राजनीति
महाराष्ट्र और तमिल नाडु के बाद उत्तर प्रदेश पर पुनः ध्यान केंद्रित करे भाजपा

आशुचित्र- उत्तर प्रदेश के महागठबंधन का सामना भाजपा उत्तर प्रदेश के बाहर छोटे-छोटे गठबंधन करके करेगी। और इसलिए बिहार, महाराष्ट्र और तमिल नाडु में गठबंधन किया गया है।

महाराष्ट्र और तमिल नाडु में सीटों के बँटवारे के दो सौदों ने भारतीय जनता पार्टी की ओर से 2019 के आम चुनावों में एक नए यथार्थवाद का संकेत दिया है।

आज महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी की स्थिति अच्छी है लेकिन इसके बावजूद इसने सहयोगी दल शिव सेना को काफी जगह दी है। भारतीय जनता पार्टी 25 सीटों के लिए और शिव सेना 23 सीटों पर लड़ने के लिए मान गई है, साथ ही दिसंबर में होने वाले विधान सभा चुनावों में बराबर की सीटों पर लड़ने का भी निर्णय हो गया है। अगर यह गठबंधन सफल हो जाता है तो यह कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के गठबंधन को आसानी से हरा सकती है।

तमिल नाडु में  जहाँ ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (अन्नाद्रमुक) वरिष्ठ पार्टी है, वहाँ भाजपा पांच सीटों पर लड़ने के लिए मान गई है, वहीं सात सीटों पर वन्नियार पार्टी पट्टाली मक्कल काची (पमका) लड़ेगी। तीन तरफ़ा गठबंधन जिसमें अन्नाद्रमुक, पमका और भाजपा शामिल हैं, वह देसिया मुरपोकू द्रविड़ कड़गम (देमुद्रक) जैसी एक-दो और स्थानीय पार्टियों को अपने साथ जोड़कर एक मज़बूत गठबंधन साबित हो सकता है जो अब द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) और कांग्रेस के खिलाफ लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार है। डीएमके की 40-0 से जीत की उम्मीद अब थोड़ी दूर जाती दिख रही है। मुख्यमंत्री ई पलानिस्वामी और पूर्व मुख्यमंत्री ओ पन्नीर्सेलवाम के नेतृत्व में अन्नाद्रमुक पश्चिम तमिल नाडु में और उत्तर और उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र के वन्नियार बेल्ट में अच्छा प्रदर्शन कर सकती है। कई संवैधानिक क्षेत्रों में छोड़-छोड़ वोट शेयर अर्जित कर भाजपा इस गठबंधन में योगदान देगी, भले ही यह अपने बलबूते पर कहीं भी पूरी तरह जीतने में सक्षम नहीं है।

जहाँ भाजपा और सेना के साथ होने का तर्क समझ में आता है (दोनों की विचारधारा एक है और कांग्रेस-एनसीपी के गठबंधन को वे एकजुट होकर ही हरा सकते हैं), वहीं तमिल नाडु का गठबंधन मात्र अस्तित्व की लड़ाई का भाग है। अगर अपने पूर्व प्रमुख जयललिता की अनुपस्थिति में अन्नाद्रमुक जीत दर्ज नहीं कर पाती है तो इसके लिए खतरा होगा। इसके अलावा अस्थायी राज्य सरकार को चुनाव जीतने के बाद केंद्रीय सहायता की भी आवश्यकता होगी। अन्नाद्रमुक सिर्फ करुणानिधि के बाद की द्रमुक और कांग्रेस के गठबंधन से ही मुकाबला नहीं कर रही, बल्कि शशिकला के भतीजे टीटीवी दीनाकरण के समूह से बी इसका मुकाबला है। दीनाकरण अपने बैनर तले ही चुनाव लड़ रहा है और एक प्रभावशाली जाति, थेवरों से इसे अधिकांश मत मिलने की आशंका है।

अगर चुनावों के बाद द्रमुक विरोधी दलों को एक होना पड़ा तब मात्र भाजपा की केंद्र सरकार ही इस गठबंधन को चलाने में सहायता कर सकती है। एमके स्टालिन के नेतृत्व में द्रमुक को पूरा भरोसा है कि सत्त-विरोधी भावना इसे जीत दिलाएगी। लेकिन कोई भी इसपर पूर्ण विश्वास नहीं कर सकता।

भाजपा में यह नई विनम्रता इसलिए आई है क्योंकि इसे आभास हुआ है कि यह उत्तर प्रदेश की कई सीटें हार जाएगी क्योंकि समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने गठबंधन कर लिया है और पूर्वी उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी के महासचिव बनाए जाने से भी पार्टी को खतरा है जिससे इसकी अंकतालिका 2014 में 71 सीटों के आँकड़े से अवश्य ही नीचे लुढ़केगी।

उत्तर प्रदेश के महागठबंधन का सामना भाजपा उत्तर प्रदेश के बाहर छोटे-छोटे गठबंधन करके करेगी। और इसलिए बिहार, महाराष्ट्र और तमिल नाडु में गठबंधन किया गया है।

पंजाब में अकाली दल और भाजपा का साथ आगे बढ़ेगा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भाजपा मुश्किल से एक-दो सीट जीत पाएगी और उसे वहाँ क्षेत्रीय साथी मिलने की भी बहुत कम संभावना है। ओडिशा में भाजपा असमंजस में है, यह नवीन पटनायक की बीजू जनता दल से सीधा सामना नहीं करना चाहती, जबकि यह ऐसा कर सकती है क्योंकि यदि यह 272 के आँकड़े को नहीं छू पाई तो यह एक भावी साथी को खो सकती है।

ये बातें हमें फिर से उत्तर प्रदेश पर ला खड़ा करती हैं जहाँ भाजपा को कई छोटे-छोटे साथी बनाने पड़ेंगे जिससे यह निशाद, आदि जैसे उपजातीय वर्गों में वोट शेयर अर्जित कर पाए। सपा-बसपा के गठबंधन में त्यागी हुई राष्ट्रीय लोक दल से संधि के विकल्प को नकारा नहीं जा सकता।

कर्नाटक में कांग्रेस-जनता दल (सेक्युलर) का गठबंधन भाजपा की कई सीटों को निगल लेगा जिसका अर्थ यह है कि भाजपा को पुनः उत्तर प्रदेश पर ध्यान केंद्रित करना होगा और देखना होगा कि 2014 की 71 सीटों में से यह कितनी सीटें बचा पाती है।

असम और पूर्वोत्तर में पार्टी की और सीटें अर्जित करने की आकांक्षा पर नागरिकता संशोधन अधिनियम के कारण पानी फिर गया है। यह विधेयक जो समय सीमा के कारण राज्य सभा में प्रस्तुत नहीं हो पाया, वह पश्चिम बंगाल में भाजपा को थोड़ा लाभ पहुँचाएगा पर इस लाभ को पार्टी कुछ सीटों में परिवर्तित कर पाती है या नहीं, यह देखने वाली बात होगी। इस बात की संभावना है कि भाजपा सीपीएम के काते से कुछ मतों को चुरा लेगी लेकिन इससे यह अधिक सीटें नहीं जीत पाएगी।

सीधे शब्दों में कहा जाए तो यदि भाजपा 2019 में पुनः सत्ता में आना चाहती है तो इसे महाराष्ट्र और तमिल नाडु की संधियों के बाद उत्तर प्रदेश पर ध्यान केंद्रित करना होगा।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।