राजनीति
संघ को एक नहीं बल्कि भगवान राम के लिए दो मंदिरों की रणनीति पर विचार करना चाहिए

कुछ हिंदू समूहों के बीच पनप रही अवास्तविक आशाएँ कि राम मंदिर निर्माण को शुरू करने के लिए सरकार द्वारा अध्यादेश जारी करके पूरे राम मंदिर मुद्दे को हल किया जा सकता है, को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नकार कर सही किया है।

एएनआई को दिए एक इंटरव्यू में मोदी ने कहा कि अयोध्या मामले में अदालत द्वारा अपना फैसला दिए जाने के बाद अध्यादेश का सवाल उठ सकता है, और कोर्ट की देरी के लिए कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराते हुए इसमें एक राजनीतिक कोण भी जोड़ दिया। उन्होंने कहा- “मैं कांग्रेस से, देश की सुरक्षा के लिए, सांप्रदायिक सद्भाव के लिए भीख मांगता हूँ, उन्हें अपने वकीलों को मामले में बाधा डालने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। मामले को अपनी दिशा खुद तय करने देना चाहिए। हम सभी को जल्द फैसला लेने की दिशा में काम करना चाहिए। फैसले के बाद हम आवश्यक कदम उठाएँगे।”

जो लोकसभा चुनाव से पहले अध्यादेश के मुद्दे पर हंगामा कर रहे हैं- जैसे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और संघ परिवार है- हिंदुओं को असल नुकसान पहुँचा रहे हैं। न केवल अध्यादेश प्रतिकूल है, क्योंकि अदालतें निश्चित रूप से इसकी जाँच करेंगी और इसे एक तरफ रख देंगी, बल्कि यह इस धारणा को भी नष्ट कर देगा कि इससे लंबे समय तक हिंदू वोट बैंक जीता जा सकता है। राम मंदिर मुद्दे पर हिंदुओं को बार-बार बेवकूफ नहीं बनाया जाएगा।

आश्चर्य होता है सोचकर कि हिंदू संगठनों का ऐसा क्यों मानना ​​है कि अयोध्या में मंदिर के निर्माण को शुरू करने के लिए एक कानून लाना एक प्रकार का चमत्कारी उपचार है। राजनीतिक विचार वाले हिंदू इस मुद्दे पर एक झटके में समाधान चाहते हैं, जबकि केवल दो व्यवहार्य और समझदार समाधान हैं, एक अदालत का फैसला या दूसरा मुस्लिम समूहों के साथ अदालत के बाहर समझौता। एक कानून लाने से कुछ हद तक मंदिर निर्माण संभव हो सकता है, लेकिन यह सांप्रदायिक संबंधों को हमेशा के लिए खत्म कर देगा, और मंदिर खुद जिहादी संगठनों के लिए एक लक्ष्य बन जाएगा। अगर मुस्लिमों का मानना ​​है कि राम जन्मभूमि पर रियायत देने के लिए उन्हें मजबूर किया जा रहा है, तो यह भावना वर्षों तक बरकरार रहेगी।

इसलिए, हिंदुओं को स्पष्ट रूप से और रणनीतिक रूप से सोचने की ज़रूरत है, भावनात्मक रूप से नहीं। राम मंदिर पर प्रधानमंत्री का वक्तव्य मंदिर निर्माण के तरीके पर एक रणनीतिक पुनर्विचार के लिए प्रारंभिक बिंदु होना चाहिए।

पहला, मूल बातें। औपचारिक रूप से आधिकारिक इतिहास को यह स्वीकार करने का प्रयास करना चाहिए कि कई हिंदू मंदिर वास्तव में नष्ट किए गए हैं और उस स्थान पर मस्जिदें बनाकर उन्हें रूपांतरित कर दिया गया। इस क्षेत्र में सीता राम गोयल और अन्य इतिहासकारों जैसे बी बी लाल, कोनराड एल्स्ट और मीनाक्षी जैन के कार्यों को व्यापक रूप से प्रचारित किया जाना चाहिए ताकि आम जनता को पता चले कि राम मंदिर केवल चरमपंथी हिंदुओं के लिए सिर्फ माथापच्ची करने का विषय नहीं है। इस बौद्धिक और सामाजिक ज्ञान के बिना, आम हिंदू भी यह नहीं समझ सकते हैं कि अयोध्या में एक मंदिर के ऊपर ऐसा उपद्रव क्यों किया जा रहा है, जब इसे कहीं भी बनाया जा सकता है।

