श्रद्धांजलि
रानी दुर्गावती के जन्मदिन पर विशेष- जबलपुर के पास हुआ था जौहर

भारत के इतिहास के उपेक्षित और लगभग भूले-बिसरे किरदारों में से एक हैं रानी दुर्गावती, जिनका आज जन्म दिवस है। आजादी के बाद अकबर की महानता के पाठ हमें जीवन रक्षक घोल की तरह पिलाए गए हैं। इन्हीं अकबर “महान्’ ने अपनी ताकत वर्तमान मध्यप्रदेश के अपने इलाके में राज कर रही रानी दुर्गावती को कुचलने के लिए इस्तेमाल की थी।

जंग के मैदान में आखिर तक बचे अपने चंद सैनिकों के साथ रानी दुर्गावती ने अकबर की फौज का सीधा मुकाबला किया और जिंदा हाथ लगने से पहले अपना ही खंजर खुद को घोंपकर जान दे दी। घायल हालत में बच निकले रानी के बेटे को बाद में घेरकर मारा गया।

जबलपुर के पास चौरागढ़ के महल में राज परिवार की महिलाओं ने जौहर किया। रानी दुर्गावती की होने वाली बहू और बहन जीवित पकड़ी गईं। महान अकबर ने दोनों को अपने हरम में दाखिल किया।

1524 में 5 अक्टूबर के दिन दुर्गाष्टमी थी। इसी दिन बुंदेलखंड के कालिंजर में कीर्तिसिंह चंदेल के यहाँ एक बेटी का जन्म हुआ। दुर्गाष्टमी के दिन बेटी की किलकारी घर में गूँजी थी इसलिए नाम हुआ दुर्गावती। यह कालिंजर वही जगह है, जिसे दिल्ली पर इस्लामी कब्जे के बाद पहली ही सदी में कुतबुद्दीन एबक, इल्तुतमिश और बलबन समेत कई तुर्क गुलामों ने कई बार रौंदा था। इसके बाद भी यहाँ लगातार इस्लामी हमलावर मार-काट मचाते रहे थे।

  कालिंजर वही किला था, जहाँ शेरशाह सूरी दुर्गावती के ही राजवंश के चंदेलों से मार-काट के दौरान एक विस्फोट में खुद मारा गया था। यह 22 मई 1545 की हेडलाइन है। इस घटना से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि दिल्ली पर कब्जे के 300 साल बाद भी हिंदू इस हैसियत में खुद को बनाए हुए थे कि वे एक बेरहम अफगान शेरशाह सूरी से मुकाबले में टिके हुए थे।

वही सूरी जिसने बाबर के बेटे हुमायूं को हिंदुस्तान से जान बचाकर भागने पर मजबूर किया था। वह खुद चंदेलों से टकराकर आज के आतंकियों की तरह एक विस्फोट में खुद के चिथड़े उड़ा बैठा।

 रानी दुर्गावती को सूरी के मारे जाने के शुभ समाचार 21 साल की उम्र में अपनी ससुराल चौरागढ़ के किले में मिले होंगे। वे दलपत शाह की रानी थीं। उनका विवाह 1542 में हुआ था। शेरशाह के हमले से तीन साल पहले। चौरागढ़ आज के मध्यप्रदेश की एक शानदार ऐतिहासिक जगह है, जिसे आधुनिक भारत का तीर्थ होना चाहिए था।

रानी दुर्गावती के शासन की भूली-बिसरी यादें स्थानीय दायरे में दम तोड़ रही हैं, लेकिन अकबर के साथ उनकी टक्कर और वीरतापूर्ण लड़ाई ने इतिहास में उन्हें अमर कर दिया। दलपत शाह से शादी के बाद एक बेटा हुआ। दलपत की मौत उसी समय हो गई, जब उनका बेटा वीर सिर्फ 5 साल का था।

 मगर हुआ क्या था?

