संस्कृति
भगवान् पाणिनि ने शास्त्रार्थ करके कैसे अष्टाध्यायी को दिलाई प्रमाणित शास्त्र की उपाधि

“यह पुण्य भूमि प्रसिद्ध है, इसके निवासी आर्य हैं
विद्या कला कौशल्य सबके, जो प्रथम आचार्य हैं
संतान उनकी आज यद्यपि, हम अधोगति में पड़े
पर चिह्न उनकी उच्चता के, आज भी कुछ हैं खड़े ”
– मैथिलीशरण गुप्त, “आर्य”

महान् स्वतंत्रता सेनानी व आध्यात्मिक गुरु श्री अरविंद कहते हैं, “आर्य वही है, जो मन की उपाधियाॅं और विद्वेष को पीछे छोड़ उदार अंतःकरण से सत्य और विमुक्ति की ऊॅंचाईयाॅं प्राप्त करने के लिए कृतसंकल्पित हो”। महान् गुरु-शिष्य परंपरा से भरी-पूरी हमारी भारत भूमि पर कई ऋषि-मुनि-आचार्यों ने जीवन में इसी सिद्धांत को चरितार्थ किया।

श्रेष्ठतम विचारों एवं मूल्यों से सनातन भारतीय संस्कृति का परिमल दुनिया में चारों ओर फैलाने वाले वंदनीयों में प्रातःस्मरणीय महावीर, बुद्ध, शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, ज्ञानेश्वर, तुलसी समेत अनेकानेक संत-गुरुजनों ने जो उदात्त मूल्य प्राणिमात्र के कल्याण के लिए उजागर किए, उनसे मानवमात्र के जीवन की दशा व दिशा सत्य-करुणा के राजमार्ग पर चल पड़ी।

इस परंपरा का भव्य-दिव्य विवेचन केवल असंदिग्ध व अर्थपूर्ण भाषा से ही संभव हो सका। सर्वज्ञात है, कि भारतीय दृष्टि की विराट् ज्ञानगंगा की गंगोत्री संस्कृत भाषा है। परंतु हमारे वर्तमान भारत के स्मृतिपटल पर इस संस्कृत-सरिता के भगीरथ का स्मरण धुंधला-सा ही रह गया है। वे भाषा-भगीरथ थे- ‘आचार्य पाणिनि’।

पाणिनि की भाषाशास्त्र पर छाप इतनी व्यापक है, कि उनका नाम लिये बिना भारत ही नहीं, अपितु विश्व की किसी भी भाषा के शास्त्र का अध्ययन प्रारंभ ही नहीं हो सकता। उनके द्वारा प्रणीत साहित्य से केवल भाषा-विज्ञान ही नहीं, बल्कि  मानव जीवन के चारों पुरुषार्थों के सम्यक् विवेचन में सहायक है। हमारी यह लेखमाला इन्हीं के महात्म्य-वर्णन में एक छोटा-सा प्रयास है, ताकि उनके पगचिह्नों का दर्शन हमें प्राप्त हो । भारतीय संस्कृति के एक अनूठे आचार्य की स्मृति प्रकाशित करने में यह हमारा एक प्रयत्न है।

पाणिनि: संस्कृत व्याकरण-परंपरा के महान् संशोधक

भारतीय प्राचीन संस्कृत के विषय में प्रचलित मान्यता के अनुसार, भाषा के सटीक ज्ञान के लिए ब्रह्मदेव ने सर्वप्रथम “व्याकरण” शास्त्र की दीक्षा देवगुरु बृहस्पति को दी। बृहस्पति ने यही व्याकरण इंद्रदेव को सिखाया, व इंद्र ने मानव-मात्र की शिक्षा के लिए सबसे पहले “ऐंद्र” नामक व्याकरणशास्त्र की रचना की।

युगों-युगों से ऐंद्र व्याकरण का पठन-पाठन गुरु परंपरा के अनुसार होता रहा। परंतु समय के बीतते-बीतते मनुष्य की बुद्धि संकुचित होने लगी। विशाल ऐंद्र व्याकरण मर्त्य मनुष्यों की क्षमता से बाहर जाने लगा, और लोग धीरे-धीरे भाषा का सही उपयोग भूलने लगे। आचार्यों ने यथाशक्ति भाषा की शुद्धता को बनाए रखने का प्रयत्न किया।

