श्रद्धांजलि
जयंती विशेष- शिवाजी द्वारा की गई ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की गाथा

आशुचित्र- शिवाजी का हर सैन्य अभियान बेमिसाल साहस की रोमांचकारी कहानी है, लेकिन 1659 से 1664 तक पांच साल का यह कालखंड हैरत अंगेज़ कामयाबियों से भरपूर है और यह ‘सर्जिकल स्टाइक’ भी उसी अवधि की एक गाथा है।  

छत्रपति शिवाजी भारत के उन महान् नायकों में से हैं, जिनका ज़िक्र ही जोश भर देता है। वे अपने समय के किसी बड़े अजूबे से कम नहीं हैं। उन्होंने अपने छोटे से जीवन में यह सिद्ध किया कि साधनों की कमी का रोना फिजूल है। वे कुशल रणनीतिकार हैं और महान योद्धा भी। उनके युद्ध अभियान की योजनाएँ चौंकाने वाली हैं। दुस्साहस की सीमा तक अपने ही जीवन को जोखिम में डालने वाले सफल अभियानों का नेतृत्व करके शिवाजी ने बताया कि अगर योजना सही बनाई गई  है और प्रतिभा की पहचान आपमें है तो कोई फर्क नहीं पड़ता कि सामने वाला कितना ताकतवर और कितना बड़ा है? मैं उन्हें अपने समय का अजूबा इसलिए मानता हूँ क्योंकि वे चारों तरफ दुश्मनों से घिरे थे और अपनी शुरुआत एक तरह से शून्य से ही की। सिर्फ पचास साल की ज़िंदगी पाई और एक के बाद एक इतनी मिसालें कायम की हैं कि आप देखकर हैरान रह जाते हैं। भारत के अंधेरे युग में जली एक मशाल हैं छत्रपति शिवाजी। सहयाद्रि के हरे-भरे जंगलों और पहाड़ों से उतरी ऊर्जा की एक ऐसी लहर, जो आज भी प्राणों को आंदोलित कर देती है।

शिवाजी का हर सैन्य अभियान बेमिसाल साहस की रोमांचकारी कहानी है, लेकिन पांच साल का वह कालखंड मुझे हमेशा सोचने के लिए मजबूर खुशी से भर देता है, जब उन्होंने एक के बाद एक हैरत अंगेज़ कामयाबियाँ हासिल कीं। यह समय है 1659 से 1664 का। इस दौरान उन्होंने अपने आसपास बीजापुर के आदिलशाह, अहमदनगर के निजामशाह से लेकर दिल्ली के मुगल बादशाह तक की नींदें हराम कर दीं। इन कम्बख्त सुलतानों और बादशाहों के अलावा शिवाजी को सबसे ज्यादा अपनों ने ही सताया। महाराष्ट्र के कई असरदार लोग उन दिनों शिवाजी के खिलाफ इन बहमनी सुलतानों के तलवे चाट रहे थे। लेकिन अपने चंद साहसी और भरोसेमंद सहयोगियों के साथ शिवाजी ने वो कर दिखाया, जो सुलतानों-बादशाहों के लिए भी मुमकिन नहीं था।

शिवाजी ने इस भ्रांति को भी हमेशा के लिए तोड़ा कि भारतीयों के पास साहस की कमी है। वे दूरदृष्टि नहीं होते। गुलामी उनकी फितरत में है। वे संगठित नहीं हैं इस वजह से पराजित हैं। हर संभव और अप्रत्याशित प्रतिकूल परिस्थितियों में भी संतुलित रहकर कैसे किसी काम की तैयारी होती है और कैसे उसे अपने न्यूनतम नुकसान और अधिकतम उपलब्धियों के साथ समय सीमा में अंजाम दिया जाता है, यह किसी और ने नहीं, शिवाजी ने ही दुनिया को बताया। बेरहम मुगल बादशाह औरंगज़ेब के चचा शाइस्ताखान के खिलाफ पुणे में की गई ‘स र्जिकल स्ट्राइक’ तो इन पांच सालों की एक ऐसी घटना है, जिसकी दूसरी मिसाल मिलना मुश्किल है।

