राजनीति
बुलंदशहर हिंसा के बाद योगी आदित्यनाथ की कानून व्यवस्था कसौटी पर

आशुचित्र- अगर योगी आदित्यनाथ इतिहास बनाना चाहते हैं तो उन्हें इस अवसर का प्रयोग पुलिस व्यवस्था में सुधार लाने के लिए करना चाहिए जैसा कि कुछ राज्य पहले कर चुके हैं।

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में गौ कंकाल मिलने से आक्रोशित हिंदू भीड़ द्वारा एक पुलिस अफसर का मारा जाना योगी आदित्यनाथ सरकार के लिए सावधानी की घंटी है। अगर कानून व्यवस्था सुदृढ़ नहीं की जाएगी तो आम चुनावों के पहले बढ़ते सामुदायिक तनाव में परेशान होकर पुलिस अपना कार्य करने में भय अनुभव करेगी।

कल (3 दिसंबर को) हुए दंगों में स्थानीय पुलिस ने भीड़ पर लाठीचार्ज किया था लेकिन उनकी संख्या कम थी। भीड़ उपद्रवी हो गई और न सिर्फ स्याना एसएचओ सुबोध कुमार सिंह को गोली मार दी बल्कि पुलिस चौकी और परिसर में स्थित कई वाहनों को आग भी लगा दी। यह 2016 में पश्चिम बंगाल के कलियाचक में मुस्लिम भीड़ द्वारा की गई हिंसा जैसा है जहाँ भी पुलिस थाने में आग लगाई गई थी।

बुलंदशहर, कलियाचक और अन्य स्थानों की हिंसा से पता चलता है कि भारत में बहुत कम पुलिसकर्मी हैं, उनका राजनीतिकरण हो चुका है, वे अक्षम हैं और डर के कारण अपना कार्य अच्छे से नहीं कर पाते। सामुदायिक पूर्वाग्रहों को अलग रखें तो वे उस प्रकार का काम नहीं कर रहे हैं जैसा उन्हें संसाधन और राजनीतिक समर्थन मिल रहा है। आक्रोशित भीड़ का सामना करने में शायद ही कोई राजनेता पुलिस अधिकारियों को सोच-समझकर निर्णय लेने को कहेगा जिससे जान-माल का नुकसान न हो। भीड़ को देखकर डरने वाली पुलिस न लोगों की रक्षा कर सकती है और न कानून की। विशेष जाँच दल का गठन या न्यायिक पूछताछ का महत्त्व कम ही होता है जब एक बार नुकसान हो चुका है और वह भी तब जब न्यायिक प्रक्रिया इतनी धीमी हो।

राजनीतिक स्तर पर योगी आदित्यनाथ को निशाना बनाना आसान है और उन्हें इस गलती में खुद को भागीदार भी मानना चाहिए। लेकिन आदित्यनाथ कोई अपवाद नहीं हैं। यह स्थिति भारत भर में है, हर राज्य में है, चाहे वहाँ कांग्रेस का शासन हो या भारतीय जनता पार्टी या क्षेत्रीय पार्टियों का।

कुछ सुधार किए जा सकते हैं, विशेषकर ये दो, अगर राजनेता इस दवाई का कड़वा घूँट पीने के लिए तैयार हैं तो।

पहला, उदार राजनीतिक निर्देशों के अलावा पुलिस के क्रियान्वयन में राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। प्रकाश सिंह बनाम भारतीय संघ के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने 2006 में यह निर्णय सुनाया था लेकिन इसका पालन करना राज्यों पर निर्भर करता था। यह निर्णय केंद्र व राज्य को पुलिस को स्वायत्तता प्रदान करने के लिए निर्देशित करता है जिससे सरकार और पुलिस के बीच संतुलन बन सके, पुलिस के कार्य में राजनीतिक हस्तक्षेप कम हो और इसके कर्मों व अकर्मों के लिए पुलिस ज़िम्मेदार हो।

दूसरा, राज्यों को कानून व्यवस्था को प्रथमिकता देनी चाहिए। यह आश्चर्य की बात है कि सारे राज्य किसानों को हज़ारों करोड़ों की कर्ज़माफी देने को तैयार हैं लेकिन पुलिस बल और अपराध जाँच दलों के लिए कुछ सौ करोड़ खर्च नहीं करना चाहते।

भीड़ द्वारा एक पुलिस अधिकारी का मारा जाना पुलिस बल के मनोबल को क्षति पहुँचाता है। अगर योगी आदित्यनाथ इतिहास बनाना चाहते हैं तो उन्हें इस अवसर का प्रयोग पुलिस व्यवस्था में सुधार लाने के लिए करना चाहिए जैसा कि कुछ राज्य पहले कर चुके हैं।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi द्वारा ट्वीट करते हैं।