श्रद्धांजलि
आज के भारतीय का शहीद राम प्रसाद बिस्मिल को एक पत्र

अमर स्वतंत्रता सेनानी राम प्रसाद बिस्मिल को उनकी 91वीं पुण्यतिथि पर एक पत्र।

प्रिय बिस्मिल,
ठंड उतर चुकी है मौसम में, हवाओं के किनारे नुकीले हुए जा रहे हैं। कल 19 दिसंबर फिर से लौटेगी। यही दिन था ना बिस्मिल, जब तु्म्हारी अक्षुण्ण आत्मा तितलियों का रूप धर कर उड़ गई थी। मुझे लगता है कि तुम जाकर भी एक चिंतित पुत्र की भाँति लौट-लौट कर बेड़ियों से छिली हुई माता की एड़ियों को मलहम लगाया करते होगे। लगभग 90 बरस हो गए जब तुमने गोरखपुर जेल में ऐसे ही किसी ठिठुरते दिन पर अपनी आत्मकथा का अंतिम पृष्ठ लिखा होगा।

तुम्हारी आत्मकथा के उपसंहार में मन्मथनाथ गुप्तजी 1908 में अलीपुर जेल में अंग्रेज़ मुखबिर नरेंद्र गोस्वामी की हत्या के उपरांत फाँसी पर चढ़ाए गए कन्हाईलाल दत्त के अंतिम संस्कार के विषय में लिखते हैं- कैसे श्री दत्त के अंतिम संस्कार पर लाखों का हुजूम उमड़ आया था और मिनटों की बात है जिसमें शहीद के अंतिम अवशेषों की ऐसी लूट मची थी कि लूटने वाले तावीज़ों के लिए राख बटोर कर ले गए। तुम्हारे जाने के पहले की घटना थी, संभवत: इसी से झूमकर फाँसी पर चढ़ते हुए तुम कह गए- “शहीदों की मज़ारों पर लगेंगे हर बरस मेले”। बहुत भोले थे तुम बिस्मिल जो राष्ट्र के पलटते हुए मनोभाव को पढ़ ना सके। छोटे भी थे। कुल 30 के ही तो थे जब 19 दिसंबर 1927 को निर्भीक, निर्विकार भाव से मृत्यु पाश को नीलकंठ के गरल की भाँति गले का श्रृंगार बनाकर तुमने स्वीकार किया था।

सच कहूँ तो कहने में कष्ट बहुत होता है कि आज के आधुनिक भारत में यह सर्दियों का मौसम मेलों का ही मौसम होता है। साहित्यिक सम्मेलन, पुष्प मेले, खान-पान के मेले- मानों मेलों की बहार आ जाती है मौसम में जो संभवत: 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस पर जाकर ही रुकती है। हाँ किंतु बिस्मिल, शहीदों की मज़ारों पर अब भी मेले नहीं लगते। लोकशाही आ गई है भारत में, वायसराय हाऊस अब भारत के प्रथम नागरिक का आवास, राष्ट्रपति भवन कहलाता है और वहाँ से उतरती सड़क राजपथ। विडंबना यह है कि राजपथ अब भी जनपथ को बीच से चीरता हुआ निकल जाता है। अंग्रेज़ी ध्वज की रक्षा के लिए हुतात्मा भारतीय सैनिकों के लिए अंग्रेज़ी स्मारक अब भारतीय ध्वज के रक्षकों के नाम से जुड़ गया है। नहीं, ऐसा मितव्ययिता के विचार से नहीं है कि हम अपने सैनिकों का अपना स्मारक नहीं बना सके। बहुत स्मारक बनाए हमने किंतु हमारी श्रद्धा उन नेताओं के द्वार पर जाकर रुक गई जिनके यहाँ उस दौर में, जब आपकी दादी आने सेर पर गेहूँ पीसकर आपके पिता के लिए दुर्भिक्ष के दिनों में भोजन की व्यवस्था करती थीं, भी विलायती जीवन के उत्कृष्टतम मानक माने जाते थे। शहीदों की मज़ारों पर मेले नहीं लग पाते, बिस्मिल, भारत आधुनिक हो गया है, और आधुनिक जीवन की व्यस्तताएँ साँस कहाँ लेने देती हैं।

