राजनीति
राजनीतिक आज़ादी- परिवारवादी वर्चस्व के मोह में फँसे दलों के लिए संवैधानिक संशोधन?

‘स्वराज’ अथवा ‘स्वराज्य’ अर्थात् ‘राजनीतिक आज़ादी’! भारत में ‘स्वराज्य’ की सर्वप्रथम परिकल्पना छत्रपति शिवाजी महाराज ने की थी। इस परिकल्पना में उनकी दृष्टि स्पष्ट एवं लोकहितकामी थी और उद्देश्य था- विदेशी आततायी साम्राज्य से भारतीय लोक (राष्ट्र) को मुक्त करना।

बाद के काल में, लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और विपिन चंद्र पाल (लाल-बाल-पाल), अरविंद घोष (महर्षि अरविंद), नेताजी सुभाषचंद्र बोस, विनायक दामोदर सावरकर, भगत सिंह इत्यादि क्रांतिकारी एवं विचारक इसके पक्षधर थे।

ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य से ‘राजनीतिक आज़ादी’ का मूलभूत आधार वास्तव में ‘शक्ति-अर्जन’ करना कदापि नहीं था। उस राजनीतिक चेतना में लोकहितकामी (राष्ट्र) सर्वोच्च भावात्मक पवित्रता थी। इसी भावात्मक पवित्रता की आधारभूमि पर भारत को ‘राजनीतिक आज़ादी’ हासिल हुई। इस राजनीतिक आज़ादी के लिए निस्संदेह कांग्रेस मूल आधार बनी।

परंतु, कालांतर में कांग्रेस की राजनीतिक चेतना जैसे-जैसे संकुचित और पथभ्रष्ट (अपवित्र?) होती गई, यही राजनीतिक आज़ादी ‘शक्ति-अर्जन’ का साधन (माध्यम) बनी। देखते-न-देखते इस राजनीतिक आज़ादी पर एक परिवार का एकाधिकार-सा होता गया, जो लंबे समय से आज तक थोड़े-बहुत अंतर और अंतराल के साथ चला ही आ रहा है।

दीर्घावधि तक सत्ता की बागडोर एक ही परिवार के पास होने के कारण उसे राजनीतिक सत्ता (भोग) की तीव्र आदत हो गई है। ऐसा प्रतीत होता है मानो सत्ता भोग की वह आदत धीरे-धीरे लत-सी बन गई है। जाहिर है कि आदत का लत बन जाना वैचारिक पंगुत्व का बोधक है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जबकि कांग्रेस को एक मज़बूत विपक्ष की भूमिका निभानी चाहिए, पार्टी के भीतर ‘राजनीतिक आज़ादी’ के स्वर उठ रहे हैं। ऐसा लगता है मानो कांग्रेसियों के लिए ‘राजनीतिक गांधी परिवार’ औपनिवेशिक ग़ुलामी के गढ़-सा प्रतीत होने लगा है।

हाल में नटवर सिंह द्वारा राजनीतिक गांधी परिवार को ‘तीसमारखाँ’ कहना, ग़ुलाम नबी आज़ाद का ‘फाइव स्टार से इलेक्शन नहीं लड़े जाते’ कहना और कपिल सिब्बल द्वारा ‘हम जी-23 हैं, जी हुजूर 23 नहीं हैं’ कहना इसी आलोक में देखा जाना चाहिए।

अब यह स्पष्ट हो चुका है कि कांग्रेस अपनी आंतरिक संरचना में ‘लोकतांत्रिक’ ढाँचे को नकार चुकी है। अतः वर्तमान में स्वघोषित सर्वाधिकार प्राप्त राजनीतिक परिवार की ‘तिकड़ी’ सारे निर्णय (उचित?) करती दिखाई देती है।

राजनीतिक आज़ादी-से अर्जित शक्ति का एक परिवार तक सीमित हो जाने के कारण यह समस्या उत्पन्न हुई है। वैसे, राजनीतिक आज़ादी से अर्जित शक्ति से लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम हो ही, आवश्यक नहीं। कांग्रेस और तालिबान इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।

