विचार
विभाजन का दोष संघ और सावरकर पर मढ़कर किसे बचाने का प्रयास जारी है

राजनीति को, विशेष रूप से मूल्यहीन राजनीति को, मनुष्य की नहीं, देवताओं एवं महाराक्षसों की आवश्यकता होती है। तथ्य इन राक्षसों का मानवीकरण करता है, अतः नेताओं को भाता नहीं है। 1947 के पूर्व कांग्रेस के लिए इस महादानव की भूमिका मुस्लिम लीग ने अदा की और विभाजन के पश्चात नए शत्रुओं का निर्माण हिंदू संगठनों के रूप में किया गया।

नेहरू की व्यक्तिवादी राजनीति के लिए यूँ भी आवश्यक था कि स्वतंत्र भारत में एक काल्पनिक शत्रु का निर्माण किया जाए जिससे युद्ध उनकी राजनीति को धर्मयुद्ध का स्वरूप देता और एक तानाशाही राजनीति को राष्ट्रहित का स्वरूप देता।

जिस प्रकार से इतिहास को मिथ्यावाद के साथ गूँथकर परोसा गया, उसके पीछे यह ध्येय भी हो सकता है कि एक रक्तरंजित इतिहास के अपराधबोध से उन्हें मुक्त किया जा सके जिनकी प्रत्यक्ष-परोक्ष सहमति एक लहू में डूबी हुई स्वतंत्रता का कारण बनी, और पाकिस्तान के द्वारा अस्वीकृत हो जाने के पश्चात वे एक मुक्त अधिकार स्वतंत्र भारत में प्राप्त कर सकें।

यदि यह कारण था तो इस बेईमान इतिहास ने उन लोगों को बल दिया जो धर्म पर आधारित विभाजन के पक्ष में थे, और उनके साथ अन्याय किया जो एक भारत के पक्ष में थे। यह तर्क भी अक्सर दिया जाता है कि कांग्रेस के नेताओं के समक्ष उस समय की हिंसा ने बहुत अधिक विकल्प छोड़े नहीं थे।

ऐसे ही प्रश्न अमरीका के स्वतंत्रता सेनानियों के समक्ष रहे होंगे गृहयुद्ध के समय, परंतु उन्होंने एक राष्ट्र के लिए लड़ने का संकल्प बनाए रखा। हमारे नेताओं ने हिंसा की आड़ में विभाजन को स्वीकार किया।

अब जब नरेंद्र मोदी सरकार ने विभाजन विभीषिका का स्मृति दिवस मनाने का प्रस्ताव किया है तो पुनः इतिहासकारों की एक जमात दल-बल समेत हिंदू संगठनों पर विभाजन का अभिशाप ठेलने का कार्यक्रम आरंभ कर चुकी है।

जहाँ नेहरू की राजनीति को एक महाराक्षस का निर्माण करने की आवश्यकता स्वतंत्र भारत के आरंभिक दिनों में थी, जब उन्हें एक अभिजात्य नेता के रूप में देखा जाता था, तो वर्तमान कांग्रेस के लिए इसकी आवश्यकता तो और अधिक हो जाती है।

ऐसा इसलिए क्योंकि एक, उसके पास रचनात्मक राष्ट्रीय नीति का अभाव है और दूसरे, उसने तुष्टिकरण की नीति के गर्त में स्वयं को वर्तमान नेतृत्व में इस प्रकार धकेल दिया है कि आज वह स्वयं लीग का प्रतिरूप बनकर भारतीय विचार पटल पर स्थापित हो गई है।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने स्वयं को कांग्रेस के द्वारा रिक्त किए गए दक्षिणपंथी दल के स्थान पर ऐसे स्थापित किया है कि बजाय इसके कि कांग्रेस उस स्थान की पुनः प्राप्ति के लिए संघर्ष करे, वह स्वयं को धीरे-धीरे लीग के खाँचे में ढालती जा रही है।

यही कांग्रेस का वर्तमान में सबसे बड़ा दुर्भाग्य है, और इसका कारण यह है कि कांग्रेस वामपंथियों को ढोने वाली म्यूनिसिपैलिटी की गाड़ी बन गई है। वयोवृद्ध वामपंथी पत्रकारों को यह एक साधन-सा जान पड़ता है जिसके द्वारा वे राष्ट्रवादी राजनीति से लड़ सकते हैं।

