राजनीति
नाम बदलना राजनीति नहीं, सांस्कृतिक दासता से आज़ादी है (आगरा संग्रहालय नामकरण)

शेक्सपियर की बात गौण है कि नाम में क्या रखा है। उनकी बात मज़ाक में कही गई हो सकती है लेकिन, नाम में बहुत कुछ रखा है। ये नाम ही तो हैं जिन्होंने हमारी सांस्कृतिक पहचान छीन ली, यह नाम ही तो हैं जिन्होंने हमें अपने इतिहास का गौरवबोध नहीं होने दिया, ये नाम ही तो हैं जिन्होंने हमारा सांस्कृतिक, सामाजिक वजूद हमसे छीनने की कोशिश की। इसके बाद भी कोई ऐसा तर्क हो सकता है कि नाम में कुछ नहीं रखा है!

हम शिवाजी का स्तुतिगान पढ़ेंगे या औरंगजेब को महिमामंडित करने वाली झूठी कहानियों को। हमें बताना है तो उसके अत्याचार बताइए जो उसने हमारी पीढ़ियों पर किए, हमें यह जानने का हक है कि कैसे शिवाजी राजे आगरा में दुष्ट औरंगजेब के चंगुल से निकले और उसके साम्राज्य की चूलें हिलाई।

अब मुगल संग्रहालय जब छत्रपति शिवाजी महाराज संग्रहालय के नाम से जाना जाएगा तो ही हम यह जान पाएँगे। मुगलिया अत्याचार से लड़ने की गाथाओं से हम अपने गौरव को पाएँगे। वास्तव में यह इतिहास के सही पुनर्पाठ का काल है। योगी सरकार का यह निर्णय गतिरोधों के बीच भारतीय संवेदना को जागृत करने वाला है।

आगरा में मुगल संग्रहालय अभी निर्माणाधीन है। 2016 में अखिलेश यादव की सरकार में स्वीकृत हुआ था, उन्होंने वोटबैंक को खुश करने की कीमत पर इसका नाम मुगल म्यूज़ियम रखा था। प्रदेश में 2017 में योगी सरकार का गठन हुआ तो, परंपरा और इतिहास की गौरवशाली धरोहर संजोई जाने लगी।

योगी आदित्यनाथ का मानना है कि यह संग्रहालय इस क्षेत्र के सांस्कृतिक धरोहर वैभव को प्रस्तुत करता है और आगरा से छत्रपति शिवाजी की स्मृतियाँ जुड़ी हैं। भाजपा के साथ ही समान विचारधारा वाले संगठन भी इसका खुलकर समर्थन कर रहे हैं। इसके पीछे उनका यही तर्क है कि गुलामी की मानसिकता से बाहर आना होगा, मुगल आक्रांता थे और उनका महिमामंडन नहीं होना चाहिए।

यह बात किसी से छिपी नहीं है, कैसे एक-एक कर हमारे सांस्कृतिक प्रतीक नष्ट किए गए। मुगलों और फिर आगे के कालखंड में अंग्रेज़ी हुकूमत ने किस प्रकार षड्यंत्र के तहत हमें अपने वीर गाथाओं से भरे इतिहास को बदलकर हमें संकुचित किया। नाम बदलने की कहानी भी इसी का एक हिस्सा है, अयोध्या फैजाबाद कब हो गई और तीर्थ राज प्रयाग कब इलाहाबाद बनकर हमारे जेहन में रच-बस गया। केवल यही नहीं देश हज़ारों की संख्या में ऐसे नए नामकरण केवल हमारा मान मर्दन करने के लिए ही किए गए।

अलीगढ़ में राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने विश्वविद्यालय के लिए ज़मीन तो दे दी, लेकिन उनके योगदान को भुलाने के लिए सारे प्रयास मुस्लिम विश्वविद्याल द्वारा किए गए। जब योगी सरकार ने उनके नाम पर राज्य विश्वविद्यालय की स्थापना का निर्णय लिया तो अलीगढ़ के बाहर बहुत से लोगों को उनके योगदान का पता चला।

सल्तनतों-मुगलों ने साजिश के तहत नाम बदले, स्थलों को गिराया, प्रतीकों को नष्ट किया जिससे पीढियाँ इन पहचानों से वंचित हो जाए। दुनिया में भला कौन-सा देश है, संस्कृति है जिसने हमलावरों, आतताइयों के नाम को अपने गौरव और पहचान से जोड़ा है, संभवतः कोई भी नहीं।

केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं भारत के कई दूसरे राज्यों ने भी अंग्रेज़ी शासन द्वारा दिए गए शहरों के नाम बदले हैं। कोलकाता, मंगलुरु, बंगलुरु, ओडिशा, चेन्नई, शिमला, मुंबई, गुरुग्राम यह सब गुलामी के प्रतीकों से मुक्त हुए नाम हैं। दुनिया के तमाम देशों मसलन घाना, म्यांमार, जिम्बाब्वे, जाम्बिया, कांगो सहित कई देशों ने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में अपने नाम बदले हैं। कनाडा के टोरंटो और ओटावा जैसे शहरों ने भी इसी कारण अपने पुराने नाम छोड़े।

दिल्ली में औरंगजेब रोड केवल कांग्रेसी तुष्टिकरण के कारण ही आज़ादी के 70 साल बाद तक बची रही। क्या यह लुटेरे और अत्याचारी शासक का महिमामंडन नहीं था, कि देश की राजधानी में लुटरे के नाम पर भी सड़क जानी जाती हो। आज़ादी के बाद कांग्रेसी सरकारों ने भी थोड़ी बहुत कोशिश की लेकिन वोटबैंक के लालच और वामपंथी विचारकों से प्रगाढ़ता ने उसे रोक दिया। बाद में कांग्रेसी प्रश्रय का परिणाम भी यह रहा कि वामपंथी दृष्टिकोण रखने वाले इतिहासकारों ने बड़ी ही चतुराई से हमारे गौरव बोध को बखूबी तोड़ा।

मुगल हमारे नायक नहीं हो सकते इसलिए हमें उनकी दी हुई दासता से मुक्ति पानी ही होगी। आज समय है गौरव बोध को जगाने का सरकार लोकमत को समझकर निर्णय भी ले रही है। इस देश में किसी भी लुटेरे के नाम पर नगर, सड़क या कोई भी प्रतीक रहना नहीं चाहिये इस विषय पर भी लोग खुलकर विचार रख रहे हैं। पाठ्यक्रमों में भी क्रमिक सुधार जारी है। इसे राजनैतिक या वोटबैंक के चश्में को उतार कर देखना होगा। हमें गर्व का बोध कराने वाला इतिहास चाहिए, सिर झुका कर अपमानित होने वाला नहीं।

अंकुश त्रिपाठी स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। वे@ankushtofficial के माध्यम से ट्वीट करते हैं।