देश-काल के न्यायानुसार ऐंद्र व्याकरण के मार्ग पर आधारित विविध ग्रंथों की रचना हुई, परंतु शब्दों के सही अर्थ और व्याकरण के उचित नियमों की परिभाषा पर उनके बीच मतांतर बढ़ता चला गया। गार्ग्य, शकटायन, स्फोटायन आदि 28 पूर्वाचार्यों की पृथक्-पृथक् परंपराऍं व्याकरण के पंडितों में व जनसामान्य में दिशाभ्रम का कारण बनने लगीं।

वैदिक भाषा में ऋषियों द्वारा व्यक्त की गई उन्नत कल्पनाओं का अर्थ केवल भाषिक द्वंद्व की वजह से विकृत और लुप्त होने का संकट मंडराने लगा। अपनी ही भाषा से अबोध होने के कारण सांस्कृतिक विखंडन की स्थिति किसी भी सभ्यता के लिए घातक सिद्ध होती है, इस बात का अनुभव करने के लिए हमें पाणिनि के समय में जाने की आवश्यकता ही नहीं है। हमारा वर्तमान समय भी इस बात का भली-भांति परिचय कराता है।

ऐसे बढ़ते कोलाहल के बीच ही ईसा पूर्व 450 के कालखंड में, पणि गोत्र में “दाक्षी” नामक स्त्री को दाक्षीपुत्र पाणिनि नामक संतान प्राप्त हुई । वर्तमान पाकिस्तान के खैबर प्रांत में स्थित “लहूर” गाँव इस महामनीषी का जन्मस्थान उस समय “शालातुर” नाम से प्रख्यात था। तत्कालीन भारतवर्ष में पाटलिपुत्र (आज का पटना) उन महानगरों में एक था, जहॉं अनेक महानतम विद्वान् अपने गुरुकुलों में नई पीढ़ी को शिक्षा प्रदान करते। स्वाभाविक रूप से पाणिनि भी पाटलिपुत्र जाकर ‘वर्ष’ नामक आचार्य के शिष्य बने।

पाणिनि के जीवनकाल का कोई अधिकृत समकालीन इतिहास उपलब्ध नही है। परंतु गुणाढ्य नामक (पैशाची) प्राकृत के साहित्यकार की रचना “बृहत्कथा” को मूलस्रोत मानते हुए संस्कृत साहित्य के अनेकानेक महान् ग्रंथों से अनुप्राप्त कथाओं का सारांश यह है कि जन्मतः पाणिनि मंदबुद्धि थे।

आचार्य वर्ष के गुरुकुल में उन्हें ज्ञानार्जन कठिन ही लगता। इसके कारण उन्हें अन्य आश्रमवासी विद्यार्थियोंसे अपमान झेलना पड़ता था। बात यहॉं तक गई, कि एक बार पाणिनि गुरुकुल से निकलकर हिमालय की ओर तपस्या करने चले गए। कठिन तपस्या के बाद भगवान् शिव प्रसन्न हुए और पाणिनि के समक्ष प्रकट हुए। इस परंपरा से महादेव के इस साक्षात्कार का वर्णन कुछ ऐसा है–

नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्।
उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धान् एतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम् ॥

अर्थात्, तांडव नृत्य में लीन नटराज ने सनकादि ब्रह्मदेव के मानस-पुत्र और सिद्ध पुरुषों के उद्धार के लिए 14 बार अपनी डमरू बजाई। उसकी ध्वनि का विमर्श करने पर 14 “माहेश्वरसूत्र” या “शिवसूत्रों” का जाल पाणिनि को प्राप्त हुआ, जिससे समस्त पाणिनीय व्याकरण की नींव बनी। महादेव की प्रेरणा से पाणिनि की मेधा जागृत हुई। अपनी तपस्या की पूर्णता-स्वरूप उन्होंने आठ अध्यायों में 3,995 सूत्रों वाले ग्रंथ की रचना की। उस बृहद्ग्रंथ का नाम पड़ा “अष्टाध्यायी”।

बृहत्कथा से प्राप्त इस पाणिनि जीवनक्रम से विपरीत एक और परंपरा भी उल्लेखित की जानी चाहिए। प्रसिद्ध चीनी प्रवासी यूआन त्सांग जब सातवीं शताब्दि में भारत आए, तब वे स्वयं पाणिनि-जन्मस्थान शालातुर गए। यूआन त्सांग और पाणिनि के बारे में लिखने वाले आगे के और मान्यवर लेखकों से प्राप्त इस अलग परंपरा के अनुसार पाणिनि जन्मतः ही महामेधावी थे और अपनी कुशाग्रबु्द्धि के कारण अत्यंत सहज रूप से तत्कालीन व्याकरणशास्त्र में पारंगत बने।