 अकबर को आखिर 150 कोस लंबे और 80 कोस चौड़े 30 हजार गाँवों वाले छोटे से इलाके में स्थित एक दूर-दराज राज्य की इस युवा रानी से क्या दुश्मनी थी? उसकी क्या नीयत थी, जो 10,000 की फौज के साथ इलाहाबाद से आसिफ खां को भेजा, ताकि वे दुर्गावती के राज्य का वही हाल करे, जो उसके पहले की इस्लामी सेनाओं ने अपने हर झपट्‌टे में भारत के अलग-अलग इलाकों का कर डाला था। कत्लेआम करो, लूटपाट करो, औरतों-बच्चों को गुलाम बनाकर ले आओ।

दुर्गावती ने तो कोई चुनौती कभी पेश नहीं की थी। क्या वह दुर्गावती को भी अपने हरम में देखना चाहता था? या दुर्गावती के हाथों मांडू के बाज बहादुर के बार-बार हारने की खबरों ने अकबर की नींद उड़ा दी थी? अकबर की महानता के लिए जरूरी था कि दूसरों को हराने वाला सिर्फ वही रहे! उसके रहते कोई कैसे किसी को हरा सकता है?

 हम सीधे शेख अबुल फज़ल के पास चलते हैं। एक वही शख्स है, जो हमें बताएगा कि आखिर हो क्या रहा है? अबुल फज़ल ने मालवा में रायसेन से लेकर बुंदेलखंड में पन्ना और वर्तमान जबलपुर के आज के इलाके को घेरने वाले तब के गढ़ कटंग नाम के इस प्रांत के दस राजाओं के नाम सहित जिक्र किए हैं, जो पीढ़ियों से राज कर रहे थे। इन सब पर दुर्गावती का राज था। राजधानी चौरागढ़…

 अबुल फज़ल बता रहा है-“जब मुसलमानों ने पहली बार हिंदुस्तान पर फतह पाई, तब उनमें से कोई इन मजबूत किलों तक पहुँच नहीं पाया था। अब कड़ा के जागीरदार आसफ खाँ ने पन्ना को जीत लिया है। इस समय गढ़ कटंगा पर दुर्गावती का राज है। रानी अपनी हिम्मत, दानशीलता और ऐसे गुणों के कारण प्रसिद्ध हैं। प्राचीनकाल से गढ़ा का राजवंश ऊँचा और प्रतिष्ठित था। जब आसफ खाँ ने पन्ना जीत लिया, तब भी दुर्गावती को अपनी हिम्मत और काबिलियत पर इतना भरोसा था कि उसे कोई डर नहीं हुआ।’

 अकबर तक आते-आते दिल्ली में मुस्लिम राज्य को 350 साल से ज्यादा हो चुके थे लेकिन भारत के दूर-दराज हिस्सों पर कब्जे करने और किसी भी हालत में फतह करने के तौर-तरीके एक जैसे थे। आसफ खाँ ने रानी दुर्गावती से दोस्ती के इरादे से पहले अपने जासूस और कुछ कारोबारी भेजकर पता लगाया कि रानी के राज्य में माल-मत्ता कितना है?

इन लोगों ने लौटकर रानी के राज्य में बेहिसाब दौलत के किस्से आसफ खाँ को सुनाए तो उसकी आँखें वैसी ही चमकीं जैसी बंगाल की लूट ने बख्तियार खिलजी के लालच को बढ़ा दिया था। ये ब्यौरे बहुत काम के थे। आसफ खाँ ने फौरन रानी के राज्य की सीमाओं से लगे गाँवों में लूटपाट मचाने के साथ ही अपना काम शुरू कर दिया।

आखिर में अकबर का हुक्म आता है। अबुल फजल की ताजा खबर-“बादशाह के हुक्म से आसफ खाँ ने 10,000 सवार और बड़ी तादाद में प्यादों की फौज खड़ी करके दमोह के पास तक जा पहुँचा। बादशाह की वजह से उस इलाके के बड़े और छोटे कितने ही जागीरदारों ने आसफ का साथ दिया। जब आसफ की फौज दमोह तक आ गई तब रानी को इस हमले का इल्म हुआ। उसकी फौज में 2000 सवार और एक हजार हाथी थे।

वह तीर और बंदूक की अच्छी निशानेबाज थी। जब कभी शिकार के दौरान उसे कहीं शेर के होने का पता चलता तो वह पानी पीने के लिए भी रुकती नहीं थी। शेर को मारकर ही चैन लेती थी। हिंदुस्तान में उसके युद्धों की और उसकी दावताें की कई कहानियाँ हैं। उसे अपनी हिम्मत पर भरोसा था। इसलिए उसने अकबर के आगे झुकना कभी कुबूल नहीं किया।’