शिवाजी का जन्म 1630 का है। फरवरी महीने की 19 तारीख। मुगल सेनापति शाइस्ता खान की फौज के बीच से घुसकर सीधे शाइस्ता खान के शिविर में जाकर हमला बोलना, मौत के मुँह में जाने जैसा कारनामा था। तब शिवाजी की उम्र थी सिर्फ 33 साल। इस उम्र में आज के हज़ारों प्रतिभाशाली नौजवान ढंग की नौकरी के लिए भटक रहे होते हैं। और इस उम्र तक शिवाजी ऐसे कई सैन्य अभियानों का कुशल नेतृत्व कर चुके थे, जिनमें उन्होंने अपने से कई गुना ज्यादा ताकतवर और साधन संपन्न फौज को सीधी टक्कर में हराया। शाइस्ता खान मुगलों की तरफ से शिवाजी के खात्मे की सुपारी लेकर एक लाख फौजियों के साथ पुणे आया था। तीन साल तक लगातार जितना संभव था उसकी फौज ने अपना आतंक फैला दिया था। पुणे पर कब्ज़ा हो चुका था और फौजियों के खेमे चारों तरफ एक बड़े शहर का नजारा पेश करते थे। शाइस्ता खान ने अपने और अपने हरम के लिए वह लाल महल चुना, जो कभी शिवाजी के परिवार का निवास था। यहाँ शिवाजी का बचपन बीता था।

जिस वक्त औरंगाबाद से निकलकर अहमदनगर होते हुए जब शाइस्ता ने पुणे में हल्ला बोला, उस समय भी शिवाजी अपने किसी किले में आराम नहीं फरमा रहे थे। बीजापुर और अहमदनगर के सुलतानों की फौजेें उनकी तलाश में लगातार भूखे भेड़ियों की तरह इस किले से उस किले को लगातार महीनों तक घेरे रही थीं। शाइस्ता खान से मुकाबले के पहले के तीन सालों में चार बड़ी कामयाबियों के जरिए शिवाजी ने बता दिया था कि उनके रहते बादशाहों और सुलतानों के क्रूर एकाधिकार की दक्षिण में तो गुंजाइश नहीं है।

आज के खुशगवार लोकतांत्रिक माहौल में हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि उन दिनों किस तरह बहमनी सुलतानों की आपसी लड़ाइयों में भी मराठा पिस रहे थे और बीच-बीच में दिल्ली के बादशाहों की फौजें भी रौंद रही थीं। लड़ाई का मैदान भी मराठों की जमीन थी और हरेक सुलतान-बादशाहों की फौजों में आपस में मरने-मारने के लिए भी मराठे ही थे। लूटमार और कत्लेआम में सबसे ज्यादा हर तरह का नुकसान मराठों का ही था और ऐसा बीते ढाई सौ साल से चल रहा था। तब से जब अलाउद्दीन खिलजी ने देवगिरि के यादव राजवंश को फतह किया। इसके बाद महाराष्ट्र का सूरज जैसे अस्त ही हो गया था। शिवाजी भारत के उस गहरे अंधेरे क्षितिज में चमके एक नया सूर्य ही थे।

पुणे में डेरा डालकर बैठे शाइस्ता खान का हिसाब बराबर करने के लिए आखिरकार शिवाजी महाराज ने एक प्लान बनाया। यह प्लान सबके होश उड़ाने वाला था। बाबा साहेब पुरंदरे लिखते हैं कि महाराज के प्लान हमेशा ही बहुत मुश्किल होते थे। लेकिन एक बार प्लान बना तो फिर पूरी ताकत से, बिना किसी कमजोरी के और आत्मविश्वास के आखिरी कतरे को भी खींचकर उसे पूरा करना ही होता था। इस बार प्लान बना-शाइस्ता खान ने जिस लाल महल में डेरा डाल रखा है, वहां सीधे घुसकर हमला बोला जाए! उनका एक्शन बहुत हुआ, अब हमारा रिएक्शन शुरू होता है।

