राजनीति
अलवर की ज़मीनी वास्तविकता खोल रही ‘हिंदुत्व प्रयोगशाला’ प्रोपगैंडा की पोल

आशुचित्र- अलवर की ज़मीनी वास्तविकता ‘भयग्रस्त मुस्लिम’ नैरेटिव का करती है खंडन।

हिंदुत्व प्रयोगशाला‘ क्या होती है? जिस ‘हिंदुत्व प्रयोगशाला’ में मुस्लिम हिंदुओं से भयभीत होकर जीते हैं, वह कैसी लगती है?

क्या यह ऐसा स्थान है जहाँ नाबालिग हिंदू लड़की पड़ोसी मुस्लिम परिवार के द्वारा सामूहिक दुष्कर्म किए जाने के महीनों बाद कुएँ में कूद जाती है? जहाँ उसके पिता न्यायालय में बयान देने के दिन ही पेड़ से लटके मिलते हैं? जहाँ स्थानीय पुलिस मुस्लिम आरोपियों का पक्ष लेती है और हिंदू पीड़ितों के साथ दुर्व्यवहार करती है?

राजस्थान के अलवर को नैरेटिव सृजित करने वाली राष्ट्रीय मीडिया और मुस्लिमों को पीड़ित दर्शाने वाले व्यावसायिक संगठनों ने हिंदुत्व का गढ़ कह दिया था जहाँ भीड़ मुस्लिमों की हत्या कर देती लेकिन ज़मीनी स्तर की वास्तविकता इसके उलट है।

उपरोक्त घटना तीन सप्ताह पूर्व अलवर की रामगढ़ तहसील के बालोट नगर में हुई थी। 18 जून को एक नाबालिग हिंदू लड़की आत्महत्या के उद्देश्य से कुएँ में कूद गई थी जिसे स्थानीय लोगों ने बचाया। परिवार के लिए तनाव का कारण बनने के कारण वह अपनी जान देना चाहती थी।

उसका पड़ोसी मोहम्मद अनीस और उसके भाई वर्ष भर से लड़की का उत्पीड़न कर रहे थे। पुलिस ने इसपर कोई एफआईआर दर्ज नहीं की और कथित तौर पर उलटा लड़की को ही “चरित्रहीन” कह दिया। मामला तब ही दर्ज किया गया जब थाने के बाहर हिंदू संगठनों ने धरना दिया।

जिस दिन जिला न्यायालय में लड़की का बयान दर्ज होना था, उसी दिन उसके पिता श्रवण घर से 500 मीटर की दूरी पर स्थित पेड़ से लटके मिले। परिवार ने मुस्लिम पुरुषों पर हत्या काआरोप लगाया है। बालोट नगर में 80 प्रतिशत जनसंख्या मुस्लिम है। यह हिंदू परिवार इस क्षेत्र का एकमात्र ब्राह्मण परिवार था।

पेड़ से लटके लड़की के पिता श्रवण

अलवर के लिए चलाया गया नैरेटिव कितना गलत है, इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि उपरोक्त घटना लालवंडी गाँव के 2 किलोमीटर के दायरे में हुई है जहाँ 2018 में मुस्लिम व्यक्ति को हिंदू पुरुषों ने पीटा था जिसके कथित कारण के अनुसार कुछ घंटों बाद उसकी मौत हो गई थी।

रकबर खान आरोप-पत्र में नामित मवेशी चोर था जिसे ग्रामीणों ने पकड़ लिया था जब वह दो अदुधारू गायों को रात के अंधेरे में ले जा रहा था और उसे पुलिस को सौंप दिया था। उसकी मौत पुलिस हिरासत में ही हुई।

स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि यदि रकबर खान की मौत ने मुस्लिम समुदाय को चौंकाया और भयग्रस्त किया तो बालोट नगर के मुस्लिम परिवार को इतनी हिम्मत कहाँ से आई कि वह पड़ोसी हिंदू परिवार की नाबालिग लड़की का महीनों तक उत्पीड़न कर सकें और इस बात का विरोध करने वाले उसके भाइयों को पीट सकें?

अलवर को बदनाम करने के लिए मीडिया ने जितने मामलों की बात की थी, उनमें से अधिकांश गौरक्षा से संबंधित और रामगढ़ तहसील के हैं। रामगढ़ राजस्थान की सीमा पर स्थित है जिसके पड़ोस में हरियाणा का नूह जिला है।

मेवात का यह क्षेत्र संगठित और खतरनाक मवेशी तस्करी माफिया के लिए जाना जाता है जिसका उल्लेख पुलिस और न्यायालय के रिकॉर्ड में तो मिलता है लेकिन अधिकांश मीडिया रिपोर्टों में नहीं। 2017 और 2018 में रामगढ़ में गौरक्षकों द्वारा मारे गए तीन मुस्लिम पुरुषों में से दो का मवेशी चोरी और हत्या में इतिहास था।

पड़ोसी जिले भरतपुर के रहने वाले उमर मोहम्मद और नूह जिले के रकबर खान के अलावा तीसरा व्यक्ति है पहलू खान जो नूह जिले का ही रहने वाला है और उसकी मृत्यु के उपरांत उसपर मवेशी चोरी का आरोप लगा था।

