अर्थव्यवस्था
पाम तेल मिशन- घरेलू उत्पादन बढ़ाकर आयात पर से निर्भरता कम कर सकेगा भारत

भारत सरकार ने हाल ही में एक योजना को स्वीकृति दी है जिसका उद्देश्य घरेलू पाम तेल (सीपीओ) के उत्पादन में वृद्धि करना है। केंद्र द्वारा प्रायोजित एक योजना के रूप में राष्ट्रीय खाद्य तेल- तेल ताड़ मिशन को शुरू किया गया है जो पाम तेल के लिए खेतीहर भूमि में वृद्धि करेगा।

भारत पाम तेल आयातों पर काफी निर्भर है जहाँ देश की कुल सीपीओ आवश्यकताओं का 98 प्रतिशत इंडोनेशिया और मलेशिया से आयात किया जाता है। ऐसे में इस निर्भरता को कम करने के लिए यह योजना शुरू की गई है।

हालाँकि भारत में अभी भी तेल ताड़ की खेती की जाती है लेकिन इस खेती से मात्र 3 लाख टन सीपीओ ही प्राप्त होता है, जबकि प्रतिवर्ष 80 लाख टन सीपीओ का आयात भारत करता है।

रिपोर्टों के अनुसार भारत के कुल खाद्य तेल आयात में 60 प्रतिशत भागीदारी पाम तेल आयात की ही होती है जो पाम तेल आयात पर देश की निर्भरता दर्शाती है। इस आयात पर वार्षिक रूप से 10 अरब डॉलर का खर्च होता है।

संगठित क्षेत्र में पाम तेल का पहला उपयोग डाल्डा ब्रांड द्वारा 1937 में शुरू हुआ था। घी के सस्ते संस्करण के रूप में यह प्रचलित हुआ था और आज भी निचले वर्गों में लोकप्रिय है।

डाल्डा वनस्पति घी

स्वास्थ्य चिंताओं के बावजूद आज पाम तेल सभी की दैनिक खाद्य आदतों का भाग बन गया है और रिपोर्ट है कि 90 प्रतिशत पाम तेल का उपयोग भोजन पकाने में होता है।

कम घरेलू उत्पादन

घरेलू स्तर पर सीपीओ का उत्पादन कई कारण से काफी कम रहा है। भारतीय किसानों के पास छोटे-छोटे भूखंड हैं और वित्तीय स्थिति अच्छी नहीं है। तेल ताड़ों को बड़ा होने और फल देने में चार से छह वर्ष लगते हैं और इतनी अवधि के लिए किसानों के पास नकद प्रवाह नहीं रहता।

बिक्री का न्यूनतम मूल्य तय न होने के कारण भी किसानों ने ताड़ की खेती का जोखिम नहीं उठाया। साथ ही छोटे भूखंडों पर वह कुशलता प्राप्त नहीं की जा सकती जो बड़े ताड़ बागानों में होती है।

रुचि सोया, गोदरेज ऐग्रोवेट जैसी कुछ बड़ी कंपनियों ने तेल ताड़ के लिए किसानों और राज्य सरकारों के साथ त्रिपक्षीय समझौते किए। एक विशिष्ट क्षेत्र के किसान किसी विशिष्ट तेल प्रसंस्करण कंपनी को ही उत्पाद बेचते हैं। समझौतों से कंपनियों के लिए कच्चा माल सुनिश्चित होता है और किसानों के लिए आय।

नए प्रोत्साहन

अब सरकार ने पाम तेल हेतु छोटे किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए मूल्य निश्चितता और लागत वित्तपोषण जैसे कुछ प्रयासों को लागू किया है। किसानों को फ्रेश फ्रूट बन्चेस (एफएफबी) के लिए सरकार से एक तय मूल्य मिलेगा।