युआन त्सांग ने अपने शीयूकी नामक प्रवास वर्णन में शालातुर के बारे में विस्तृत जानकारी दी है। उन्होंने देखा कि पाणिनि के जीवन के लगभग सहस्र वर्षों बाद भी शालातुर में पाणिनि की प्रतिमा खड़ी थी, और उस गाॅंव में उनके अनुयायी छात्र वहाँ पर व्याकरण पढ़ते थे। यूआन त्सांग पाणिनि के बारे में भी उपर्युक्त व्यापक जानकारी देते हैं। उनके अनुसार पाणिनि काल में संस्कृत व्याकरण में व्याप्त त्रुटियों का निरसन करने के लिए पाणिनि ने स्वयंप्रज्ञा से अष्टाध्यायी की रचना की।

व्याकरण के एक और प्रमाणभूत आचार्य पतंजलि अष्टाध्यायी की रचना का कुछ ऐसा वर्णन करते हैं– “कुश-मुष्टि बनाकर व सूर्यदेव से सम्मुख होकर आचार्य पाणिनि ने परिश्रमों की पराकाष्ठा करके एक-एक सूत्र की रचना की । जब उनके द्वारा रचित प्रत्येक अक्षर का कुछ प्रयोजन प्राप्त हो, तब कोई भी सूत्र अप्रासंगिक या निरर्थक कैसे होगा?”

ग्रंथ की रचना करने के बाद, अपने ग्रंथ के उद्बोधन और अध्यापन के लिए पाणिनि पाटलिपुत्र लौटे। उस समय विद्वानों द्वारा रचित ग्रंथों की समीक्षा और रचनाकारों के साथ शास्त्रार्थ में जीतने के बाद ही किसी ग्रंथ को प्रमाणित शास्त्र की उपाधि मिलती। यह शास्त्रार्थ मगध के सम्राट की राजसभा में हुआ करता था। अष्टाध्यायी इस कसौटी पर खरी उतरी।

राजसभा में अष्टाध्यायी की मुक्तकंठ से प्रशंसा हुई, यहॉं तक कि विद्वानों ने यह घोषित कर डाला कि व्याकरणशास्त्र के समूचे इतिहास में ऐसे अद्भुत ग्रंथ की सिद्धि नहीं हुई। विद्वज्जनों ने घोषित किया “पाणिनीयं महत् सुविहितम्”, अर्थात् पाणिनि द्वारा विहित रचना सबसे सुंदर है ।

नन्दवंशीय राजा पाणिनि की प्रतिभा से इतने प्रसन्न हुए कि उनकी पाणिनि के साथ मित्रता हुई। इतना ही नहीं, सम्राट ने यह घोषित कर दिया कि पाणिनि द्वारा बनाए गए व्याकरण के नियमों को कंठस्थ करने वाले को एक सहस्र मुद्राओं से पुरस्कृत किया जाएगा। पाणिनि की ख्याति इतनी विशाल हुई, कि उनके बाद शताब्दियों तक उनकी जन्मस्थली शालातुर व्याकरण शिक्षा की धरती बनी।

इन परंपराओं का काल के उदर में लुप्त सच जो भी हो, यह सत्य अक्षुण्ण है कि उनके समय संस्कृत भाषा के नानाविध व्याकरण-परंपराओं के बीच का कलह पाणिनि ने ‘अष्टाध्यायी‘ लिखकर अचानक पूरी तरह से समाप्त कर दिया। पाणिनीय व्याकरण का उद्गम ‘शिवसूत्रों’से हुआ था। उनके समय के बाद अष्टाध्यायी को ही संस्कृत व्याकरण का अंतिम प्रमाण माना गया।

उनके कई शिष्यों ने सामान्य बुद्धि के छात्रों के हित के लिए अष्टाध्यायी पर कई वार्तिक और भाष्य लिखे। परंतु अष्टाध्यायी की रचना इतनी सुंदर है, कि अनेकानेक भाष्यग्रंथों के नानाविध प्रकार के स्पष्टीकरणों के बावजूद एक भी सूत्र का अर्थ बाधित या विकृत नहीं होता।

इन भाष्यग्रंथों का अष्टाध्यायी के साथ रत्न-कांचन योग ही बनता है। आज भी संस्कृत व्याकरण का पाठन महर्षि पाणिनि की ही परंपरा से अनुप्राप्त है। आगे मध्ययुग से प्रचलन में आई भारत की सभी प्रादेशिक भाषाऍं भी अष्टाध्यायी की कल्पनाओं से ही अपने-अपने व्याकरण-शास्त्र की प्रेरणा लेती हैं।

