राजनीति
हार के बाद मोदी-शाह को 2019 के लिए विनम्रतापूर्वक पुनर्विचार करने की आवश्यकता

आशुचित्र- 2019 लोकसभा चुनावों के पहले मोदी-शाह के लिए कार्य चुनौतीपूर्ण हो गया है। मुख्यत: एक ऐसी रणनीति पर कार्य करना, जो केवल मोदी को करिश्माई नेता तथा उनकी साफ छवि पर केंद्रित न हो।

विधानसभा चुनावों में हिंदीभाषी राज्यों में 3-0 से मिली पराजय के बाद, अब मोदी-शाह को 2019 के लोकसभा चुनावों की रणनीति पर पुन: मंथन करने की आवश्यकता है। सामान्यत: कहा जाता है कि विधानसभा चुनावों तथा लोकसभा चुनावों में जनता अलग मानसिकता से मत देती है। किंतु भाजपा की हानि को देख बदलाव की आकांक्षा को अनदेखा नहीं किया जा सकता। विधानसभा चुनावों में जनता के समक्ष, भाजपा अपनी बात रख पाने में उतनी कामयाब नहीं हो सकी। यदि भाजपा ने इस बात पर विचार नहीं किया तो 2019 के लोकसभा चुनावों में उसे भारी नुकसान से मोदी फ़ैक्टर भी नहीं बचा पाएगा।

राजस्थान तथा मध्यप्रदेश में भाजपा की सम्मानजनक हार हुई है, इसे देखकर दो बातें कही जा सकती हैं। पहली, कि भाजपा को वहाँ हार नहीं झेलनी पड़ी जहाँ क्षेत्रीय नेतृत्व मज़बूत रहा। छत्तीसगढ़ में मिली बड़ी शिकस्त को देख कहा जा सकता है कि यदि जनता में अविश्वास रहा तो करिश्माई नेता भी विजय नहीं दिला सकता है। कहा जा रहा था कि मायावती- जोगी का गठबंधन रमन सिंह को फायदा दिला पाएगा किंतु इसके विपरीत जनता ने उन्हें नकारा तथा विपरीत दिशा की ओर रुख़ किया।

भाजपा के लिए सबसे बड़ी सीख यही होगी कि जनता के समक्ष विश्वसनीय बातें रखी जाएँ। भले ही भाजपा के पास धरातल पर एक मज़बूत संगठन हो, भले ही समस्त स्त्रोत उपलब्ध हों, भले ही वोट दिलाने वाले पन्ना प्रमुख तथा बूथ प्रबंधक हो, परंतु भाजपा के पास एक कारण, एक ऐसी बात होना आवश्यक है, जो भाजपा को जीत दिला सके, जनता को वोट देने के लिए उत्साहित कर सके। यही कारण रहा कि भाजपा के पास ऐसी कोई बात न होने के कारण छत्तीसगढ़ में उसे भारी शिकस्त झेलनी पड़ी। वहीं मध्यप्रदेश तथा राजस्थान में लगभग यह 50 प्रतिशत होने के कारण इतना भारी नुकसान होने से बच गया। कांग्रेस के पास एक ही बात रही, बदलाव की आवश्यकता जो कि एक राज्य में करिश्माई तौर पर काम कर गई वहीं अन्य दो राज्यों में अधिक लाभ पहुँचाया।

तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) तथा मिज़ो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) कांग्रेस पर भारी पड़ गए किंतु वहाँ भी भाजपा को सबक मिला है। तेलंगाना में कांग्रेस, कुछ हद तक अपनी पकड़ बनाए रख पाने में सफ़ल रही भले ही उसका सहयोगी दल, तेलुगु देशम पार्टी बुरी तरह से शिकस्त खा गया। लेकिन तेलंगाना में टीआरएस के तूफान में भाजपा बुरी तरह पीट गई। इससे यही कहा जा सकता है कि राज्य में भाजपा को अधिक मज़बूत पकड़ की आवश्यकता है। वहीं मिज़ोरम में एमएनएफ की जीत ने कांग्रेस मुक्त उत्तर-पूर्व भारत सुनिश्चित कर दिया। चूँकि ऐसा पहले भी था, तो इसका बड़ा असर 2019 लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को नहीं होगा ।

मोदी- शाह की जोड़ी को आवश्यकता है कि 2019 के लोकसभा चुनावों के पूर्व एक नई योजना पर कार्य किया जाए, एक ऐसी योजना जो सिर्फ़ मोदी को करिश्माई नेता तथा उनकी साफ़ नियत वाली छवि पर केंद्रित न होकर अन्य बातों का ध्यान रखे।

अधिक से अधिक राज्यों में भाजपा के विरुद्ध एक सामान्य प्रत्याशी उतारने की चुनौती विपक्ष के लिए बनी रहेगी वहीं अमित शाह को अपने सहयोगियों का विश्वास जीतने की चुनौती है, ऐसे सहयोगी जो संघ परिवार के भी हैं और बाहर के भी।

