राजनीति
शिक्षा पर आवंटित बजट आँकड़ों की बाज़ीगरी- आप के झूठे रिपोर्ट कार्ड का सच

दिल्ली में विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र केजरीवाल सरकार ने एक रिपोर्ट कार्ड जारी किया है। बीते पाँच सालों में दिल्ली सरकार की प्राथमिकता शिक्षा रही है और यह बात रिपोर्ट कार्ड में उसके पहले स्थान से स्पष्ट होती है। लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में सरकार की जो उपलब्धियाँ बताई गईं हैं, वे झूठ का पुलिंदा मात्र हैं। 

कायदे से आम आदमी पार्टी (आप) को अपने उन चुनावी वादों का हिसाब-किताब देना चाहिए था, जिसे सामने रखकर वह प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई थी। लेकिन उन वादों को भूलाकर भ्रमित करने वाले तथ्य जनता के सामने परोसे जा रहे हैं।

आप ने 2015 के चुनाव के समय 500 नए सरकारी स्कूल खोलने, दिल्ली के सभी निवासियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने, 17,000 शिक्षकों की बहाली करने और शिक्षा के लिए बजट बढ़ाने के वादे किए थे। बजट छोड़कर एक भी वादा पूरा नहीं हुआ। लेकिन जिस बढ़े शिक्षा बजट को लेकर दिल्ली की आप सरकार अबतक समाचारों की सुर्खियाँ बटोर रही है, उनमें भी तथ्यों के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ किया गया है। 

बजट 

आप के नेता यह कहते नहीं थकते कि शिक्षा को लेकर दिल्ली का बजट सबसे अधिक है और ऐसा पहले किसी सरकार में कभी नहीं हुआ। सच्चाई यह है कि भारत के इतिहास में दिल्ली इकलौता राज्य नहीं है जिसने शिक्षा पर अपने बजट का एक चौथाई हिस्सा आवंटित किया है।

बीते एक दशक के आँकड़ों को देखें तो कई ऐसे राज्य हैं जिन्होंने शिक्षा के लिए अपने कुल बजट का 20-30 प्रतिशत तक शिक्षा के लिए आवंटित किया है। असम ने तो वर्ष 2000-01 में 25.5 प्रतिशत शिक्षा के लिए आवंटित किए थे। मेघालय जैसे छोटे से राज्य ने वर्ष 2014-15 में अपनी बजट का 27.8 प्रतिशत शिक्षा के लिए रखा था।

वास्तविकता यह है कि दिल्ली में हमेशा शिक्षा के लिए अधिक बजट आवंटित करने का जो ट्रेंड पिछली सरकारों ने शुरू किया, आप सरकार उसी पदचिन्हों पर चल रही है। आँकड़ों को देखें तो दिल्ली का बजट वर्ष 2000 से लेकर अब-तक औसतन 15 प्रतिशत से हमेशा अधिक ही रहा है, जो देश के कई राज्यों से काफी अधिक है। 

बजट के मामले में यह समझना भी आवश्यक है कि दिल्ली शिक्षा पर इसलिए भी अधिक खर्च कर सकने में समर्थ है क्योंकि इसके पास धन अधिक है और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र होने की वजह से खर्च करने का क्षेत्र सीमित। वर्ष 2018-19 में दिल्ली की प्रति व्यक्ति औसत आय 3,65,529 रुपये है, जो कि राष्ट्रीय औसत 1,25,397 रुपये से तिगुनी है।

दिल्ली का राजस्व अधिशेष (रेवेन्यू सरप्लस) भी 2017-18 के दौरान 4,913 करोड़ रुपये था। वहीं देखा जाए तो देश के कई बड़े राज्य भारी कर्ज में डूबे हैं और उनकी आय से कई गुना अधिक खर्च होता है।

