राजनीति / विचार
सबरीमाला की एक लड़ाई हारने के बाद वामपंथ युद्ध जीतने की तैयारी कर रहा है, क्या हिंदू तैयार हैं?
आशुचित्र- सबरीमाला की लड़ाई विविधता और संतुलन के सूक्ष्म तर्कों से नहीं जीती जा सकती। यह जीती जाएगी वामपंथियों के उन्हीं बाइनरी  तर्कों से जिसका प्रयोग वे हिंदू धर्म संस्थाओं और स्थानों के दमन के लिए करते हैं।

केरला मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन भले ही इस लड़ाई के एक चरण में पराजित हो गए हैं परंतु उन्होंने युद्ध जीतने की तैयारी कर ली है। सितंबर अंत में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद, इस माह छोटे से अंतराल के लिए जब सबरीमाला खुला था, महिलाओं के समूहों और संघ कार्यकर्ताओं ने कुछ कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर 10 से 50 वर्ष की आयुवर्ग की महिलाओं को मंदिर में घुसने से रोका।

लेकिन अगले माह में जब 17 नवंबर को मंदिर फिर खोला जाएगा तब तक विजयन के पास बेहतर तैयारियाँ होंगी। 25 अक्टूबर की टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, केरला तीर्थयात्रियों के लिए ऑनलाइन पंजीयन शुरू करेगा जिससे नए भक्त तभी मंदिर मेंप्रवेश करेंगे जब पुराने भक्त निकल चुके होंगे। अगर प्रवेश पर ज़्यादा संख्या में श्रद्धालु होंगे तो उन्हें प्रतीक्षा करने के लिए कहा जाएगा।

प्रभावी रूप से इस व्यवस्था से राज्य सरकार कम संख्या में अलग-अलग समूहों में भक्तों को अंदर जाने दे सकेगी। प्रदर्शनकारियों की इच्छा के विरुद्ध यह व्यवस्था राज्य को कुछ महिलाओं को भी अंदर ले जाने का अवसर देगी। पिछली बार आंदोलनकारी संगठित थे और सरका नहीं परंतु अगली बार सरकार उन्हें विफल कर देगी।

यह हिंदुओं को एक सरल सच्चाई सिखाता है- अपने धार्मिक मामलों में पर अपना अधिकार होने की राह इन छोटी जीतों से प्राप्त नहीं होगी, बल्कि एक दीर्घकालिक रणनीति से यह युद्ध जीता जा सकता है। अगर अभी हम केरला सरकार के कुचक्र और 19 समीक्षा याचिकाओं के बावजूद सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को बदलने में असफल हो जाते हैं, तब भी हिंदुओं को यह लड़ाई जारी रखनी होगी। सबरीमाला में एक बड़ा युद्ध भले ही शुरू हो चुका परंतु वामपंथी-लुट्यन्स जैसे हिंदुओं के शत्रुओं को हराने के लिए हमें एक कुशल रणनीति बनानी होगी।

समझें, कि वमापंथियों ने इस युद्ध के लिए कितनी अच्छी रणनीति बनाई है। इसने समानता और लैंगिक असमानता जैसे सिद्धांतों पर अपने तर्क रखें हैं जिसका विरोध नहीं किया जा सकता। इससे बुरा यह कि उन्होंने प्रजनन आयुवर्ग की महिलाओं के सबरीमाला में प्रवेश निषेध की परंपरा को सती और ट्रिपल तलाक जैसे लैंगिक अपराधों के समतुल्य प्रस्तुत किया है।

अब देखें कि हिंदुओं के तर्क कितने कमज़ोर हैं; कुछ ने मासिक धर्म और अशुद्धि जैसे तर्क देकर बकवाद किया है, जिससे महिलाएँ और दूराव महसूस करेंगी। और कुछ समझदार लोगों ने सबरीमाला की अनोखी परंपराओं का हवाला दिया है जिसमें अयप्पा को नैश्तिक ब्रह्मचारी माना जाता है और अनुच्छेद 26 के अधीन किसी संप्रदाय की विशेष परंपराओं को समान आदर देने की बात कही है।

दीर्घकालिक युद्धों में, अब्राहमिक बाइनरिज़्म  ही है जो विजयी होगा क्योंकि वे एक केंद्रीय सिद्धांत पर ही ध्यान देते हैं और बाकि सूक्ष्म तर्कों को नकार देते हैं। अगर अपने धार्मिक स्थलों पर अधिकार के लिए वे यह लड़ाई जीतना चाहते हैं तो हमें वही बाइनरिज़्म  और विचारों में स्पष्टता लानी होगी। हमें अपने समर्थन में 100 कमज़ोर तर्कों की आवश्यकता नहीं है, बल्कि एक-दो मज़ूबत तर्क ही काफी होने चाहिए।

अगर हमारे विरोधी यूरापी समानता सिद्धांतों का प्रयोग हमें हराने के लिए कर रहे हैं, तो हमें उनका प्रतिकार अपने तरीके से करना होगा।

दो तर्क हैं जिन्हें गलत नहीं ठहराया जा सकता और दोनों का मूल पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता में निहित है।