वह रमज़ान का मुबारक महीना था। ऑपरेशन के लिए छह अप्रैल 1663 काे आधी रात का वक्त तय किया गया। यह मुगलों के ढाई सौ सालों के राज में ऐतिहासिक “सर्जिकल स्ट्राइक’ का दिन है। भारत के इतिहास में उजाले की एक किरण जैसा। सच्चे भारतीय का असली परिचय देने का दिन। शिवाजी ने अपने चार सौ महावीर मावलाओं के साथ बड़ी शान से यह परिचय दिया था। इस अभियान के हर सेकंड में शिवाजी किसी महानायक की तरह परदे पर दिखते हैं। उनकी हर अदा हैरत में डालने वाली है। वे बुद्धिमान वीर, दूरदर्शी योद्धा, कुशल रणनीतिकार और अपनी टीम का ख्याल रखने वाले संवेदनशील लीडर थे।

सबसे पहले शिवाजी के दक्ष गुप्तचर शाइस्ता खान के कैम्प की दूर-पास की हर बारीक जानकारी लेकर आते हैं। इस आधार पर शिवाजी ने अपने वॉर रूम में डिटेल प्लानिंग की। भरोसेमंद सरदारों के साथ चार सौ बहादुर मावला चुने। हरेक को एक खास जिम्मेदारी दी गई। यह जोशीले जवानों का जल्दबाज झुंड नहीं था। कदम-कदम की डिटेल प्लानिंग। हरेक की अपनी ऑनरशिप तय की गई। राजगढ़ के किले से किस समय सब निकलेंगे। पुणे कब तक पहुंचना। पुणे के मीलों पहले बनी खान साहब की चौकियों पर पहरेदारों से क्या कहना, कैसे कैम्प में दाखिल होना, किस रफ्तार से लाल महल तक पहुंचना और घुसना। ऑपरेशन पूरा होने के बाद बाहर किस शान से लौटना और दूसरी दिशा में कितने लोग घोड़े को लेकर तैयार रहेंगे ताकि एक मिनट गंवाए बिना दूसरे किले में सुबह होने तक सुरक्षित पहुँचा जा सके।

शाइस्ता खान की बेरहम फौज का मतलब औरंगज़ेब की फौज। औरंगज़ेब की फौज का मतलब हिंदुस्तान के तख्तो-ताज के मालिक की खूंखार फौज। भारत के इतिहास में ताकतवर और इंसाफ पसंद हुक्मरानों की तरह बताए और पूजे गए महान मुगलों की शान में गुस्ताखी का हक किसी को नहीं था। कम से कम किसी काफिर को तो कतई नहीं। यह कोई मज़ाक नहीं था। क्या मजाल कि एक “पहाड़ी चूहा’ बादशाह औरंगज़ेब के चचा और सल्तनत के अजेय मंसबदार, कोई और नहीं स्वयं शाइस्ता खान को घर में घुसकर मारना तो दूर की बात, ख्वाब में भी ऐसा सोचे। मुगलों की नजर में शिवाजी “पहाड़ी चूहा’ ही थे। जबकि शिवाजी सहयाद्रि की गोद में खेलकर शेर बने थे। उनके दिल-दिमाग में स्वराज्य का सपना उनके बचपन में ही डाल दिया गया था। एक मां ने यह किरदार समय के परदे के लिए गढ़ा था। वह प्रात:स्मरणीया जीजा बाई थीं। इस शेर शावक ने अभी पंजे फैलाए ही थे। हम कह नहीं सकते कि अगर शिवाजी अस्सी साल जीए होते तो भारत की शक्ल कैसी होती? इतिहास का रुख क्या होता?

तो छह अप्रैल की शाम सूरज ढलते ही खंजर और तलवारों के साथ ढोल, नगाड़े लिए एक मामूली सी फौज के साथ पहाड़ी चूहा राजगढ़ किले से नीचे उतरा। उन्हें चंद घंटों में ऐसी जगह पहुंचना था, जहां से पुणे साफ नजर आ जाए। किसी भी सूरत में रात ढलनी नहीं चाहिए थी। आधी रात के वक्त टारगेट तक पहुँच अनिवार्य तय की गई थी। आगे पहुँचकर पीछे वालों को क्या इशारे करने हैं, सबको पता थे। पुणे के पहले ही चौकी पर शाइस्ता खान के पहरेदारों ने इन्हें रोका। ये सब बड़ी चतुराई से मुगल फौजी बन गए और पूरी ठसक से बताया कि वे लोग कटक से हैं। कैम्प के बाहर निगरानी से लौट रहे हैं। इतनी पूछताछ के बाद इन्हें अंदर आने दिया जाता है। दरअसल दोनों ही तरफ मराठे सैनिक हुआ करते थे। इसलिए इनकी भाषा-बोली और पहनावे पर किसी को शक नहीं हुआ। भीतर दाखिल होते ही अब ये सब मगरमच्छों के जबड़े में हैं। शिवाजी काे लाल महल का रास्ता याद है। यहाँ चूक की गुंजाइश बिल्कुल ही नहीं है। वे सबको लाल महल की तरफ ले जाते हैं। चारों तरफ शाइस्ता खान की फौज के खेमे लगे हैं। ये योद्धा अपने महानायक के साथ प्राणों की बाजी लगाकर आए हैं और दम साधे अपने टारगेट की तरफ बढ़ रहे हैं।

