राजनीति
बारामूला संसदीय क्षेत्र का विश्लेषण- दो प्रबल दावेदारों के साथ उभरता तीसरा पक्ष

आशुचित्र- क्या आतंकवाद मुक्त होने का प्रभाव बारामूला के चुनावों पर पड़ेगा? 

नियंत्रण रेखा के निकट स्थित बारामूला संसदीय क्षेत्र का चुनाव इस वर्ष रोचक होगा क्योंकि पिछली बार चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों में से एक निर्दलीय को छोड़कर कोई भी उम्मीदवार पुनः चुनाव की होड़ में नहीं है, यहाँ तक कि पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) से पिछली बार जीते मुज़फ्फर हुसैन बेग भी नहीं। बात सिर्फ प्रत्याशियों की नहीं अपितु लोगों की भी है जो कई वर्षों बाद चुनावी सभाओं व रैलियों में अपनी सक्रियता दिखा रहे हैं।

बारामूला संसदीय क्षेत्र भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) और नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के अधीन ही रहा था जब तक कि 2014 लोकसभा चुनावों में पीडीपी के हुसैन बेग ने यहाँ जीत दर्ज नहीं की थी। 2018 के अंत में बेग के बागी तेवर देखने के बाद उन्हें पीडीपी का संरक्षक बना दिया गया था और संभवतः इसी वजह से उन्हें इस बार चुनाव में नहीं उतारा जा रहा है।

बारामूला संसदीय क्षेत्र में तीन जिले आते हैं- बारामूला, कुपवाड़ और बांदीपोरा। 2011 की जनगणना के अनुसार तीनों जिलों की जनसांख्यिकी का विवरण दिया गया है जिससे संसदीय क्षेत्र की जनसांख्यिकी निकाली गई है।

जिला कुल जनसंख्या हिंदू (%) मुस्लिम (%) ईसाई (%) सिख (%)
बांदीपोरा 392232 2.15 97.39 0.15 0.14
बारामूला 1008039 3.04 95.15 0.15 1.47
कुपवाड़ा 870354 4.27 94.59 0.2 0.64
संसदीय क्षेत्र 2270625 3.36 95.32 0.17 0.92

15 विधान सभा क्षेत्रों से बना बारामूला संसदीय क्षेत्र

15 विधान सभा क्षेत्रों से बने इस लोकसभा क्षेत्र में पिछले चुनाव में 15 प्रत्याशी खड़े हुए थे जिसमें से 13 अपनी जमा राशि भी बचा नहीं पाए थे। इस बार चुनाव के प्रथम चरण में 11 अप्रैल को होने वाले मतदान में नौ प्रत्याशी खड़े हो रहे हैं। उम्मीदवारों के बारे में जानने से पहले राजनीतिक पार्टियों के प्रति लोगों का रुझान पिछले चुनावों के मत प्रतिशत से देखते हैं-

चुनाव एनसी पीडीपी आईएनसी पीसी भाजपा
2004 38.13 35.18 18.61 N/A 2.69
2009 46.01 31.32 N/A 14.82 N/A
2014 31.34 37.61 N/A 15.27 1.41

2009 और 2014 में कांग्रेस व एनसी ने मिलकर चुनाव लड़ा था इसलिए कांग्रेस का अलग प्रत्याशी नहीं था। हालाँकि इस वर्ष भी कांग्रेस और एनसी ने गठबंधन किया है लेकिन अनंतनाग और बारामूला में वे अपने प्रत्याशियों को एक दूसरे के सामने उतार रहे हैं। ऊपर के डाटा से आप पाएँगे कि इन पाँच पार्टियों में से सभी पार्टियों ने अपने प्रत्याशियों को कभी नहीं उतारा, ऐसे में ये पार्टियाँ इस बार एक दूसरे के मत को भी काटेंगी।

आइए अब चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों के विषय में भी जानते हैं। अपने इतिहास में एक भी लोकसभा सीट न जीत पाने वाली जम्मू-कश्मीर नेशनल पैंथर्स पार्टी ने जहांगीर खान को मैदान में उतारा है।

पिछली बार भी निर्दलीय की तरह चुनाव में उतरे अब्दुल राशीद शेख, इस बार भी निर्दलीय की तरह ही चुनाव लड़ेंगे। लोकसभा चुनाव में 4.74 प्रतिशत मत पाने वाले इंजीनियर राशीद 2014 में लंगेट से निर्दलीय विधायक बने थे। लंगेट विधानसभा क्षेत्र बारामूला लोकसभा क्षेत्र का ही भाग है। इससे कम से कम एक खंड में तो उनकी लोकप्रियता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। साथ ही उनकी चुनावी सभा में उपस्थित लोगों की संख्या संकेत देती है कि भले ही वे इस सीट के दावेदार न हों लेकिन दूसरों के वोट काटने का कार्य ज़रूर करेंगे।

