राजनीति
नागरिकता विधेयक का विरोध असमियों की गलती, बेहतर समझौते से हो सकेगा लाभ

आशुचित्र-

  • असमियों के लिए नागरिकता विधेयक अपनी पहचान बनाए रखने का एक माध्यम है।
  • असमियों को ज़मीनी स्तर की सच्चाइयों को समझना होगा।

भारत सरकार द्वारा असमी आइकन और संगीत प्रतिभा के धनी भूपेन हज़ारिका को दिए जाने वाले मरणोप्रांत भारत रत्न को उनके परिवार द्वारा ठुकराया जाना समझ में आता है क्योंकि नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) के नागरिकता संशोधन विधेयक से वहाँ के लोगों की भावनाएँ आहत हुई हैं। लोकसभा में पारित इस विधेयक को राज्य सभा में बाधाओं का सामना पड़ सकता है क्योंकि इसके अनुसार बांग्लादेश, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के हिंदुओं, सिखों व बौद्ध एवं ईसाई समुदाय के लोगों को नागरिकता दी जाएगी।

असमी और कई पूर्वोत्तर वासी आक्रोशित हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यह असम समझौते, जिसके अनुसार 1971 के बाद बांग्लादेश से अवैध तरीके से आए लोगों को वापस भेजा जाना है, को शक्तिहीन करने के लिए पीछे का रास्ता है। दूसरे पूर्वोत्तर राज्यों की भी यही चिंता है कि अधिनियम के लागू होने के बाद राज्यों में बांग्लादेशियों की बाढ़ आ जाएगी।

यह कहना तर्कसंगत हो सकता है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की संचार रणनीति व विधेयक को लाने का समय गलत है। विधेयक से पूर्व असमी संस्कृति व जनसांख्यिकी की सुरक्षा हेतु कुछ वैधानिक प्रावधान रखने चाहिए थे। इसके साथ ही विधान सभा में भी उन्हें सुनिश्चित राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए था।

समय निश्चित रूप से गलत है क्योंकि एक तरफ भाजपा यह कह रही है कि राष्ट्रीय नागरिक सूची तैयार होने के बाद वह अवैध अप्रवासियों को वापस भेज देगी। अब इन अवैध प्रवासियों में से अधिकांश बंगाली हिंदू नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं क्योंकि वे बांग्लादेश के उत्पीड़ित अल्पसंख्यक हैं।

लेकिन यह भी तर्क दिया जा सकता है कि वर्तमान सरकार के कार्यकाल की समाप्ति के बाद यदि गठबंधन की सरकार आती है तो कोई संशोधन विधेयक पारित नहीं हो सकेगा। इसलिए विधेयक को अभी ही पारित करना आवश्यक है। फिर भी इसका पारित होना आसान नहीं होगा क्योंकि भाजपा को हराने के लिए विपक्ष अल्पसंख्यकों के मत के भरोसे है, लेकिन वह अलग कहानी है।

भाजपा का ध्यान असम के अलावा पाकिस्तान और अफगानिस्तान के उत्पी़ित हिंदुओं पर है और वहीं कई हिंदू बंगाली पश्चिम बंगाल और बिहार में भी बसे हैं (और अवैध रूप से कई अप्रवासी कई राज्यों में रह रहे हैं)। फिर भी मुख्य मुद्दा बांग्लादेशी हिंदुओं का है। 1947 से हिंदू एक्सोडस (खदेड़ा जाना) पर अध्ययन कर रहे ढाका विश्वविद्यालय के प्राध्यापक अबुल बरकत का कहना है कि अगले 30 वर्षों में बांग्लादेश में कोई हिंदू नहीं बचेगा। नागरिकता अधिनियम भूत के साथ-साथ भविष्य पर भी ध्यान देता है।

हालाँकि असमियों की चिंता वास्तविक है लेकिन परेशानी यह है कि वे तर्क की बजाय भावनाओं से प्रतिक्रिया दे रहे हैं। भले ही कुछ कट्टरपंथी भारत से अलगगाव का बीज बो रहे हैं लेकिन सत्य यह है कि भारत ही असमी पहचान को सुनिश्चित कर सकता है। एक अलग असम अवैध प्रवासियों को बाहर रखने के लिए कड़े कानून बनाएगा लेकिन वह पहले से आए हुए बांग्लादेशियों को वापस नहीं भेज पाएगा। यदि भारत जैसी क्षेत्रीय शक्ति ऐसा नहीं कर सकती तो असम के लिए ऐसा कर पाना असंभव होगा। यहाँ तक कि डोनाल्ड ट्रम्प का यूएसए भी अवैध प्रवासियों को रोकने के लिए दीवार नहीं खड़ी कर पा रहा और जनसांख्यिकी केवल मेक्सिको से यूएसए की दिशा में बढ़ रही है।