राजनीतिक आज़ादी के लिए लड़ने वाली कांग्रेस में एक समय ऐसा भी आया कि इस परिवार को किसी अन्य (लोक-प्रिय) का पदासीन होना भी नागवार गुज़रा। 1978 में इंदिरा गांधी के पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद गांधी परिवार से इतर दो ही अध्यक्ष बने– पीवी नरसिंहा राव (1992-96) और सीताराम केसरी (1996-98)।

यह प्रमाण भी है कि इंदिरा गांधी के रहते हुए ही राजनीतिक गांधी परिवार ने पार्टी में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को तिलांजलि देकर एकल-निर्णय (अलोकतांत्रिक?) की परंपरा की नींव डाल दी थी। यह बारंबार स्पष्ट होता रहा है कि राजनीतिक गांधी परिवार के इशारों पर काम न करने वालों के साथ अत्यंत विचित्र घटनाएँ घटती रही हैं।

राव का अंतिम संस्कार देश की राजधानी में न होकर हैदराबाद में हुआ। उनका शव कांग्रेस पार्टी के मुख्यालय के बाहर बहुत देर तक भीतर ले जाने के लिए प्रतीक्षित रहा। सीताराम केसरी के साथ जो कुछ हुआ, वह एक अलग विश्लेषण की माँग करता है। वह पूरी घटना जगजाहिर है।

राजनीतिक आज़ादी प्राप्त करने के बाद कांग्रेस का रुख़ और रवैया इस क़दर बदला है कि लोकतंत्र पार्टी से रुख़सत हो गया। राजेंद्र प्रसाद के आख़िरी दिनों का हाल सुन कर हरकोई अवाक् रह जाता है। कोई आत्माविहीन ही उनके सदाकत आश्रम (पटना) में बिताए असुविधाग्रस्त जर्जर जीवन को अनदेखा कर सकता है।

भारत के प्रथम राष्ट्रपति होने के बावजूद उनके उपचार का कोई ठौर-ठिकाना नहीं था। उनका परिवार गुमनाम तथा उपेक्षित जीवन जीता रहा। भारत की ‘राजनीतिक आज़ादी’ (स्वराज) के लिए लड़ने वालों ने तथा उनके परिवारों ने कभी ‘परिवारवाद’ (?) को बढ़ावा नहीं दिया। ऐसे अनगिनत नेता और उनके परिवार गुमनामी और उपेक्षा में ‘मर गए’।

परंतु, राजनीतिक गांधी परिवार की कीर्ति और बेहिसाब संपत्ति को देख कर लोकमन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि ऐसा क्यों है कि राजनीतिक आज़ादी से राजनीतिक गांधी परिवार को ही सारा लाभ (लोभ) है? ‘राजनीतिक आज़ादी’ से ‘मिली’ शक्ति मानो एक परिवार के नाम कॉपीराइट (प्रतिलिप्यधिकार) हो चुकी है।

यह जानना-समझना होगा कि समय-समय पर राजनीतिक गांधी परिवार के आधिपत्यपूर्ण और मनमाने रवैये से रुष्ट होकर कई कद्दावर नेताओं ने पार्टी छोड़ी और उनमें से कइयों ने नई पार्टियाँ बनाईं। भारतीय जन संघ (वर्तमान भाजपा) का उदय कांग्रेस से ही हुआ (1951) और आज भाजपा सर्वाधिक जनाधार वाली पार्टी बन चुकी है। यह विचारणीय है। निश्चय ही ऐसा अकारण नहीं हुआ है।

इसी क्रम में आचार्य जे. बी. कृपलानी (1951), सी. राजगोपालाचारी (1959), के. कामराज (1963), चौधरी चरण सिंह (1967), मोरारजी देसाई (1969), बीजू पटनायक (1969), बाबू जगजीवन राम (1977), शरद पवार (1978), मुफ़्ती मोहम्मद सईद (1987 और 1999), शिवाजी गणेशन (1989), माधवराव सिंधिया (1996), ममता बैनर्जी (1997), पी. ए. संगमा (1999), वाई. एस. जनगमोहन रेड्डी (2010), हिमंता बिस्वा सरमा (2015), ज्योतिरादित्य सिंधिया (2020) और जितिन प्रसाद (2021)।

