संस्कृति
पाणिनीय व्याकरण का मुखदर्शन और आज के समय में प्रासंगिकता (भाग- 2)

“अनन्तपारं किल शब्दशास्त्रं स्वल्पं तथायुर्बहवश्च विघ्नाः।
यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसैर्यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात् ॥”
– पञ्चतन्त्रम्, प्रथमः तन्त्रः “मित्रभेदो” नाम

उपर्युक्त श्लोक का तात्पर्य है कि केवल व्याकरणशास्त्र का ही विचार करें, तो उसका भी कोई अंत ही नहीं है। मानव की संपूर्ण आयु भी इसके अध्ययन के लिए अल्प है। जो सारभूत है, उसी का अध्ययन करना चाहिए, जैसे नीर-क्षीर विवेक से हंस इन दोनों के मिश्रण से केवल क्षीर को ही अलग करके पीता है।

संस्कृत व्याकरण की परिदृश्य इतना विशाल है, कि एक स्फुटलेख में मुझ जैसे सामान्य व्यक्ति के द्वारा इसका संपूर्ण उद्बोधन करना दुःसाहस ही प्रतीत होता है। परंतु इस विषय का महत्व जन-जन तक पहूंचाने की मनीषा से, और इस शास्त्र की महत्ता और पाणिनीय अष्टाध्यायी की सुंदरता के दर्शन के लिए यह आवश्यक जान पड़ता है। अतः इस साहस के लिए क्षमाप्रार्थना करते हुए आगे बढ़ता हूँ।

परंपरा से व्याकरण का इतना महत्त्व है, कि कहा जाता है “वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम्” अर्थात् वेदों का मुख-स्वरूप व्याकरणशास्त्र है। अतः अष्टाध्यायी के सूत्रों के अध्ययन के बिना संस्कृत साहित्य का गंभीर अध्ययन असंभव है। महर्षि पाणिनि द्वारा विरचित अष्टाध्यायी की नींव 14 माहेश्वर सूत्र हैं, जिसके उद्गम का वर्णन हम इसके पूर्व देख चुके हैं। अतः इनके परीक्षण के पश्चात् ही व्याकरणशास्त्र का चिंतन हो सकता है।

परन्तु “सूत्र” क्या होता है? इसकी व्याख्या कुछ ऐसे की जाती है–

“अल्पाक्षरमसन्दिग्धं सारवद्विश्वतोमुखम्।
अस्तोभमनवद्यञ्च सूत्रं सूत्रविदो विदुः॥”

यानी, अल्प अक्षरों वाला, असंदिग्ध, सारपूर्ण, सर्वतोमुख (वैश्विक रूप से उपयुज्य), अस्तोभ (यानी अखंडित रूप से उच्चारणसुलभ) और अवद्य (दोषमुक्त) जो है, उसे ही “सूत्र” माना जाता है। आधुनिक विचारधारा में इस व्याख्या को हम एक अचूक, मर्मग्राही, गणितीय परिभाषा (फार्मूला) मान सकते है। इस परिभाषा की दृष्टि में, भगवान् शिव के आशीर्वाद-स्वरूप प्राप्त हुए माहेश्वर-सूत्रों का हम दर्शन करेंगे।

अथ माहेश्वरसूत्राणि।
अइउण् । ऋऌक् ।  एओङ्  । ऐऔच् । हयवरट् । लॅंण् । ञमङणनम् । झभञ् । घढधष् । जबगडदश् । खफछठथचटतव् । कपय् । शषसर् । हल् ।।
इति ।।

इन रहस्यमयी-से प्रतीत होने वाले सूत्रों का अर्थ क्या है? इसके विमर्श पर ही सम्पूर्ण पाणिनीय रचना बसी है। यह माहेश्वर सूत्र हमारी सामान्य वर्णमाला (अ, आ, इ…) का ही एक अलग अनुक्रम है। परंतु इसमें केवल मूल स्वर सम्मिलित हैं (अ, इ, उ…),  इनके दीर्घ (आ,ई, ऊ …) या प्लुत (आ३, ई३, ऊ३ …) रूप इसमें सम्मिलित नहीं हैं।