तेल ताड़ के बीज जिनसे तेल निकाला जाता है

पाम तेल को एफएफबी से ही निकाला जाता है। एफएफबी का मूल्य वार्षिक औसत सीपीओ दर को थोक मूल्य सूचकांक के अनुसार ढालकर तय किया जाएगा। सीपीओ का 14.3 प्रतिशत किसानों को खरीददार देंगे तथा पूर्वोत्तर एवं अंडमान के किसानों को सरकार 2 प्रतिशत अतिरिक्त मूल्य देगी।

अंडमान व पूर्वोत्तर पर इसलिए ध्यान दिया जा रहा है क्योंकि तेल ताड़ की खेती के लिए वहाँ का वातावरण अनुकूल है। खेती के लिए लागत सहयोग को 12,000 रुपये प्रति हेक्टेयर से लगभग ढाई गुना करके 29,000 रुपये प्रति हेक्टेयर कर दिया गया है। ताड़ खेती में किसानों की रुचि बढ़ाने के लिए कुछ और प्रोत्साहन भी लाए गए हैं।

इन परिवर्तनों का लाभ किसे मिलेगा

किसानों के अलावा पाम तेल में व्यापार करने वाली कंपनियाँ भी लाभान्वित होंगी। अभी तक ये कंपनियाँ सीपीओ निर्यात करके उसे अपने संयंत्रों पर प्रसंस्कृत करती थीं। आयात के कारण वे आपूर्ति शृंखला, विदेशी विनिमय और देशों के बीच संबंधों में उतार-चढ़ाव के प्रति भेद्य थीं।

उदाहरण स्वरूप, जनवरी 2020 में कथित रूप से आयातकों को मलेशिया से आयात कम करने के लिए कहा गया था क्योंकि मलेशियाई प्रधानमंत्री ने नागरिकत संशोधन अधिनियम और कश्मीर मुद्दे पर भारत सरकार की आलोचना की थी।

इसके अलावा कर दर में होने वाले परिवर्तनों से पड़ने वाले प्रभाव से भी कंपनियाँ बच सकेंगी। मलेशियाई और इंडोनेशियाई सरकारें प्रायः घरेलू पाम मूल्यों को स्थिर रखने और प्रसंस्करण उद्योगों को समर्थन देने के लिए निर्यात शुल्क बढ़ा देती हैं।

रुचि सोया, गोदरेज ऐग्रोवेट और अन्य कंपनियों को इन परिवर्तनों का लाभ मिलेगा क्योंकि वे कच्चा माल के लिए सुनिश्चित होंगी और विदेशी विनिमय जोखिमों से बच सकेंगी। सबसे बड़ी खाद्य तेल कंपनियों में से एक जेमिनी फूड्स ने हाल ही में आईपीओ के लिए आवेदन किया है, उसे भी इन परिवर्तनों का लाभ मिलेगा।

हालाँकि, अडानी-विल्मार जैसी कंपनी जिसमें विल्मार इंटरनेशन के साथ अनुबंध करके कच्चा माल सुनिश्चित किया हुआ था, उसे विभिन्न विक्रेताओं तक पहुँचने और विदेशी विनिमय जोखिम से बचने में सहायता मिलेगी। इसके बावजूद भी भारत को आयात पर निर्भरता कम करने में कुछ वर्ष लगेंगे।

तेल ताड़ों को उगने में काफी समय लगता है जिसका अर्थ हुआ कि इस नीति का लाभ भारत छह-सात वर्षों के बाद ही उठा पाएगा। वहीं पर्यावरण एक्टिविस्टों ने भी चिंता व्यक्त की है क्योंकि तेल ताड़ को प्रतिदिन 200-250 लीटर पानी की आवश्यकता होती है, वहीं नारियल ताड़ को 55-120 लीटर।

क्षेत्र की पानी आवश्यकताओं पर तेल ताड़ की खेती का दुष्प्रभाव हो सकता है। 1992 से ही भारत पाम तेल आयात पर निर्भरता कम करने का प्रयास कर रहा है लेकिन उपरोक्त कारणों से ऐसा नहीं हो पाया। अब देखना होगा कि क्या नई नीतियों का लाभ भारत को मिलेगा।