राजनीति
कश्मीर घाटी से इस्लामी कट्टरवाद का सफाया ही स्थाई हल है
आईना - 18th February 2019

आशुचित्र- पुलवामा हमले का बदला लेना समय की मांग है लेकिन कश्मीर की समस्या के लिए एक स्थाई हल ढूँढने की भी आवश्यकता है।

सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकवादियों द्वारा किए गए हमले में 44 जवान शहीद हो गए और इस हमले से पूरा देश शोक में डूबा हुआ है।

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि इस हमले ने हमें नींद से जगाकर इस चल रही जंग का साक्षी बना दिया है। एक कोकून के अस्तित्व में रहने से हमें लगने लगता है कि बाकी सब कुछ एक श्रेष्ठ की तरह है। पुलवामा आतंकी हमले का यह क्षण है जो हमें बताता है कि सीमा पार के दुश्मन ने किस जोश के साथ हम पर नज़रें जमाई हुई हैं।

हालाँकि, दुश्मन ना सिर्फ टैंक और बम से हमला करते हैं, वे अपने विचारधारा से भी हमला करता जो ज़हर की तरह हमें हमारे ही खिलाफ खड़ा कर देती है। दशकों से कश्मीर के युवाओं में रणनीतिक और व्यवस्थित तरीके से भारत के खिलाफ ज़हर भर दिया गए है।

भारत और हिंदुओं के खिलाफ प्रचार-प्रसार ने एक बार पाकिस्तान को जन्म दिया। और अब यह घाटी और सीमा क्षेत्रों में विस्तार कर रहा है।

घाटी एक ऐसा क्षेत्र बन गया है जहाँ मुख्यधारा की कोई भी वास्तविकता सीधे रूप से नहीं पहुँचती बल्कि छनकर पहुँचती है। कश्मीर में जो कुछ भी पहुँचता है, वह ज़्यादातर भारतीय सीमा के पार से बनकर आता है जिसे कश्मीर के लोकाचार के साथ ना सिर्फ संप्रदायवादी बल्कि जिहादियों द्वारा युवाओं की थालियों में परोस दिया जाता है। उदारवादी और मानवाधिकार एक्टिविस्ट आतंक के क्षमा-प्रार्थी और सेना के आलोचकों के रूप में कार्य करते हैं।

सावधानीपूर्वक संचालित ये प्रचार मशीनें भारतीय सेना को गिराने और आतंकवाद के खिलाफ किसी भी करवाई को बाधित करने का काम करती है। सेना पर पत्थर बरसाने वालों को दिग्भ्रमित युवाओं की तरह दर्शाया जाता है और सेना को आक्रमणकारी के रूप में दिखाया जाता है। यह त्रुचिपूर्ण कथात्मक ही है जो फिदायीन और जिहादियों को भारत का खून बहने के लिए ताकत देता है।

जैसे ही एक आतंकवादी कश्मीरी युवक के हमलों में सीआरपीएफ जवानों के शहीद होने के पीछे एक जवान आतंकवादी का हाथ है जिससे गुस्साए सभी नागरिकों की बस एक ही मांग है और वह है बदला। सभी नागरिकों के अंदर बहुत आक्रोश है और अब जंग ही एकमात्र ज़रिया है जिससे सब सहमत भी हो जाएँगे। हालाँकि इस लेखक का मानना यह है कि जंग छेड़ना भी एक अस्थाई समाधान है।

विचारों में भरे हुए ज़हर को खत्म करने के लिए सिर्फ सैन्य करवाई काफी नहीं होगी। जिहादियों की विचारधारा को खत्म करने के लिए एक दीर्घावधि और रणनीति भरा समाधान देखना होगा। कश्मीर की अनोखी जनसांख्यिकी स्थिति जो भारत में अनियमित है जहाँ संविधान के मौलिक अधिकारों के अनुसार व्यक्ति को पूरे देश में कहीं रहने का अधिकार है जिसके परिणाम स्वरूप कश्मीर घाटी के वैचारिक यहूदी बस्ती का जन्म हुआ है। धारा 370 को कश्मीर के भारत से अलग होने का ज़िम्मेदार माना जाता है

जम्मू कश्मीर के राज्य को धारा 35 (अ) के साथ खुलने की ज़रूरत है, यह कश्मीर में लोगों और उद्योग के आने का रास्ता खोल देगा जिससे कश्मीर को संप्रदायवादी विचार धारा से मुक्ति मिलेगी।

भारतीय जनता पार्टी इकलौती ऐसी पार्टी है जो धारा 370 को कश्मीर में लागू करने को एक स्थाई उपाय मानती है। जवानों की कुर्बानी से सुन्न पड़े हुए भारत के चिंतित नागरिक सभी राजनीतिक दलों से मांग करें कि वे बताएँ कि इस मामले पर उनकी क्या मुद्रा है।

यह जितनी सैन्य ताकत की लड़ाई है उतनी ही भारत और पाकिस्तान की विचारधाराओं की भी लड़ाई है।

बटवारे के कुछ अवधेश अब भी ज़िंदा हैं, खासकर कश्मीर के कुछ हिस्सों में। सुरक्षा सेनाओं और सरकार द्वारा घाटी में शांति बनाए रखने के प्रयास को ही भारत की सबसे बड़ी कमज़ोरी माना जा सकता है।

हालांकि इस बार अंतर्राष्ट्रीय दबाव के ले या चुनावी व्यवहार के ले, यह एक ऐसी सरकार है जो देश को सबसे आगे रखती है।

पिछले कुछ सालों में प्रोत्साहित सुरक्षा बलों ने घाटी में आतंकवाद का पीछा किया है। आँकड़ों को देखे तो उन्होंने 2017 में 218 आंतकवादी और 2018 में 276 आतंकवादियों का सफाया किया है, जो आतंकवाद को खत्म करने का जोश दर्शाता है। अगर उरी हमले के बाद हुई सर्जिकल स्ट्राइक एक संकेत है तो इस बार हम आतंकवाद को हटाने के लिए इससे बड़े प्रयास की उम्मीद कर सकते हैं। हालाँकि यह एक अस्थाई हल होगा, जम्मू कश्मीर में यथास्थिति बदलने की ज़रूरत है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए हुए दमदार जवाब ने गुस्साए नागरिकों को एक उम्मीद दी है, प्रधानमंत्री मोदी ने सेना को छूट दे दी है और कहा है कि वो शहीदों का बदला लेने के लिए जो चाहे वो कर सकती है जिससे दिखता है कि सरकार इस बार आतंकवाद का सामना करने  लिए पूरी तरह से तैयार है।

समझौते करने का सामना अब खत्म हो गया है, प्रधानमंत्री मोदी ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि जवानों कि कुर्बानी बिल्कुल भी व्यर्थ नहीं जाएगी। समय की मांग है कि दुश्मनों को करारा जवाब ज़रूर दिया जाए। यह लेखक बाकी सभी भारतवासियों की तरह प्रधानमंत्री मोदी पर भरोसा करता है कि कश्मीर की समस्यायों को इस बार पूरी तरह से अंत किया जाएगा।