यह अनुक्रम इतना सुविहित है, कि इससे कईं व्याकरणिक कल्पनाओं की व्याख्या अत्यन्त सरल हो जाती है । इन सभी सूत्रों के अंत में उपस्थित “ण्, क्, ङ्” इत्यादि को “इत्” की संज्ञा दी जाती है। इस रचना का प्रचंड लाभ दर्शाने के लिए हम अष्टाध्यायी के प्रथम सूत्र का परिशीलन करेंगे–

वृद्धिरादैच् । १ । १ । १ ।।

प्रथम आँकड़ा अध्याय के लिए है, दूसरा आँकड़ा “पाद” (यानी अध्याय के भाग का) और अंतिम आँकड़ा सूत्र के क्रमांक का है। अब इस सूत्र का पदच्छेद कुछ इस प्रकार है– वृद्धिः, आत्, ऐच्। इसका शब्दशः अर्थ है, “दीर्घ आ और ऐच् को ‘वृद्धि’ की संज्ञा प्रदान की जाए”। अब प्रश्न यह उठता है, कि इसका माहेश्वर सूत्रों से क्या सम्बन्ध?

उत्तर यह है, कि माहेश्वर सूत्रों का वर्णानुक्रम इस प्रकार नियोजित है, कि कईं वर्णों पर लागू होनेवाले नियमों की संक्षेप में व्याख्या हो सके । जैसे, उपर्युक्त सूत्र में “ऐच्” का अर्थ है “ऐ, औ” यह दो वर्ण। यह “ऐऔच्” सूत्र का ही एक संक्षिप्त स्वरूप है, जिसे “प्रत्याहार” की संज्ञा प्राप्त है। अतः इस प्रथम सूत्र की संपूर्ण व्याख्या है, “आ, ऐ और औ को ‘वृद्धि’ की सञ्ज्ञासंज्ञा प्रदान की जाए”। विविध प्रत्याहारों की रचना का वर्णन अष्टाध्यायी में वर्णित है, जो नाना प्रकार के नियमों की आवश्यकताएँ पूरी करते हैं।

उदाहरणार्थ, सवर्ण-दीर्घ संधि से संबंधित सूत्र है-

अकः सवर्णे दीर्घः । ६ । १ । ७७ ।।

इस सूत्र से दीर्घ-संधि के नियम को निरूपित किया गया है– जैसे “देव + अंश = देवांश” या “हरि +  इन्द्र = हरीन्द्र” इत्यादि।  उपर्युक्त “अक्” प्रत्याहार पर संधि -प्रक्रिया का निर्देश है। प्रथम दो शिवसूत्रों (अइउण्। ऋऌक्।) से “ण्” इस बीचवाले इत्संज्ञक को हटाकर (इत्ससंज्ञकों को हटाने की भी निर्दिष्ट विधि होती है) अ, इ, उ, ऋ, ऌ, क् प्राप्त हुए।

अ, इ, उ, ऋ, ऌ– यह चार वर्ण एवं “क्” यह इत्संज्ञक मिलकर संक्षिप्त रूप में “अक्” प्रत्याहार कहलाते हैं। पाणिनीय अष्टाध्यायी में 41 ऐसे प्रत्याहारों (अक्, अच्, इक्, अण् …) का वर्णन है, जिनसे व्याकरण के नियमों का बोध अध्येताओं के लिए अत्यन्त सरल हो जाता है। वर्णों की लम्बी माला की पुनरावृत्ति की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। केवल प्रत्याहार के आधार पर ही सबका सटीक बोध संभव हो जाता है। यदि प्रत्याहार न होते, तो अष्टाध्यायी की सूत्र-रचना पूरी तरह बिखर जाती।

उपर्युक्त सूत्र संधि के नियमों से संबंधित है, वैसे ही समास, शब्दरूप, धातुरूप, कर्तरि-कर्मणि प्रयोग, कृदंत-तद्धितान्त प्रत्यय आदि व्याकरण के सभी पहलुओं पर इस ग्रंथ में स्पष्ट विवेचन है। परंतु अष्टाध्यायी केवल नियमावलि-भर नहीं है। विविध प्रकार के सूत्र इसमें में पाए जाते हैं–