केजरीवाल सरकार ने शिक्षा बजट की राशि को जिस तरह बढ़ता हुआ दिखाया है उसके अनुरूप वह खर्च करने के मामले में हमेशा फिसड्डी रही है। 2008 से 2013 तक के ही आँकड़े देखें तो यह जानकर आश्चर्य होगा कि कांग्रेसनीत शीला सरकार ने जहाँ आवंटित बजट का औसतन 98 प्रतिशत खर्च किया, वहीं केजरीवाल सरकार किसी भी वित्तीय वर्ष में इस आँकड़े के आस-पास भी नही पहुंच पाई।

बात केवल शिक्षा की ही करें तो दिल्ली सरकार ने शिक्षा के लिए आवंटित बजट का 2014-15 में 62 प्रतिशत, 2015-16 में 57 प्रतिशत, 2016-17 में 79 प्रतिशत ही खर्च किया। कुछ यही हाल बीते दो वर्षों में भी देखने को मिला है। 

यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि शिक्षा के लिए आवंटित बजट की कुल राशि में स्कूली शिक्षा के साथ उच्च शिक्षा भी शामिल है। आँकड़ों के अनुसार सामान्य शिक्षा के जुड़ी योजनाओं के लिए वर्ष 2017-18 के बजट में 2,970 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रावधान किया गया था, लेकिन वास्तविकता में 2374.75 करोड़ रुपये ही खर्च हुए।

वहीं तकनीकी शिक्षा के लिए जहाँ बजट में 363 करोड़ रुपये आवंटित थे, उसमें से मात्र 193.36 करोड़ रुपये ही खर्च हुए। उच्च शिक्षा की बात केजरीवाल सरकार अमूमन कम करती है, स्कूली शिक्षा में क्रांति के उसके दावे होते हैं। लेकिन जब प्राथमिक शिक्षा के लिए आवंटित बजट की स्थिति देखें तो शिक्षा निदेशालय को जहाँ 2018-19 के बजट में 2,127 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, खर्च केवल 1,677.46 करोड़ रुपये ही हुए।

ऐसी ही स्थिति उच्च शिक्षा के लिए आवंटित बजट में भी देखने को मिलती है जहाँ आवंटित 483 करोड़ रुपये में से 337.28 करोड़ रुपये ही खर्च हुए। इसके साथ ही बजट प्रस्तुत करते समय बजट अनुमान और संशोधित अनुमान के आँकड़ों में काफी अंतर देखने को मिला है।  

दिल्ली के शिक्षा बजट देखने में भले तीन गुना हो गया हो लेकिन सच्चाई तो यही है कि यह राज्य के कुल सकल राज्य घरेलू उत्पाद (ग्रॉस स्टेट डोमेस्टिक प्रॉडक्ट यानी जीएसडीपी) का 2 फीसदी भी नहीं है। वर्ष 2018-19 में शिक्षा के लिए आवंटित बजट को ही मानें तो शिक्षा पर जीएसडीपी का मात्र 1.70 फीसदी ही खर्च हो रहा है।

अगर इसे पिछले सरकार के आँकड़ों से तुलना करें तो 2013-14 में दिल्ली ने अपने कुल जीएसडीपी का जहाँ 1.29 प्रतिशत शिक्षा के लिए आवंटित किया था, वहीं 2018-19 तक केवल 0.41 प्रतिशत की ही बढ़ोतरी हुई। यानी दिल्ली की जितनी आर्थिक क्षमता बढ़ी उस हिसाब से शिक्षा के लिए आवंटित यह बजट मात्र आँकड़ों की बाजीगरी से इतर कुछ भी नहीं है।

देश की जीडीपी के 6 प्रतिशत खर्च करने के पैरोकार अरविंद केजरीवाल और उनके साथी, राज्य के जीएसडीपी के 2 प्रतिशत के भी आँकड़े को नहीं छू सकें हैं और इस बात को बड़ी चालाकी से छुपाया गया है। 

नए क्लासरूम

7 मार्च 2017 को विधानसभा में दिए अपने भाषण में शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा था कि 8,000 कमरों का काम लगभग पूरा हो गया है व आगामी वित्तीय वर्ष में 10,000 नए कमरे बनाने का काम शुरू कर लिया जाएगा। लेकिन आप की आधिकारिक वेबसाइट कुछ और हकीक़त बता रही है। लगभग छह माह बाद यानी 7 अक्टूबर 2017 को आम आदमी पार्टी की वेबसाइट द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार दिल्ली के स्कूलों में केवल 5,695 कमरे बने थे। मतलब विधानसभा में भी दिल्ली के शिक्षा मंत्री ने झूठ बोला!

