श्रद्धांजलि
बिस्मिल-अश्फ़ाक होते तो क्या करते? कुछ शब्दचित्र, कुछ विचार

प्रसंग- बिस्मिल और अश्फ़ाक की पुण्यतिथि पर सोचें जिन देशभक्तों के विचारों का उद्देश्य सत्ता और राजनीति से परे सिर्फ राष्ट्रभक्ति था, यदि आज होते तो क्या कहते?

इतिहास में अपनी एक तरलता है, अपना एक बहाव है। किंतु कभी-कभी इतिहास को छायाचित्रों में, स्नैपशॉट में देखना चाहिए। जब समयचक्र अजीब-सी तीव्रता से घूमता है तब इतिहास को रोककर देख लेना चाहिए।

आज का दिन, जो वर्तमान में एक षड्यंत्रकारी राजनीति के प्रभाव में दो ध्रुवों के मध्य बँटा हुआ है। आज का ही दिन, 1927 का, जब एक 30 वर्षीय युवक कसरत करके, हँसकर जेल अधिकारियों से कहता है, “अगले जन्म में भारत माता की सेवा के लिए शरीर को मज़बूत रखना है”, और सधे कदमों से वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुए फाँसी की बलि वेदि को चल पड़ता है।

हम, भारत के लोग, आदर्श विहीन भारत के लोग, आज अपने आदर्श सेलुलॉयड में देखते हैं या क्यूबा के हत्यारे को अपना हीरो समझते हैं। इतिहास को खो चुके हम प्रत्येक प्रश्न का उत्तर- “आज गांधी होते तो क्या कहते?”

गांधी महान थे परंतु उनकी राजनीति जो धर्म के कम, पर ज़मीनी राजनीति के अधिक निकट थी, वह तमाम प्रश्नों के उत्तर नहीं दे सकती। गांधी का सत्य कई प्रश्नों पर मौन हो जाता था। ना बुरा कहो वाला गांधी का मौन सत्य के कम असत्य के अधिक निकट आ जाता था।

हालाँकि आज जिस प्रश्न से राष्ट्र जूझ रहा है कि आनंद भवन के वकीलों द्वारा विभाजन के उस ओर छूटे अल्पसंख्यकों का क्या? उसपर तो गांधी बाबा भी कह गए कि पाकिस्तान से आने वाले हिंदू-सिख जो प्रताड़ना से परेशान भारत आएँगे, उन्हें आज भी और कल भी भारत अपनी संतान मान कर शरण देगा क्योंकि जिन्होंने अपने लिए ज़मीन काटी, उनके लिए ज़मीन छोड़ी ही नहीं।

यह सोचना आवश्यक है कि जब राजेंद्र प्रसाद कहते हैं, “गांधी के पूर्व के भारत में अपने धर्म की बात बिना संकोच और लज्जा के साथ की जा सकती थी जो गांधी के अति-धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद में संभव नहीं था”, तो आवश्यक है कि हम गांधी से इतर ऐसे संवादों का उत्तर ढूंढें।

भारत की जिस सांप्रदायिक राजनीति को गांधी ने पहले ख़िलाफ़त में जिन्ना और तिलक को किनारे करने और बाद में विभाजन में नेहरू को सत्ता देने के लिए स्थान दिया, उसका उत्तर इसमें नहीं मिलेगा कि आज गांधी होते तो क्या कहते। उसका उत्तर हमें यह जानने में मिलेगा कि आज रामप्रसाद बिस्मिल होते तो क्या कहते, अश्फ़ाकउल्लाह खान होते तो क्या कहते।

ऐसा नहीं है कि उन्होंने कहा नहीं। बहुत कहा और बहुत लिखा, परंतु एक परिवार की महानता स्थापित करने के उत्साह में हमने जो इतिहास को मिटाया, उसमें वह भी मिट गया है। राजनीति में हिंसा के विषय में बिस्मिल अपने अंतिम दिनों में लिखते हैं- “गोली-रिवाल्वर साथ रखने के स्थान पर नवयुवक सच्चे देशभक्त बनें।”

आज के जो बुद्धिजीवी अपने सुरक्षित आवासों के संपन्न अस्तित्व से युवाओं को हिंसा का संदेश दे रहे हैं, उन्हें त्याग कर युवाओं को उस बिस्मिल की बात को समझना चाहिए जो हिंसा और अहिंसा दोनों मार्गों पर चल कर राष्ट्र सेवा करते रहे।

प्रत्येक हिंदू विचारधारा के व्यक्ति के प्रति द्वेष से भरने वाले पत्रकारों को नकार के उन्हें उस बिस्मिल को समझना होगा जो मृत्यु के समय इसी भारत में जन्म मांगते हैं जहाँ परमात्मा की वाणी- वेदवाणी का वे प्रचार कर सकें, और जो सनातन के प्रति पूर्णतया समर्पित होकर भी कह सकते थे-

“अश्फ़ाक कट्टर मुसलमान होकर पक्के आर्यसमाजी रामप्रसाद का दाहिना हाथ बन सकते हैं, तब क्या भारतवर्ष की स्वतंत्रता के नाम पर हिंदू-मुसलमान अपने निजी छोटे-छोटे फ़ायदों का ख़्याल न करके एक नहीं हो सकते?”

