श्रद्धांजलि
यतींद्र को कैसे मिला ‘बाघा जतिन’ का नाम, अंग्रेज़ों को पीटने पर नहीं माँगी माफी (भाग 2)

यह यतींद्रनाथ दास की कहानी का दूसरा भाग है। पहला भाग यहाँ पढ़ें

कुछ समय पश्चात यतींद्र सुबह के समय अपने गाँव के बाग में टहल रहा था। अचानक से आठ-दस लोगों की भीड़ यतींद्र के समक्ष आ खड़ी हुई। उनमें से एक ग्रामीण ने कहा– “यतींद्र दा हमारे गाँव के जंगलों में एक बाघ घुस आया है। और आए दिन वह हमारी गायों को मार रहा है। अब तो गाँव में भी लोगों ने उसे घुसते देखा है। अगर आप उस बाघ से हमें छुटकारा दिला दें तो बड़ी मेहरबानी होगी।”

यतींद्र ने विचार करते हुए कहा– “ठीक है। पहले ये मुआयना करते हैं कि बाघ किस दिशा में हैं उसके बाद ही उससे निबटा जाएगा।” यतींद्र ने एक हँसिया निकाली और गाँव वालों के साथ चल दिया। यतींद्र जंगल की ओर बढ़ रहा था और बाघ के पंजों की दिशा का मुआयना करता हुआ चल रहा था। ग्रामीणों के हाथ में लाठी और यतींद्र के हाथ में हँसिया थी।

यतींद्र मुआयना करता करता जंगल के काफ़ी भीतर घुस आया। इतने में किसी जानवर के चलने की भनक यतींद्र के कानों तक पहुँचने लगी। यतींद्र समझ गया कि ये वही बाघ है। यतींद्र वहाँ से लौट पाता इससे पहले ही बाघ दहाड़ता हुआ जतिन के सामने आ खड़ा हुआ। बाकी लोग दुम दबाकर भागने लगे।

यतींद्र को अंदेशा था कि बाघ को देखकर अगर वह भागने की कोशिश करेगा तो ज़रूर बाघ उसपर झपट पड़ेगा, इसलिए यतींद्र बिना आवाज़ किए बाघ के सामने हँसिया लिये खड़ा हो गया। बाघ दो-तीन बार दहाड़ता हुआ इधर से उधर चलने लगा।

यतींद्र बाघ को हँसिया दिखाता हुआ पीछे की और हटने लगा। बाघ धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। और अचानक से बाघ ने यतींद्र पर हमला किया। बाघ का अगला पंजा यतींद्र के हाथ पर गड़ गया। बाघ फिर पीछे हटा और फिर यतींद्र पर हमला किया और उसी क्षण यतींद्र ने हँसिया से बाघ पर वार किया।

बाघ पागलों की तरह दहाड़ने लगा। उसने फिर यतींद्र पर हमला किया और इस सिलसिले में यतींद्र के शरीर से बेशुमार खून बहने लगा। बाघ बार-बार पीछे हटता और बार-बार आगे बढ़कर हमला करता। यतींद्र भी लगे हाथ उसपर हँसिया के वार किए जा रहा था।

और जब फिर बाघ ने यतींद्र पर हमला किया तो यतींद्र ने हँसिया उसकी गर्दन में घुसा दी। बाघ वहीं बैठ गया और दम तोड़ने लगा। इतने में गाँव के कुछ लोग वहाँ आ पहुँचे और एक युवक ने बाघ को गोली दाग दी। यतींद्र ने मुस्कुराते हुए कहा– “अब तो बाघ मर गया। तुमने उसे गोली मारकर उसकी चमड़ी को नुकसान पहुँचा दिया” और तभी सब ग्रामीणों ने यतींद्र की जयजयकार में “जय बाघा” के नारे लगाने शुरू कर दिए।

और तभी से यतींद्र को सब ‘बाघा’ के नाम से पुकारने लगे। यतींद्र इतना घायल हो चुका था कि उसके बचने की उम्मीद भी टूट चुकी थी। लेकिन पूरे 24 दिनों के बाद यतींद्र स्वस्थ हो सका।