लेकिन राजस्थान उच्च न्यायालय ने “साक्ष्य” के अभाव में उसके विरुद्ध एफआईआर को खारिज कर दिया था। उसे आरोप से मुक्त किया जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि मवेशी चोरी और हत्या के मामलों में बहुत कम बार ही ऐसा होता है कि दोष सिद्ध हो पाता है।

पिछले वर्ष नूह पुलिस को हरियाणा उच्च न्यायालय ने फटकार लगाई थी जब यह बात रेखांकित हुई थी कि नवंबर 2015 से मार्च 2019 के बीच गौहत्या विरोधी कानून के तहत दर्ज हुए 800 मामलों में से एक में भी दोष सिद्ध नहीं किया जा सका था और सभी आरोपी निर्दोष घोषित कर दिए गए थे।

इसके कुछ महीनों बाद नूह पुलिस ने स्वीकारा था कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि स्थानीय पुलिस दोष सिद्ध करने में सक्षम नहीं है और कुछ मामलों में अपराधियों को जान-बूझकर दोषमुक्त किया गया है। वहीं दूसरी ओर राजस्थान में  हिंदुस्तान टाइम्स की 2015 की रिपोर्ट के अनुसार गौहत्या के मामले में पहली बार दोष सिद्ध हुआ था जिसे रिपोर्ट में “ऐतिहासिक” कहा गया था।

इस प्रकार दोषसिद्ध होने की न्यूनतम संभवानाओं के साथ नूह और अलवर के पड़ोसी नगरों में अपराधी खुले घूमते हैं। ज़मीनी स्तर की वास्तविकता से अनभिज्ञ पत्रकार इन अपराधियों को “दुग्ध किसान” कह देते हैं।

मीडिया में पेहलू, रकबर औक उमर को भी दुग्ध किसान ही कहा गया था। उमर की मौत के एक साल बाद उसका बेटा मकसूद उसके पिता की तरह गौ-तस्करी के मामले में ही गिरफ्तार हुआ था। उमर की मौत पर राज्य सरकार द्वारा दिए गए उदार मुआवज़े के बावजूद ऐसा हुआ।

मीडिया में जैसा भय का माहौल दर्शाया जाता है, वैसा वास्तविकता में नहीं होता, इसका प्रमाण रकबर की मौत के दो सप्ताह बाद ही मिल गया था। मीडिया चिंतित थी कि रामगढ़ में मुस्लिम वैधानिक रूप से गाय भी नहीं रख सकते लेकिन रकबर की मौत के 10 दिन बाद तीन मुस्लिम महिलाएँ 221 गाय की ताज़ा खालों के साथ रंगे हाथ मिली थीं।

अवैध कत्ल खाना हिंदू-बहुल गाँव गोविंदगढ़ में ही चलाया जा रहा था जो लालवंडी से 30 किलोमीटर से भी कम दूर है। गौहत्या विरोधी कानून के तहत जिन पुरुषों-महिलाओं पर मामला दर्ज किया जाता है उन्हें प्रायः जमानत दे दी जाती है और वे स्वतंत्र घूमते हैं।

अपने पड़ोसी नूह की तरह ही रामगढ़ की भी वास्तविकता है। नूह में दलित हिंदुओं पर अत्याचारों की रिपोर्ट तैयार करने वाले सेवानिवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने लिखा था कि नूह में “दलितों पर औरंगज़ेब जैसे क्रूर अत्याचार किए जा रहे हैं।”

नूह में 80 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या है, वहीं रामगढ़ में 2011 की जनगणना के अनुसार 38 प्रतिशत मुस्लिम आबादी दर्जी की गई है। स्थानीय लोगों का मानना है कि रामगढ़ और पड़ोसी भरतपुर में जनसांख्यिकी मुस्लिमों के पक्ष में शीघ्रता से परिवर्तित हो रही है।

वे कहते हैं कि मुस्लिम समुदाय के आपराधिक तत्वों को कांग्रेस के वर्तमान मुस्लिम विधायक का संरक्षण प्राप्त है। 2019 में हुए चुनाव में साफिया ज़ुबैर ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सुखवंत सिंह को 12,000 मतों से हराया था।

रामगढ़ के पूर्व विधायक ज्ञान देव अहुजा को टिकट हिंदू मतदाताओं में उनकी अलोकप्रियता, जो गोविंदगढ़ जैसे मामलों में उनकी असक्रियता से असंतुष्ट थे, के कारण नहीं दिया गया था। पिछले वर्ष की रामगढ़ की कुछ रिपोर्टें देखें-

इनमें से अधिकांश घटनाओं का उल्लेख स्थानीय मीडिया में हुआ परंतु राष्ट्रीय प्रेस में नहीं। इन उत्पीड़नों का शिकार हो रहे लोगों पर प्रकाश न डाले जाने के कारण ही राष्ट्रीय मीडिया ने अलवर पर प्रोपगैंडा खड़ा किया था।

यदि सच में वहाँ मुस्लिम समुदाय भय में जी रहा है और यह जिला सच में “हिंदुत्व प्रयोगशाला” बनता जा रहा है तो ज़मीनी स्तर पर भी ऐसा दिखना चाहिए था। लेकिन 46 वर्षीय श्रवण कुमार का पेड़ से लटका शव कोई और ही चित्र प्रकट कर रहा है।

स्वाति गोयल शर्मा स्वराज्य में वरिष्ठ संपादक हैं और वे @swati_gs के माध्यम से ट्वीट करती हैं।