कांग्रेस पार्टी के अलोकतांत्रिक रवैये को जानने-समझने और राजनीतिक ग़ुलामी से मुखालिफ़त की दृष्टि से ये (ऐसे) नाम उल्लेखनीय हैं। वैसे, यह भी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि कांग्रेस से टूट कर बनी नई पार्टियों में भी परिवारवाद हावी है और उनके लिए भी ‘लोकतंत्र’ एक शगूफ़ा बना हुआ है।

राजनीतिक आज़ादी और लोकतंत्र पर होने वाली चर्चा-परिचर्चा में ऐसी बातों को दृष्टिगत रखते हुए ऐसे विचार भी आते हैं कि “यह राष्ट्र एक परिवार अथवा कुछ परिवारों की बपौती बन गया है।” यह बात भी बारंबार विमर्श के केंद्र में आती है कि जो-जो चेतनायुक्त थे और इस राजनीतिक आज़ादी (ग़ुलामी?) से उपजे एकाधिपत्य में सजग रुकावट बने, उनका नामोनिशान मिट (मिटाया) गया।

मसलन, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, लाल बहादुर शास्त्री। यहाँ तक कि राममनोहर लोहिया भी? बाबू जगजीवन राम की मृत्यु भी विवादास्पद रही। इधर, हाल ही में राममनोहर लोहिया की पुण्यतिथि थी और राजनीतिक चेतनायुक्त विमर्शकारों में यह बात बारंबार उभर कर आई कि लोहिया की मृत्यु राजनीतिक आज़ादी (शक्ति) में क्षय के भय से रची गयी साज़िश का ही हिस्सा मानी जानी चाहिए (?)।

ऐसे पक्ष निश्चय ही चिंतनीय हैं। क्या राष्ट्र-हितकामी नेताओं की गुमनाम मौतों को संयोग माना जाना चाहिए? राजनीतिक आज़ादी का लाभ उठाकर एक परिवार ने किस प्रकार ‘वर्चस्ववादी सत्ता’ का रूप धारण कर लिया, इसके अनेकानेक किस्से आपातकाल के दौरान बिखरे पड़े मिलते हैं। आपातकाल में राजनीतिक आधिपत्य (प्रिडॉमिनन्स) का उग्र रूप वर्णित है।

यह सत्य है कि कांग्रेस राजनीतिक आज़ादी के लिए लड़ी। निस्संदेह वह लड़ाई और उससे हासिल आज़ादी पूरे लोक (राष्ट्र) के लिए थी। अतः लोक उससे जुड़ा और इस क़दर जुड़ा कि बहुत लम्बे समय तक कांग्रेस का कोई विकल्प नहीं उभर सका और उभरा भी तो वैसा जनाधार न बना सका। धीरे-धीरे कांग्रेस और राजनीतिक गांधी परिवार ने उस आज़ादी को एकाधिकार में तब्दील कर लिया और लोक को अपना ‘गुलाम’ समझने की जुर्रत की।

स्मरणीय है कि लोक का रुझान चेतना की अपेक्षया भावना की ओर रहा है। ध्यातव्य है कि परिवार का सदस्य जब-जब प्रसंग-अप्रसंग आँसू बहा देता था तो लोक रुदन आरंभ हो जाता था। यह संयोग नहीं कि आज भी लोक (जनमानस) का एक बहुत बड़ा हिस्सा इंदिरा की छवि उस परिवार की एक नौसिखिया और सुविधापरस्त नेता में खोजता है।

राजनीतिक आज़ादी से प्राप्त शक्ति और उसके प्रदर्शन का घिनौना रूप 1984 में हुए हिंदू-सिखों के नरसंहार में स्पष्ट दिख जाता है। राजनीतिक शक्ति और अहंकार से भरपूर यह कथन स्मरणीय है, “जब बड़ा पेड़ (अर्थात् परिवारवादी नेता) गिरता है, तो धरती थोड़ी-बहुत हिलती है (अर्थात् लोक का नरसंहार जायज़ हो जाता है)।” दुर्भाग्य कि राजनीतिक आज़ादी से एक दल और एक परिवार इतना शक्तिशाली और संपन्न हुआ कि उसने लोक का सतत उपयोग, उपहास और पददलन ही किया।