अंधेरी रात में लाल महल खामोश है। रमज़ान के महीने में सूरज ढलने के बाद इफ्तारी के वक्त दो गुनी पौष्टिक नॉनवेज खुराक पेट में भरकर सोए शाइस्ता खान, उनके हरम के खास पहरेदार, हरम के भीतर के खवातीनो-हजरात गहरी नींद में हैं। रसोई में सुबह के खाने की तैयारी के लिए खानसामों की चहलपहल है। हवा की रफ्तार से खामोश झोंके की तरह शिवाजी चुनिंदा मावलाओं के साथ लाल महल में दाखिल हो चुके थे।

महल के दरवाजे भीतर से बंद कर दिए जाते हैं…अब एक-डेढ़ घंटे की चीख-पुकार… बाहर भी हो-हल्ला शुरू हो जाता है…कुछ देर में अचानक दरवाजे खुलते हैं…कौन है-कौन है…शोर करते हुए बाहर के फौजी भीतर दाखिल होते हैं…अंधेरे में भीतर चीख-पुकार मची है…किसी को कुछ दिखाई भी नहीं दे रहा, कुछ सूझ भी नहीं रहा कि माजरा क्या है…

– मत मारो…हमें बख्श दो…हमारे बीवी-बच्चे हैं…धोखेबाज आलमगीर से तो हम दिल्ली जाकर हिसाब कर लेंगे…हुजूर, हम कल ही फौज को समेट लेंगे और कभी इस तरफ निगाह नहीं करेंगे…हमारी जान बख्शी जाए…हमसे भूल हुई, जो यहां आए…हम अल्लाह के नाम पर माफी मांगते हैं…आप जो भी हैं, हमें जाने दें…अरे मार डाला…बचाओ!!!

लेकिन यह बकवास सुनने का समय शिवाजी के पास नहीं था…यह औरंगजेब के एक्शन का असली डायरेक्ट रिएक्शन था। अंधेरे में शाइस्ता खान अपनी जान की खैर मना रहा था।

-…कौन है…कौन है…क्या हुआ है…हुआ क्या है…लाल महल के भीतर भी ये आवाजें हो रही थीं….

शिवाजी और उनके साथी उसी घुप अंधेरे में बिना एक पल गँवाए शोर-शराबे का हिस्सा बन गए-कौन है, कौन है…। इस जोरदार हो-हल्ले में कौन कब कहां से किस तरफ बाहर निकल गया, किसी को पता ही नहीं चला…

बाकी फिर जो जहाँ था शिवाजी के लौटने की दिल थामकर प्रतीक्षा कर रहा था। इस एक्शन प्लान में हरेक को सिर्फ अपना ही रोल याद था कि फलां जगह इस वक्त पर किस तरह चौकन्ना रहकर इंतजार करना है। उसे यह ज़रूर पता था कि इस प्लान में हमेशा की तरह खुद छत्रपति सबसे आगे हैं। इसके आगे के सीन में छत्रपति तयशुदा जगह पर पहुंचते हैं। अपने राजे को अपनी जान पर खेलकर बचाने का काम अब अगली टुकड़ी का था। बस। सुबह जब सूरज उगा तो शिवाजी महाराज सात कोस दूर सिंहगढ़ के किले में दाखिल हो रहे थे, जहाँ पहले ही सब चौकन्ने अपने हिस्से के रोल के लिए तैयार थे। एक ही समय में सबको अपनी श्रेष्ठतम भूमिका निभाने का मौका था। वे शिवाजी के अनुयायी थे। ऐसे लीडर होंगे तो अनुयायी भी ऐसे ही होंगे। जनता भी ऐसी ही होगी। साहसी, चौकन्नी, देश के लिए कुछ भी कर गुज़रने वाली।