जब 2018-19 का इकॉनोमिक सर्वे आया तो पता लगा 8,095 कमरे ही बने हैं। लेकिन ठीक दो महीने बाद जब लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी ने घोषणापत्र जारी किया तो बनने वाले क्लासरूम की संख्या 8,213 बताए चलो यहाँ तक ठीक है 8,000 कमरे बन गए लेकिन अब रिपोर्ट कार्ड के जरिए ये दावा किया जा रहा है कि सरकार ने 20,000 कमरे बना लिए तो उसकी सच्चाई पता लगाना कठिन है क्योंकि लगातार भ्रामक आँकड़े सरकार और पार्टी की ओर से दिए जा रहे हैं। 

28 जनवरी, 2019 को केजरीवाल सरकार ने दिल्ली के कोने-कोने में विज्ञापन देकर बताया कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों में 11,000 नए कमरे बनाने का शिलान्यास हो रहा है तो 1,000 कमरे नए कमरे अलग से बनने की प्रक्रिया कब शुरू हुई? यहाँ यह भूलना उचित नहीं होगा कि इन नए कमरों के निर्माण में भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। ऐसा लगता है कि नए कमरे बनाने के नामपर पर्दे के पीछे खेल चल रहा।

यही नहीं, दिल्ली सरकार ने चार वर्षों में 8,000 नए कमरे बनाए तो यह बताया ही नहीं कि इसमें से बच्चों के बैठने वाले क्लासरूम कितने हैं और बाकी काम के लिए कितने! शक होना लाज़मी है क्योंकि जो सरकार चार साल में 25 फीसदी बजट के बावजूद केवल 8,000 कमरे ही बनवा पाई, वह नवंबर 2019 तक 12,000 और नए बनाने के दावे कर रही है। 

सवाल यह भी अनुत्तरित है कि नए कमरे बनाने से 500 नए स्कूल बनाने के वादे से आम आदमी पार्टी क्यों मुकर गई! सरकार की यह मंशा भी बेहद खतरनाक है, जहाँ वो नए स्कूल खोलने की बजाए, नए कमरे बनाकर सुबह और शाम की शिफ्ट में चलने वाले स्कूलों को एक शिफ्ट में करने की योजना पाले आगे बढ़ रही है यह हुआ तो भीड़ में न तो पढ़ाई होगी, न ही शैक्षिक गुणवत्ता बचेगी शिक्षकों और प्राचार्यों के पद खत्म तो होंगे ही। 

12वीं के परिणाम

आप सरकार और उनके समर्थकों द्वारा एक और झूठ फैलाया जाता है कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों ने पहली बार निजी स्कूलों को भी पछाड़ दिया है। 12वीं के परीक्षा परिणामों का संदर्भ देते ऐसे लोग खूब नज़र आते हैं। रिपोर्ट कार्ड में भी इसका ज़िक्र उपलब्धि बताते हुए प्रस्तुत किया गया है। लेकिन जब बात 10वीं के परीक्षा परिणामों की होती है तो बेतुकी दलीलें देकर सब चुप्पी साध लेते हैं। हालत यह है कि दिल्ली के स्कूलों का परिणाम 2006-07 के अपने सबसे निचले स्तर 77.12 प्रतिशत से भी नीचे है। 

बात पहले 12वीं के परिणामों की! पहली बार यह सुनना बहुत अच्छा लगता है कि सरकारी स्कूल प्राइवेट से भी बेहतर परिणाम ला रहे है लेकिन दिल्ली के मामले में यह पहली बार नहीं हो रहा है। दिल्ली के सरकारी स्कूलों ने पहले भी प्राइवेट स्कूलों को पछाड़ा है। 2009 और 2010 में सरकारी स्कूलों का 12वीं में प्रदर्शन प्राइवेट स्कूलों से बेहतर था। 

