राजनीति
आपातकाल का दुःस्वप्न

नायक खिन्न था। आज शाम को नायिका से बहस हो गई। लड़कियों को राजनीति की कुछ समझ है नहीं, बहस करती हैं। ऐसा भी क्या हुआ था आपातकाल में जो आज मोदी के अघोषित आपातकाल मे नहीं है। बेचारे पत्रकार आईफ़ोन का उपयोग कर रहे हैं पर बिल का पैसा कहाँ! ट्विटर पर जाएँ तो कोई भी हिंदी माध्यम वाला धमका देता है। सबको तथ्य चाहिए, मानो सारा हिंदुस्तान वैज्ञानिक हो गया है, कुछ साहित्यिक सरोकार भी तो होता है।

ग़रीब पत्रकार इस तानाशाही में ना तो कोठी के लॉन में बत्ती जला पा रहा है, ना सरकारी ख़र्च पर विदेश जा पा रहा है। इससे बुरी क्या इमर्जेंसी हुई होगी? कल ही एक ट्वीट मोदी के विरोध में किया कि भक्त टूट पड़े। अनकाऊथ इल्लीट्रेट “भैया-भैया” कर के ज्ञान दे रहे थे। दो बार फ**ंग लिखा तब माने। ये सब हिंदी स्कूल वाले, इंजीनियर, डॉक्टर, सीए बनकर सोचते हैं बुद्धिजीवी हो गए।  

भक्तों को लगता है मानों इन्हीं के टैक्स से देश चल रहा है और हम इनके पैसों पर शैंपेन पीते हैं। जैसे जीवन की सब समस्या इन्हीं को है जो घर से बाहर नाईट शिफ्ट मे जवानी झोंक कर घर पैसा भेजते हैं। हमारा जो मोदी ने नर्क बनाया सो क्या। बाप भी अब उतना पैसा नहीं भेजता कि डीसेंट वैकेशन हो। अब क्या हम भी क्रांति का मार्ग त्याग कर नौ से पाँच के चक्कर में उलझ जाएँ?

दृश्य परिवर्तन- नायक प्रेमिका से मिलने जा रहा है। कल की बहस और मर्दाना मूर्खता को परे रखकर प्रेमिका से समझौता करने का प्रयास किया जा रहा है। युवा क़दम कॉफ़ी हाऊस की ओर चल रहे हैं, आशा है प्रेम राजनीतिक बहस को दरकिनार कर दे और फ़ैज़ के शब्दों में फिर से इक बार हरेक चीज़ वही हो कि जो है, आसमाँ हद-ए-नज़र, रहगुज़र रहगुज़र, शीशा-ए-मय, शीशा-ए-मय। युवक प्रतीक्षा करता है, सरकार को कोसता है। रोज़गार भी तो नहीं है और ऐसा भी कोई नहीं जिससे बेरोज़गारी की नाउम्मीदी बाँटी जाए। सरकारी नौकरी बिना सिफारिश लगती नहीं है, सरकार के सिवाय कोई रोज़गार है नहीं।

समय बीतता जाता है, नायिका को वैचारिक वैमनस्य बहुत नागवार गुज़रा है। वह आज नहीं आई, कल भी नहीं आएगी, परसों भी प्रेम ख़ाली सिगरेट की डिब्बियों पर ही लिखा जाएगा, और फेफड़े की धौंकनी का प्रेमविहीन धुआँ उदास आसमान पर हताशा की कथा लिखेगा।

प्रेमी हताश होकर पत्र लिखता है। बुरा हो इस आपातकाल का कि प्रेमी हृदयों में मतभेद उत्पन्न किया। क्या प्रियतमा सत्य वचन पर ऐसी रूठेगी कि मिलन की अमावस पर चंद्र कभी उदय ही ना होगा? प्रेमी उद्वेलित होकर शायरी से सुसज्जित पत्र भेजता है। मेघदूत के स्थान पर सरकारी डाक का स्पीडपोस्ट है।

ग़ालिब लिखते थे- “ज़िक्र उस परीवश का और फिर बयाँ अपना, बन गया रक़ीब आख़िर जो था राजदाँ अपना।” सरकारी राजदाँ जब कुर्सी की पीठ पर सफ़ेद तौलिया बिछा कर राजदाँ बन के नायक का ख़त सेंसर करता है तो रक़ीब नहीं बनता, सरकारी गवाह बनता है। परीवश का ज़िक्र सरकारी दफ़्तर का लुत्फ़ बढ़ा देता है। मेघदूत में प्रेमिका का सौंदर्य सरकारी बाबू चटखारे लेकर पढ़ते हैं। राजीव जी का पोस्टल अमेंडमेंट एक्ट लगा है, गुलाबी लिफाफे धूलि-धूसरित सरकारी दफ्तरों में रोमांस ले आते हैं।

