राजनीति
पाकिस्तान में लोकतंत्र की अल्पायु का कारण क्या है

पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में कुर्सी हासिल करना जितना मुश्किल होता है, उससे ज़्यादा मुश्किल होता है, कुर्सी पर बने रहना। इसे एक साधारण एवं सटीक बात से समझा जा सकता है कि पाकिस्तान के अब तक के इतिहास में कुल 23 प्रधानमंत्री हुए हैं लेकिन किसी भी प्रधानमंत्री ने पाँच साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया है।

प्रधानमंत्री का अधूरा कार्यकाल पाकिस्तानी राजनीति व लोकतंत्र में अभिशाप है। इमरान से पहले कई और प्रधानमंत्री इसके शिकार हो चुके हैं। यह लोकतंत्र का मज़ाक नहीं तो और क्या है।

भारत और पाकिस्तान दोनों देश एक साथ स्वतंत्र हुए थे। लेकिन इनकी स्वाधीनता के 75 वर्ष गुज़रने के बाद, जहाँ एक तरफ भारतीय लोकतंत्र की जड़ें लगातार मज़बूत होती गई, वहीं दूसरी तरफ, पाकिस्तान में बार-बार लोकतंत्र का गला घोंटा गया।

असल में, पाकिस्तान के लिए लोकतंत्र एक अबूझ पहेली ही रहा है। यहाँ लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुनी गई सरकारों का प्रभाव कम और सैन्य शासकों का प्रभाव ज्यादा रहा है। एक तरफ पाकिस्तान की ऐसी हालत है कि जहाँ सरकारें कार्यकाल पूरा नहीं कर पातीं हैं, और आतंकवाद और सैन्य शासन (प्रत्यक्ष/ अप्रत्यक्ष) वहाँ आम बात है।

वहीं दूसरी ओर हमारा देश भारत है, जहाँ  गाँव से लेकर केंद्र तक, लोकतंत्र की सुखद तस्वीर ही दिखती है। इसके बावजूद यहाँ की वामपंथी और लिबरल बुद्धिजीवी जमात जनता के लोकप्रिय मत से चुनी गई लोकतांत्रिक मोदी सरकार को फासीवादी और न जाने क्या-क्या कहता रहता है।

इन्हें भारतीय लोकतंत्र हमेशा खतरे में ही दिखता है और इसकी एक प्रमुख वजह यह है कि इनका खुद का अस्तित्व खतरे में है। आश्चर्य की बात यह है कि यहाँ के बुद्धिजीवियों का विरोध हास्यास्पद तो तब होता है जब वह पाकिस्तान के हैप्पीनेस इंडेक्स की तुलना भारत से करने लगता है। उनके इसी बचकाने प्रयास का फायदा पकिस्तान जैसा बीमार देश उठाता है और उसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के विरोध का मौका मिल जाता है।

धर्म, सेना, सत्ता और तख्तापलट की राजनीति

पाकिस्तान अपने आप में एक अलग ही राष्ट्र है, जहाँ कभी-कभी जनता भी सेना से लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को बर्खास्त करने की मांग करती दिखती है। मोटे तौर पर, पाकिस्तान 1958 से 1971, 1977 से 1988 तक और फिर 1999 से 2008 तक सैन्य शासन के अधीन रहा है।

एक प्रेटोरियन, अर्थात् सेना-शासित देश के रूप में, पाकिस्तान में सेना को राजनीतिक निर्णय लेने में प्रमुख आधार के रूप में देखा जाता है। पाकिस्तानी सेना आज भी देश के अंदरुनी मामलों से लेकर विदेश-नीति के मामलों में प्रमुख भूमिका निभाती है। एक बार फिर पाकिस्तान में कुछ ऐसा ही हो रहा है, जब सेना की प्रमुख भूमिका के कारण से सत्ताधारी इमरान खान की प्रधानमंत्री की कुर्सी खतरे में आई।

पाकिस्तान में क्या वास्तव में 75 बरसों में जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा वाला वास्तविक लोकतंत्र कायम हो पाया है? इसका उत्तर कमोबेश हम सभी के पास है। बॉलीवुड की फिल्म ‘सिंघम’ में एक लाइन है कि “राजनीति में सिस्टम हो ना हो, पर सिस्टम में राजनीति ज़रूर होती है”। पाकिस्तान इसका जीता-जागता उदाहरण है।

