श्रद्धांजलि
यतींद्रनाथ दास (भाग 1)- बाघा जतिन में क्रांति की चिंगारी नहीं बल्कि ज्वाला धधक रही थी

स्वामी विवेकानंद ने यतींद्रनाथ (बाघा जतिन) के कंधों पर हाथ रख कर कहा– “लोगों के प्रति तुम्हारी सेवा देखकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई। आखानंद ने तुम्हारे बारे में सच ही कहा था। मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है।”

“जी मैं कृतज्ञ हुआ। वो मुझे…आपसे…..!” यतींद्र कहते कहते रुक गया। इतने में स्वामी जी ने उसके मनोभावों को समझते हुए कहा– “तुम्हारे जैसे सेवाभाव रखने वाले देशभक्त युवाओं की हमें सख़्त ज़रूरत है। मैं यह तो नहीं चाहता कि तुम्हारी निर्भीकता और साहस को एक दिन मौत के घाट उतार दिया जाए। लेकिन तुम मानने वाले नहीं हो, यह भी मैं जानता हूँ। और जब तुमने ठान ही ली है तो ठीक है। तुम ‘हिराम मैक्सिम’ से मिलो।”

“जी यह सज्जन कौन हैं?”
“हिराम कहता है भारत को आज़ादी के लिए गोलियों से अधिक बमों की आवश्यकता है।”
“जी समझ गया।”
“और सुनो। तुम अंबु गुहा के अखाड़े में जाना शुरू कर दो और अपनी आत्मरक्षा हेतु अधिक चुस्ती-फुर्ती के सबक हासिल करो।”
“ जी। आज्ञा दें।”
“विजयी भवः।”

यतींद्र वहाँ से लौट आया। पाँवों की गति तेज़ होने लगी। उसकी रगों में बहता खून खौलती ज्वालाओं की भाँति रंग दिखाने लगा। उसके हाथों की लालिमा उसकी आँखों तक चमकने लगी। लंबा चौड़ा पुष्ट शरीर, बाघ जैसी पैनी आँखें, भुजाओं में अक्षुण्ण बल, गंभीर मन और लोगों के प्रति संवेदना भरी आवाज़; यतींद्र को यतींद्र नामों के अन्य युवकों से अलग करती थी।

कलकत्ता सेंट्रल कॉलेज की गहमागहमी से बाहर आकर रोज़ी-रोटी के लिए बंगाल सचिवालय में टाइपिंग की खट-खट वाली चुभन यतींद्र को अक्सर परेशान किया करती। लेकिन आज यतींद्र टाइपिंग मशीन की खट-खट वाली आवाज़ से परेशान नहीं था। वह अपनी भावी योजनाओं में उलझा हुआ था। उलझा हुआ था या सुलझने की ओर बढ़ रहा था।

यतींद्र के होंठों की धीमी-धीमी मुस्कान को देखकर उस क्षण किसी भी व्यक्ति को यह भ्रम हो सकता था कि यकीनन वह अपनी प्रेमिका की आँखों की मिठास में उतर रहा है। लेकिन यतींद्र के मन की कल्पनाओं में कुछ और ही तसवीर पनप रही थी।

सचिवालय की खट-खट से फ़ारिख होकर शाम को जब यतींद्र अपने कमरे में पहुँचा तो उसी क्षण एक डाकिया आया, उसके हाथों में एक चिट्ठी थमाई। उस चिट्ठी में एक वाक्य लिखा हुआ था– “माँ बहुत बीमार हैं। जल्दी घर आ जाओ।” यतींद्र ने तुरंत अपना बक्सा उठाया और ‘कायाग्राम’ के लिए रवाना हुआ।

यतींद्र जब गाँव पहुँचा तो उसे पता चला कि उसकी माँ को प्लैग हो गया है और यह उनकी अंतिम घड़ी है। माँ को इस तरह मृत्यु शैय्या पर लेटा देख यतींद्र का आत्म-मनोबल ज़मीन में धसने लगा। यतींद्र से माँ की बुझती आँखों को देखा न गया और वह अपनी माँ के पैरों को पकड़कर फूट-फूटकर रोने लगा।

तब अंतिम साँसे लेते हुए यतींद्र की माँ ने उससे कहा– “बेटा यतींद्र! आदर्श के लिए जीवन कुर्बान भी करना पड़े तो बेझिझक कर देना।” यतींद्र कुछ पल यूँहीं अपनी माँ के पाँव के नज़दीक बैठा रहा। औरतों के रोने की गूँज चारों तरफ़ फैल गई। यतींद्र वहीं बैठा रहा। जैसे अपनी माँ के पाँवों में सिमटकर पुनः साहस और शक्ति बटोर लेना चाहता हो। और अगले ही पल वह उठ खड़ा हुआ।

दिन बीतते जा रहे थे और यतींद्र अपने स्वप्नों को विराम नहीं लगने देना चाहता था। संकल्प लेने के बाद उसने अपनी माँ सरीखी बड़ी बहन से कहा–“दीदी! मैं अब यहाँ से जाना चाहता हूँ। आज्ञा दीजिए।”

“यतींद्र! माँ की इच्छा थी कि तुम ‘इंदुबाला’ से ब्याह करो।”
“लेकिन दीदी! मैं शादी नहीं कर सकता।”
“क्यों?”
“’मेरे जीवन के संकल्प कुछ और हैं।”
“कैसे संकल्प?”

“जो इस रोज़-मर्रा की ज़िंदगी से मेल नहीं खाते। मैं गृहस्थ लोगों की भाँति अपने जीवन को चारदीवारी के पिंजरों में कैद करके नहीं रख सकता। और अपने मकसद के चलते मैं किसी की जान जोखिम में नहीं डाल सकता।”

“कौनसा मकसद? कैसा मकसद? और किस संकल्प की बात कर रहे हो तुम? और तुम्हारी वजह से किसी की जान जोखिम में क्यों पड़ेगी?”
“वो फिलहाल मैं नहीं बता सकता।”
“नहीं बता सकते तो इंदुबाला से ब्याह करो। माँ की भी यही इच्छा थी।”

यतींद्र रात भर अपने कमरे में लेटा विचार करता रहा। और इस फ़ैसले को टालने की लाख कोशिशों के बाद भी वो सफल न हो सका।

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यतींद्र अपने क्रांतिकारी सदस्यों के साथ बंगाल के भंग होने को लेकर चिंतित था। बारींद्र घोष ने आक्रोश भरे लहजे में कहा– “वायसराय कर्ज़न की नीति ने पूरे बंगाल को तोड़कर रख दिया। बस यही दिन देखना बाकी रह गया था।”

भोलानाथ– “कोई कर भी क्या सकता है।”
यतींद्र– “हम फिलहाल तो बहुत कुछ नहीं कर सकते! लेकिन कुछ तो कर ही सकते हैं।”
अन्य युवक – “क्या?”
यतींद्र – “चार दिन बाद प्रिंस ऑफ वेल्स का दौरा है।”
घोष– “लेकिन इससे क्या प्रयोजन?”

यतींद्र– “आजकल ऐसे बदतमीज़ अंग्रेज़ों की तादात बढ़ चुकी है जो आए दिन हमारी बहन-बेटियों के साथ बदतमीज़ी करते हैं। जब तक इनको इन्हीं के प्रिंस के सामने नहीं मारा जाएगा तब तक इनकी बदतमीजियाँ कम नहीं होंगी।”

भोलानाथ– तो क्या हम वहाँ गोली बारी करेंगे?
यतींद्र– हम नहीं सिर्फ़ मैं। और कोई गोली बारी नहीं होगी। इनके लिए केवल मेरे ये दो हाथ ही काफ़ी हैं!
अन्य युवक– लेकिन इसके बाद परिणाम क्या होगा?

यतींद्र ने मुस्कुराते हुए कहा– “अंग्रेज़ों को पीटने से काले पानी की सज़ा तो नहीं ही होती होगी। क्यों बारींद्र दादा?”
घोष– “खूब भालो।”

प्रिंस ऑफ वेल्स का स्वागत जुलूस निकल रहा था। चारों तरफ भीड़ से लबरेज़ लोग प्रिंस के स्वागत के लिए खड़े थे। यतींद्र भी जुलूस में शामिल था। गाड़ी की छत पर बैठे अंग्रेज़ों की बेहूदा हरक़तों ने यतींद्र को उन्हें सबक सिखाने का मौका दे दिया। गाड़ी की छत पर बैठे अंग्रेज़ों के जूते खिड़की की ओर लटक रहे थे जिनमें कुछ महिलाएँ बैठी हुई थीं।

यतींद्र ने उन अंग्रेज़ों से कहा– “आप तरीक़े से बैठिए। अपने जूते ऊपर कर लीजिए। आपके जूते उन महिलाओं के मुँह की ओर लगे हुए हैं।”
एक अंग्रेज़ बोल पड़ा– “हू आर यू बास्टर्ड?”

इतना सुनना था कि यतींद्र ने उसकी गर्दन पकड़ी और गाड़ी से नीचे गिरा दिया। दूसरा अंग्रेज़ यतींद्र को मारने के लिए आगे बढ़ा, इतने में यतींद्र ने उसे ज़ोरदार घूसा जमाया कि वह आप ही गाड़ी से नीचे जा गिरा। एक-एक कर बाकी के दोनों अंग्रेज़ों को यतींद्र ने बुरी तरह पीटा। और यह सारा दृश्य प्रिंस ऑफ वेल्स की आँखों से होकर गुज़रा।

यतींद्र को पकड़ लिया गया और कुछ दिनों बाद रिहाई भी मिल गई। यतींद्र जब वापस आया तो ‘अनुशीलन समिति’ के सदस्यों ने यतींद्र का ज़ोर-ओ-शोर से स्वागत किया।

घोष ने कहा– “तुम्हारे कारनामे की कहानी छपी है अखबार में। और यह काम बहुत अच्छा हुआ। इससे हम भारतीयों में यह संदेश पहुँचेगा कि हम इन अंग्रेज़ों के दबैल नहीं हैं। अगर ये बदतमीजियाँ करेंगे तो इसका जवाब भी हम इसी तरीक़े से देंगे।”

मनोरंजन सेन– “और यतींद्र दा इससे बंगाल की जनता में  हम क्रांतिकारियों के लिए सम्मान का भाव भी बढ़ रहा है। जगह जगह यह खबर फैल चुकी है कि एक अकेले क्रांतिकारी युवक ने महिलाओं से अभद्र व्यवहार कर रहे चार अंग्रेज़ों को भगा भगा कर पीटा।”

यतींद्र– “यह बहुत बड़ा काम नहीं हुआ जिसके लिए हम इतना ख़ुश हो रहे हैं।” इतना कहते ही पूरी समिति में सन्नाटा छा गया।
यतीश– “लेकिन यतींद्र प्रिंस के सामने अंग्रेज़ों की धुलाई कर देना, अंग्रेज़ सरकार के मुँह पर खुले-आम तमाचा मारने जैसा है। और इसे छोटा काम नहीं समझना चाहिए।”

यतींद्र – “छोटा है और बहुत छोटा है। लेकिन मेरे इरादे इतने छोटे नहीं। मैंने कुछ सोचा है। अब वह समय आ गया है कि हम अपनी एक अलग आर्मी बनाएँ और अंग्रेज़ों को हमारी मातृभूमि से बाहर निकाल फेंके।” यह सुन समिति के अन्य लोगों में खुसर फुसर होने लगी।

घोष ने समिति के सदस्यों को शांत कराते हुए यतींद्र से कहा– “लेकिन आर्मी को संगठित करने के लिए बहुत धन की आवश्यता होगी। हथियार वगैरह इन सबका इंतज़ाम कैसे होगा?”
चंद्रपाल ने व्यंग्य कसते हुए कहा– “कहाँ अंग्रेज़ों की आर्मी और कहाँ हम यहाँ बैठे बैठे हवाई बातें कर रहे हैं।”

यतींद्र ने आक्रोश भरे लहजे में कहा– “मैं हवाई बातें नहीं कर रहा हूँ। हम प्रयास तो कर ही सकते हैं। आख़िर कब तक इन अंग्रेज़ों से डरकर उनकी गुलामी करते रहेंगे। नहीं देखा जाता जब किसान और मजबूर इनकी बेगारी करते करते मर जाते हैं। इन अंग्रेज़ साम्राज्यवादियों को समाप्त कर श्रेणीहीन समाज की स्थापना ही हम क्रांतिकारियों का लक्ष्य होना चाहिए। और केवल अंग्रेज़ों से ही नहीं, अपने लोगों द्वारा हो रहे शोषण से मुक्त कराना और आत्मनिर्णय द्वारा जीवनयापन का हक़ पाना हमारा बुनियादी लक्ष्य होना चाहिए। और यह लक्ष्य तभी पूरा होगा जब अंग्रेज़ों को खदेड़कर यहाँ से बाहर किया जाएगा।”

चित्तप्रिय– “लेकिन दादा यह सब कैसे होगा?”
यतींद्र– “धन और हथियार के लिए हम डकैती करेंगे। और हमें बम फैक्ट्री का निर्माण जल्द से जल्द करना होगा ”
चंद्रपाल– “और अंजाम पता है?”
यतींद्र– “आज़ादी के लिए लड़ने वाले अंजाम की परवाह नहीं करते।”
घोष – “खूब भालो।”

यतींद्रनाथ दास की पूरी कहानी चार भागों में उपलब्ध होगी।