नायिका सेंसर से अनभिज्ञ प्रेम में पिघलकर मिलन की स्वीकृति देती है। ग्रीष्म ऋतु मे वसंत का भान होता है। सेंसर से अनजान प्रेमी युगल टूटकर मिलते हैं, और कॉफ़ी हाऊस के धुँधले कोने मे फ़िल्टर कॉफ़ी का कप प्रेम का अकेला गवाह बनता है। फ़ैमिली केबिन के भारी पर्दे के बाहर बूटों की आवाज़,

घबराया हुआ वेटर आकर फुसफुसाता है- साहब, आपको ढूँढ रहे हैं।

नायक आस्तीनों चढ़ा कर उठता है। चे ग्युावारा के भाव युवा मुख पर आते हैं। बाहर से ठसक भरी पुलिसिया आवाज़ आती है- “साले, मोदी सरकार समझे हैं, गाली भी देंगे और फील्स लाईक इमरजेंसी कहकर कॉन्क्लेव में कबाब भी तोड़ेंगे। प्रेम पत्र में इमरजेंसी की दुहाई लिखते हैं। अब वह सरकार है जिसे आपातकाल लगाना और सरकार चलाना बख़ूबी आता है। अंदर करके तोड़े जाएँगे तो सब राजनीति निकल जाएगी। पिरेमी हो पिरेम करो, भगतसिंह ना बनो।”

पीछे से सिपाही का स्वर- “प्रेमिका भी गदराई सुंदरी है इसकी, फिर भी नेतागीरी। मस्त लिखा ख़त में! भला हो राजीव जी के डाक सेंसर का, वरना पैक्टसा, हमारी ज़िन्दगी नीरस हो जानी थी।”

एक घिनाई हुई सरकारी हँसी। प्रेमिका क़समें देती है और पुरुषार्थ को अल्पनिद्रा में भेजती है। मीसा-2 मे बंद सहपाठी देव की याद दिलाती है, बहन की डोली पड़ोसियों ने उठवाई और उसको दो माह बाद पिता की अर्थी भी! प्रेमी अभिजात्य साहस दर्शाने का प्रयास करता है, प्रेमिका मज़रूह सुल्तानपुरी की याद दिलाती है। कहती है, “उनसे ज़्यादा तो सम्मानित और प्रख्यात नहीं हो तुम, वो भी कांग्रेस सरकार द्वारा दो वर्ष के लिए भीतर किये गए, तुम क्या हो? अभी जाओ, मेरे वीर शिरोमणि, अपनी रक्षा करो। “

प्रेमी युगल पीछे को रास्ते से निकलता है।

युवक कहता है, “क्यों ना सिनेमा देखें।”

सिनेमा घंटे भर का होता है। बनता तो अब भी तीन घंटे का है, सेंसर के बाद, सुरजेवाला जी का सर्टिफिकेट लेने के बाद घंटे डेढ़ घंटे का बचता है। कला का माँस सत्ता ने निचोड़ लिया है, हड्डियाँ बची हैं।

युगल सिनेमा घर में जा घुसता है। बाहरी दुनिया से भिन्न एक सेनिटाइज़ड स्वप्न लोक बन जाता है।

मधुर गीत- “खेलेगा इक दिन वो, तेरे आँचल में” प्रेमिका प्रेमी को कंधे पर सर रख देती है। भविष्य का भान चेहरों पर मुस्कान बिखेर देता है। हाथों में हाथ मानों एक-दुसरे को स्वप्न देखने का साहस देते हैं।

प्रोजेक्टर पर लगी फ़िल्म अचानक अटक जाती है। बत्तियाँ जगमगा उठती हैं, दरवाज़ों से पुलिस के साथ सरकारी लोग भड़भड़ाते हुए अंदर आते हैं- लाउडस्पीकर घोषणा- राष्ट्रहित मे नसबंदी कराएँ। युवक भागने का प्रयास करता है, धर लिया जाता है। कसमसाता है, रेडियो के स्थान पर अब एलसीडी का उपहार है नसबंदी पर- अधिकारी बताता है, दो नुमांईदे काग़ज़ पर हस्ता़क्षर करवाते हैं। 15 और लोग हैं। 10 स्कूली बच्चे भी जो स्कूल बंक कर के सिनेमा देखने पहुंचे थे। उन्हें पता नहीं क्या होने वाला है, नायक को भविष्य के अंधकार का भान है।