तुम युवा थे सो तुम्हारे आशावाद की बेल आदर्शवाद के वृक्ष पर पनप रही थी। तभी तो रायबरेली कांग्रेस के बनवारीलाल के मुखबिर हो जाने के बाद भी तुम्हारी आंदोलन से श्रद्धा कम नहीं हुई। तुम्हारे समय में ही तुमने तिलक की लोकप्रियता से ईर्ष्यालु धनाढ़्य कांग्रेसियों को उनके विरुद्ध साज़िश करते देखा किंतु समकालीन नेताओं के इस कुटिल स्वार्थ को तुमने स्वतंत्र भारत के सुंदर स्वप्न को कलंकित करने नहीं दिया। जब इलाहाबाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जगत नारायण मुल्ला तुम्हारे विरुद्ध मोर्चा लेकर खड़े हुए और तुम्हारी फाँसी तय कर गए, तुमने कोई द्वेष मन में ना धरा और गोरखपुर निष्ठुर कारा में मृत्यु की अविचलित भाव से राह देखते रहे। संभवत: तब भी तुम्हारे अधरों पर वही शब्द रहे होंगे- शहीदों की मज़ारों पर लगेंगे हर बरस मेले। तुम तो एक विश्वास लिए चले गए, किंतु स्वतंत्र भारत में मुल्लाजी उत्तर प्रदेश न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश। तुम्हें मालूम शायद ना हुआ हो, बिस्मिल, तुम्हारे बाद अश्फ़ाक को भी मृत्यु दंड दिलाने में मुल्लाजी सफल रहे। मोती लाल नेहरूजी के परिवार की प्रारंभिक नाराज़गी जल्द ही समाप्त हो गई और मुल्लाजी के पुत्र कांग्रेस के टिकट पर राज्य सभा में मनोनीत भी हुए। लिखते अच्छा थे सो इक़बाल सम्मान भी मिला उन्हें और बताते हैं कि उनके नाम पर शहर में चौक भी है।
वैसे अश्फ़ाक़ का जाना एक तरह अच्छा ही हुआ। अपने उस लक्ष्मण के बिना, राम तुम्हारा भी तो वहाँ मन ना लगता। यूँ भी अश्फ़ाक़ स्वतंत्र भारत मे रह गए होते तो पता नहीं हिंदुस्तानी रहते या पाकिस्तानी। पता नहीं जिन्ना की बँटवारे की राजनीति या मौलाना आज़ाद की पैन-इस्लामिक राजनीति में भोले-भाले अश्फ़ाक का क्या स्थान बनता। नेहरू ने जो भारत बनाया उसमें अश्फ़ाक से अधिक ओवैसी के लिए स्थान रहा। वैसे व्यस्त 21वीं सदी के भारत के पास इन प्रश्नों पर विचार करने के लिए समय कहाँ है। चे गुआवारा के पोस्टरों में आदर्श तलाशती पीढ़ी के पास ना राम प्रसाद बिस्मिल के लिए समय है, न अश्फ़ाक़ के लिए। विभाजन से पैदा हुआ भारत बँटता ही जाता है। टूट की दरारों में ही स्वार्थ के वृक्ष उगाए जा रहे हैं।

अब तो बहुत वक्त जा ही चुका है, धीरे-धीरे परतंत्रता के पाश से शायद राष्ट्र की आत्मा मुक्त हो रही है, जिसमें एक सदी लग गई। जिस पैतृक राजशाही से तुम भारत को मुक्त देखना चाहते थे, वह लौट-लौट कर आती है। गोरे साहबों का स्थान भूरे साहबों ने ले लिया है किंतु सत्ता की नीति वही है- क्षेत्र की, राज्य की, धर्म की। जिस परस्पर सम्मान से तुम और अशफ़ाक़ गले मिला करते थे वो उस असुरक्षित राजनीति को भाता नहीं है जो राजनीति को स्वतंत्रता पूर्व के दौर से ही एक ही परिवार के लिए सुनिश्चित करने में व्यस्त रही। अल्पायु में ही यह तुम्हारी परिपक्वता रही जो तुमने अपनी आत्मकथा के उपसंहार में लिखा।

यदि फ्रांस या अमेरिका की क्रांति की भाँति क्रांति द्वारा राजतंत्र को पलट कर प्रजातंत्र स्थापित कर लिया जाए तो बड़ेबड़े धनी पुरुष अपने धन बल से सब प्रकार के अधिकारों को दबा बैठते हैं। कार्यकारिणी समितियों में बड़ेबड़े अधिकार धनिकों को प्राप्त हो जाते हैं।

ऐसा भान होता है कि तुम तभी बैठे भविष्य में झाँक पा रहे थे। जो तब आनंद भवन था, वही आज लुट्येन्स है। जिस अभिजात्य बौद्धिक बंधन से राष्ट्र को मुक्त करने तुम और तुम्हारे मित्र महामना तिलक के पीछे जुड़े, आज शायद उसमें धुंधली सी दरार दृष्टिगोचर हो रही है। शायद राजनीति के इस काल सर्प से मुक्ति के बाद ही शहीदों के मज़ारों पर मेले लग सकें। तब तक तो हम तुम्हारे व्यक्तित्व की विशालता को आती पीढ़ियों तक पहुँचाने का प्रयास ही कर सकते हैं।

शत शत प्रणाम बिस्मिल

साकेत सूर्येश स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। वे  @saket71 द्वारा ट्वीट करते हैं।