यह भी कहना अतिरेक है कि परीक्षा परिणाम में सुधार केवल आप की सरकार बनने के बाद हुए। आँकड़े बताते हैं कि दिल्ली के सरकारी और निजी स्कूलों के परीक्षा परिणामों में अंतर पहले के मुकाबले काफी कम हुआ है।

2005 में सरकारी और निजी स्कूलों के बीच 13 प्रतिशत अंकों का फासला था। तब सरकारी स्कूलों में 12वीं में पढ़ने वाले बच्चों का परिणाम 76.44 प्रतिशत था, वहीं निजी स्कूलों के बच्चों का परिणाम 89.47 प्रतिशत था। कभी 13 प्रतिशत अंक से पिछड़ने वाले दिल्ली के सरकारी स्कूलों ने निजी स्कूलों की न केवल बराबरी की, बल्कि उसे पछाड़ा भी। बीते तीन साल से यही दोहराया जा रहा है लेकिन सरकारी और निजी के बीच का फासला बहुत अधिक का नंही है जैसा बीते दशकों में था।

2008-2015 तक दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का परीक्षा परिणाम कभी 85 प्रतिशत से कम नहीं हुआ। पिछले तीन सालों में अगर मामूली बढ़त हुई भी है तो उसी अनुपात में निजी स्कूलों का भी परिणाम सुधरा है। सत्र 2018-19 में सरकारी स्कूलों का आँकड़ा 94 प्रतिशत था तो निजी स्कूलों के आँकड़े भी 90 प्रतिशत से ऊपर थे।

एक बेहद चौंकाने वाली बात यह है कि बीते दो दशकों में परीक्षा परिणाम भले ही चाहे जैसा आए, परीक्षा में बैठने वाले बच्चों की संख्या हमेशा बढ़ती रही है। जहाँ 1998-99 में 44,918 बच्चे 12वीं की परीक्षा में बैठे थे, वहीं यह संख्या बढ़ते-बढ़ते 2014 में 1,66,257 बच्चों तक पहुँच गई।

लेकिन जैसे ही आप की सरकार आई, परीक्षा में बैठने वाले विद्यार्थियों की संख्या हर साल घटते गई। हालत यह थी कि वर्ष 2018 में बैठने वाले बच्चों की संख्या 1,12,826 हो गई। ये सवाल पूछा जाना चाहिए कि जब दिल्ली की जनसंख्या बढ़ रही है, स्कूल वर्ल्डक्लास बन चुके हैं, फिर बच्चों की संख्या कम क्यों हो रही है?

कहा जाता है कि 12वीं के परीक्षा परिणाम बेहतर करने के लिए हर साल 9वीं एवं 11वीं की परीक्षा में बड़ी संख्या में बच्चों को फेल किया जा रहा है ताकि केवल अच्छे बच्चे ही 12वीं की परीक्षा दे सकें। हर साल परीक्षार्थियों की घटती संख्या इसकी गवाही देती है। उपलब्ध आँकड़े बताते हैं कि हर साल लगभग आधे बच्चों को 9 वीं में फेल कर दिया जाता है, वही 11वीं कक्षा में भी एक तिहाई बच्चों की छंटनी कर दी जाती है।

यहाँ यह भी देखना पड़ेगा कि जहाँ सरकारी स्कूलों में बच्चे कम हो रहे हैं, वहीं हर साल निजी स्कूलों में बच्चे बढ़ रहे हैं। निजी स्कूलों में कुल नामांकन का हिस्सा भी दिल्ली में बढ़ता जा रहा है। सरकार द्वारा जारी की गई इकॉनोमिक सर्वे की रिपोर्ट के आँकड़े इसकी गवाही देते हैं। इसके अनुसार 2014-15 में जहाँ प्राइवेट स्कूलों का शेयर 31 प्रतिशत था, वह 2017-18 में 45.5 प्रतिशत हो गया।