 ये सब बहुत अचानक ही हुआ। एक बार फिर हम देखते हैं कि हमले की कोई वजह नहीं है। राज्य की सीमाओं की कोई लड़ाई नहीं हैं। रानी दुर्गावती ने अपनी तरफ से कभी कोई उकसाने वाली पहल नहीं की। यह सिर्फ महान” अकबर के घमंड की चरम सीमा थी।

एक ही जिद थी-झुको या मरो। जब आसफ खाँ का अचानक हमला हुआ तो रानी के सारे खास अहम ओहदेदार अपने कुटुंबों को संभालने के लिए यहाँ-वहाँ हो गए। उनकी एकजुट होकर लड़ने की कोई तैयारी नहीं थी। रानी के पास सिर्फ 500 लोग बचे। पीछे हटने की बजाए रानी ने अपने पूरे आत्मविश्वास के साथ भिड़ने का निर्णय लिया।

  रानी के मंत्री आधार सिंह ने आसफ खाँ की बड़ी फौज की ताकत और अपनी मुट्‌ठी भर फौज का ब्यौरा दिया। रानी का जवाब अबुल फज़ल ने इन शब्दों में लिखा-“मैं वर्षों से इस देश पर राज्य कर रही हूँ। मैं भागने का विचार कैसे कर सकती हूँ। बेइज्जती के साथ जिंदा रहने से इज्ज़त की मौत भली है। आसफ खाँ मेरे बारे में जानता क्या है? मेरे लिए यही सबसे बेहतर है कि मैं हिम्मत से उसका मुकाबला करूँ और लड़ते हुए अपनी जान दे दूँ।’

 अपने 2000 सैनिकाें के साथ भारत के इतिहास की एक महान किरदार आसफ खाँ से मुकाबलें में उतरी। गढ़ा के उत्तरी जंगलों से होकर वे पूर्व में किसी नरहा नाम की जगह पर जा पहुँचीं। यह ऐसी जगह थी, जहाँ चारों तरफ ऊंचे पहाड़, एक तरफ गौर नाम की नदी और दूसरी तरफ नर्मदा नदी है। आसफ खाँ दमोह में घात लगाए बैठा था। वह गढ़ा की तरफ रास्ते के गाँवों में लूटपाट करते हुए बढ़ा। उसे रानी की लोकेशन का पता चला तो गढ़ा में अपने गुर्गे छोड़कर उस तरफ बढ़ा।

 उधर रानी के पास अब तक 5000 की फौज इकट्‌ठा हो चुकी थी। यह कैसी लड़ाई रही होगी? रानी अपने साथ वर्षों से काम कर रहे सैनिक अधिकारियों से कह रही है-“जो जाना चाहते हैं, खुशी से चले जाएँ। मैं तो लड़ना चाहती हूँ। मेरे सामने तीसरा विकल्प नहीं है। या तो मैं मर जाऊँगी या जीत हासिल करूँगी।’

 कम सैन्य संख्या के बावजूद रानी ने बहुत समझदारी से युद्ध की लोकेशन तय की थी। जबलपुर के पास यह एक ऐसी घाटी थी, जहाँ वे अपने कम से कम नुकसान के साथ ज्यादा देर तक युद्ध जारी रख सकती थीं। अब आसफ खाँ तेजी से उनकी तरफ बढ़ रहा था।

अब रास्ते में डटी रानी की सेना और आसफ के हमलावर लुटेराें के बीच टकराने की खबरें आने लगी थीं। रानी जैसा चाहती थीं, वैसी ही शुरुआत हुई। आसफ खाँ की तरफ से आए 300 मुगलों के शहीद होने का समाचार अबुल फज़ल ने दर्ज किया। रानी ने आसफ के भागते हुए फौजियों का पीछा किया।

  आसफ खाँ को पीछे हटना पड़ा। रानी विकट जोश से भरी थीं। उन्होंने अपने मुख्य सरदारों को बुलाकर उसी रात आसफ की फौज पर टूट पड़ने का प्रस्ताव रखा, ताकि अगली सुबह तक फैसला ही हो जाए और आसफ पलटकर हमला करने लायक ही न बचे। लेकिन रानी जितना हिम्मतवर उनके आसपास कोई नहीं था।