सञ्ज्ञा च परिभाषा च विधि: नियम एव च।
अतिदेशो अधिकारश्च षड्विधम् सूत्र-लक्षणम्॥

अर्थात्, अष्टाध्यायी में संज्ञा, परिभाषा, विधि, नियम, अतिदेश व अधिकार यह छह प्रकार के सूत्र पाए जाते हैं। इन सूत्रों की की सुंदरता यह है कि व्याकरण के नियम-परक सूत्र, विविध प्रकार की संज्ञाएँ विदित करने वाले सूत्र, यहाँ तक कि सूत्रों के अन्वयार्थ-निरूपण के नियम बतानेवाले सूत्र भी सभी इसी सूत्रावली में समाहित हैं। सूत्रान्वय के लिए अष्टाध्यायी से अन्यत्र कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं है।

सबसे उत्तम बात यह है, कि इन सूत्रों के निर्देशों का उल्लंघन पाणिनि के उत्तरकालीन संस्कृत साहित्य में अलभ्यप्राय है। इस अपवादहीनता के कारण, अंग्रेज़ी या इतर भाषाओं की तुलना में संस्कृत और तत्पर्याय भारतीय भाषाओं का व्याकरण अधिक सरस प्रतीत होता है।

पाणिनीय व्याकरण का आधुनिक महत्त्व: आधुनिक भाषा-शास्त्र, सूचना शास्त्र एवं तर्कविज्ञान के ‘अष्टाध्यायी’ स्थित मूल

आधुनिक काल में ल्योनार्ड ब्लूमफिल्ड, फ्रिट्स स्टाल तथा नोएम चॉम्स्की जैसे अनेक दिग्गज भाषाशास्त्रीयों के अभ्यासविषय में पाणिनि के अष्टाध्यायी का प्रभाव साफ तौर से दिखाई देता है। ब्लूमफिल्ड ने कहा है “अन्य कोई भी भाषा संस्कृत के जितनी अच्छी तरह से वर्णित नहीं की गई है इसका कारण पाणिनीय व्याकरण है।“

यहाँ तक कि ब्लूमफ़ील्ड ने अष्टाध्यायी से जन्मी पारंपरिक हिंदू व्याकरणकर्ताओं की संज्ञावली का सीधा उपयोग करते हुए ‘संधि’, ‘संप्रदाय’, ‘कर्माधारय’, ‘द्वन्द्व’, ‘तत्पुरुष’, ‘आम्रेडित’, ‘बहुव्रीहि’, ‘द्विगु’, और ‘अव्ययीभाव’, इन शब्दों को भाषाविज्ञान में तकनीकी ‘संज्ञाओं’ के रूप में अंगीकृत किया है। यद्यपि चॉम्स्की स्वयं ‘पाश्चात्य’ अध्ययन शैली के अग्रणी हैं, तदापि उनके अनेक लेखों में नागार्जुन,भर्तृहरि आदि भारतीय व्याकरणविदों का अध्ययन सम्मिलित होता ही है। अंततः इन सब व्याकरणविदों के भीष्म पितामह पाणिनि ही थे।

अष्टाध्यायी में तर्कना (लॉजिकल इन्फरेन्स), ’प्रक्रिया’ (अल्गोरिद्म) और ‘दत्तांश’ (डाटा)

पिछले भाग में हमने पाणिनि के ‘गणपाठ’ का संज्ञान लिया, जहाँ उन्होंने तत्कालीन संस्कृत भाषा में उपलब्ध शब्द तथा संज्ञाओं के एक आदर्श कोष का निर्माण किया। यह प्रयास किसी ‘दत्तांश-मंजूषा’ (डाटाबेस) की रचना से कम नहीं। अब इस दत्तांश-मंजूषा से एक विशिष्ट शब्द पर कुछ क्रिया करनी हो, तो कार्य करनेवाली नियमावली अष्टाध्यायी में उपस्थित है।

