राजनीति
1984 सिख-विरोधी दंगे: खुलने लगा है न्याय का द्वार

प्रसंग
  • भारत में औपनिवेशिक इतिहास के बाद के इतिहास में सबसे बड़े अत्याचारों में से एक के लिए न्याय की माँग लंबे तक नहीं सुनाई दी, जब तक हाल ही में, न्याय के चक्के घूमने नहीं शुरू हो गए।

1984 के सिख विरोधी दंगों के सफर में एक पुरानी भारतीय कहावत ‘तारीख पे तारीख’ दुःखद रूप से प्रभावी रही है।

जो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद फूटे एक गुस्से के रूप में शुरू हुआ था और जल्द ही एक संगठित नरसंहार में बदल गया था।

चौंतीस साल पहले, एक हिंसा भड़की थी, सड़कों पर आगजनी, ट्रेनों में भीषण नरसंहार, बच्चों की चिल्लाहट और चिल्लाती हुई माताओं के दृश्य ने देश को युद्धक्षेत्र में बदल दिया था, यह सब साल 1947 के विभाजन के दिनों की याद दिलाता है। पलक झपकते ही देश क्रोध, पीड़ा और आतंक में डूब गया था, जिसने देश को नर्क में पहुँचा दिया था।

तब से हिंसा के सबसे ज्यादा मामले दिल्ली में दर्ज किए गए हैं जो तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा किए गए आघात और विश्वासघात को दर्शाते हैं। सत्ता में रहते हुए पार्टी के विश्वासघात और न्याय में अविश्वास ने उत्तरजीवियों को बहुत निराश करके छोड़ा, जब तक कि 2014 में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन पार्टी ने शपथ नहीं ली।

साल 1984 में सिख विरोधी हिंसा के दौरान हत्याओं और दुर्व्यवहारों के लिए जिम्मेदार लोगों पर मुकदमा चलाने में कांग्रेस सरकार की लगातार असफलता से यह बात तो साफ है कि उनके लिए सत्ता ही सब कुछ है।

भीषण नरसंहार में हजारों लोगों की मौत पर कोई पछतावा न करते हुए  राजीव गांधी ने टिप्पणी की थी कि “जब एक बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती हिल जाती है।” देश के मुखिया के इस तरह के अपमानपूर्ण बयान से यह बात तो साफ है कि कांग्रेस सरकार इस पूरी तबाही को टालने में कितनी गंभीर थी।

जो काम कांग्रेस सरकार 30 सालों में करने में नाकाम रही वो मोदी सरकार ने 3 सालों में ही कर दिखाया। केवल प्राथमिकी दर्ज करने से लेकर ही जाँच अधिकारियों ने लोगों को डराया-धमकाया, कार्य में विलंब किया और लोगों को निराश किया, लेकिन नरेंद्र मोदी के संरक्षण में उचित प्रक्रिया के साथ इसका तेजी से पालन किया गया। दो आरोपियों को सुनाए गए फैसले और दी गई सजा सिख समुदाय के लिए एक आशा की किरण लेकर आई।

साल 1996 के बाद से सिख विरोधी दंगों के लिए यशपाल सिंह को दी गई मौत की सजा पहली सजा है। दंगों में शामिल अन्य लोगों को पकड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं।

मारवाह आयोग, जिसे भीषण नरसंहार की बाद गठित किया गया था,  की बर्खास्तगी के साथ ही न्याय की विफलता शुरू हुई। इसके बाद कई जाँच आयोगों का गठन किया गया और उनको भंग भी कर दिया गया। अफसोस की बात है, कि रंगनाथ मिश्र आयोग ने पीड़ितों की गैरहाजिरी में गोपनीय रूप से बयान दर्ज करवाए और राजीव गांधी की सरकार को इसकी जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया। साल 1994 में साक्ष्यों के अभाव में दिल्ली सरकार ने इस मामले को बंद कर दिया।

