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अब्दुल कलाम- जिनके लिए देश सर्वोपरि था

भारत के 11वें राष्ट्रपति भारत रत्न डॉ. अब्दुल कलाम की मृत्यु के अगले दिन रामानंद सेनगुप्ता  ने स्वराज्य के माध्यम से बताया था कि उनके लिए भारत के मिसाइल मैन क्या थे। आज उनकी जन्मतिथि पर उस लेख का अनुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है।

जब जुलाई 2007 में अब्दुल कलाम का भारत के राष्ट्रपति के पद का कार्यकाल पूर्ण हुआ था, वे राष्ट्रपति भवन से केवल दो सूटकेस और अपनी ढेर सारी किताबों के साथ बाहर निकले थे।

मैं उनसे बहुत अल्प समय के लिए केवल तीन-चार बार मिला था, दो बार दिल्ली में और एक बार चेन्नई में।

हर भेंट के बाद, मैं उनके बारे में थोड़ी दुविधा में पड़ जाता था क्योंकि उनके बारे में मेरी समझ और उनके मृदु-भाषी व्यक्तित्व में बड़ा अंतर था।

आखिरकार, वह भारत के मिसाइल मैन थे, एम.टी.वी. के यूथ आइकन खिताब के लिए एक बार नहीं बल्कि दो बान मनोनीत हुए थे जिसे 2003 में अनिल अंबानी और 2006 में महेंद्र सिंह धोनी ने जीता था, परंतु एक 70 वर्षीय यूथ आइकन!

मैं किस चीज़ की अनुपस्थिति महसूस कर रहा था? स्पष्टतः बहुत कुछ।

मुंबई, जनवरी 2005- भारतीय प्रवासियों को उत्सव के रूप में मनाने के लिए आयोजित त्रिदिवसीय कार्यक्रम के अंत में प्रवासी भारतीय दिवस पर अब्दुल कलाम जी प्रवासी सम्मान देने के लिए आमंत्रित किए गए थे। वहाँ पावर पॉइंट द्वारा संबोधित करते हुए उन्होंने एक ऐसा मुद्दा उठाया जिसने आयोजकों को भी असहज कर दिया था। उन्होंने कहा कि हम केवल अमीर भारतीय प्रवासियों के नाम पर शेखी बघारते हैं लेकिन फिजि, मॉरिशियस, कैरिबियन और गल्फ देशों में रहने वाले भारतीय जो गरीब और दलित हैं, उन्हें नज़रअंदाज़ किया जाता है।

अपने स्लाइडशो का शीर्षक ‘आपकी संपन्नता, हमारी प्रसन्नता’ रखकर कलाम ने यह साफ कर दिया कि हम केवल पत्रक नहीं बल्कि प्रवासी भारतीयों ने पीढ़ियों से या हाल ही में जो ज्ञान सहेजा है, उसे भी बाँटना चाह रहे थे।

प्रेज़ेंटेशन कुछ खास नहीं थी लेकिन इसके बावजूद कलाम को भारतीय प्रवासियों से जो जयध्वनि प्राप्त हुई, उसने राष्ट्रीय निष्पादन कला केंद्र के संचालकों को चौंका दिया। पत्रक और उपहार उनके लिए एक हौआ थे।

दो साल बाद, राष्ट्रपति भवन छोड़ने से एक हफ्ते पहले, जुलाई 2007 में डॉ. कलाम ने दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में भरे हुए सभागार को संबोधित किया था। राष्ट्रपति भवन में अपने यशस्वी पाँच वर्षों को याद करके उन्होंने कहा कि प्राप्त हुए सभी उपहारों को वे आर्ट गैलरी की तरह छोड़कर जाएँगे। उन्होंने श्रोताओं को उपहारों से दूर रहने को कहा क्योंकि वे ‘हानिकारक’ होती हैं। उन्होंने बताया कि कैसे उनके पिताजी जनब अवुल पाकिर जैनुलाअबदिन, जो रामेश्वरम पंचायत मंडल के अध्यक्ष चयनित हुए थे, ने उनकी इस बात पर पिटाई की थी कि उन्होंने जीत की खुशी में लाए गए तोहफों को घर पर रख लिया था। उनके पिता ने कहा था कि तोहफे खतरनाक इसलिए होते हैं क्योंकि वो हमेशा एक उद्देश्य के साथ दिए जाते हैं।

