राजनीति
10 बातें जो 2014 के चुनावों से 2019 के चुनावों को भिन्न बनाती हैं

आशुचित्र- क्यों 2019 के चुनाव 2014 के चुनावों से भिन्न हैं।

चुनाव आयोग द्वारा 17वें लोकसभा चुनावों व चार विधान सभा चुनावों के आयोजन की घोषणा के कई भिन्न पहलु हैं।

पहला यह कि 2014 में नौ चरणों की बजाय इस बार सात चरणों में चुनाव आयोजित कराया जा रहा है लेकिन इस प्रक्रिया की अवधि में कोई कटौती नहीं की गई है। 2014 में  चुनाव 7 अप्रिल को शुरू हुए थे व 16 मई को मतगणना हुई थी- 40 दिनों की अवधि। इस बार प्रथम चरम 11 अप्रिल को है और 23 मई को गुनती होगी जो कि 43 दिनों की अवधि है। कोई यह सोच सकता है कि इस अवधि को छोटा क्यों नहीं किया गया। एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए डेढ़ माह की अवधि बहुत अधिक होती है।

दूसरा बड़ा परिवर्तन है बड़े और संवेदनशील राज्यों में चुनावों को कई चरणों में पूरा करना। 2014 में उत्तर प्रदेश व बिहार में छह चरणों में चुनाव हुए थे, वहीं जम्मू-कश्मीर व पश्चिम बंगाल में पाँच-पाँच। इस बार उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में सभी सात चरणों में मतदान होंगे, जबकि जम्मू-कश्मीर में पाँच। बंगाल का पाँच चरणों से सात चरणों तक चुनाव आयोजन निस्संदेह एक बड़ा परिवर्तन है। चुनाव आयोग ने स्पष्ट रूप से कहा है कि राज्य में बदलते राजनीतिक समीकरणों के कारण इसपर विशेष ध्यान की आवश्यकता है। इस वृद्धि का संबंध भारतीय जनता पार्टी के उदय और राज्य द्वारा स्थानीय हिंसा का सहारा लिये जाने से है।

तीसरा यह कि पहली बार किसी राज्य के चुनाव चार चरणों में होंगे। यह दुर्भाग्यपूर्ण राज्य है ओडिशा जो 11, 18, 23 और 29 अप्रिल को मतदान करेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि राज्य में लोकसभा चुनाव चार चरणों में आयोजित किए जाएँगे। 2014 में विधान सभा चुनावों के साथ हुए लोकसभा चुनावों में किसी भी राज्य ने दो चरणों से अधिक में मतदान नहीं किया था।

चौथा यह कि एक राज्य- जम्मू और कश्मीर जिससे अपेक्षा थी कि यहाँ विधान सभा चुनावों के साथ ही लोकसभा चुनाव भी होंगे, वहाँ ऐसा नहीं हो रहा है। यह आश्चर्यजनक है। यदि छह लोकसभा सीटों पर मतदान पाँच चरणों में आयोजित किया जा सकता है तो विधान सभा चुनावों के लिए ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता क्योंकि सुरक्षा तैनाती तो उतनी ही होगी। स्पष्ट रूप से राज्य के सुरक्षा हालातों को देखते चुनाव आयोग का विश्लेषण यह है कि विधान सभा चुनावों में अधिक सुरक्षा की आवश्यकता होगी। इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि हो सकता है कि केंद्र ने ही चुनाव आयोग को जटिलताओं से बचने के लिए यह सुझाव दिया हो क्योंकि दोनों ही चुनावों में लोगों की मंशा अलग-अलग होती है। विधान सभा चुनावों में लोग स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता देंगे जबकि लोक सभा में राष्ट्रीय भावना हावी होगी, विशेषकर जम्मू और लदाख में।

पाँचवा, वर्तमान चुनाव प्रक्रिया की बारीकियाँ भ्रम पैदा करती हैं। कुल 90 करोड़ लोग मतदान करेंगे जिनमें से 8.4 करोड़ पहली बार ऐसा करने वाले होंगे। चीन के अलावा कुल मतदाता बेस सभी देशों से अधिक है और नए मतदाता जुड़ने की संख्या 16 देशों के अलावा सभी देशों से अधिक है। यहाँ तक कि नए मतदाताओं की संख्या तुर्की की जनसंख्या (8.2 करोड़) से भी अधिक है।

छठा यह कि यह चुनाव सोशल और डिजिटल मीडिया पर भी उतना ही लड़ा जाएगा जितना कि सार्वजनिक रैलियों और अखबार विज्ञापनों में। और आश्चर्य की बात नहीं है कि चुनाव आयोग फ़ेसबुक, ट्विटर, गूगल और इंस्टाग्राम पर नज़र रखे हुए है। कोई प्रत्याशी सोशल मीडिया पर खर्च कर उसके संवैधानिक क्षेत्र की खर्च सीमा से बच नहीं सकता।

सातवाँ, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर आलोचना को देखते हुए आयोग ने सभी मतदान केंद्रों में वीवीपैट (वोटर वेरीफाइएबल पेपर ऑडिट ट्रेल्स) की व्यवस्था की है। आशा करते हैं कि हारने वाले लोग ईवीएम पर दोष नहीं मढ़ेंगे।

आठवाँ, पहली बार ऐसा होगा कि घोषणापत्र में प्रत्याशियों को न सिर्फ अपने आपराधिक रिकॉर्ड का उल्लेख करना होगा, बल्कि समाचार पत्रों और लोकल मीडिया में भी इसे बताना होगा। यह ऐतिहासिक है। हज़ारों प्रत्याशियों की इस घोषणा के प्रभाव को सोचें, “नमस्कार मुझपर फलां-फलां आपराधिक मामले दर्ज हैं।” अवश्य ही स्थानीय समाचार-पत्रों के सूक्ष्म अक्षरों पर अधिक लो ध्यान नहीं देंगे लेकिन फिर भी यह एक बड़ा परिवर्तन है।

नौंवा, नागरिकों द्वारा रिपोर्ट किए जाने के लिए सी-विजाइल नाम की मोबाइल ऐप जारी की गई है जिसके माध्यम से लोग अपने आसपास की अवैध गतिविधियों के पोटो व वीडियो पोस्ट कर सकेंगे। चुनाव आयोग ने दावा किया है कि यह कुछ मिनटों में ही घटनास्थल पर अपने दल को भेज देगा। लेकिन इसे सतर्क होना होगा। हो सकता है कि फ़ेक बुलावों से यह इधर-उधर भटकते रह जाए और असली घोटाला कहीं और हो जाए।

आखिरी यह कि भाजपा के नेतृत्व में एनडीए गठबंधन राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों से कड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं जिससे संभावना यह है कि 2019 में 2014 से अधिक लोग मतदान करेंगे और 66.4 प्रतिशत के आँकड़े को पार करेंगे।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।