राजनीति
गांधी हत्या के बाद हुए ब्राह्मण-विरोधी दंगों में था कांग्रेस का हाथ

30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर महात्मा गांधी की हत्या कर दी थी। सारा देश शोक में डूब गया था। मगर नाथूराम के प्रदेश महाराष्ट्र में अलग नज़ारा था। लोगों को पता था कि नाथूराम चितपावन ब्राह्मण और हिंदुत्ववादी है तो लोंगों का गुस्सा ब्राह्मणों और हिंदुत्ववादियों के खिलाफ फूट पड़ा। 31 जनवरी से लेकर 3 फरवरी तक पुणे में ब्राह्मणों के खिलाफ हिंसा का नंगा नाच चलता रहा। धीरे-धीरे हिंसा की यह आग दक्षिण पश्चिम महाराष्ट्र के सांगली, कोल्हापुर, सातारा आदि जिलों में फैल गई जिसमें सैंकड़ों लोग मारे गए, हज़ारों घर जलाए गए, महिलाओं के साथ दुष्कर्म किए गए। यह था आज़ाद भारत का पहला नरसंहार। अहिंसा के मसीहा महात्मा गांधी के अनुयायियों की उन्हें हिंसक श्रद्धांजलि।

हाल ही में 1984 में दिल्ली में हुए सिख नरसंहार के मुख्य आरोपी कांग्रेसी नेता और पूर्व सांसद सज्जन कुमार को 34 साल बाद उम्रकैद की सज़ा हुई। कई दोषियों को पहले ही सज़ा हो चुकी है। एसआईटी पुराने मामलों को फिर खोल रही है। यानी अगले कई वर्षों तक मामला चलता रहेगा क्योंकि लोगों की यादों में ज़ख्म अभी ज़िंदा हैं। मगर महाराष्ट्र के इस नरसंहार के बारे में अखबारों में खबरें भी कम छपीं, इसकी जाँच भी नहीं हुई और न दोषियों को सजा हुई। इस नरसंहार को लेकर देश अनजान है, यहाँ तक कि महाराष्ट्र और हिंसा का केंद्र रहा पुणे भी इसे भूल चुका है।

दिल्ली के 84 के दंगों और महाराष्ट्र के दंगों में एक समानता है जैसा कि राजीव गंधी ने कहा था, “जब कोई विशाल वृक्ष गिरता है तो धरती थोड़ा हिलती है”। दिल्ली में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उमड़ा गुस्सा था तो महाराष्ट्र में महात्मा गांधी की हत्या के खिलाफ आक्रोश था जिसने जातीय रूप ले लिया था, मगर इसके पीछे की सोच और हाथ कांग्रेस का ही था। राहुल गांधी को कांग्रेस इन दिनों जनेऊधारी हिंदू बताती है। वे अपने खून और डीएनए में ब्राह्मण अंश होने का दावा करते हैं। यह सही भी है। कांग्रेस के कई दिग्गज नेता और चार पीढ़ी तक राज करनेवाले गांधी परिवार को ब्राह्मण ही माना जाता है। फिर कांग्रेस का मुख्य वोट बैंक ब्राह्मण, हरिजन और मुसलमान ही थे। मगर यह भी सच्चाई है कि कांग्रेस के हाथ ब्राह्मणों के खून से रंगे हुए हैं। जैसे दिल्ली के सिख-विरोधी दंगों के बारे में कांग्रेस कहती है कि दंगों में कांग्रेस का कोई हाथ नहीं था, यह कुछ नेताओं की करतूत थी। तो महाराष्ट्र में गांधी हत्या की आड़ में कांग्रेस का जनाधार मराठा जाति, ब्राह्मणों के खिलाफ नफरत निकालने निकल पड़ा था क्योंकि गोडसे ब्राह्मण था तो उसके मार्गदर्शक सावरकर गांधी-विरोधी थे।

दरअसल कभी तिलक और गोखले जैसे ब्राह्मण कांग्रेस के नेता थे मगर हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उदय के बाद जातीय समीकरण बदलने लगे। अपने आप को क्षत्रिय कहनेवाले और 35 फीसदी जनसंख्या वाले मराठा कांग्रेस का जनाधार बन गए। ब्राह्मण हिंदू संगठनों के साथ जुड़ गए।