अश्फ़ाक जब लिखते हैं कि भारतीय मुसलमानों को जिस एक चीज़ से बचना है वह है पैन-इस्लाम, तो वह उस वैश्विक कट्टरपंथ से भारतीय मुसलमानों को बचाने की बात करते हैं जो भ्रष्टाचार और राष्ट्रविरोधी नीतियों के कारण सत्ताच्युत हुए राजनैतिक ज़मीन तलाशते नेताओं के बहकावे में आकर आज सड़क पर इस्लामिक नारे लगाता हुआ सड़क पर उतरा है।

आज जब बिस्मिल और अश्फ़ाक की पुण्यतिथि पर हम एक ओर पढ़ते हैं कि “शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले” और इसी दिन हम बुद्धिजीवियों और नेताओं को भारत को आतंकित करने के उद्देश्य से हम दंगाइयों को सड़क पर उतारने के प्रयास में रत देखते हैं तो अश्फ़ाक और बिस्मिल के प्रति किए इस विश्वासघात पर मन क्षुब्ध एवं लज्जित हो जाता है।

बहुत साल हम यही सोचते रह गए कि नेहरू होते तो क्या कहते? या गांधी होते तो क्या सोचते? राजनेता क्या सोचते, उससे कुछ प्रश्न आज भी अनुत्तरित रह जाते हैं। आज यह सोचने की भी आवश्यकता है कि जिन देशभक्तों के विचारों का उद्देश्य सत्ता और राजनीति से परे सिर्फ राष्ट्रभक्ति था, यदि आज होते तो क्या कहते?

संभवतः वर्तमान के प्रश्नों का उत्तर क्रांतिकारियों के विरोध में अदालत में खड़े कांग्रेसी नेता जगतनारायण मुल्ला (इनके पुत्र स्वतंत्रता के पश्चात राज्यसत्ता में कांग्रेस के द्वारा भेजे गए) के वर्ग से नहीं मिलेगा। इनका उत्तर हमें बिस्मिल और अश्फ़ाक के जीवन से ही मिलेगा।

कम से कम राजनीति के कुटिल शोर को हटाकर आज के दिन हमें गांधी-नेहरू के तय विचार से ज़रा हटकर सोचने की आवश्यकता है कि आज बिस्मिल होते तो क्या कहते? अश्फ़ाक होते तो क्या कहते? हमारे राष्ट्र के ये दो महान नक्षत्र नारा-ए-तकबीर की भीड़ के साथ होते या दोनों एक साथ में कहीं विस्थापित हिंदुओं के कैंप में सेवारत होते? क्या अश्फ़ाक बिस्मिल के हिंदुवाद से मुक्ति मांगते और क्या बिस्मिल अश्फ़ाक के साथ मिलकर वैश्विक इस्लाम के विचार से नहीं लड़ते जिसमें राष्ट्रीय प्रतिबद्धता के लिए स्थान नहीं है?

जिस दिन इन प्रश्नों का उत्तर हम ढूँढ लेंगे और उन तुच्छ-मस्तिष्क षड्यंत्रकारियों को देने में सक्षम हो सकेंगे जो उस राष्ट्र को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं जिसमें वे स्वयं सत्ता में न हों, उसी दिन इन देशभक्तों का हम सही मायने में सम्मान कर सकेंगे। तब ही शहीदों की चिताओं पर वे मेले लग सकेंगे जिसके प्रकाश में भारत वह इतिहास लिख सकेगा जिसकी इन महामानवों ने कल्पना की थी।

जब तक यह नहीं है, हमें वे छवि चित्र ही पढ़ने हैं जो हमारी अब तक की दिशा बताते हैं- दुर्भिक्ष से जूझता बिस्मिल का परिवार, तिलक की गाड़ी के नीचे लेटे 16 वर्षीय बिस्मिल, मंदिर में घरवापसी करते बिस्मिल, अश्फ़ाक के साथ एक थाली से भोजन करते बिस्मिल, जेल में नमाज़ पढ़ते अश्फ़ाक और संध्या करते बिस्मिल, फाँसी की ओर बढ़ते बिस्मिल, आँखों की रोशनी खो चुकी सत्ता की चकाचौंध में डूबे कांग्रेसी नेताओं द्वारा उपेक्षित माँ को स्वर्ग से देखते बिस्मिल, स्वर्ग से सावरकर का अपमान देख मन ही मन दुखी होते बिस्मिल, गणेश शंकर विद्यार्थी की दंगाइयों द्वारा फेंके हुए अनाथ शव को देख अश्रुपूरित अश्फ़ाक। इन छविचित्रो में पता चलता है कि हम कहाँ और कब भटक गए। इन्हीं में भारत को भविष्य का मार्ग भी मिलेगा।