जैसा की देखा जा रहा है कि पूरी भाजपा का नियंत्रण शीर्ष स्तर के मोदी- शाह के नेतृत्व के अनुसार चल रहा है। कई बार मध्य स्तर के नेताओं तथा पार्टी के कार्यकर्ताओं की अनदेखी हुई है। वहीं भाजपा को आवश्यकता है कि अपने पूर्व के, वर्तमान के तथा भविष्य के सहयोगी दलों के साथ विनम्र रिश्ते कायम रख, अपना गठबंधन कायम रख सके। यदि ऐसा कर पाने में भाजपा नाकमयाब रही तो शिवसेना, भाजपा का साथ छोड़ सकती है जैसा कि पहले टीडीपी ने साथ छोड़ा है। एनडीए से अलगाव के बाद चंद्रबाबू नायडू की पार्टी का सूपड़ा साफ होना भाजपा के लिए अप्रत्यक्ष रूप से लाभ रहेगा। आंध्र प्रदेश में भी चुनावों में नायडू की पार्टी की वायएसआर कांग्रेस से हारने की बड़ी संभावना है। यह भाजपा 272 के आँकड़े तक पहुँचने में असमर्थ रही तो, यह उसे पूर्व के साथियों में से चुनने का विकल्प रहेगा।

हाल ही में कुशवाह पार्टी, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी का नुकसान, एक चिंता का विषय रहेगा। इसका आशय है कि यदि भाजपा, जेडीयू तथा एलपीजे साथ में रहे तो उन्हें आरजेडी, कांग्रेस तथा एलएसपी के गठबंधन से चुनौती रहेगी। हाल ही में हालात एनडीए के विपरीत हुए हैं।

भाजपा का मंदिर की बातें करके उत्तरप्रदेश में या कहीं और भी, वोट हासिल करने में विश्वास रखना एक अन्य गलती है। देखा जाए तो भाजपा ने हिंदू एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए कुछ बड़ा कार्य नहीं किया है। साथ ही भाजपा की मज़बूती रहे संघ के स्वयंसेवकों की पिछले साढ़े चार साल से जो अनदेखी हुई है, उससे वे नाखुश ही रहे और अब भाजपा उन्हें इस्तेमाल करना चाहती है। बहुत सी अन्य खामियाँ हैं, जिन्हें भाजपा को दूर करने को आवश्यकता है।

एक अन्य सबक योगी के प्रयोग से भाजपा को लेना चाहिए कि उनके आकर्षक व्यक्तित्व के बावजूद कई बार उनकी बातों के कारण मतदाताओं ने भाजपा से किनारा किया है। आज के इस दौर में जहाँ मीडिया इतना तेज़ है कि कुछ भी कहीं कहा जाए तो वो फैल जाता है, ऐसे में पार्टी के प्रमुख मतदाताओं या कार्यकर्ताओं को भी यदि कोई संदेश दिया गया, तो निस्संदेह उसे फैलने में देर नहीं लगेगी। ऐसे में भाजपा को विचार करना होगा कि योगी को अपने फायदे के लिए कैसे प्रयोग किया जाए।

एक अन्य गलती जो भाजपा कर रही है, वो है राहुल गांधी को ज़रूरत से अधिक गैरज़रूरी दर्शाना। उनकी छवि साल के पप्पू के रूप में प्रदर्शित की गई इसके विपरीत उनका आत्मविश्वास बढ़ता गया। वहीं राहुल के पास एक मज़बूत टीम है जो आँकड़ों के आधार पर प्रत्येक राज्य में योजना बनाने में उनकी सहयोगी है। राहुल की ताकत उनके खुद के बड़े विचार नहीं अपितु अपनी पार्टी का राज्यों में रणनीति पर अमल करना तथा उसके अनुसार कार्य करवा पाना है। ऐसा देखा जा सकता है कि मोदी-शाह की जोड़ी की तुलना में राहुल गाँधी अपने सहयोगियों को अधिक महत्त्व देते हैं, जो कि उनके लिए सकारात्मक बात है।

तेलंगाना में टीआरएस इसलिए विजयी हुआ क्योंकि वो यह बात रख पाने में सफल रहा कि उन्होंने इस राज्य की नींव रखी है, अब ऐसे लोगों को अवसर न दिया जाए, जो इसके विरुद्ध रहे। यही कारण रहा कि तेलुगु देशम पार्टी बुरी तरह पराजित हो गई और इसी वजह से कांग्रेस की राह में भी बाधा उत्पन्न हुई। यह संकेत दिख रहे हैं कि आंध्र प्रदेश में भी चंद्रबाबू नायडू को शिकस्त झेलनी पड़ सकती है। यदि कांग्रेस जीतने वाले सहयोगी की तलाश में रही तो अवश्य वायएसआर कांग्रेस का समर्थन लेना चाहेगी।

भाजपा के लिए इन चुनावों से सबसे बड़ा सबक है कि जनता तक अपनी सही तथा सकारात्मक बातें पहुँचाए तथा अपने सहयोगियों से विनम्र व्यवहार बनाए रखे। भाजपा का कड़ा बर्ताव उसे सफलता नहीं दिला पाएगा।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।