गांधी का हत्यारा नाथूराम गोडसे ब्राह्मणों की उपजाति चितपावन जाति का था। गांधी हत्या के तुरंत बाद महाराष्ट्र में हत्याओं और लूटपाट का दौर शुरू हो गया। दंगे के पहले दौर में प्रतिशोध की लहर थी। महात्मा गांधी के समर्थकों ने हिंदू संगठनों जैसे हिंदू महासभा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और चितपावन ब्राह्मणों पर गुस्सा उतारा। पुणे और अन्य कुछ जिलों में गैर-ब्राह्मण जातियों ने चितपावनों के खिलाफ गुस्सा उतारा। लोग मारे गए, उनके घर और कार्यालय जला दिए गए। सरकारी सूत्रों के मुताबिक आठ लोग मारे गए। मगर न्यूयॉर्क टाइम्स (31 जनवरी 1948) के अनुसार पहले ही दिन मुंबई में 15 लोग मारे गए थे। उस समय के बारे में मॉरिस पैटरसन ने अपने अध्ययन- द शिफ्टिंग फॉरचून्स ऑफ चितपावन ब्राह्रमिन्स फोकस ऑन 1948 में लिखा है- मुंबई में भीड़ हिंदू महासभा और रास्व संघ के दफ्तरों में घुस गई थी, उनके समर्थकों के घरों और दुकानों में सेंध लगाई जा रही थी। 500 से 1000 लोगों की भीड़ ने सावरकर के घर को घेर लिया था, पत्थर फेंकने लगे थे। उन्हें पुलिस ने बचाया।

पुणे में गोडसे के अखबार हिंदू राष्ट्र और अन्य हिंदुत्ववादी अखबारों के कार्यालय में आग लगा दी गई। पुणे के निवासियों के अनुसार इस दिन 50 लोग मारे गए। इस दंगे के बारे में अध्ययन करने वाली मॉरिस पैटरसन ने लिखा है- सबसे ज़्यादा हिंसा हिंदू राष्ट्रवादियों के गढ़ों मुंबई, पुणे और नागपुर में नहीं हुई, वरन मराठी भाषी क्षेत्र के दक्षिणी पश्चिमी जिले सातारा, बेलगांव और कोल्हापुर में हुई।

दंगों का पहला दौर गांधी के समर्थकों द्वारा चितपावनों को निशाना बनाने के साथ शुरू हुआ मगर दूसरा दौर शुद्ध जातिवादी था। महाराष्ट्र की राजनीति में ब्राह्मणों का बैर सदियों पुराना है। महाराष्ट्र के ब्राह्मणों ने शिवाजी के राज्याभिषेक का इस आधार पर विरोध किया था कि वे क्षत्रिय नहीं हैं। मगर शिवाजी स्वराज्य की स्थापना में सफल हुए और राज्याभिषेक कराने में भी। मगर उनकी मृत्यु के बाद उनके वंशज राज्य संभाल नहीं पाए। परिणाम स्वरूप वे नाममात्र के राजा तो रहे मगर असली सत्ता उनके ब्राह्मण मंत्री जो पेशवा कहलाते थे के हाथों में चली गई। उन्होंने शिवाजी के साम्राज्य को दक्षिण के तंजौर से उत्तर भारत में ग्वालियर और झांसी तक फैलाया। इसके साथ महाराष्ट्र में ब्राह्मणों के वर्चस्व का युग शुरू हुआ। इसलिए सत्ता में उनका वर्चस्व बना रहा। इससे मराठा और ब्राह्मणों के बीच प्रतिद्वंद्व बढ़ा। बाद में अंग्रेज़ों के हाथों पेशवा पराजित हुए मगर सार्वजनिक जीवन में उनका दबदबा बना रहा। तिलक, गोखले और रानाडे स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करने के कारण राजनीति में छाए रहे। मगर बाद में मराठा कांग्रेस का प्रमुख जनाधार बन गए। सत्ता उनके हाथों में आने लगी मगर ब्राह्मणों का वर्चस्व उन्हें खलता था।

गांधी हत्या के रूप में उन्हें अपना हिसाब चुकाने का मौका मिल गया था। आज़ादी के समय तक कांग्रेस का नेतृत्व मराठा समाज के हाथों में ही था। वही कांग्रेस में कर्ताधर्ता थे। गांधी हत्या के बाद हुए दंगों में मराठा राजनीतिज्ञों की लॉरियों में भीड़ लाई गई और उन्होंने ब्राह्मण मौहल्लों को अपना निशाना बनाया। दरअसल कई सुधारवादी आंदोलनों ने भी ब्राह्मणों के खिलाफ माहौल तैयार किया था। जिन जिलों में हिंसा हुई उनमें सातारा ,कोल्हापुर और सांगली आदि प्रमुख थे। कोल्हापुर में हिंदू महासभा और आरएसएस के कार्यालय जला दिए गए। हिंदू महासभा के नेता का फिल्म स्टूडियो जला दिया गया। और फिर सारे ब्राह्मणों पर गाज गिरी। सबसे ज़्यादा हिंसा सात पटवर्धन राज्यों में हुई, जो चितपावन ब्राह्मणों के राज्य थे। सांगली में चितपावन ब्राह्मणों के कारखानों को नष्ट कर दिया गया। इस तरह मुंबई-पुणे से लेकर कोल्हापुर, सांगली, सातारा तक के विशाल क्षेत्र में यह ब्राह्मण-विरोधी दंगे चलते रहे। कई क्षेत्रों में तो ब्राह्मणों से ईर्ष्या करनेवाले जैन और लिंगायत भी हमलों में शामिल हो गए।

