटी फॉर दी कोर्डिनेशन ऑफ नेशनल रिसर्च इन डेमोग्राफी) द्वारा प्रकाशित किया गया था। असम का डाटा 6 अगस्त 2018 को इंडिया टुडे द्वारा जारी किए गए आँकड़ों पर आधारित है।

प्रसेनजित के बसु ने “एशिया रिबोर्न : ए कोंटीनेंट राइसेस फ्रोम द रवेजेस ऑफ कोलोनियलिज्म एंड वार टू ए न्यू डायनामिस्म (एल्फ, 2017)” पुस्तक लिखी है। वह क्रेडिट सूसी फ़र्स्ट बोस्टन में दक्षिण पूर्वी एशिया और भारत के मुख्य अर्थशास्त्री, व्हरटोन ईकोमेटरिक्स की एशिया सेवा के निदेशक, खज़ाना नेशनल बरहद के मुख्य वैश्विक अर्थशास्त्री, और डाइवा सेक्यूरिटीस के मुख्य एशिया अर्थशास्त्री रहे हैं।