स्वस्थ होकर जब यतींद्र कलकत्ता पहुँचा तब समिति द्वारा एक फैसला हुआ और यतींद्र को तीन वर्ष के लिए ‘दार्जलिंग’ जाना पड़ा। वहाँ उसने ‘बांधव समिति’ की स्थापना की। दार्जलिंग में आए दिन डकैतियाँ बढ़ने लगीं। अंग्रेज़ सरकार इन डकैतियों से परेशान हो रखी थी।

इस दौरान जब यतींद्र अपने परिवार के साथ दार्जिलिंग जा रहा था तो सिलीगुड़ी स्टेशन पर ट्रेन रुक गई। और बहुत देर से ट्रेन में बैठा एक व्यक्ति प्यास के मारे चिल्ला रहा था। स्टेशन पर मिलिट्री के आठ अंग्रेज़ चक्कर लगा रहे थे और ट्रेन में चढ़ते-उतरते लोगों के पैरों को अपने जूतों से दबाकर उन्हें परेशान कर रहे थे।

यतींद्र ने सोचा अभी गाड़ी को चलने में थोड़ा और समय है और अपने बैग से एक बोतल निकालकर पानी भरने के लिए गाड़ी से बाहर उतरने लगा। तभी मिलिट्री के अंग्रेज़ों ने उसे अड़ंगी देकर गिराना चाहा लेकिन यतींद्र गिरते-गिरते बचा।

यतींद्र ने उन्हें इसके लिए कुछ न कहा। यतींद्र जब पानी भरकर गाड़ी में चढ़ने लगा तब एक अंग्रेज़ ने फिर यतींद्र को गिराने की कोशिश की। यतींद्र इस बार ख़ुद पर नियंत्रण न रख सका। उसने अंग्रेज़ों को चेतावनी देते हुए कहा– “अगर अबकी बार किसी के भी साथ ऐसी हरकत की तो दोबारा करने लायक नहीं रहोगे।”

तभी एक अंग्रेज़ ने यतींद्र को धक्का देते हुए गाली दी। यतींद्र ने उस अंग्रेज़ को तुरंत एक घूसा जमाया। वहाँ पर उपस्थित अंग्रेज़ यतींद्र पर झपटे। यतींद्र ने एक-एक कर उन अंग्रेज़ों को बुरी तरह पीटा। लेकिन अंत में यतींद्र को पकड़ लिया गया।

अगले दिन अंग्रेज़ी और बांग्ला के अखबारों में यह खबर छप गई कि केवल एक युवक ने आठ अंग्रेज़ों को एक साथ बुरी तरह पीटा। यतींद्र पर इस केस के सिलसिले में कारवाई शुरू हो गई। यतींद्र को मजिस्ट्रेट के सामने बुलाया गया।

मजिस्ट्रेट ने अविश्वास भरे लहजे में यतींद्र से सवाल किया– “ओनली यू बीटन दीज़ फोर्स अलोन?”
यतींद्र– “जी”
मजिस्ट्रेट– “टेल मी द ट्रुथ। हाउ मैनी पीपल वर विद यू?”
यतींद्र – मैं इनके लिए अकेला ही पर्याप्त हूँ महोदय! चाहे तो आप इनसे ख़ुद ही पूछ लीजिए।
मजिस्ट्रेट– “हाउ मैनी पीपल कैन यू बीट एट वन्स?”
यतींद्र – “ईमानदार हों तो एक भी नहीं और बेईमानों की गिनती आपकी कल्पनाओं से परे है।”
मजिस्ट्रेट– यू हैव बीटन अप अ मैन ऑफ ब्रिटिश मिलिट्री। वुड यू अपोलॉजाइज़ फ़ॉर दिस?