कांग्रेस का इतिहास, ‘ये आज़ादी झूठी है’ कहने वाले वामपंथियों को मुख्यधारा में आने का अवसर देती है, भले ही इस प्रक्रिया में कांग्रेस का सर्वनाश ही क्यों ना होता हो। इस विचारधारा का मूल विरोध ऐसी विचारधारा से है जो जनता को भारत की भूमि से जोड़ती हो।

ऐसी विचारधारा का सशक्तिकरण उस वैश्विक वामपंथ के विपरीत जाता है जो चीन के शत्रुतापूर्ण व्यवहार के बाद भी चीन के साथ बैठकर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का स्थापना दिवस मनाता है। वे भारत एवं भारतीयता के उस स्वरूप का विरोध करते हैं जिसके विषय में सिंध के संघवादी मुस्लिम अध्यक्ष अल्लाहबक्ष ने 1940 में कहा था कि भारतीय मुसलमान मक्का में हिंदू ही जाना जाता है।

भारतीय राजनीति की परिस्थितियाँ बदल गईं हैं, भले ही उद्वेलित होकर वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता इस परिवर्तन के लिए भारत के नागरिक का कॉलर खींचना चाहते हों। जिस समाज को, जिस भारतीयता की भावना से भरे समाज को, मूक होकर सर झुकाकर बैठने को एक असत्य के अपराधबोध के साथ बांधकर बैठने को बाध्य किया गया था, वह मुखर होता जाता है और वामपंथी विचारक उसे संघ एवं सावरकर के मध्य अपने पाप खोजने और मानने को मजबूर करने का प्रयास करते रहते हैं।

बहुत ज्ञानी सावरकर को विभाजन का दोषी बनाने का प्रयास कर रहे हैं। उनका कहना है कि सावरकर से पूर्व भारतीय समाज में धर्म के आधार पर विभाजन का विचार नहीं था। पहले इसका दोषी ब्रिटिश नीति को बनाया गया था, कांग्रेस से मित्रता हो जाने पर मुस्लिम लीग को इसका उत्तरदायी माना गया, और स्वतंत्रता के पश्चात जब लीग का भूत भारत के सर से हट गया तो यह ठीकरा सावरकर और संघ के सर पर फूटा।

प्रारंभिक इतिहासकारों एवं लेखकों ने इस विषय पर संवरण रखा परंतु समय के साथ राष्ट्रवादी नीतिशून्यता के कारण जैसे कांग्रेस वर्तमान नेतृत्व में विक्षिप्तता की ओर बढ़ी, वयोवृद्ध वामपंथी विचारकों ने कांग्रेस के तंत्र के माध्यम से तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के नाम पर सब सीमाएँ पार कर दीं।

जिस धार्मिक दुराव का दोष सावरकर पर मढ़ा जाता है, वही सावरकर 1857 पर आधारित अपनी पुस्तक में हिंदू-मुस्लिम ऐक्य पर लिखते हैं कि जब मुसलमान उस आक्रमणकारी सोच का प्रतीक था, तब शिवाजी उससे लड़ते थे क्योंकि शासन व्यवस्था में बहुसंख्यक हिंदुओं का स्थान नहीं था, तब मुस्लिम-विरोधी विचारों का तर्क भी था, परंतु आज जब अंग्रेज़ों के दमन के हिंदू और मुसलमान समान रूप से प्रताड़ित हैं, इस धर्म पर आधारित विरोध का कोई औचित्य नहीं है।

सावरकर की यह पुस्तक 1909 में छपी थी। यह पुस्तक ब्रिटिश सरकार के द्वारा प्रतिबंधित हुई, फ़्रान्स में मैडम भीकाजी कामा के द्वारा प्रकाशित हुई, भारत में यह पुस्तक भगत सिंह द्वारा क्रांतिकारियों की प्रेरणा के लिए प्रकाशित की गई। 1910 में सावरकर को 50 वर्ष के लिए बंधक बनाकर अंडमान भेज दिया गया। 1924 में सावरकर को ब्रिटिश सरकार ने मुक्त किया, परंतु उनकी गतिविधि को रत्नागिरी में सीमित रखा गया।