सबने उन्हें हमला करने की बजाए लौटकर अपने स्थान पर जाने की सलाह दी। उन्हें सबकी बात सुननी और माननी पड़ी। अगली सुबह वही हुआ, जो होना था। चोट खाए आसफ ने तोपों के साथ घाटी का रुख किया।

 सरनाम नाम के हाथी पर सवार होकर रानी अब सीधी लड़ाई में उतरीं। दोनों तरफ से तीरों की बारिश हुई। बंदूकें चलीं। तलवार और खंंजर चमके। रानी के बेटे वीर शाह ने तीन बार अकबर की इस “महापराक्रमी’ सेना को पीछे धकेला। अबुल फज़ल ने दर्ज किया है कि तीसरे हमले में वीर शाह जख्मी हो गया।

रानी ने अपने भरोसेमंद लोगों को भेजा ताकि वीर शाह को किसी सुरक्षित जगह पर पहुँचाया जा सके। इस कारण बहुत से सैनिक मैदान छोड़ गए। अब एकदम आसफ का पलड़ा भारी था और भौगोलिक स्थिति को देखें तो अपनी सुरक्षा के लिए रानी को भी निकल जाने का आसान विकल्प सामने था। रानी के पास अब सिर्फ 300 सैनिकों की उपस्थिति बची। एक तरह से फैसला तय था। लेकिन रानी ने इन मुट्‌ठी भर सैनिकों के साथ ही आसफ के हमलावरों से मुकाबला जारी रखा।

 कहीं से आया एक तीर रानी की दाईं कनपटी में धंस गया। अपने एक हाथ से उन्होंने उसे निकाल फेंका लेकिन उसका नुकीला हिस्सा घाव में ही रह गया। फिर एक और तीर उनकी गर्दन में लगा। वह भी रानी ने निकाल फेंका लेकिन वह अचेत हो गईं।

मंत्री आधार सिंह उनके पास ही था। लगभग एक हार चुके युद्ध के मैदान में होश आने पर रानी आधार से कुछ कहती है। यह उनका आखिरी संवाद है। रानी का वह आखिरी बयान “महान’ अकबर के सबसे भरोसेमंद और करीबी लेखक शेख अबुल फज़ल ने ही लिखा है-

-“मैंने तुम्हें शिक्षा देने में सदैव परिश्रम किया। मैं समझती रही हूँ कि तुम एक दिन अच्छी सेवा करोगे। वह दिन आज आ गया है। दुश्मन ने मुझे घेर लिया है। ईश्वर करे मेरा नाम और यश न डूबे और मैं दुश्मन के हाथ न पड़ूँ। इसलिए तुम एक स्वामी भक्त सेवक की तरह मुझे इस खंजर से यहीं खत्म करो।’ रानी के शब्द हैं।

-“ऐसे काम के लिए मेरा हाथ कैसे उठ सकता है…जिस हाथ ने आपसे बख्शीशें ली हैं वह ऐसा काम कैसे कर सकता है…मैं आपकाे इस घातक रणभूमि से दूर ले जा सकता हूँ…मुझे अपने तेज रफ्तार हाथी पर पूरा भरोसा है।’आधार काँपते हुए स्वर में बोला।

 -“तुम इस लज्जाजनक काम को मेरे लिए अच्छा समझते हो?’ रानी ने गुस्से में आकर यह कहा और अपना खंजर निकाला। बड़े ही पुरुषार्थ से उसने खुद पर वार किया। वहीं मैदान में रानी दुर्गावती ने आखिरी सांस ली। पीठ नहीं दिखाई। भागी नहीं। जिंदा हाथ भी नहीं आई। “महान’ अकबर को उसकी मौत की खबर ही मिली।

रानी के कई सैनिक भी वहीं मारे गए, जिनके हमें नाम भी नहीं मालूम। आसफ खाँ के लुटेरों ने रानी के 2000 हाथियों पर कब्जा जमाया। लूट का बहुत सारा माल हाथ लगा। जिस इलाके पर रानी ने 16 साल हुकूमत की थी, अब वह महान अकबर के कब्जे में आ चुका था।

वह 24 जून 1564 का दिन था। अगर उस दिन 40 वर्षीय रानी ने अपना खंजर खुद को न घोंपा होता तो अकबर के हरम की औरतों की भीड़ में वे भी कहीं खो गई होतीं। बेशक उन बेइज्जत महिला कैदियों में उनके ही साथ उनकी बहन कमलावती और उनकी होने वाली बहू भी होती, जो विवाह के पहले ही बेवा हो गई।

अपने एकमात्र पुत्र वीर शाह की मौत और राज्य को खोने का दर्द लिए रानी दुर्गावती “महान’ अकबर के रौनकदार हरम में कब दम तोड़तीं कभी कोई नहीं जान पाता। हम अब भी कितना जानते हैं उन्हें?