न्याय पाने के प्रयास में वाजपेयी सरकार ने वर्ष 2000 में नानावटी आयोग की स्थापना की। इस रिपोर्ट में बहुत कुछ सार्वजानिक किया गया जो कि चौंकाने वाला था, जिसमें कांग्रेस के दिग्गज नेता नामित किए गए थे। उनमें से कुछ, जैसे कि एच के एल भगत, जिनकी सुनवाई से पहले ही मृत्यु हो गई। जबकि, सज्जन कुमार, जगदीश टाइटलर और कमलनाथ जैसे अन्य लोग दंड से मुक्त हो गए हैं।

हालाँकि टाइटलर ने अपना मंत्रालय खो दिया, और 2009 में विरोध के दौरान केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) ने इन्हें दोषमुक्त कर दिया था, उसके बाद किसी प्रकार का न्याय नहीं देखने को मिला। जांच अधिकारियों द्वारा नामित किसी भी आरोपी के खिलाफ ठोस सबूतों के होने के बावजूद कोई मुकदमा नहीं चलाया गया।

विडंबना यह है कि, मनमोहन सिंह ने 2004 में सिखों के सामने खेद प्रकट किया, और जल्द ही टाइटलर और कुमार को उसी वर्ष संसद के सदस्य के रूप में चुना गया। कांग्रेस ने भावनात्मक रूप से सार्वजनिक खेद प्रकट करने के साथ 3,000 सिखों की जनहानि का उपहास किया जबकि अपराधियों पर तिलमात्र भी कड़ी कार्यवाही करने की अवधारणा देखने को नहीं मिली। यहां तक कि जांच एजेंसी, सीबीआई, ने उन्हें 2009 में क्लीन चिट दे दी थी।

तीन दशक पुराने मामले की जटिलताओं, रिकार्ड को एकत्रित करने और जांच करने में कठिनाई के बावजूद, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार ने चुनौती स्वीकार की और मामलों को जांचने के लिए सभी प्रयास किए।

नुकसान की भरपाई करने और न्याय देने के अपने वादे को पूरा करते हुए, प्रधानमंत्री मोदी ने 23 दिसंबर 2014 को जी पी माथुर की अध्यक्षता में एक समिति के गठन का निर्देश दिया ताकि आगे की कार्यवाही का सुझाव दिया जा सके। कुछ ही हफ़्तों में, मामलों की दोबारा जांच करने के लिए एक विशेष जाँच दल (एसआईटी) की स्थापना की गई, और अंत में 2015 में फास्ट-ट्रैक कोर्ट में मुकदमा शुरू किया गया। एसआईटी ने पुलिस थानों और पिछली समितियों की फाइलों को निकलवाया, जिनमें सबूत मौजूद थे। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि टीम ने सबूत मिलने पर नए मुकदमे दायर किए।

जब जाँच जारी थी, तब 1984 के दंगों के आरोपी कमल नाथ कांग्रेस द्वारा पुरस्कृत किए गए जैसा कि उन्हें 2018 में मध्यप्रदेश राज्य का पार्टी अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

भारत के औपनिवेशिक इतिहास के बाद के इतिहास में सबसे बड़े उत्पीड़न में से एक के लिए न्याय की पुकार अंत में सुनी गई। लंबे समय से चलने वाली न्यायिक प्रक्रियाओं में पीड़ितों और प्रत्यक्षदर्शियों की आवाज़ें, जो इंतजार करते-करते लगभग थम सी गई थीं, हाल ही में दिल्ली न्यायालय के फैसले से फिर से जागृत हो गई हैं।

हमारे सिख भाइयों के जीवन में जो क्षति हुई है उसके घावों को भरा तो नहीं जा सकता, और जीवित बचे लोगों की अग्निपरीक्षा को भुलाया नहीं जा सकता, लेकिन मृतकों की आत्माओं को आज असीम शांति अवश्य मिल रही होगी।

आँचल चौधरी एक नीति विश्लेषक और शिकागो विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा हैं।