राजनीति
अनुच्छेद 370 का उन्मूलन- डबल रोल में लौटे सरदार पटेल

मरने तक जो याद रहेंगे, वो यही दो दिन होंगे, जब कश्मीर के 370 के एक फरेब की कुर्बानी ईद के पहले दे दी गई। संसद के ये दो दिन वैसे ही यादगार हैं, जैसे 15 अगस्त 1947 का दिन उस समय की पीढ़ी को याद रहा। जैसे बांग्लादेश बनने और पाकिस्तान के 90,000 फौजियों के घुटने टेकने का दिन। वैसी ही खुशी। एक और आज़ादी या पूरी आज़ादी का अहसास। ये दो दिन हमने खुली आँखों से देखे, कान खोलकर सुने। इतिहास रचना जिसे कहते हैं, वे यही दो दिन थे।

370 का बीज संविधान में एक ऐसी फसल की उम्मीद में डाला गया, जो घिस-घिसकर घिस जाना था लेकिन वह बरगद सा फैला दिया गया। तब जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल थे। आज लगा कि सरदार वल्लभ भाई पटेल डबल रोल में लौट आए। उन्हें कुछ बकाया हिसाब चुकता करना था। वे 550 से ज्यादा रियासतों को एक नक्शे में अपने समय में ला चुके थे। लेकिन अकेला कश्मीर पंडितजी ने अपने पास रख लिया था और इन 70 सालाें में लोगों ने भोगकर देख लिया कि पंडितजी देश के सामने क्या विरासत छोड़कर गए, जिसने कांग्रेस को कहाँ ले जाकर छोड़ा।

यह यश गुजरात के ही हिस्से में लिखा था कि वह भारत के जहरीले बिखराव को खत्म करे और देश को एक सूत्र में बांध कर रख दे। नेहरू के कारण कश्मीर का काम अधूरा रह गया था। गुजरात से ही पटेल के दो योग्य उत्तराधिकारी उसी तेवर के साथ भारतीय राजनीति में प्रकट हुए और इन दो दिनों में 370 और 35 ए का नामुमकिन सा बना दिया काम चंद मिनटों में पूरा कर दिया। 2019 का मतदान इन दो दिनों में ही वसूल हो गया।

वह आज़ादी के जोश से भरा समय था इसलिए नेहरू उस खुशगवार खुमारी में ढक गए। लेकिन आज लगता है कि कश्मीर को अपने हाथ में रखने का निर्णय लेते समय वे खुद को फिरंगियों के समय का वायसराय, मुगलों के समय का बादशाह या गुलाम वंश का ही कोई सुलतान समझ रहे थे, जिसकी झोली में तकदीर ने हिंदुस्तान को माले-गनीमत की शक्ल में डाल दिया था। अपने चाहने वाले एक शेख (दरअसल शेखचिल्ली) को खुश करने के लिए कश्मीर की ऐशगाह उसकी शर्तों पर उसके हरम में डाल दी गई थी ताकि उसकी तीन पीढ़ियाँ यहाँ की नवाबी संभाल सकें।

मुफ्तखोर मुफ्तियों ने भी लूट के माल में अपना हिस्सा लेना जारी रखा। इनमें से किसी को घाटी के अवाम पर रहम नहीं आया। वे बिल्कुल सुलतानों, बादशाहों, नवाबों और निजामों सा सलूक कर रहे थे। नेहरू की मेहरबानी से श्रीनगर के सारे गधे दिल्ली तक पहलवानी कर रहे थे। इन दो दिनों में 370 और 35 ए का फरेब अपनी पूरी दुर्गंध के साथ देश की नाक में भर गया और हर कोई इन सब पर थूक रहा है।

कुछ समय पहले जब मैं अहमदनगर किले की जेल में गया था तो उस कमरे में बहुत देर रुका, जहाँ जवाहरलाल नेहरू को कैद किया गया था। वहीं एक कमरे में उन्होंने डिस्कवरी ऑफ इंडिया लिखी थी। वह कमरा आज तक वैसा ही सजा कर रखा गया है। वही टेबल, कुर्सी, सोफा और पंडितजी के हाथ के लिखे कुछ पन्ने। मैंने बड़ी श्रद्धा से उस कक्ष के दर्शन किए थे। और आज 370 की रोशनी में देख रहा हूँ नेहरू का वह ऊँचा कद इन दो दिनों में जाने कहाँ चला गया।

