राजनीति
सबरीमाला मंदिर के द्वार खोलने के निर्णय का हुआ व्यापक विरोध
सबरीमाला मंदिर के द्वार खोलने के निर्णय का हुआ व्यापक विरोध

प्रसंग
  • पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद बुधवार को सबरीमाला मंदिर पहली बार खोला गया। अभी तक कुछ ऐसी है इसके संघर्ष की कहानी –

आज देश को यह तस्वीर देखने को मिली कि भगवान अयप्पा के मंदिर में प्रजनन आयु वाली महिलाओं के प्रवेश को रोकने के लिए प्रदर्शन कर रही महिलाओं के प्रदर्शन को कुचलने के लिए राज्य ने किस तरह से क्रूर पुलिस बल का प्रयोग किया। यह महिलाएं केरल में सबरीमाला मंदिर को जाने वाले रास्ते पर विरोध प्रदर्शन कर रही थीं।

सुप्रीम कोर्ट के विवादित फैसले के बाद मंदिर बुधवार को पहली बार खुला था, इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने, सदियों से चली आ रही उस परंपरा, जिसमें प्रजनन आयु वाली महिलाओ का मंदिर में प्रवेश प्रतिबंधित था, का अंत कर दिया। उच्चतम न्यायालय की पाँच न्यायाधीशों वाली खंडपीठ में केवल एक महिला थी जो इस फैसले को लेकर असंतुष्ट थी। इस फैसले के बाद पूरे राज्य में विरोध प्रदर्शन किया जाने लगा और इसका नेतृत्व खुद महिलाओं द्वारा किया गया।

उच्चतम न्यायालय ने इस कदम के खिलाफ यह तर्क दिया था कि इस प्रथा का प्रारंभिक उद्देश्य भगवान अयप्पा के ब्रह्मचर्य और सम्मान की रक्षा करना था। उच्चतम न्यायालय में इस मामले की सुनवाई के दौरान, एक गैर-लाभकारी संगठन ‘पीपुल फॉर धर्म’ के वकील जे साईं दीपक ने बेंच के सामने देवता (अयप्पा) की इस प्रकृति (नैष्ठिक ब्रह्मचारी)को साबित करने के लिए कई धार्मिक ग्रन्थों (लेखों) को पेश किया था। उन्होंने कहा कि महिलाओं के खिलाफ भेदभाव का आरोप सही ठहराया जाता यदि इस प्रथा में पूरा ध्यान “सभी महिलाओं” को बाहर रखने पर होता, लेकिन ऐसा नहीं है।

साईं दीपक ने कहा कि यह मुद्दा “मंदिर बनाम महिला” या “पुरुष बनाम महिला” के बारे में नहीं बल्कि “पुरुष बनाम पुरुष” और “महिला बनाम महिला” के बारे में था। अगर याचिकाकर्ता के तर्क की अनुमति थी, तो 41 दिन की तपस्या का पालन न करने वाले पुरूष भी अनुच्छेद 25(1) का हवाला देते हुए मंदिर में प्रवेश के अधिकार का दावा कर सकते हैं। एक हिंदू अनुच्छेद 25(1) और अन्य का हवाला देते हुए यह कह सकता है कि वह भगवान गणेश को मांस चढ़ाना (पेश करना) चाहता है। (पढ़ें: ‘धर्म के लिए लोग’ वकील ने उच्चतम न्यायालय को मंत्रमुग्ध कर दिया; यहाँ पेश हैं उनके तर्क)।

कई सूत्रों से पता चला है कि मंदिर के आसपास के इलाकों में हजारों प्रदर्शकारी इकट्ठा हुए थे। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की अगुवाई वाली, वाम डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) सरकार ने सबरीमाला और उसके दो मूल शिविरों नीलक्कल तथा पंबा में महिला सुरक्षाकर्मियों सहित 1,000 पुलिसकर्मियों को तैनात कर दिया था। नीलक्कल सबरीमाला से 18 किलोमीटर तथा पंबा में स्थित मूल शिविर 5 किलोमीटर की दूरी पर है।