असमियों को वास्तविकता के धरातल से सोचना होगा और यह निम्नलिखित वास्तविकताएँ हैं-

पहला, जैसा कि ऊपर कहा गया है क् अवैध प्रवासियों को नागरिकता से वंचित किया जा सकता है लेकिन उन्हें निर्वासित नहीं किया जा सकता है। इसलिए जनसांख्यिकीय बदलाव तब तक रहने वाला है जब तक, ईश्वर न करे, असमिया अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए हिंसक योजना नहीं बना रहे हैं। एनआरसी प्रक्रिया में भी कुछ सैकड़ों को छोड़कर किसी भी अवैध प्रवासी को निर्वासित नहीं किया जाएगा। भाजपा को ऐसा दिखावा करना बंद करना चाहिए कि वे कुछ कर सकते हैं।

दूसरा, जनसांख्यिकी पहले से ही परिवर्तित हो चुकी है। असमियों का वर्चस्व ब्रह्मपुत्र घाटी पर है, वहीं बंगालियों की संख्या बराक घाटी में बढ़ रही है। केंद्र सरकार की मदद से इस जनसांख्यिकी को मूल असमियों के पक्ष में झुकाया जा सकता है। यदि हिंसा के मार्ग को छोड़ दें तो जनसांख्यिकी को दूसरे राज्यों से कुछ अवैध अप्रवासियों को स्वीकार करने के निवेदन के साथ कुछ वित्तीय सहायता से बदला जा सकता है।

तीसरा, यह कोई माने या न माने लेकिन जनसंख्या दबाव के कारण बांग्लादेश हमेशा लोगों को असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में धकेलेगा। अगर जिहादी तत्वों को जोड़ा जाए तो यह असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में जनसंख्या वृद्धि का कारण बनेगा जहाँ बड़ी संख्या में बांग्लादेशी मुसलमान भी होंगे, एक ऐसा तथ्य जिससे असमियों को बंगाली हिंदुओं की बा़ से अधिक डरना चाहिए। वर्तमान में असम में मुस्लिम जनसंख्या 34 प्रतिशत है और उनकी जन्म दरें हिंदू जनसंख्या से अधिक है (2011 में मुस्लिमों के लिए औसतन जन्म दर 24.6 प्रतिशत थी जबकि हिंदू दर 16.8 प्रतिशत थी)। वे एक ऐसे बिंदु के करीब हैं जहाँ वे जल्द ही असमी राजनीति पर हावी होंगे। असमियों को एक गणना करके यह पता लगाने की आवश्यकता है कि उनके लिए सीमा पार से इस बढ़ती मुस्लिम जनसांख्यिकी का समर्थन करना या उनकी राजनीति में संतुलन कारक का काम करने वाले बंगाली हिंदुओं का समर्थन करना अधिक लाभकारी है।

चौथा, कुछ असमी बुद्धिजीवी दावा कर रहे हैं कि वे असमी मुसलमानों के विरुद्ध नहीं हैं। वे बंगाली हिंदुओं व मुसलमानों, दोनों को वापस भेजना चाहते हैं। अगर गौर करें तो पाएँगे कि यह दावा असमी मुसलमानों को स्वीकार्य नहीं है, वहीं भाजपा हिंदू शरणार्थियों को वापस भेजने के पक्ष में नहीं है लेकिन अन्य ‘सेक्युलर’ पार्टियाँ सबको वापस भेजने के विरोध में हैं। वोट बैंक कभी निर्वासित नहीं किया जा सकता है। इसलिए असमी भ्रम में जी रहे हैं अगर वे सोचते हैं कि वे असम में बाहर की सभी पार्टियों और असम की कुछ पार्टियों का विरोध कर इस मांग को मनवा सकते हैं। असमियों को यह समझना चाहिए कि एक हिंदू बहुसंख्या का राज्य असम की सांस्कृतिक और धार्मिक अधीनता को रोकेगा जहाँ मुस्लिम जनसांख्यिकी पहले से पैर पसार रही है।

असमी आगे कुआँ पीछे खाई की परिस्थिति में फँसे हुए हैं। अगर वे रणनीति बनाकर सोचें तो उनके लिए सर्वश्रेष्ठ समझौता होगा कि वे असम में राजनीतिक नियंत्रण की मांग करें जैसे कि अगले 50 सालों तक विधान सभा में निश्चित असम प्रतिनिधित्व। (इसका एक उदाहरण भी है कि दक्षिणी प्रदेश अपनी जनसंख्या की तुलना में लोकसभा में अधिक सांसद भेजते हैं, इसलिए असमियों के लिए ऐसा करना असंभवव नहीं है)। यदि असमियों को, मान लें कि 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व की गारंटी दी जाती है, जिसपर उनकी जनसंख्या का कोई असर नहीं पड़ेगा, तब वे इस राजनीतिक नेतृत्व से संतुष्ट हो सकते हैं।

असमियों के लिए नागरिकता विधेयक अपनी पहचान बनाए रखने का एक माध्यम है। उन्हें बस अपने लिए संवैधानिक गारंटियों की मांग करनी चाहिए जिससे उनकी राजनीतिक व सांस्कृतिक पहचान बनी रहे। इसके अलावा उन्हें यह भी मांग करनी चाहिए कि कुछ अप्रवासियों को दूसरे राज्यों में आश्रय दिया जाे।

यदि उन्हें इन दो चीज़ों की गारंटी मिलती है तो वे नागरिकता विधेयक का समर्थन करेंगे। उनके पास उपलब्ध विकल्पों में से यह सर्वश्रेष्ठ है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।