अपनी याददाश्त में दर्ज अब तक के प्रधानमंत्रियों के चेहरे एक के बाद नजरों के सामने से गुजर रहे हैं। इंदिरा गांधी, जो 1984 के ऑपरेशन ब्लू स्टार की पृष्ठभूमि में दिखाई दे रही हैं और चंद महीनाें बाद ही गोलियों से छलनी उनकी लाश भी। असलियत को छुपाने के लिए अच्छे शब्द कई बार पक्के लबादे का काम करते हैं।

इंदिरा की मौत के बाद उनके एक भाषण के शब्द इस्तेमाल किए गए थे, जिसमें उन्हाेंने कहा था कि मेरे खून का आखिरी कतरा भी देश के काम आएगा। इससे दिमागों में यह उतारने की कोशिश की गई जैसे उनकी शहादत हुई है जबकि वे अपने गलत फैसलों की शिकार हुई थीं। उनके बाद संयाेग से प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी, जो बेकसूर सिखों के कत्लेआम पर नेहरू युगीन उसी सुलतानी अवस्था में कह गए कि जब कोई बड़ा दरख्त गिरता है तो जमीन हिलती ही है।

उसके बाद वीपी सिंह, काहे के राजा और काहे के फकीर। नारे फिजूल थे। मंडल कमीशन का जहर फैलाकर यह शख्स आज इतिहास के कूड़ेदान में है। चंद्रशेखर, इंद्रकुमार गुजराल, देवेगौड़ा, पीवी नरसिंह राव और मनमोहन सिंह। किसी को दो साल मिले, कोई 10 साल टिका। यही संसद थी। यही संविधान था। यही कश्मीर था। यही 370 थी। यही 35 ए और इन सबके होते हुए लगातार बढ़ी दहशतगर्दी भी।

पहला मुस्लिम गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद भी इसी दौरान आया। इन्हीं के दौरान कभी घाटी में मस्जिदों से एलान करके पंडितों को न सिर्फ निकाला गया बल्कि उनकी महिलाओं और बच्चियों के साथ आज के सीरिया में आईएस जैसी हैवानियत की गई। याद कीजिए इन सबको एक सिरे से। क्या तो इनकी नीति थी, क्या रणनीति और क्या कूटनीति।

याद कीजिए आज बेनकाब हुए सारे सेक्युलर चेहरे वही हैं, जो गोधरा कांड के बाद गुजरात के एक शख्स के पीछे हाथ धोकर पड़े रहे थे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था और 2014 के बाद इनके बुरे दिन शुरू हो गए। इन सेक्युलरों के बीच कश्मीर के ठेकेदार हर कहीं अपनी जमावट किए रहे।

शेखचिल्ली परिवार के अब्दुल्ला बाप-बेटे, मुफ्ती की बेअक्ल दुख्तर मेहबूबा और कश्मीर में कांग्रेस की एजेंटी संभाल रहे गुलाम नबी, जिनके बीच गिलानी और भट जैसे टुकड़खोर भी मजे से पल रहे थे। अफजल गुरुओं, जाकिर मूसाओं, बुरहान वानियों जैसे गद्दारों की आवक-जावक भी धड़ल्ले से चलती रही। वे थाली में भी छेद कर रहे थे। आँखें भी तरेर रहे थे। 370 और 35 ए के साये में यह गाजरघास पूरी घाटी को अपनी चपेट में ले चुकी थी, पूरी सेक्युलर जमात इस गाजरघास को ही जन्नत का नज़ारा समझ बैठी थी। सब पीठ फेरकर बैठे रहे।

मगर भारत की जनता न पीठ फेरकर बैठी थी, न आँखें मूंदकर और न कान बंद करके। वह सिर्फ इंतज़ार में थी। एक अवतार की प्रतीक्षा हर युग में हुई है और भारतवासियों की यह युगों पुरानी आदत है। इसलिए उसे इंतज़ार खलता नहीं है।

वह 50 साल तक औरंगज़ेब को भी झेल लेती है, 700 सालों तक तुर्क और मुगल उसकी छाती पर आराम से लदे रह सकते हैं और 250 सालों तक अंग्रेज़ भी। वह सिर्फ अपने अवतार की प्रतीक्षा में रहती है और उसके आते ही पूरे दम से पीछे हो लेती है। तो 90 साल के संघर्ष के बाद एक दिन वह आज़ादी भी हासिल कर लेती है। फिर जब 70 साल तक ठगी जाती है तो एक दिन सबको किनारे लगा देती है।

तजुर्बेकार लीडर अपने निर्णय से कैसे मायूसी और निराशा के बीच उम्मीद जगा जाते हैं, यह हमने दो दिन में देख लिया। एक नामुमकिन सा काम उन्होंने जैसे चुटकियों में कर दिखाया है। 130 करोड़ लोगों को पहली ही बार पता चला कि 370 और 35 ए के मायने क्या हैं? कैसे इन दो अंकों ने एक सूबे को जकड़ रखा था और देश की पकड़ से बाहर भी रखा था।