अपने सीमित साधनों का किस चतुराई से शिवाजी ने इस्तेमाल किया? वे मुगल फौज के विशाल आकार और उस पर होने वाले बेहिसाब खर्च की खिल्ली उड़ाया करते थे। यह बोझ भी आम गरीब भारतीयों पर ही पड़ता था। यह उनकी ही लूट के माल पर हो रही शाही एेयाशी थी। बादशाहों की फौजें एक चलता-फिरता शहर हुआ करती थीं। बीच-बीच में हफ्तों-महीनों तक बादशाह हुज़ूर शिकार में भारत के जंगलों में शेर, चीतों, हाथी, हिरण और रीछों को पकड़ा-मारा करते थे। उनकी फौजें कई दिनों तक जंगल में हाँका लगाकर वन्य जीवों को एक घेरे में इकट्‌ठा करती जाती थीं। सबसे आखिर में कम जगह में हजारों जानवर जुट जाते थे और तब शुरू होता था उन सबको मार डालने का अंतहीन दर्दनाक सिलसिला। पहला शिकार बादशाह का पहला हक था। फिर वाकयानवीस ये किस्से इकट्‌ठे करते थे कि किस बहादुरी से हमारे बादशाह ने मांडू के जंगलों में एक साथ पांच शेरों को मारा। दरअसल पूरा हिंदुस्तान ही इनकी शिकारगाह थी। क्या जंगल, क्या शहर!

शिवाजी ने मुगलों और बहमनी बहेलियों की ऐसी ही विशालकाय साधन संपन्न और बेरहम फौजों से अपने ठेठ अंदाज में जबर्दस्त सीधी टक्कर ली। नतीजे अविश्वसनीय हैं! शाइस्ता खान की हालत ही देख लीजिए-

मुल्क में 7 अप्रैल 1663 की सुबह का समाचार बुलेटिन यह था-पुणे में शिवाजी के सैनिकों की सफल सर्जिकल स्ट्राइक…शाइस्ता खान के शिविर पर अचानक अटैक…आधी रात को हुए हमले में कई के मारे जाने की खबर…अपुष्ट सूत्रों के अनुसार 50 से ज्यादा मारे गए…मगर पता चला है कि खान साहेब इस हमले में बाल-बाल बच गए हैं…उनके दाएँ हाथ की तीन उंगलियाँ कट गई हैं… मरने वालों में खान साहेब के लख्ते-जिगर अबुल फतेहखान भी बताए जा रहे हैं…यह नौजवान बदकिस्मत बेटा एक ही दिन पहले अपने वालिद से मिलने पुणे पहुंचा था…अब भी लाल महल में किसी को नहीं पता कि रात को हुआ क्या था…कई तरह के सियासी दावपेंच लगाए जा रहे हैं…शाइस्ता खान ने इस हमले के लिए अपनी ही फौज के राजपूत सिपहसालाार जसवंतसिंह पर शक जाहिर किया है…सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह फौज के भीतर वालों का ही हमला था या बाहर से कोई आया…अब तक हमले की जिम्मेदारी किसी ने नहीं ली है…शहंशाह औरंगज़ेब को यह बुरी खबर तब मिली जब वह कश्मीर की वादियों में मौजूद थे…उन्होंने सबसे पहले शाइस्ता खान का तबादला बंगाल किया है…शहजादे मुअज्ज्म को पुणे का प्रभार दिया गया है…