क्रियमाण कार्यानुसार अष्टाध्यायी के प्रथम सूत्र “वृद्धिरादैच् १।१।१॥” से अंतिम सूत्र “अ अ ८।४।६८॥” तक क्रमशः नियमों के चयन (रूल सेलेक्शन) और कार्यन्वयन (ऐप्लिकेशन) की प्रक्रिया (अल्गोरिद्म) का अध्ययन ही व्याकरण का मूल प्रयोजन है।

इस तर्कशास्त्र के पितामह तो भगवान् पाणिनि ही हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने नियमों की योग्य, असंदिग्ध व्याख्या (रूल सिन्टैक्स) करने पर भी बल दिया। दत्तांश-मंजूषा का आदर्श सूचीबद्ध संकेतीकरण (इन्फॉरमेशन एनकोडिंग) भी करके दिखाया।

आज की भाषा में इन सब शब्दों की तकनिकी संज्ञाएँ संगणक विज्ञान में पढ़ाई जाती हैं। आज जिसे प्राकृतिक भाषा कार्यकलाप (नैचुरल लैंग्वेज प्रोग्रामिंग) कहा जाता है, उसके आधारभूत सूत्र अष्टाध्यायी में सदीयों से मौजूद हैं और उन सूत्रों का उपयोग आज भी स्वचालित भाषांतरण जैसे विषयों में सर्वाधिक सरलता से किया जा सकता है।

वर्तमान, आधुनिक संगणकीकृत काल में भी पाणिनीय व्याकरण परंपरा का महत्त्व अक्षुण्ण है, यह वाचकों के समक्ष प्रस्तुत करने का अतिसंक्षिप्त प्रयास हमने किया। अनेक तकनीकी विद्वान और संस्कृत भाषाविद इन विषयों पर आज भी निरंतर अध्ययन कर रहे हैं। अभी भी अनेक शोधपत्रिकाओं में आचार्य पाणिनि के विचारलेखन और आधुनिक तकनीकी के बीच का समन्वय प्रशस्त करनेवाले शोधनिबंध प्रस्तुत किये जाते है।

ऊपर दिए गए विवरण से अधिक जानकारी और संबंधित प्रमाणों के लिए उस महद्ग्रन्थ का और संबंधित शोधकार्य का अधिक विस्तार से अध्ययन करने की वाचकों से नम्र प्रार्थना है। यह कहा जा सकता है, अष्टाध्यायी का समग्र अध्ययन आधुनिक विज्ञान की किसी भी उच्च ‘डिग्री’ के अध्ययन से कम नहीं है।

इस बात को विशेष रूप से बतलाना चाहिए कि वैदिक संस्कृत भाषा के लिए भी आचार्य पाणिनि ने अपने ग्रंथ में कईं सूत्रों का निर्माण किया। वैदिक ऋचाओं की अतिप्राचीन भाषा-शैली में परिवर्तन लाया नहीं जा सकता, क्योंकि वह अनादिकाल में द्रष्टा ऋषियों द्वारा उद्धृत की गईं हैं। अतः उनके सही अर्थबोध हेतु साधकों के लिए अष्टाध्यायी में कुछ संकेत दिए हैं। एक उदाहरण के रूप में, इंद्र-मरुत् आदि देवों को संबोधित करने के लिए उपयोगी विशेष सूत्र है–

मतुँवसो रुँः सम्बुद्धौ छन्दसि । ८ । ३ । १ ।।

इस लेख में अत्यधिक विवरण न देते हुए केवल इतना ही लक्षित किया जाता है, कि जो-जो सूत्र वेदों की भाषा से निगडित हैं, प्रायः उनमें “छन्दसि” विशेषण प्राप्त होता है। इस प्रकार आचार्य पाणिनि ने वेदों के सही बोध को यथारूप बनाए रखने में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पाणिनीय अष्टाध्यायी पर भाष्य-परंपरा

व्याकरण के महाग्रंथ अष्टाध्यायी के मात्र कुछ ही उपरोक्त सूत्रों का परीक्षण पढ़कर से आप सहमत हो सकेंगे कि आचार्य पाणिनि की यह महारचना व्याकरण के नौसीखिए विद्यार्थिओं के लिए इतनी आसान प्रतीत नहीं होती। यहाँ तक कि, आचार्य पाणिनि के समकालीनों एवं शिष्यों को भी इसका आकलन करने के लिए कुछ सहायता की आवश्यकता जान पड़ी।