पहला, हमें चर्च और राज्य के आलगाव पर ज़ोर देना चाहिए। हिंदू इसे अपनी धर्मनिरपेक्षता के रूप में नहीं मानते, और मंदिर-राज्य के बीच की लकीर धुंधली है, लेकिन जब इस प्रकार के तर्कों को न्यायालय वैध ठहरा रहा है तो हमें अपने लाभ के लिए इसका प्रयोग करना चाहिए। इसलिए अगर विजयन त्रवणकोर देवास्वोम बोर्ड को नियंत्रित कर तीर्थस्थल को अपने तरीके से चलाना चाह रहे हैं तो हमें बुनियादी आधार पर यह प्रश्न उठाना चाहिए कि एक धर्मनिरपेक्ष राज्य में तंत्र मंदिरों को कैसे नियंत्रित कर सकता है।

लैंगिक बाइनरी  तर्क- या तो आप इसे मानते हैं या इसके विरुद्ध हैं- का जवाब भी धर्मनिरपेक्ष बाइनरिज़्म – या आप मानते हैं कि राज्य का मंदिरों पर नियंत्रण होता है या नहीं होता- से देना होगा। पहले सर्वोच्च न्यायालय अपना निर्णय सुनाने से पहले यह बात तय कर ले। असल में जब 13 नवंबर को समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई शुरू होगी तो पहला तर्क यही होना चाहिए कि राज्य सरकार को सबरीमाला मुद्दे में हस्तक्षेप का कोई अधिकार नहीं है जब तक यह मंदिर को नियंत्रित रने वाले देवास्वोम बोर्ड में अपनी दखल अंदाज़ी बंद न कर दे। अगर बोर्ड को पिंजरे का पक्षी बना दिया गया तो वह भक्तों का मत नहीं रख पाएगा और न ही राज्या। याचकों को यह माँग करनी चाहिए कि जब तक समीक्षा याचिका पर सुनवाई नहीं हो जाती, तब तक 28 सितंबर के सबरीमाला निर्णय पर रोक लगा देनी चाहिए और राज्य को मंदिर परंपराओं में ऑनलाइन पंजीयन प्रणाली समेत किसी प्रकार का परिवर्तन करने से रोकना चाहिए।

एक संबंधित बिंदू- यदि संवैधानिक मुद्दे को राज्य नियंत्रण के साथ जोड़कर एक बड़ी समस्या के रूप में प्रस्तुत किया जाए तो हमें एक बड़ी बेंच मिल सकती है सुनवाई के लिए जिसमें कम-से-कम सात न्यायाधीश हों जिससे प्रवेश का समर्थन करने वाले न्यायाधीशों से ज़्यादा नए न्यायाधीश हो जाएँ जो मामले को एक ताज़े मन से सुनें। किसी भी नई बेंच में चार न्यायाधीशों में से तीन न्यायाधीश (पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को छोड़कर) पुरानी बेंच के ही होंगे। इनमें हिंदुओं के पक्ष में व निर्णय से असहमत एकमात्र न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा भी होंगी। एक पाँच न्यायाधीशों की बेंच 3:2 अनुपात से पुराने निर्णय को बदल सकती है, लेकिन यह अति आशावादिता होगी। इसलिए हमें इस मुद्दे को सबरीमाला से और बड़े मुद्दे की तरह प्रस्तुत करना होगा जिससे हमें ज़्यादा न्यायाधीशों की बेंच मिल सके।

अगर इस बहस में जीत नहीं हुई तो विजयन हिंदू एकता का नाश करने के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। वह न्यायालय के निर्णय को मानने और कानून लागू करने के नाम पर सबरीमाला में से एक-दो हठी पुजारियों को निकाल सकते हैं और उनकी जगह लचीले पुजारियों को ला सकते हैं। हिंदुओं को अपने अतीत से समझना चाहिए कि उन्हें बाँटना कितना आसान काम है। एक बलपूर्वक तरीका और दूसरा ओर थोड़ी-सी घूस हमें बाँट सकती है और हमारी नज़र से हमारा सामान्य शत्रु बच निकलेगा। पृथ्वीराज चौहान और जयचंद लड़ेंगे जब ग़ोरी द्वार पर अपनी सेना लेकर खड़ा होगा।

दूसरा  सिद्धांत असमानता के तर्क को बदलने का। यदि अनुच्छेद 15 हर नागरिक से समान व्यवहार का आश्वासन देता है तो यह तर्क दिया जा सकता है कि पूरे बहुसंख्यक समुदाय के साथ ही असमान व्यवहार हो रहा है जब मात्र हिंदू संस्थानों पर ही राज्य का अधिकार है और उनके साथ ही हस्तक्षेप किया जा सकता है। यह वह असमानता का तर्क है जिसे जीतना आवश्यक है।

सबरीमाला का युद्ध विविधता और संतुलन जैसे सूक्ष्म तर्कों से नहीं जीता जा सकता। यह जीता जाएगा वामपंथियों के उन्हीं बाइनरी  तर्कों से जिसका प्रयोग वे हिंदू धर्म संस्थाओं और स्थानों के दमन के लिए करते हैं। इस बार हिंदुओं को आवश्यकता है कि वे ज़्यादा नहीं बल्कि मज़बूत तर्क दें और मंदिरों को राज्य के नियंत्रण से मुक्त करा लें। यही युद्ध है जो हमे जीतना है। सबरीमाला युद्ध नहीं है, यह इस लंबे युद्ध में एक लड़ाई है।