14 मार्च 1887 को, 1857 की क्रांति के 30 वर्ष बाद (1857 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के संस्थापक सर सैय्यद अहमद को अंग्रेज़ों की सहायता के लिए ब्रिटिश सरकार के द्वारा सम्मानित किया गया था।) सर सैय्यद ने मेरठ में भाषण दिया जिसमें उन्होंने नेशनल कांग्रेस को एक आसुरिक संस्था बताया और कहा कि कांग्रेस के साथ जुड़कर हिंदू शक्तिशाली होंगे और मुसलमानों का दमन करेंगे।

उन्होंने 20वीं सदी के आने से पहले हिंदुओं और मुसलमानों को दो राष्ट्र बताया था और यहाँ तक कि इस की चेतावनी तक दे दी थी कि संघर्ष की स्थिति में पश्चिम से पठान योद्धा मुसलमानों के पक्ष में उतरकर भारत भूमि में रक्त की नदियाँ बहा देंगे।

राजनीतिक विवशताओं में सर सैय्यद को राष्ट्रवादी बनाया गया है परंतु उनके भाषणों में जो विष है, उसके सामने जिन्ना तो भोले-भाले ही दिखते हैं। हिंदू-मुस्लिम द्विदेशीय सिद्धांत के प्रतिपादक इस भाषण के समय सावरकर चार वर्ष के थे।

यदि इतिहास में इसपर चर्चा हो तो आधुनिक भारतीय सजग हो सकें, परंतु सावरकर को, और जिस हिंदू विचारधारा का वह प्रतिनिधित्व करते थे, उसे धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध राक्षस बनाने से कांग्रेस को, और उनके पीछे छुपे वामपंथियों को लगता है कि उनका राजनीतिक लाभ होगा।

अलीगढ़ की इसी विचारधारा का पोषण गांधी ने खिलाफत आंदोलन में किया जब भारतीय मुसलमानों को उन्होंने भारत से काटकर तुर्कों और अरबों से जोड़ने का प्रयास किया। अश्फ़ाकउल्लाह खान ने इस पैन-इस्लाम के खतरे पर बड़ी मासूमियत और ईमानदारी से लिखा है।

परंतु दक्षिण अफ़्रीका से आए गांधी को संभवतः तिलक, बदरूद्दीन तैय्यबजी जैसे नायकों के मध्य स्थान बनाने के लिए अपने एक समर्थक दल बनाना था और खिलाफत इसका माध्यम बना। महात्मा गांधी के विभाजन के विरोध पर बहुत कुछ कहा गया है, परंतु इतिहास देखकर यह प्रश्न भी उठता है कि क्या वे वास्तव में विभाजन के विरोध में थे? अक्तूबर 1940 में गांधी लिखते हैं-

‘मुझे भारतीय मुसलमानों को भारत में रखने का कोई अहिंसक साधन नहीं दिखता है। अभी हम एक संयुक्त परिवार हैं। कोई भी सदस्य परिवार से अलग होने का दावा प्रस्तुत कर सकता है। अन्य भारतीयों की भाँति मुसलमानों का भी स्वतः निर्धारण का अधिकार है।’

यहाँ गांधी के शब्दों में ‘अन्य भारतीय’ एवं मुसलमानों में क्या गांधी दो भिन्न राष्ट्रों की बात नहीं करते हैं? 1906 में आगा खान ब्रिटिश वाइसराय से मिलते हैं और मुसलमानों के लिए अलग मताधिकार की माँग करते हैं। इसका परिणाम मिंटो-मोर्ले के 1909 के निर्णय में परिलक्षित होता है जिसमें धर्म के आधार पर चुनाव क्षेत्रों के विभाजन को ब्रिटिश स्वीकार करते हैं और विभाजन की नींव पड़ती है।

एक ब्रिटिश प्रशासनिक अधिकारी श्रीमती मिंटो को लिखते हैं कि एक इस संशोधन के द्वारा 6.25 करोड़ जनसंख्या को साम्राज्य विरोधी आंदोलन में जुड़ने से रोक लिया गया। इसी वर्ष मुस्लिम कॉन्फ्रेन्स की स्थापना होती है और यही आगे मुस्लिम लीग बन जाता है।