दो महीने बाद। चौरागढ़ में जौहर…

 आसफ खाँ ने चौरागढ़ यानी रानी दुर्गावती की राजधानी का रुख किया। इस किले में बेहिसाब दौलत और कीमती रत्न गड़े होने की खबरें अकबर के आसपास फैली हुईं थीं। अब लूट की मुहिम शुरू हुई। रानी का बेटा वीर शाह जख्मी हालत में यहीं आया था। अबुल फजल की लाइव रिपोर्ट-

“वीर शाह किले से बाहर आया। शाही फौज से लड़ा। एक बहादुर की मौत मारा गया। उसने पहले ही दो लोगों को जाैहर के लिए नियुक्त किया हुआ था। भारतीय राजाओं में यह प्रथा है। ऐसी हालत में वे लकड़ी, रुई, घास और घी एक जगह जमा करते हैं। इसकी आग में औरतें जलकर मरती हैं। यह जौहर कहलाता है।

इन दोनों सेवकों ने यह सेवा पूरी की। अगर कोई औरत उस वक्त कमजोर हुई तो उसे भी जला दिया गया। जौहर के चार दिन बाद जब दरवाजा खोला गया तो दो महिलाएं जिंदा मिलीं।वे लकड़ियों के ढेर के पीछे छिपी थीं। इनमें से एक रानी की बहन कमलावती थी और दूसरी राजा पुरगढ़ा की बेटी थी, जिसका विवाह वीर शाह से होना था, लेकिन अभी हुआ नहीं था। इन दोनों को अकबर ने अपने हरम में शामिल किया।

आसफ खाँ के हाथ अपार सोना और चांदी लगे। सोने के सिक्के, पांसे, बर्तन, रत्न, मोती, रत्नों से जड़ी मूर्तियाँ और ऐसी कई बेशकीमती चीजें, जिनकी गिनती नहीं की जा सकती। आसफ खाँ ने इनमें से कुछ भी अकबर को नहीं भेजा। 1000 में से सिर्फ 200 हाथी भेजे।’

  अकबर की महानता को आसफ खाँ से बेहतर कौन जानता था। उसने लूट का पूरा माल दबा लिया। उसे पता था कि अकबर किस चीज से खुश होगा। तभी तो उसने दुर्गावती की बहन कमलावती और उनकी होने वाली बहू को उसके हरम में ही भेजा था। जहाँपनाह को वह मिल गया था, जिसके लिए वह किसी भी फलते-फूलते ऐसे राज्य को भी हर समय मिट्टी में मिलाने के लिए तैयार था, जिससे कभी कोई चुनौती भी नहीं थी। हर इलाके की हर खूबसूरत और बेशकीमती चीज उसके पास होनी ही चाहिए थी।

 नवरात्रि के पर्व की धूमधाम में आज का दिन एक ऐसी रानी को याद करने का है, जिसने महाबली अकबर के आगे झुकना स्वीकार नहीं किया। नवरात्रि में जन्मी उस रानी ने अपने प्राणों की आहुति से अपना नाम सार्थक किया था। आजाद भारत में अकबर की महानता कितना सिर चढ़कर बोली।

किताबों में उसे सम्राट अशोक के बराबर इतिहास पुरुष तक बता दिया गया। लेकिन रानी दुर्गावती की आवाज चौरागढ़ के पहाड़ी इलाकों की आखिरी गूंज बनकर सिमट गई। एक ऐसी पवित्र पुकार, जिसे अभी पूरी श्रद्धा से अपनी लबालब आँखों से सुना जाना शेष है। और तब तक नवरात्रि की हमारी आराधना भी अधूरी है…

विजय मनोहर तिवारी

भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक। छह किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। कई पुरस्कार मिले हैं। भारत में इस्लाम के फैलाव पर 20 साल से अध्ययनरत। स्वराज्य के सहयोगी लेखक।