पंडालम के पूर्व शासक परिवार द्वारा गठित एक समूह, पंडालम कोट्टारम निर्वाहक समिति, ने कहा है कि वह उच्चतम न्यायालय के फैसले में संसोधन होने तक केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में विरोध जारी रखेगा। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में अयप्पा सेवा संघ भी विरोध प्रदर्शन करेंगे।

चूँकि विरोध प्रदर्शन तेज हो गया है इसलिए सबरीमाला मंदिर के मुख्य पुजारी, महेश्वरारु तांत्री ने हिंसा की चेतावनी दी। इस विरोध प्रदर्शन में वनवासियों के प्रमुख वी के नारायण वनवासियों की अगुवाई कर रहे हैं। नीलक्कल और पंबा में सबरीमाला संरक्षण समिति के सदस्यों द्वारा विरोध प्रदर्शन की अगुवाई की जा रही है। विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया ने राज्य में एक हड़ताल का आह्वान किया है। सबरीमाला के पुजारी परिवार के सदस्य, राहुल ईश्वर, ने भी विरोध प्रदर्शन किया है। कांग्रेस और भाजपा भी पंबा और नीलक्कल में विरोध प्रदर्शन कर रही हैं। त्रावणकोर देवस्माम बोर्ड के अध्यक्ष प्रायर गोपालकृष्ण को एक मूल शिविर में विरोध प्रदर्शन करने के कारण हिरासत में ले लिया गया है।

मूल शिविरों में सैकड़ों महिलाएं और पुरूष शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारी महिलाएं, ज्यादातर जनजातीय और दलित, भगवान अयप्पा की तस्वीरें पकड़े हुए हैं और भजन गा रही हैं। हालांकि, रिपोर्टों में कहा गया है कि महिला भक्तों को मंदिर में ले जाने वाली बस पर पथराव हुआ था क्योंकि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को उस बस की जाँच करने की अनुमति नहीं दी थी। इससे पहले, प्रदर्शनकारियों ने केरल की एक महिला पत्रकार लिबी सी एस को वहाँ से खदेड़ दिया था, जो मंदिर के नजदीक पहुँच गई थी। आंध्र प्रदेश की एक और महिला को सबरीमाला में जाने से रोक दिया गया था। कहा जाता है कि प्रदर्शनकारियों ने दि न्यूज मिनट और रिपब्लिक टीवी पत्रकारों पर हमला किया था। कुछ प्रदर्शकारियों ने आत्महत्या करने की धमकी दी है। केरल ब्राह्मण सभा ने इस फैसले के विरोध में उच्चतम न्यायालय में एक समीक्षा याचिका दायर की है।

बुधवार को प्रदर्शन तेज हो गया क्योंकि इस दिन मंदिर अपनी ‘थुलम’ (मलयालम कैलेंडर का एक महीना) पूजा के लिए 5 बजे खुलता है। यह पहली बार हुआ जब विवादास्पद फैसले के बाद मंदिर खुला। यह मलयालम कैलेंडर के हर महीने के पहले पांच दिनों तक और नवंबर तथा जनवरी में वार्षिक मंडलम और मकर विलक्कु त्योहारों के दौरान भक्तों के लिए खुला रहता है। इस कार्यकाल में यह 22 अक्टूबर तक खुला रहेगा। कई महिला कार्यकर्ता इस तारीख को या उससे पहले मंदिर तक पहुंचने की कोशिश कर सकती हैं।

एलडीएफ सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले की समर्थक रही है। इसे महिलाओं के खिलाफ भेदभाव के मुद्दे के रूप में प्रस्तुत करते हुए मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने कहा है कि महिला भक्तों के पास पुरुषों भक्तों के समान अधिकार हैं। उन्होंने कहा था कि “सरकार अदालत में एक समीक्षा याचिका दायर नहीं करेगी और सभी महिलाओं को सुविधा प्रदान करेगी जो सबरीमाला में किसी भी कीमत पर प्रवेश करना चाहती हैं।”