“महत् शास्त्रौघ”: पाणिनि का कार्यक्षेत्र किसी महासागर से कम नहीं

पाणिनि यहीं पर रुके नहीं। महादेव के जनमान्य वरदान के कारण मिली उनकी प्रचंड बुद्धि का सदुपयोग उन्होंने देशभर में भ्रमण कर लोगों की दैनंदिन बोली में प्रयुक्त शब्द और क्रियाओं को ग्रंथबद्ध करने के लिए किया और उन्हें शास्त्रसंगत बनाया।

“गणपाठ” नाम से प्रसिद्ध व्याकरण के अंग में आचार्य पाणिनि ने नित्य प्रयोग में आनेवाले शब्दों का संग्रह किया। इससे शब्दों के घने वन को सुव्यवस्थित उपवन का रूप प्राप्त हुआ। साथ-ही-साथ “धातुपाठ” में नानाविध प्रकार के क्रियावाचक शब्दों का संचय किया।

यह दोनों ऐतिहासिक विश्लेषण की दृष्टि से सुवर्णतुल्य हैं, चूंकि पाणिनि के दृष्टिक्षेप में तरह-तरह की चीज़ों का इसमें उल्लेख प्राप्त होता है, जिससे ईसा पूर्व पांचवीं शताब्दि के भारतवर्ष का चित्र हमारे सामने पूरी बारीकी से निर्मित किया जा सके।

इन महाभाग के अन्य कई उल्लेखनीय योगदान इतिहास को याद हैं। कहा जाता है कि “जांबवतीविजय” नामक नाटक के भी यही रचयिता थे, परंतु विद्वानों में इस बात पर असहमति है। अन्य ग्रंथों में “पाणिनीय शिक्षा” का विशेष महत्त्व है। इसमें गणपाठ में वर्णित शब्दों तथा वैदिक ऋचाओं के शुद्ध उच्चारण को बनाए रखने के लिए पाणिनि ने उच्चारण-संबंधित सूत्रों को बद्ध किया गया।

इस ग्रंथ ने संस्कृत भाषा के सही उपयोग की, तथा शब्दों के यथार्थ उच्चारण की परंपरा को सुदृढ़ बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। विगत 2,500 वर्षों में संस्कृत का प्रामाणिक उच्चार अपरिवर्तित रहने का कारण ही “शिक्षा” शास्त्र है, जिसमें पाणिनीय शिक्षा का महत्त्वपूर्ण स्थान है ।

इसी के विरुद्ध, अंग्रेज़ी आदि भाषाऍं विगत 500-600 वर्षों में इतनी बदल गईं, कि आज उस समय के अंग्रेज़ी साहित्य का विवेचन अविशेषज्ञ नागरिक के लिए प्रायः असंभव है। अतः संस्कृत वाङ्मय को सहस्राब्दियों तक सुबोध बनाए रखने का एक महत्त्वपूर्ण कारण भगवान् पाणिनि ही हैं।

“तस्मै पाणिनये नमः”: “भगवान् पाणिनि” लेखमाला का प्रयोजन

आधुनिक भारत देश के उत्थान का मार्ग उसके प्राचीन महापुरुषों के चिन्तन को समझने से प्रशस्त हो सकता है। केवल पुरातन होने के कारण इन सब विचारशील महानुभावों की एक महान् धरोहर को समूल त्यागना नहीं चाहिए। आज भी इनमें से कई विचार परंपराओं का मूल्य जन-जीवन के धारण के लिए अनिवार्य है।

हमारी इस लेखमाला का कार्य आचार्य पाणिनि के कार्य का परिचय आधुनिक पाठकों कराना है जो प्रायः हमारे सभ्यता की विचार और आचार परंपरा से अनभिज्ञ हो सकते हैं। आने वाले भाग में हम पाणिनीय व्याकरण की एक छोटी-सी झलक देखकर पाणिनीय अष्टाध्यायी के सामर्थ्य का दर्शन करने का प्रयास करेंगे।

तत्पश्चात्, उनके द्वारा विरचित ग्रन्थों की दृष्टि से सनातन परंपरा के चार पुरुषार्थों, अर्थात् धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष का वर्णन करेंगे। अतः स्वभाषा के इस भगीरथ के कार्य का एक छोटा-सा अध्ययन पाठकों को विचारप्रवर्तक और रोचक लगेगा, यही मनीषा है।

निखिल नाईक विद्युत अभियांत्रिकी के शोध छात्र हैं। वे भू-राजनीति एवं भारत की प्रगति गाथा में रुचि रखते हैं।