नेहरू से इंदिरा में राजनीतिक हस्तांतरण को कुछ हद तक वाज़िब माना जा सकता है। वैसे, इंदिरा की राजनीतिक योग्यता पर सिवाय लोहिया के किसी ने प्रश्नचिह्न नहीं लगाया। यह भी निस्संदेह कहा जा सकता है कि लोकहित (राष्ट्र) की उपेक्षा कर राजनीति में ‘दावपेंच’ का प्रयोग करना और उसे ‘अखाड़े’ में तब्दील करने का काम (जघन्य अपराध?) इंदिरा ने ही आरंभ किया।

केरल में मार्क्सवादी ईएमएस नंबूदरीपाद की सरकार को उखाड़ फेंकने वाली बात प्रसंगावधान से स्मरणीय है। इंदिरा के आगमन के साथ ही भारतीय राजनीति में बहुत सारे दाँव-पेंच आरंभ हो गए थे। किसी पेंचकस से इन पेंचों को हटाना-मिटाना लगभग असंभव प्रतीत होता है। भारतीय जनमानस में दायित्वबोध का गहरा अभाव है और वह अपनी चिंता राजनीतिक दल को सौंप कर निश्चिंत हो जाता है।

दायित्वबोध के गहरे अभाव और ‘कोउ नृप होय हमें का हानि’ की विरक्ति ने धीरे-धीरे ‘ग़ुलामी में आनंद’ की स्थिति पैदा कर दी है। आज भी कांग्रेस की राजनीतिक ग़ुलामी में एक बहुत बड़ा वर्ग आनंदित दिखाई देता है। स्वयं को बुद्धिमान समझने वाले युवा (?) कांग्रेस को देश बचाने का एकमात्र मार्ग समझने की चूक कर रहे हैं। इसे ओढ़ी हुई ग़ुलामी का ही जीवंत रूप (उदाहरण) माना जा सकता है।

भारत ही नहीं विश्व के किसी भी देश में राजनीतिक आज़ादी का आग्रह निश्चय ही केवल शक्ति-अर्जन हेतु नहीं था। पाकिस्तान को राजनीतिक आज़ादी मिलने के बावजूद पाकिस्तानी जनमानस कभी आज़ाद नहीं हो सका। इधर अफगानिस्तान में तालिबान के वर्चस्व को भी कुछ लोग ‘आज़ादी’ मानने की भूल कर रहे हैं।

यह जानना-समझना होगा कि जिन्हें राजनीतिक आज़ादी मिली है, वे शक्तिशाली तो हैं परंतु स्व-तंत्र नहीं। उनके असंयमित आवेश में ग़ुलामी को ही बढ़ावा मिलता रहा है। कांग्रेस का लोकतांत्रिक राजनीति में विश्वास न करना और असंयमित हरक़तें करना तालिबानीकरण की प्रक्रिया का ही रूप-रूपांतरण माना जा सकता है।

राजनीतिक गांधी परिवार को लगता है कि राजनीतिक सत्ता पर केवल उन्हीं का अधिकार है। अतः सारे निर्णय परिवार करता (रहा) है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हाय-हाय (हाहाकार!) करने के अलावा ख़ास कुछ नहीं कर पा रहे हैं। राजनीतिक गांधी परिवार ने राजनीतिक आज़ादी से प्राप्त शक्ति का उपयोग देश और देशवासियों को ग़ुलाम बनाने के लिए किया (कर रहे हैं!)।

युवा भारत की नई पीढ़ी का दायित्व है कि इस ख़तरे को जानें-समझें। परिवारवाद की गिरफ़्त से देश को बचाने की नितांत आवश्यकता है। स्मरणीय है कि राजनीतिक आज़ादी से अर्जित शक्ति का पूरा उपयोग चंद परिवारों ने अपने हित में ही किया है। अतः जागृति ही संदेश है। जागरण ही उपाय है। उतिष्ठ भारत!

क्या राजनीतिक दलों की संरचना और दलों में लोकतंत्र की बहाली हेतु सरकार को विशेष पहल कर संवैधानिक संशोधन नहीं करना चाहिए? क्या ऐसा करना भारतीय लोकतंत्र की रक्षा हेतु उचित नहीं होगा कि किसी भी दल में किसी एक परिवार विशेष का कोई भी सदस्य एकाधिक बार कोई पद धारण नहीं करना चाहिए? क्या इन अनुत्तरित प्रश्नों के वांछित उत्तरों (कार्यवाही) की अपेक्षा की जानी चाहिए?