“कल ही एक प्रसिद्ध व्यक्ति ने मुझे उपहार स्वरूप दो पेन दिए। मुझे अप्रसन्नता से उन्हें लौटाना पड़ा।”, एक अच्छे राष्ट्रपति ने पछताते हुए कहा। उन्होंने मनुस्मृति से एक बात उद्धृत करते हुए कहा कि उपहार ग्रहण करने से मनुष्य के भीतर से दैवीय प्रकाश चला जाता है। “मैं आप सबसे यह इसलिए कह रहा हूँ ताकि आप उस उपहार से प्रभावित होकर, जो एक उद्देश्य के साथ आया है, अपने व्यक्तित्व का आकर्षण न खो बैठें।”, कलाम ने कहा।

ऐसी बातें वह आदमी करता था जिसने अखबार बेचकर शिक्षा ग्रहण की, 40 विश्वविद्यालयों से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की और 1997 में भारत के सर्वोच्च पुरस्कार भारत रत्न से विभूषित हुए। ऐसी बातें वह आदमी करता था जो अपने राष्ट्रपति के कार्यकाल में एक लाख से अधिक विद्यार्थियों से मिला और उन्हें भारत में परिवर्तन लाने के लिए अपने संबोधन द्वारा प्रत्साहित किया था। और सपनों के लिए- “सपने पूरे करने से पहले आपको वह सपने देखने होंगे।”

उनका सपना था एक विकसित और सशक्त भारत को देखने का। भारत के परमाणु हथियार कार्यक्रम के प्रति वे अपराध भाव से पूर्णतः मुक्त थे और उनका मानना था कि भारत को शिखर पर ले जाने में यह सहायक सिद्ध होगा। ऐसा कहता था वह आदमी जिसकाे जन्मदिन पर ही मेरा जन्मदिन आता है।

तो कैसे एक नम्र वैज्ञानिक और एक राष्ट्रवादी मनोदृष्टि वाले व्यक्ति में सामंजस्य स्थापित किया जाए?

मुझे तभी अहसास हुआ कि मैं कलाम के बारे में किस चीज़ से चूक रहा था जब मैंने ‘विंग्स ऑफ फायर’ पढ़ी जिसमें भारत के लिए उन्होंने अपने नज़रिए को बहुत स्पष्ट रूप से व्यक्त किया था।

पहली, स्वतंत्रता। अगर हम स्वतंत्र नहीं हैं तो कोई हमारा आदर नहीं करेगा।

दूसरा, विकास। सकल घरेलु उत्पाद की श्रेणी में भारत शीर्ष पाँच में है। ज़्यादातर क्षेत्रों में दस प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर है। हमारा गरीबी स्तर घटा है और विश्व भर में हमारी उपलब्धियों को सराहा जा रहा है। फिर भी हम खुद को विकसित और आत्मनिर्भर देश के रूप में देखने का आत्म-विश्वास नहीं रखते।

और तीसरा, भारत को दुनिया के सामने खड़ा होना होगा। ‘केवल शक्ति ही शक्ति का आदर करती है। हमें केवल सैन्य बल नहीं बल्कि आर्थिक शक्ति के रूप में भी उभरना होगा। दोनों का विकास साथ-साथ चलना ज़रूरी है।’

कलाम बहुत लोगों के लिए बहुत कुछ थे। एक अखबार बाँटने वाले बालक, एक वैज्ञानिक, एक अभियंता, एक कवि, एक लेखक, एक प्रेरणा, एक मार्गदर्शक, एक शिक्षाविद् और एक द्रष्टा। एक ऐसे व्यक्ति जो क़ुरान और भगवत गीता दोनों को पढ़ने में सहज थे, शोभा डे के अनुसार एक महा-बोर (बोरों की सूची में) लेकिन इन सबसे ऊपर एक देशभक्त। निस्संदेह, एक मृदुभाषी व्यक्ति।

लेकिन बिना किसी शक के, एक विनम्र व्यक्ति। जो व्यक्ति अपने पाँच साल के निवास स्थान से मात्र दो सूटकेसों के साथ निकले, वह केवल विनम्र ही हो सकता है।

विदाई डॉ. कलाम। भारत आपको हमेशा याद करेगा।