वहीं बारामूला से पिछली बार जीती पीडीपी ने बेग के स्थान पर अब्दुल क़यूम वानी को उतारा है। वानी का पीडीपी में फरवरी माह में ही महबूबा मुफ्ती ने स्वागत किया था। इससे पूर्व वे व्यापार संघ के वरिष्ठ नेता और कर्मचारी संयुक्त कार्य समिति के अध्यक्ष थे और उस समय भी उनका मानना था कि अनुच्छेद 35-ए से छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए, इस प्रकार उनका पीडीपी नें सम्मिलित होना विचार सम्मत है।

हालाँकि जम्मू-कश्मीर में भाजपा व पीडीपी के गठबंधन के टूटने के बाद पीडीपी के मतदाता आधार को थोड़ा नुकसान पहुँचा है लेकिन फिर भी कई क्षेत्रों में अभी भी इसका वर्चस्व है। लोलाब (बारामूला का एक विधान सभा क्षेत्र) से विधायक रहे अब्दुल हक़ खान की भी जनता पर अच्छी पकड़ मानी जाती है। साथ ही स्वयं उम्मीदवार वानी अध्यापक समुदाय में लोकप्रिय माने जाते हैं।

कांग्रेस ने नामांकन की अंतिम तिथि से एक दिन पूर्व ही फारूक़ अहमद मीर का नाम घोषित किया। वे प्रदेश कांग्रेस कमेटी में कुपवाड़ा जिले के अध्यक्ष हैं। वे पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं व 2014 में लोलाब के विधान सभा चुनाव में वे जीत दर्ज नहीं कर पाए थे। कई मीडिया रिपोर्टों में उन्हें प्रबल दावेदार नहीं माना जा रहा है।

एनसी ने मोहम्मद अकबर लोने को प्रत्याशी के रूप में खड़ा किया है। 72 वर्षीय लोने 2004, 2008 और 2014 में सोनवारी से विधायक रह चुके हैं जो कि बारामूला के संसदीय क्षेत्र में आता है। वे विधान सभा के पूर्व अध्यक्ष भी हैं। पाकिस्तान समर्थक बयानों के कारण विवाद में रहने वाले लोने की कार्यकर्ताओं पर अच्छी पकड़ मानी जाती है।

पीपल्स कॉन्फ्रेंस (पीसी) के नेता राजा अजियाज़ अली के इस प्रतिद्वंद में प्रवेश से एनसी की मुश्किलें बढ़ती नज़र आ रही हैं। उरी क्षेत्र से आने वाले अजियाज़ स्वयं एक पहाड़ी हैं व पीसी के अध्यक्ष सज्जाद लोने की हंदवाड़ा और कुपवाड़ा में अच्छी पकड़ है जो कि बारामूला के संसदीय क्षेत्र के भाग हैं। साथ ही पीडीपी छोड़ पीसी में सम्मिलित होने वाले इमरान अंसारी शिया मतों को भी आकर्षित करेंगे।

रही बात भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की तो बारामूला सीट पर यह 5 प्रतिशत मत पाने के लिए भी संघर्षरत ही रही है। जहाँ 2014 में यह राज्य की छह में से तीन सीटें जीतने में सफल रही थी, वहीं बारामूला में इसे मात्र 1.41 प्रतिशत मत मिले थे। इस बार भाजपा ने मोहम्मद मक़बूल वार को मैदान में उतारा है लेकिन उनकी जीत की संभावानाएँ बहुत ही कम हैं। भाजपा प्रत्याशी को लोकप्रिय नहीं माना जा रहा है, यहाँ तक कि उनकी रैली में मात्र 78 लोगों ने उपस्थिति दर्ज कराई थी और पिछले विधान सभा चुनावों में उनको मिले मतों की संख्या भी अपमानजनक है।

इस प्रकार देखा जाए तो मुख्य रूप से मुकाबला पीडीपी व एनसी में होना चाहिए लेकिन कांग्रेस के अलग प्रत्याशी उतारने से एनसी के मत कटेंगे और साथ ही अंसारी के पीसी में सम्मिलित हो जाने से पीडीपी के भी कुछ मत कटेंगे जिसके कारण तीसरे स्थान पर रहने वाली पीसी भी मैदान में मुख्य भूमिका में आ जाएगी।

2009 में 41.84 प्रतिशत मतदान और 2014 में भी अलगाववादियों के बहिष्कार के कारण 40 प्रतिशत तक मतदान का साक्षी बना बारामूला इस वर्ष के आरंभ में ही आतंकवाद मुक्त घोषित किया गया था। इसलिए यह देखना रोमांचक होगा कि आतंकवाद मुक्त होने के बाद बारामूला की जनता अपने मताधिकार के प्रति कितनी उत्साहित है और उनका उत्साह कैसे चुनाव परिणाम की धारा को बदलेगा।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।