हालांकि, कांग्रेस ने अपने मत को स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं किया है। मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर इसकी स्थिति आज भी स्पष्ट नहीं है। हालांकि प्रदर्शनकारियों के समर्थन के लिए कई नेता व्यक्तिगत रूप से सामने आए हैं। केरल विधानसभा के विपक्षी नेता रमेश चेन्निथला ने आदेश के क्रियान्वयन में जल्दबाजी के लिए विजयन की निंदा की है, लेकिन राष्ट्रीय नेतृत्व ने चुप्पी साध रखी है।

भाजपा परंपरा के इस हनन के खिलाफ रही है और इसकी केरल इकाई विरोध प्रदर्शन कर्ताओं में शामिल रही है। पार्टी ने मांग की है कि राज्य सरकार सर्वोच्च न्यायालय में एक समीक्षा याचिका दायर करे। केरल राज्य के भाजपा अध्यक्ष पीएस श्रीधरन पिल्लई ने फैसले को लागू करने में सरकार की जल्दबाजी पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा है, “मुख्यमंत्री जानबूझकर भक्तों की आस्था और परंपरा को नष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं।” पिछले महीने एक बयान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की समीक्षा की मांग की थी।

श्री नारायण धर्म परिपालन योगम, जिनको एझावा समुदाय (केरल की आबादी का लगभग 23 प्रतिशत) का समर्थन प्राप्त है, ने एलडीएफ सरकार के फैसले का समर्थन किया है। इसने भाजपा और कांग्रेस को सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करके राज्य सरकार को गिराने की कोशिश करने का आरोप लगाते हुए विरोध प्रदर्शन को दुर्भाग्यपूर्ण और अनुचित बताया है। संगठन के महासचिव वेल्लापल्ली नातेसन ने प्रदर्शनकारियों की आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने अब तक एझावा समुदाय और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति समेत किसी अन्य हिंदू संप्रदाय के साथ परामर्श करने से इनकार किया है।

उन्होंने बताया, “क्या उनका लक्ष्य मुक्ति आंदोलन है? श्री नारायण धर्म परिपालन योगम समान विचार वाले अन्य लोगों का सहयोग करके इन प्रदर्शनों के पीछे की वास्तविकता का खुलासा करने के लिए मैदान में उतरेगा।”

मंदिर के मुख्य पुजारी तंत्री का परिवार प्रजनन आयु (12 से 52 वर्ष) की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने की इजाजत देने के खिलाफ रहा है। पिछले महीने राज्य सरकार को नकारते हुए, परिवार ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर चर्चा करने के लिए मुख्यमंत्री द्वारा बुलाई गई बैठक में भाग लेने से इनकार कर दिया था। मुख्य पुजारी समेत परिवार के सदस्य सत्ता के खिलाफ हो गए हैं। पांडलम का शाही परिवार भी फैसले के कार्यान्वयन के खिलाफ है और उसने समीक्षा याचिका दायर न करने के लिए सरकार की आलोचना की है। दोनों परिवारों के सदस्यों ने आज विरोध प्रदर्शन में भाग लिया और उनमें से कुछ को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।

भारत के विभिन्न मंदिरों में उनसे संबंधित इतिहास और परंपराएं हैं। प्रश्न यह है कि यदि भारतीय राज्य उनमें से एक की धार्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप करता है, तो कल इसे अन्य मंदिरों की परंपराओं में हस्तक्षेप से कौन रोक सकता है? सबरीमाला के फैसले के माध्यम से, न्यायतंत्र ने इन हस्तक्षेपों की शुरुआत कर दी है। शायद सबरीमाला और पूरे भारत में प्रदर्शनकारी अब यह तय करेंगे कि वे इसे आगे बढ़ने देंगे या नहीं।

आश्विन मोहन से प्राप्त जानकारी के अनुसार।

प्रखर गुप्ता स्वराज के एक वरिष्ठ उप-संपादक हैं। इनका ट्विटर हैंडल @prakhar4991 है।