इसका परिणाम हमें माउंटबैटन के डोमनिक लपियेर को दिया साक्षात्कार में दिखता है जब वे कहते हैं, ‘मैं वैसे तो निष्पक्ष हूँ परंतु मुझे मुसलमान अधिक पसंद हैं क्योंकि उन्होंने अंग्रेज़ों के विरुद्ध किसी षड्यंत्र में भाग नहीं लिया। वे ब्रिटिश राज के बने रहने के पक्ष में थे।’

1928 की नेहरू रिपोर्ट से मिंटो-मोर्ले संशोधन के प्रभावहीन हो जाने की संभावना से विभाजन के विचारों को बल मिलता है। इस समय सावरकर राजनीतिक अज्ञातवास में थे, संघ का मात्र दो वर्ष का संगठन था।

1933 में जब कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में चौधरी रहमत अली पाकिस्तान की परिकल्पना का प्रारूप बनाते हैं और जिन्ना का पाकिस्तान आंदोलन से जुड़ने के लिए आवाहन करते हैं तब संघ मात्र आठ वर्ष का था और सीमित प्रभाव रखता था। सावरकर नज़रबंद थे, और हिंदू महासभा के राष्ट्रीय नेता जैसे महामना मदन मोहन मालवीय और लाला लाजपत राय राष्ट्रनिर्माण की नींव में स्वयं को समर्पित कर चुके थे।

आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बड़ी शक्ति है, अतः उसका विरोध करने के लिए पाखंड खड़ा भले ही किया जा रहा हो, परंतु सत्य यह है कि जब सावरकर और संघ ने विभाजक विचार और धर्म-राजनीति के मिश्रण के दुष्परिणाम देखे, उस समय तक विभाजन की विभीषिका भारत के माथे पर लिखी जा चुकी थी।

हम मिथ्या दानवों का निर्माण करके उनसे लड़ते रहेंगे तो ऐसे शक्तियों को पुनः बल मिलेगा। आज उत्तर प्रदेश में जब असदुद्दीन ओवैसी धर्म के आधार पर सत्ता में हिस्सा माँगते हैं तो उस माँग में अल्लाबक्ष नहीं, सर सैय्यद और जिन्ना के स्वर सुनाई देते हैं।

वामपंथी विचारकों का शोर हमें उन स्वरों के प्रति बधिर हो जाने को प्रेरित करके काठ के शत्रुओं से लड़ने को कहता है, ताकि सर सैय्यद और जिन्ना निर्बाध पनपते रहें और हम सावरकर, मालवीय, अश्फ़ाक और अल्लाहबक्ष से लड़ते रहें। इसके प्रति सजग होना आवश्यक है। इतिहास बताता है कि सावरकर, संघ और हिंदुओं का समर्थन विभाजन को रहा नहीं, और यदि कुछ त्रुटि रेखाएँ बनी भी तो प्रतिक्रिया के रूप में।

हिंदुओं को दोषी ठहराना वामपंथियों के लिए उपयोगी भले ही हो परंतु यह ऐसा ही है जैसे 9/11 के लिए अमरीकीयों की अल-क़ायदा को विश्वास में लेने में विफलता का परिणाम या अफगनिस्तान की वर्तमान स्थिति के लिए चुनी हुई सरकार के द्वारा तालिबान के मन से असुरक्षा की भावना को हटाने में विफलता को माना जाए।

विभाजन की विभीषिका का स्मृति दिवस हमें उसी प्रकार इतिहास के प्रति सजग करेगा जैसे प्रतिवर्ष 27 जनवरी को मनाया जाने वाला होलोकौस्ट दिवस हमें भविष्य के धर्मांध नाज़ियों के प्रति जागरूक रखने का कार्य करता है। ना तो वह किसी धर्म के विरोध में है, ना ही यह। इतिहास के प्रति जागरूक समाज भविष्य की सुरक्षा के लिए आवश्यक है। यह दिन उन घावों को खोलता है जिनमें पट्टियों के अंधेरों ने मवाद भर दी है, ताकि भारत पुनः स्वस्थ हो सके।

साकेत लेखक व ब्लॉगर हैं जो @saket71 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।