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कैसे सरदार वल्लभ भाई पटेल ने राज्यों को जोड़कर संपूर्ण भारत का निर्माण किया
आशुचित्र- हम एक राष्ट्र बना रहे हैं और अखिल भारत की नींव रख रहे हैं, और जो हमें फिर से बाँटना चाहते हैं और जो उपद्रव के बीज बोएँगे, उनके लिए यहाँ ज़रा सा भी स्थान नहीं है, और यह बात मैं स्पष्ट रूप से कहता हूँ।– सरदार पटेल

आज भारत सरदार वल्लभ भाई पटेल की 143वीं जयंती मना रहा है। ऐसा माना जाता है कि मुख्यधारा के इतिहासकारों द्वारा सरदार पटेल, सुभाषचंद्र बोस और अन्य निष्ठावान क्रांतिकारियों को कम आँका गया। पिछले कुछ वर्षों में देखा गया कि राष्ट्र फिर से पटेल और बोस जैसे नेताओं को स्मृति पटल पर लेकर आया है।

आज हम सरदार पटेल के कुछ कृत्यों का स्मरण करते हैं-

  1. भूतपूर्व जूनागढ़ राज्य में 85 प्रतिशत हिंदू और 15 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या थी जो एक मुस्लिम नवाब द्वारा शासित था। 15 अगस्त 1947 को नवाब ने जूनागढ़ को पाकिस्तान का भाग मान लिया। जनता ने विरोध किया। पटेल ने पाकिस्तान से कहा कि वह इस परिग्रहण की स्वीकृति वापस कर दे और जनमत-संग्रह करवाए।

जूनागढ़ के एक लोकप्रिय नेता समलदास गांधी ने जूनागढ़ में निर्वासित रूप से अपनी सरकार बना ली। जूनागढ़ अपने ज़मीनी भाग में चारों ओर भारत से घिरा हुआ था और जटिल परिस्थितियों में भारत की ओर से व्यापार निलंबित कर दिया गया जिसके कारण राज्य सरकार का वित्तीय पतन हो गया।

एक अंतरिम सरकार स्थापित की गई और 20 फरवरी 1948 को जनमत-संग्रह किया गया जिसमें 99.95 प्रतिशत मत भारत से जुड़ने के पक्ष में थे। भारतीय सेना की सहायता से राज्य के स्थिरीकरण के लिए पटेल, के.एम.मुंशी और एन.वी.गाडगिल 12 नवंबर 1947 को जूनागढ़ गए थे और उसी समय उन्होंने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का आह्वान किया था।

महात्मा गांधी ने इस प्रयास का समर्थन किया पर इस शर्त पर कि इसके व्यय का भार सरकार पर नहीं आएगा बल्कि दान से इसके पुनर्निर्माण की राशि एकत्रित की जाएगी। दुख की बात है कि इसका निर्माण पूरा होने के पहले ही पटेल की मृत्यु हो गई थी। लेकिन सोमनाथ तीर्थस्थल ने पटेल के संकल्प के कारण अपने गौरव को फिर से प्राप्त किया।

  1. त्रवणकोर के दीवान सर सी.पी.रामास्वामी अय्यर चाहते थे कि उनका राज्य स्वतंत्र रहे और न भारत में न पाकिस्तान में विलय हो। पटेल को महाराज ने कहा कि उनके अधीन पद्मनाभा भगवान का क्षेत्र है और उनकी स्वतंत्रता किसी को समर्पित नहीं की जा सकती। पटेल ने उनसे पूछा, “फिर कैसे आपने इसे अंग्रेज़ों के अधीन जाने दिया?” इसके बाद वार्ता में अपनी राजनीतिक चतुराई से पटेल ने दीवान को अपना पद त्यागने के लिए मना लिया और महाराज भारत से जुड़ने के लिए तैयार हो गए।
  2. हैदराबाद के निज़ाम को अंग्रेज़ों द्वारा “हिज़ एक्सॉल्टेड हाइनेस” की उपाधि मिली थी और दोनों विश्व युद्धों में उन्होंने अंग्रज़ों की आर्थिक सहायता की थी। माउंटबैटन ने भारतीय राजाओं और नवाबों को भारत में मिलाने के लिए पटेल की सहायता की थी लेकिन हैदराबाद के लिए वे नहीं चाहते थे कि यह भारत का अंग हो, इसकी बजाय भारत सरकार और निज़ाम के बीच एक संधि हो।

जून 1948 में माउंटबैटन ने ‘हेड्स ऑफ़ अग्रीमेंट’ समझौते के तहत हैदराबाद को भारत के अधीन के स्वशासी राज्य का दर्जा देने की तैयारी की थी। इस समझौते में न केवल नवाब को राज्य के कार्यकारी मुखिया का दर्जा मिलता बल्कि राज्य में चुनावों के साथ जनमत-संग्रह भी होता। जब पटेल ने इस मामले पर ध्यान दिया, उन्होंने माउंटबैटन से पूछा क्या यह समझौता उनके लिए बहुत मायने रखता है। माउंटबैटन ने कहा “हाँ”। फिर पटेल ने इसपर अपने हस्ताक्षर कर दिए। लेकिन जब यह निज़ाम को दिया गया तो उन्होंने मना कर दिया।