इसी आपाधापी का लाभ लेकर प्रेमिका भागकर प्रेमी के पिता के पास पहुँचती है।

“अंकल, उसे सरकारी लोग पकड़ ले गए, नसबंदी विभाग वाले। उसे बचा लीजिए। आपकी तो राजनीतिक पहुँच है। विपक्षी नेता से कहिए।”- साँस टूटती है, आशा नहीं।

बुजुर्ग पिता मुख हाथों में ढाँप लेता है। “विपक्ष तो जेल में है।”
“कोर्ट चलिए अंकल”
“बेटा, सुप्रीम कोर्ट जज इस्तीफ़ा दे चुके हैं, जीवन का अधिकार सर्वोपरि नहीं है, संविधान स्थगित है।”
“आप तो लिखते हैं। अख़बार मे छपवाइए। कुछ तो करें, अंकल”
“सरकार विरोध में लिखा छाप जेल कौन जाएगा? कोई लाभ नहीं।” प्रेमी के बूढ़े पिता के कंधों पर सर रखकर प्रेमिका सुबकती है।

पटाक्षेप।

साल निकल गया। प्रेमी जेल से निकलता है।

खोया हुआ पौरूष पाँव घसीटता आता है। हर दृष्टि में एक चिंतित तिरस्कार झाँकता है। पिता वंश का वादा उसके चेहरे में ढूँढते हैं, प्रेमिका आगे बढ़ कर लंगड़ाते बदन को साथ देती है। डेढ़ बरस का टॉर्चर आत्मा को तोड़ चुका है। नायक मूक घर लौटकर छत पर लगे पंखे को तकता है।

पुराना एसी ख़राब हो गया था पिताजी बता रहे थे। नए ऐसी के लिए लाइसेंस की प्रतीक्षा है। दो साल की वेटिंग है, कुछ पैसे ख़र्च करके कांग्रेसी विधायक की सिफ़ारिश से एक साल में मिल जाएगा। युवक बिस्तर के नीचे से पुराने ख़त निकालता है।

“तुम कहते हो तुम्हें मुझ जैसी बेटी चाहिए, मुझे तुम सा नटखट बेटा चाहिए, सूर्य सा प्रखर और जीवंत।”, युवक पढ़ता है।

प्रेमी के कानों में अतीत खुसफुसाता है, मानों मक्खन में खंजर उतर जाता है। नितांत रिक्त नेत्रों से अश्रु-धरा बहती जाती है। आपातकाल जैसा और आपातकाल का अंतर मानों मन को निचोड़ देता है।

बाहर से मुफ़्त में मिले एलसीडी पर प्रधानमंत्री का संदेश। “देखिये भैया, हमारी सरकार आई, और अब संविधान सुरक्षित है। एक विक्षिप्त अराजकता को हटाकर हमने व्यवस्था को पुनर्स्थापित किया है। संविधान के प्रथम संशोधन का उचित उपयोग हो रहा है, 66-ए फ़िर से लागू है, और ज्ञानी जैल सिंह द्वारा रोका गया पोस्टल विधेयक फिर से प्रभावी किया गया है। देश सुरक्षित हाथों में है।

युवक मुट्ठियों मे ख़त भींच लेता है। पंखे को देखता है, कोने मे टेबल पर रस्सी पड़ी है। उठकर युवक रस्सी की और बढ़ता है। अतीत के चित्र आँखों के घुमते हैं, भविष्य के स्वप्न के साथ गड्ड-मड्ड से हो जाते हैं।

अकबका कर युवक नींद से उठता है। एसी बहुत ठंडा भान होता है पर शरीर पर उतरा स्वेद धारा पर निष्प्रभाव है। कैलेंडर देखता है, 2019 है। बाहर बाबूजी समाचार देख रहे हैं। बाहर पिताजी टीवी देख रहे हैं। एक आवाज़ आती है- “मित्रों…”

युवक चैन की साँस लेता है। मुस्कुराता है और फिर से सोने का प्रयास करता है।