इस बात से कोई भी इंकार नहीं कर सकता कि पाकिस्तान की मूल समस्या उसकी स्थापना में है, क्योंकि इसकी स्थापना के मूल में मजहब है। धार्मिक होना बुरी बात नहीं लेकिन धर्मांधता समाज को गर्त की ओर ले जाती है। धर्मांधता कट्टरपंथ के उदय के लिए उचित आधार तैयार करती है, और पाकिस्तान इसका भुक्तभोगी है।

गौरतलब है कि 1956 में पाकिस्तान को इस्लामिक राष्ट्र घोषित किया गया था। इसके बाद तो पाकिस्तान में बार-बार सेना ने सत्ता प्राप्त की और लोकतंत्र का गला घोंटा। परंतु यह कहना कि केवल सेना ने ही लोकतंत्र का गला घोंटा, उचित नहीं होगा। क्योंकि, ऐसा मालूम पड़ता है कि वहाँ के जनप्रतिनिधि ही लोकतांत्रिक परंपरा पर विश्वास नहीं रखते और लोकतंत्र के पीठ पर खंजर भोकते हैं। वे केवल खुद के और अपने लोगों के विकास को प्राथमिकता देते हैं।

विकास की राजनीति जैसी बुनियादी व्यवस्था भी पाकिस्तान की पूरी राज्यव्यवस्था में नदारद भाव में है। लोकतंत्र का मूल जनता के द्वारा स्थापित शासन होता है, परंतु पाकिस्तान में सत्ता पर आसीन कोई भी नेता/ शासक जनता के प्रति जिम्मेदार/ उत्तरदायी न होकर, सेना, कट्टरपंथियों एवं अपने लोगों के प्रति झुकाव रखता है।

पाकिस्तान में सेना, सत्ता और तख्तापलट की राजनीति कोई नई बात नहीं है। इस सूरत में कहां से लोकतंत्र स्थापित हो पाएगा। सेना, मजहब और आतंकवाद ने अपनी जड़ें राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था में इस कदर मजबूती से टिकाए रखी हैं कि विकास का मार्ग प्रशस्त होना संभव नहीं है।

लोटातंत्र

पाकिस्तान में एक जुमला है ‘लोटातंत्र’ जो कुछ दिनों पहले मीडिया में बड़ी सुर्ख़ियों में था। लोटातंत्र, पाकिस्तान की वर्तमान परिस्थितियों को प्रतिबिंबित करता है। ‘बेपेंदी का लोटा’ नामक एक मुहावरा हम सभी ने सुना है, जिसका मतलब है कि अगर लोटे की पेंदी ना हो तो वो इधर से उधर लुढ़कता रहता है। इमरान खान की पार्टी पीटीआई के कई सदस्य ऐसे लुढ़के कि इमरान सरकार ही लुढ़क गई।

पाकिस्तानी जनता को “नए पाकिस्तान” का सपना दिखाने वाले इमरान खान की खुद की कुर्सी आज चली गई, जिसमें पाकिस्तान की सर्वोच्च न्यायपालिका ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, और इमरान खान सरकार का गेम ओवर कर दिया। मज़े की बात यह है कि इमरान खान का तकिया कलाम है, ‘आपने घबराना नहीं है’। लेकिन अब वो खुद संकट में घिर गए, तो उनसे ये कौन कहे कि ‘आपने घबराना नहीं है’।

खैर, नई सरकार का गठन तो हो गया है, फिर भी, यह देखना काफ़ी दिलचस्प होगा कि पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़ के अध्यक्ष शहबाज़ शरीफ, जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम के प्रमुख फज़लुर रहमान और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के संरक्षक आसिफ अली ज़रदारी की तिकड़ी कैसे तालमेल बिठाएगी।

पाकिस्तान में इस बार लोकतंत्र कितना लंबा रास्ता तय करेगा, इसपर भारत की भी नज़र है। पाकिस्तान में कमज़ोर होता लोकतंत्र और कट्टरपंथ को मिलती मजबूती भारत के लिए भी अलार्मिंग हैं। हालांकि 2014 के बाद जब से प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ता की कमान संभाली है, तब से क्रॉस बॉर्डर आतंकवाद की कमर टूट गई है। इसके बावजूद, अशांत पाकिस्तान, भारत और खासकर कश्मीर को मुख्यधारा में लाने की भारत सरकार की कोशिशों के लिए एक चुनौती बन सकता है, जिस पर और सतर्क नजर रखे जाने की जरूरत है।

व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं।