श्रद्धांजलि
बोस ने परिवार की अप्रसन्नता को कैसे स्वीकार किया, उनके लिखे पत्रों से समझें

“मनुष्य का जीवन इसीलिए है कि वह अत्याचार के विरुद्ध लड़े।”– बोस

नेताजी सुभाष चंद्र बोस को याद करते हुए उनकी 125वीं जयंती के पावन दिन पर पराक्रम के असली आदर्श की जयंती को पराक्रम दिवस घोषित करने के लिए भारत सरकार व संस्कृति मंत्रालय का विशेष आभार। बोस को इतिहास के पन्नों से यूँ गुमनाम रखना वामपंथियों की कपटता है।

स्वतंत्रता आंदोलन की उस युद्धमय स्थिति में भी वे महिला सशक्तिकरण के केवल वक्ता न बनकर कर्ता बने। आज़ाद हिंद फौज में झाँसी की रानी रेजिमेंट की स्थापना करना महिलाओं के प्रति उनके दृष्टिकोण को दर्शाता है। भारतवर्ष को सर्वप्रथम स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में घोषित करने वाले वे शाश्वत व्यक्ति थे।

‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा’, ‘दिल्ली चलो’ आदि उनके दिए हुए वे नारे थे जिसने विश्व के कोने-कोने में रह रहे भारतीयों के मन में अंग्रेज़ों से स्वतंत्रता प्राप्ति की लहर दौड़ा दी थी। उसी के चलते कुशल नेतृत्व के धनी बोस ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापान की सहायता से आज़ाद हिंद फौज की स्थापना की । 

23 जनवरी 1897 में जन्मे कुशल संगठक व भारतप्रेमी सुभाष चंद्र बोस भारत में ही नहीं विश्व में भी आदर्श के रूप में माने जाने वाले व्यक्तित्व हैं। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उभरे हुए आजतक के अद्वितीय नेता हैं बोस। उन्होंने कहा था-

“हम जिस स्वतंत्रता की अवधारणा लेकर काम कर रहे हैं वह त्याग, कष्ट और सहिष्णुता के मूल्यों का परिशोध न करने तक प्राप्त नहीं हो सकता। इस बात का अनुभव करने के लिए जिनका हृदय और जो कष्ट सहने को सहने को तैयार है, वह पूजा के फूल हाथों में लेकर आगे आएँ।” 

उस समय के सबसे कठिन माने जाने वाली परीक्षा आईसीएस में बोस अच्छे परिणाम के साथ उत्तीर्ण हुए। परंतु उन्होंने इसका पद ग्रहण नहीं किया जिस वजह से उनके पिताजी को बहुत दुःख हुआ और वे बीमार पड़ गए। उनकी हालत देखकर बोस के बड़े भाई शरत् चंद्र ने उन्हें पत्र लिखा–

“पिताजी तुम्हारे सिद्धांत के कारण बहुत क्रोधित हुए हैं। आवेग के वशीभूत होकर तुमने यह निर्णय कैसे लिया? तुमने पिताजी के साथ चर्चा क्यों नहीं की?”

पत्र पाकर सुभाष धर्म संकट जैसी स्थिति में पड़ गए। विनम्रता के साथ भाई को लिखा-

“इंग्लैंड के राजा के प्रति आधीनता स्वीकार का शपथ लेना मेरे लिए संभव नहीं है। मैं खुद को राष्ट्र की सेवा में समर्पित करना चाहता हूँ। मैं कठिन परिस्थिति का सामना करने को तैयार हूँ। यहाँ तक कि अभाव, दरिद्रता और माता-पिता की अपसन्नत्ता को भी सहने के लिए प्रस्तुत हूँ।”

सुभाष के इस उत्तर में दादा ने फिर एक पत्र लिखा-

“पिताजी को रात भर नींद नहीं आती। वे अत्यंत व्याकुल हो गए हैं। भारत आने पर तुम्हें बंदी बनाया जाएगा। सरकार अब तुम्हें आज़ाद रहने नहीं देगी। तुम्हारे गतिविधि को रोकने के लिए निश्चय ही पदक्षेप लेंगे।”

इस पत्र को बोस के मित्र दीलिप राय ने भी पढ़ा था। उन्होंने कहा था कि बोस अभी भी समय है। तुम चाहो तो पद-त्याग पत्र वापस ले सकते हो। इसे सुनते ही बोस का चेहरा लाल हो गया। उन्होंने कहा, “तुमने ऐसा सोचा भी कैसे?”

दिलीप राय ने सुभाष का गुस्सा देखकर धीरे से कहा, “पिताजी की हालत को सोचते हुए मैंने ऐसे कहा।”

बोस ने कहा- ‘मैं समझ रहा हूँ, लेकिन अगर हम हमारे परिवार की प्रसन्नता को देखते हुए आदर्श निर्धारित करेंगे तो वह सही होगा क्या।” इस बात को सुनकर दिलीप राय स्तंभित हो गए ।

“त्यजेदेकं कुलस्यार्थे, ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥”

मीनाक्षि जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में शोधछात्रा हैं।