पाणिनि के समकालीन आचार्य वररुचि कात्यायन पाणिनि के सबसे प्रखर भाष्यकार और आलोचक हुए। वे भी आचार्य पाणिनि की ही तरह विशालमति विद्वान् थे। उन्होंने पाणिनीय अष्टाध्यायी को सुगम बनाने के लिए “वार्त्तिकापाठ” का निर्माण किया, जहाँ अष्टाध्यायी के एकएक सूत्र का चिकित्सक परीक्षण है।

जगह-जगह पर उन्होंने अष्टाध्यायी सूत्रों के अधिक स्पष्टीकरण के लिए सूत्रपद्धति में ही कई “वार्तिकासूत्रों” का निर्माण किया, जिन्हें भी आज व्याकरण का अभिन्न अंग माना गया है। इनके पश्चात् आचार्य पतंजलि ने इसी ग्रंथ पर “महाभाष्य” की रचना की, जहाँ नित्य बोली में प्रयोग की जानेवाली भाषा से संबंधित सूत्रों पर अधिक विमर्श को ध्यान में रखते हुए विस्तार से चर्चा की गई है।

मध्ययुग में “जयादित्य” नामक पंडित ने इसी के आधार पर “काशिका” नामक वृत्ति (भाष्य) की रचना की। तत्पश्चात् काश्मीर के विद्वान् मम्मट ने अपना भाष्य लिखा और वाराणसी के विद्वान् भट्टोजी दीक्षित और उनके शिष्य वरदराज ने “सिद्धान्तकौमुदी” और “लघुसिद्धान्तकौमुदी” नामक भाष्यों की रचना की।

इसी लघुसिद्धान्तकौमुदी का सबसे सुलभ और विस्तृत विवरण सहित हिंदी अनुवाद पंडित भीमसेन शास्त्री जी द्वारा रचित ६ खण्डों में उपलब्ध है, जो व्याकरण के हिन्दी-भाषी अनुरागियों को “भैमी व्याख्या” (भैमी प्रकाशन, दिल्ली) के रूप में परिचित है। संस्कृत व्याकरण के इच्छुक अध्येताओं को इन ही भाष्यग्रंथों के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए।

संस्कृत व्याकरण के इस अत्यल्प दर्शन के पश्चात् हम पाणिनि कालीन भारत के दर्शन की ओर प्रस्थान करेंगे। आचार्य पाणिनि द्वारा विरचित ग्रन्थावली के आधार पर तत्कालीन भारत के दर्शन सनातन परंपरा के अनुसार चार भागों में बाँटते हुए, सर्वप्रथम हम आगामी दो भागों में प्राचीन भारत में धर्म के स्वरूप के परीक्षण से शुरुआत करेंगे।

निखिल नाईक विद्युत अभियांत्रिकी के शोध छात्र हैं। वे भू-राजनीति एवं भारत की प्रगति गाथा में रुचि रखते हैं।

संबंत कड़ियाँ और संसाधन

  1. https://ijllnet.com/journals/Vol_2_No_5_November_2015/4.pdf
  2. https://www.ece.lsu.edu/kak/bhate.pdf 
  3. https://web.stanford.edu/~kiparsky/Papers/panini-1.pdf
  4. https://www.ashtadhyayi.com
  5. https://www.youtube.com/watch?v=bVXAQxzbgTw&ab_channel=PushpaDikshit (यूट्यूब पर संस्कृत व्याकरण पर डा. पुष्पा दीक्षित जी की व्याख्यानमाला)
  6. “Laghu Siddhant Kaumudi – Bhaimi Vyakhya” by Shri. Bhimsen Shastri, available at: https://www.bhaimiprakashan.com/ 
  7. https://youtube.com/playlist?list=PL_a1TI5CC9REWduj0zmtYdPUBQNDHq-Fq (playlist on Vedic grammar by Dr. Pushpa Dixit, by ‘Vidya Mitra’, MHRD, Govt. of India)