यतींद्र – “मैंने जो किया वो इन आठ लफ़ंगों के मूर्खतापूर्ण रवैये के लिए किया। ये आए-दिन ट्रेन में चढ़ते-उतरते यात्रियों को परेशान किया करते हैं। मेरे साथ भी इन्होंने वही सुलूक किया। मैंने इनसे प्रार्थना की मगर ये माने नहीं।”
मजिस्ट्रेट– वुड यू अपोलॉजाइज़ फ़ॉर दिस?
यतींद्र– “माफ़ी चाहता हूँ महोदय! माफ़ी न माँगने के लिए।”

ऐसा वाकया पहली बार ही घटा था कि एक अकेले भारतीय युवक ने आठ मिलिट्री के अंग्रेज़ों को बेतहाशा पीटा हो। पूरे बंगाल में यह खबर आग की तरह फैल गई। यतींद्र नाम का युवक अब प्रिसिद्धि पाने लगा। इस कांड से अंग्रेज़ मिलिट्री की थू-थू होने लगी।

यतींद्र की जमानत के लिए प्रदर्शन होने लगे। मजिस्ट्रेट ने अफसरों को जल्द से जल्द ये केस बंद करने की हिदायत दी। लेकिन इस कांड के चलते यतींद्र को सरकारी नौकरी के पद से इस्तीफा देना पड़ा।

इन सब मसाइलों से फ़ारिख हो अब यतींद्र अपने घर पहुँचा। यतींद्र की पत्नी इंदुबाला उसकी बाट जोहती रहती थी। यतींद्र कमरे में दाखिल हुआ। कमरे में रखी हर चीज़ सिलसिलेवार रखी हुई थी। यतींद्र मेज पर जाकर बैठ गया।

यतींद्र मेज पर बैठा-बैठा इंदुबाला को मुस्कुराते हुए देखने लगा। इंदुबाला अपनी सारी उखड़न के बावजूद उस मुस्कुराते हुए चेहरे पर अपनी हँसी को नियंत्रण में न रख सकी। इंदुबाला ने यतींद्र से कहा– “आप कब तक ये काम करते रहेंगे। बच्चे भी तो हैं। आपकी याद करते हैं। मेरी न सही इनकी ही सोचो।”

“अच्छा! तो अब बच्चों के कंधों पर बंदूक रख कर चलाई जा रही है।” (यतींद्र ने छेड़ते हुए कहा)
“नहीं ऐसी बात नहीं है।”
“तो साफ़-साफ़ कहो कि तुम मुझे अपने लिए रोकना चाहती हो!”
“साफ़-साफ़ भी कह देती, लेकिन साफ़-साफ़ कहने से भी आप कहाँ रुक जाओगे।”
“मैं भी यहीं रहना चाहता हूँ। लेकिन काम ही कुछ ऐसा है कि जाना पड़ता है।”
“छोड़ क्यों नहीं देते ये काम?”

और इसी सवाल पर दोनों की बातचीत में विराम पड़ जाता। यतींद्र अकसर अपनी पत्नी से यही कहा करता और इंदुबाला जितना जानती थी उतना शायद यतींद्र को अंदाज़ा न था। इंदुबाला जानती थी कि यतींद्र कुछ ऐसे कामों में लिप्त है जो काम अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़ हैं और इसमें उसकी जान को ख़तरा भी है। लेकिन वह कुछ बोलती न थी। यतींद्र भी सच को छुपाए रहता।

दोनों के बीच प्रेम से जुड़ी आशाएँ और आकांक्षाएँ सीमांतों पर झुकी हुई थीं। यतींद्र को इस बात का कोई द्वंद न था कि परिवार पहले या देश। लेकिन कभी-कभी बच्चों के मासूम चेहरे और उनकी किलकारियों भरी आवाज़ जतिन को उद्वेलित कर देती थीं।

इंदुबाला के झरते आँसू जब उसके हाथों पर गिरते तो उसे लगता जैसे आग में जलते हुए स्फटिक के टुकड़े उसके हाथ पर रख दिए गए हों। द्वंद्व जान देने का नहीं था, द्वंद्व था तो नन्हीं-सी जानों को ज़िंदा छोड़ जाने का, द्वंद देश को आत्म-समर्पण कर देने का नहीं था, द्वंद्व था आत्म-समर्पण की हुई स्त्री को अकेले बिलखते हुए छोड़ जाने का। लेकिन इन सबके बावजूद यतींद्र अपने आँसुओं को अपनी हथेलियों से नीचे नहीं गिरने देता था।

जारी…