दूसरा, बाबरी संरचना को ध्वस्त करने से पहले 1991 में नरसिम्हा राव द्वारा एक कानून लाया गया था, जो काशी और मथुरा पर कानूनी मुकदमेबाज़ी करने पर रोक लगता है, उसे निरस्त या संशोधित किया जाना चाहिए।

राव द्वारा अधिनियमित किया गया पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 15 अगस्त 1947 तक अस्तित्व में आए हुए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को एक आस्था से दूसरे धर्म में परिवर्तित करने और किसी स्मारक के धार्मिक आधार पर रखरखाव पर रोक लगाता है। हालाँकि इस अधिनियम ने राम जन्मभूमि को विशेष रूप से अपने दायरे से बाहर रखा लेकिन काशी और मथुरा के संबंध में इसने हिंदू आशाओं का गला घोंट दिया जहाँ इस्लामी शासन के दौरान मंदिर क्षेत्रों पर मस्जिदों की स्थापना की गई थी। इसे राम मंदिर बनाने के लिए हिंदू मंदिरों की एक प्रकार की सौदेबाजी के रूप में इस्तेमाल किया गया था। “यदि आप हमें राम जन्मभूमि देते हैं तो हम काशी और मथुरा छोड़ देंगे”, कहने का इस विचार अब संभव नहीं है। हिंदुओं के पास अब मोलभाव करने के लिए कुछ भी नहीं बचा है। मुसलमानों की धमकियों के कारण वास्तविक सौदेबाजी करने का अब कोई विकल्प नहीं है।

तीसरा, राम मंदिर का मुद्दा अपने आप में एक अलग दृष्टिकोण है। आज के हिंदू समूहों की दो समस्याएँ हैं- एक यह है कि मंदिर के निर्माण के लिए सामग्री पिछले दो दशकों से बेकार पड़ी है, और संघ परिवार जैसे हिंदू संगठनों का धैर्य अब जवाब दे रहा है।

दूसरी हकीकत यह है कि अदालतें जल्द फैसला सुनाने की जल्दबाज़ी में नहीं हैं। यदि वे ऐसा करते हैं, तो वे 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले की तरह फैसला कर सकते हैं, जिसके अनुसार राम जन्मभूमि को 1: 2 के अनुपात में विभाजित किया जाएगा, जिसमें मुसलमानों को एक तिहाई, और हिंदू समूहों को अन्य दो हिस्से मिलेंगे।

दोनों मुद्दों से निपटने का एक समझदारी भरा तरीका है “दो राम मंदिरों” की योजना बनाना। उत्तर प्रदेश सरकार को चाहिए कि वह ट्रस्ट को राम मंदिर के निर्माण के आयोजन को विवादित स्थल के बाहर सरयू के तट पर, या कुछ दूरी पर आयोजित करने की अनुमति दे। इस तरह सांप्रदायिक क्षति के बिना रामभक्तों की भावनात्मक ऊर्जा को कम समय में मंदिर निर्माण की ओर ले जाया जा सकता है।

हालाँकि, यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि यह अंतिम राम मंदिर नहीं है जिसका पहले वादा किया गया था, जो अदालत के निर्णय की प्रतीक्षा कर रहा है। सबको भ्रम मुक्त करने के लिए कि राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण को परित्यक्त कर दिया गया है, उप्र सरकार को इस बात पर ज़्यादा ज़ोर देना चाहिए कि दूसरा राम मंदिर एक ‘वनवास राम मंदिर’ है, इस प्रकार कट्टर मुस्लिम समूहों और अदालतों पर वनवास खत्म करने का मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ेगा। अदालत के निर्णय के बाद वास्तविक राम मंदिर बनाया जा सकता है, जो भले ही थोड़ा छोटा हो। इसकी संभावना नहीं है कि कोई भी अदालत एक ऐसा फैसला देंगी जो हिंदुओं की इच्छाओं के विपरीत हो।

हिंदुओं को भावनात्मक रूप से नहीं बल्कि रणनीतिक रूप से विचार करना सीखना होगा और प्रधानमंत्री के बयान ने उन्हें यह सोचने का सही मौका दिया है कि राम मंदिर का निर्माण कैसे होगा।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।