माउंटबैटन इस दुख में भारत छोड़कर चले गए कि वे भारत सरकार और निज़ाम के बीच संधि नहीं करवा पाए। इस घटना से माउंटबैटन के प्रति पटेल का सम्मान झलकता है और उनका दृढ़ विश्वास भी कि इस्लामियों के प्रभाव में निज़ाम संधि के लिए कभी तैयार नहीं होंगे और सैन्य बल से हू उनसे निपटा जा सकता है।

“रज़ाकार का समर्थन पाकर हैदराबाद शासक युद्ध के लिए तैयार हो गए थे। क़ासिम रज़वी जो हैदराबाद पर शासन करना चाहता था ने स्पष्ट रूप से कहा कि अगर भारतीय अधिराज हैदराबाद आता है तो इसे डेढ़ करोड़ हिंदुओं की अस्थियों के अलावा कुछ नहीं मिलेगा।”- वी.पी.मेनन की पुस्तक ‘द स्टोरी ऑफ़ इंटीग्रेशन ऑफ़ इंडियन स्टेट्स’ से अंश

सैन्य कदम के लिए पटेल जवाहरलाल नेहरू से अधिक प्रबल थे। भारतीय सेना 14 सितंबर 1948 की सुबह हैदराबाद गई। पटेल ने हैदराबाद को दूसरा कश्मीर बनने से बचा लिया।

  1. जब पाकिस्तान के समर्थन से मुजाहिद्दीन बलों ने कश्मीर पर हमला किया था, तब पटेल ने कहा,

“मैं एक बात स्पष्ट करना चाहता हूँ कि हम कश्मीर की धरती के एक इंच का भी समर्पण नहीं करेंगे।”- लाइफ़ एंड वर्क ऑफ़ सरदार वल्लभ भाई पटेल

पटेल ने समय रहते निर्णय लेकर सुरक्षा बलों को कश्मीर भेजकर आक्रमणकारियों से राज्य को बचाया। लेकिन नेहरू ने गृह और राज्य से कश्मीर को हटाकर पटेल के पोर्टफोलियो से इसे निकाल दिया।

संवैधानिक सभा के दीर्घानुभवी सदस्य एच.वी.कामत लिखते हैं-

“सरदार पटेल ने एक बार मुझसे अपनी व्यथित आवाज़ में कहा था कि “काश जवाहरलाल नेहरू और गोपालस्वमी अय्यंगर कश्मीर को मेरे गृह और राज्य के पोर्टफोलियो से हटाकर अपने पास रक्षित करके नहीं रखते,” वे इस मसले से वैसे ही निपटते जैसा उन्होंने हैदराबाद में किया था।

  1. संवैधानिक सभा में जब कुछ मुस्लिम सदस्यों ने अलग चुनाव व्यवस्था की माँग की थी, तब पटेल ने कहा था-

पहले आंदोलन था कि “हम एक अलग राष्ट्र हैं। अलग चुनाव व्यवस्था, कोई महत्त्व, कोई रियायत, कोई विचार, हमारी रक्षा के लिए काफी नहीं है। इसलिए हमें एक अलग राज्य चाहिए।” हमने कहा, “ठीक है, अलग राज्य ले लीजिए।” लेकिन बचे हुए भारत में, 80 प्रतिशत भारत को तो एक राष्ट्र होना चाहिए, क्या आप सहमत हैं? या आप दो राष्ट्रों की बात यहाँ भी लाना चाहते हैं? मैं अलग चुनाव प्रक्रिया के विरोध में हूँ। लेकिन यह भारत का दुर्भाग्य होगा अगर देश के विभाजन के बाद भी यहाँ अलग चुनाव प्रक्रिया लागू होगी। अगर वही प्रक्रिया दोहरानी है जिससे देश का विभाजन हुआ तो मैं कहूँगा- “जो यह प्रक्रिया चाहते हैं, उनके लिए पाकिस्तान में जगह है। यहाँ हम एक राष्ट्र का निर्माण कर रहे हैं और अखिल भारत की नींव रख रहे हैं, और जो हमें फिर से बाँटना चाहते हैं और जो उपद्रव के बीज बोएँगे, उनके लिए यहाँ ज़रा सा भी स्थान नहीं है, और यह बात मैं स्पष्ट रूप से कहता हूँ।”- 27 अगस्त 1947, वाद-विवाद पर संवैधानिक सभा की रिपोर्ट

विशुद्ध राष्ट्रवाद के इस कथन को अब सांप्रदायिक कहा जाएगा।

  1. राज्य के विलय के नेतृत्व के लिए माउंटबैटन द्वारा नेहरू की बजाय पटेल को चुनना तर्कसंगत था। वे कहते हैं-

“मुझे कहते हुए खुशी है रही है कि नए राज्यों के मंत्रालय का दायित्त्व नेहरू को नहीं सौंपा गया, नहीं तो बात बिगड़ जाती। पटेल अनिवार्य रूप से यथार्थवादी और समझदार व्यक्ति हैं। राज्य विभाग उनके प्रभावशाली नेतृत्व के अधीन था।”- बी.कृष्णा की भारत का बिस्मार्क, सरदार वल्लभ भाई पटेल

आज भारत अपने सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री, जो इसे कभी नहीं मिला, को याद करता है।

लेखक आंध्र प्रदेश सरकार के पूर्व सूचना प्रौद्योगिकी सलाहकार हैं।