चंद परिवारों ने अपने हिस्से का माले-गनीमत समझकर इसे 70 सालों से ऐसा उलझा दिया था कि आज संसद में बैठे भाई और माई के चेहरों को देखकर लगा जैसे उन्हें सच में कुछ पता ही नहीं था कि वे किस विरासत के वारिस बनकर बैठे हुए थे। अपनी खिसकी हुई जमीन का उन्हें अब तक अहसास नहीं है। वे 2019 में शपथ के सपने देख रहे थे।

एक डरावनी कल्पना कीजिए। खुदा न खास्ता 2014 में ही यूपीए नाम का झुंड किसी तरह तीसरी बार दिल्ली पर कब्जा करने में कामयाब हो गया होता तो? सपा, बसपा, तृणमूल, एनसी, एनसीपी, पीडीपी, डीएमके, राजद के झुंड भी माले-गनीमत में अपने हिस्से बाँटकर खा ही रहे होते। किसे पता चलता कि 370 और 35 ए ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में कैसी घुटन मचा रखी है और सत्ता के इस मिले-जुले खेल में भारत के संविधान का गला कहाँ घोंटा हुआ है?

फिर दिल्ली में शानदार इफ्तार पार्टियों में अब्दुल्लाओं, मुफ्तियों और नबियों की रौनक बदस्तूर जारी रहती। हमें कभी पता नहीं चलता कि लद्दाख की भी एक आवाज़ है, जो संसद में कुछ कहना चाहती है। अब भी कश्मीर का मतलब होता सिर्फ घाटी। पूरे सूबे का सिर्फ 25 फीसदी हिस्सा, जिसने 370 और 35 ए की आड़ में सब कुछ हड़पा, जिसने जम्मू को भी वंचित रख छोड़ा है और लद्दाख को भी। सुलतानों और नवाबों के समय के चंद चेहरे इसे अपनी खानदानी रियासत बनाए बैठे हैं। कैसे यह पता चलता?

अब सब बेनकाब हो चुका है। यह सब कैसे चलता रहा, किसने कश्मीर की ठेकेदारी अपने हाथ में ली और किसे पेटी ठेके देकर चला गया? सब नामजद सामने हैं। शेखचिल्ली के दो वारिस सामने हैं। मुफ्ती की रज़िया सुलतान हैं। हुर्रियत की गुमटी वाले खदेड़े जा चुके हैं। बंदूक थामकर दहशतगर्दी करने वालों की बड़ी जमात कब्रस्तानों में कयामत के इंतज़ार में लेटी है।

मेरी नज़रें नेहरू की तस्वीर पर टिकी हैं। उनके कई रूप तेजी से जेहन में आ-जा रहे हैं। एडविना के साथ सिगरेट सुलगाते हुए नेहरू। शेख अब्दुल्ला के साथ गले मिलते हुए नेहरू। पटेल के साथ खिंचे-खिंचे से नेहरू, सीधे 70 साल बाद 370 वोटों से कूड़ेदान में जाती धारा 370 के पीछे से झाँकते नेहरू और संसद के एक कोने की दो बेंचों पर आगे-पीछे उनके मुँह सिले उत्तराधिकारी। यह बिल्कुल तख्त उलटने और लोकतंत्र के तानाशाहों के धूल-धसरित जैसा अहसास है।

यह दो दिन ज़िंदगी में मरते दम तक याद रहने वाले हैं। हमने इतिहास के एक बकाया हिसाब को चुकता होते हुए अपनी आँखों से देख लिया है। हम इस अहसास से भरे हैं कि भारत नपुंसक नेताओं का देश नहीं है, जो अपनी कुर्सी की खातिर सब कुछ दाव पर लगा देंगे।

भारत ने 1,000साल तक बहुत बुरे दिन देखे हैं। वह टुकड़ों में बटकर आज़ाद हुआ है, जिसे 70 साल तक सियासी और सेक्युलर गिद्धों ने जमकर नोंचा है। इन दो दिनों में यह यकीन पुख्ता हुआ कि उनका समय जा चुका है। अब वे इतिहास के कूड़ेदान में हैं। हमारा भरोसा अवतारों पर है। भगवान ने भी इस भरोसे को अब तक कायम रखा है। दो दिन में सिर्फ दो लोगों ने यह साबित कर दिखाया है कि भारत को ईश्वरीय शक्ति संभाले हुए है।

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छः पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com