महाराष्ट्र के हज़ारों-लाखों ब्राह्मण के घर-मकान-दुकानें-स्टॉल फूँक दिए गए। सैंकड़ों ब्राह्मण मारे गए, हज़ारों ज़ख्मी हुए, ब्राह्मण स्त्रियों के साथ दुष्कर्म किए गए। वृद्ध हों या किशोर, सबके नाम पूछ-पूछ कर चितपावन ब्राह्मणों को चु- चुन कर जीवित ही जला दिया गया। कई दिनों तक पुणे जलता रहयह हिंसा गाँव-गाँव तक फैली। वहाँ नारे लगते थे- “ब्राह्मणों… यदि जान प्यारी हो, तो गाँव छोड़कर भाग जाओ…”।

दंगों का असर यह हुआ कि प्रत्येक गाँव से ब्राम्हण भाग-भाग कर यहाँ-वहाँ छिप गए। बहुत से ब्राह्मण महाराष्ट्र से बाहर चले गए अथवा किसी अन्य दूर के गाँव में छिप गए और बहुत समय तक उन्होंने अपना परंपरागत कार्य छोड़ दिया। कई अन्य व्यवसायों में चले गए। कई ब्राह्मण विस्थापित होने पर विवश हो गए।

संघ के साथ जुड़े ब्राह्मणों के घर पर जो हमले हुए उसका विवरण “युग प्रवर्तक गुरूजी” पुस्तक में चं. प. भिशीकर ने बताया है, महाराष्ट्र के इस कांड ने ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण विवाद का रूप ले लिया। इसके परिणाम स्वरूप असंख्य लोगों के घरों पर हमले हुए। आगजनी, लूटपाट की घटनाएँ होती रहीं। भारी नुकसान हुआ। महाराष्ट्र और उसके आस-पास के प्रदेशों में हज़ारों परिवार निराधार भी हो गए। कितने ही लोगों के प्राण भी गए। देशभर में संघ के (ब्राह्मण) स्वयंसेवकों और कार्यकर्ताओं को यातनाएँ भोगनी पड़ी।”

गांधी हत्या के बाद कांग्रेस के मराठा नेताओं ने ब्राह्मणों का अघोषित बहिष्कार शुरू कर दिया। उस ज़माने में सांप्रदायिक दंगों की रपट पर कड़ा नियंत्रण था। मॉरिस पैटरसन लिखती हैं कि घटना के दस साल बाद भी उन्हें इन मामलों की पुलिस फाइलें नहीं दिखाई गईं। जब तक सारे रिकॉर्ड सामने नहीं आते, तब तक यह पता नहीं चल सकता कि कितनी जानें गईं और कितना नुकसान हुआ।

वैसे पर्यवेक्षक मानते हैं कि इन दंगों में सैकडों जानें गईं। कुछ लोग मरनेवालों की तादाद हज़ार के आस-पास बताते हैं तो कुछ 5000 मगर वास्तविकता का पता चल पाना मुश्किल है। उस समय विपक्ष इतना कमज़ोर था कि इन दंगों का पुरजोर विरोध करने में भी नाकाम रहा। विडंबना यह थी उस समय देश के प्रधानमंत्री पंडित नेहरू जैसे महान डेमोक्रैट थे। उन्होंने भी इन दंगों के खिलाफ ज़बान नहीं खोली।

मॉरिस पैटरसन ने इस सिलसिले में परशुराम की पौराणिक कथा का हवाला देते हुए कहा है कि चितपावन ब्राह्मण स्वयं को परशुराम का वंशज कहते हैं। मगर इन दंगों में अपने को क्षत्रिय कहनेवाले मराठों ने स्वयं को परशुराम के 21 बार क्षत्रिय मुक्त धरती करने के संकल्प का बदला लेने की स्थिति में पाया था।

बहुत से लोग मानते हैं कि यह स्वतंत्र भारत में भीड़ द्वारा हत्या (लिंचीग) की पहली घटना थी जिसे कांग्रेस ने अंजाम दिया था। कुछ लोग इसे स्वतंत्र भारत का पहला नरसंहार कहते हैं,जिसकी न जाँच हुई और न दोषियों को कोई सज़ा हुई।

इस लेख के मॉरिस पैटरसन के उद्धरण कोएनार्ड एल्स्ट की पुस्तक गांधी एंड गोडसे से लिए गए हैं।

सतीश पेडनेकर ‘आईएसआईएस और इस्लाम में सिविल वार’ पुस्तक के लेखक हैं।