10वीं के ख़राब परिणाम का ठीकरा किसी और पर फोड़कर बड़ी चालाकी से अपनी नाकामी छुपाने में यह सरकार सफल रही है। न तो विपक्ष ने कभी इसे मुद्दा बनाया, न मीडिया ने। हालत यह है कि वर्ष 2018-19 में निजी स्कूलों के मुकाबले दिल्ली के सरकारी स्कूल 21 अंक पीछे रहे हैं। जहाँ दिल्ली के सरकारी स्कूलों का सामूहिक प्रतिशत 71.58 प्रतिशत था, निजी स्कूलों का परिणाम 93.12 प्रतिशत।

पिछले सत्र यानी 2017-18 में 10वीं परिणाम जब आए तो जहाँ सरकारी स्कूलों के 69.32 प्रतिशत बच्चे पास हुए थे, निजी स्कूलों के 89.45 फीसदी बच्चे पास हुए खे। बीते दो सालों में 10वीं की परीक्षा में दिल्ली के स्कूल राष्ट्रीय औसत से भी काफी कम परिणाम दे रहा है, इसके बावजूद इसकी जिम्मेवारी लेने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा।

दिल्ली के सरकारी स्कूलों में 10वीं के परिणाम की हालत एक दशक पहले भी ऐसी नहीं थी। इसे ख़राब स्थिति में लाने का श्रेय आप सरकार को जाता है, जहाँ दिल्ली का प्रदर्शन पिछले एक दशक का भी रिकॉर्ड तोड़ अपने सबसे निम्नतम स्तर पर आ गया है।

सरकारी और निजी के बीच के निगेटिव फासले को वर्ष 2001-02 के -45 अंकों से जो सरकार +1.17 में ले आई थी, 2013 में जिसने प्राइवेट स्कूलों को पछाड़ने का काम किया था, आप सरकार की नीतियाँ उसे दुबारा -21 में ले आई। प्रतिशत और सरकारी के बीच का अंतर पाटने में जो मेहनत दिल्ली के सरकारी स्कूलों में आप की सरकार बनने से पहले हुई थी, उसे चौपट करने की जिम्मेवारी दिल्ली सरकार को लेनी ही चाहिए।

यह हालत तब है जबकी पिछले चार सालों से लगातार 42 प्रतिशत से अधिक बच्चे 9वीं की परीक्षा में फेल हो रहे थे यानी बेहतर बच्चे ही अगली कक्षा में भेजे गए फिर भी परिणाम नहीं सुधरा। सबसे बड़ी बात है कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों में बड़ी संख्या में उन बच्चों को दुबारा नामांकन नही लेने दिया जा रहा, जो फेल हो गए थे। पिछले सत्र यानि 2017-18 में ऐसे बच्चों की संख्या 66 प्रतिशत थी।

कहना गलत नहीं होगा कि रिपोर्ट कार्ड के जरिए केजरीवाल सरकार अपनी नाकामी भले छुपा रही है लेकिन इससे यह भी साबित हो रहा है कि पार्टी अपने चुनावी वादे को पूरा करने में असफल रही है। न तो स्कूल खुले, न नामांकन बढ़े, न परिणाम सुधरे, न शिक्षक बहाल हुए।

बस गिने-चुने स्कूलों में करोड़ों लुटाकर और उनकी तस्वीरें दिखाकर यह बताने की कोशिश हो रही है कि शिक्षा में क्रांति आ गई है और दिल्ली के सरकारी स्कूलों का कायापलट हो गया है। दरअसल आप की शिक्षा क्रांति, उस खुबसूरत-सी दिखने वाली रंगीन बैलून की तरह है, जो बाहर से देखने में मनभावन तो लगती है लेकिन अंदर से बिल्कुल खोखला है।

प्रचार तंत्र के साए में वाहवाही बटोरने वाला यह गुब्बारा जब फूटेगा तो शिक्षा के क्षेत्र में कुछ बदल जाने की आस पालकर बैठे कई लोगों का विश्वास टूटेगा। फिलहाल दिल्ली के गरीब लोगों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एक स्वप्न की तरह ही है।