जो समाचार बुलेटिन में नहीं बताया गया वो अंदर का दृश्य कुछ यूँ था- सेहरी के इंतज़ार में सोए खान साहेब हल्ला शुरू होते ही घबराकर अपनी जान बचाने के लिए औरतों के बीच जा छिपे थे… चेहरे पर उड़ती हवाइयां लिए वे तो दीवार फांदकर शिवाजी के सीधे हमले में बाल-बाल बच गए लेकिन दीवार पर समय रहते बनी रहीं उनके दाएँ हाथ की तीन उंगलियाँ कटकर दूर जा गिरीं…घुप अंधेरे में मौत को इतने करीब से खान साहेब ने ज़िंदगी में पहली बार ही देखा था…पता नहीं शिवाजी ने सामने आने पर उन्हें अपना नाम बताया था या बिना बताए ही खान साहेब समझ गए कि “पहाड़ी चूहा’  यही है….इस हल्ले में लाल महल में खान साहेब के हरम की कुछ औरतों सहित उनके खास स्टाफ के 55 लोग मारे गए… पूरे तीन साल से इस इलाके में आतंक बरपा रही उनकी बाकी फौज की हवा इस नजारे को सुबह की रोशनी में देखने के बाद ही गोल हो गई…किसी की समझ में ही नहीं आया कि यह क्या हुआ…खान साहेब का सितारा तो हमेशा के लिए डूब गया। उनकी साख मिट्‌टी में मिल चुकी थी। वे किसी को मुँह दिखाने के लायक भी नहीं बचे थे। कोई घर में आकर ठोक गया। रमजान में खुदा ने ये क्या दिन दिखाए! या खुदा, कयामत ही क्यों न आ गई?

पुणे से 600 कोस दूर काश्मीर में मौजूद शहंशाह औरंगज़ेब के पास यह बुरी खबर 8 मई 1663 को पहुँची तो वह दाढ़ी नोचते रह गए। चचाजान की नाकामी दरअसल उनके गाल पर पड़ा जोरदार तमाचा थी। एक काफिर पहाड़ी चूहे का करारा वार। शाइस्ता मरने वालों के कफन-दफन भी इत्मीनान से नहीं कर पाया। धूल में मिल चुकी अपनी इज्जत के साथ वह यहीं से बंगाल रवाना किया गया। बादशाह ने उससे मिलना भी मुनासिब नहीं समझा। बंगाल भेजे जाने का मतलब था कि अब आपका समय खत्म हुआ। आदमी की रोजी-रोटी चलती रहेगी बस। साले ने सब बरबाद कर दिया। मुगलों की इज्ज़त मिट्‌टी में मिलाने वाले का तो सिर काटकर दिल्ली दरवाजे पर टांगा जाना चाहिए। आप चचा हैं। उम्र का लिहाज है। बंगाल की हिजरत कीजिए।

और उधर सुबह सिंहगढ़ में सुरक्षित पहुँचे शिवाजी अब भी विश्राम नहीं कर रहे थे। बादशाही दरबारों की तरह मसखराें और चीयर लीडर्स का कोई प्रावधान कभी शिवाजी के संसार में नहीं था। अब तक यह समझा जा रहा था कि शाइस्ता खान मारा जा चुका है। शिवाजी फौरन राजगढ़ के लिए रवाना हुए, जहाँ जीजा बाई अपने लाख आशीर्वादों के साथ उनका इंतज़ार कर रही थीं। माँ का एक और आशीर्वाद पुणे में सफल हुआ था। शिवा मौत के मुंह से बाहर आ गया था। स्वराज्य की ओर बुरी नजर से देखने की कीमत शाइस्ता खान से वसूल की गई थी। यह पहला मौका नहीं था। सिर्फ बीते तीन सालों के दरम्यान शाइस्ता खान और बीजापुर के आदिलशाह की अक्ल कई बार ठिकाने लगाई जा चुकी थी।

प्रतापगढ़ किला

इससे पहले के शिवाजी के कारनामे इस प्रकार हैं- प्रतापगढ़ के किले के बाहर अफजल खान की तीस हजार फौज के सामने कदकाठी में बेहद मजबूत और चालाक अफजल को अपने बुद्धि चातुर्य से ठिकाने लगाना, रुस्तम जमां की फौज को कोल्हापुर में 25 गुनी तेज रफ्तार से भागने के लिए मजबूर कर देना, पन्हाला के किले के बाहर आदिलशाही फौेज के साथ डटे सीदी जौहर को चकमा देकर बारिश की रात में निकल भागना, उंबरखिंड में शाइस्ता खान के सूबेदार करतलब खान की फौज को तबाह करना और शाइस्ता खान की इस सर्जिकल स्ट्राइक के बाद वे सूरत का रुख करते हैं। यहाँ औरंगज़ेब के सूबेदार इनायत खान की वह हालत करते हैं कि अहमदाबाद से आया महाबत खान भी सिर पीट लेता है कि यह शिवाजी चीज क्या है? काफिर कहीं का!

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छः पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com