श्रद्धांजलि
राम प्रसाद बिस्मिल की माताजी ने समय पर विजय पाई थी लेकिन उपेक्षा ने उन्हें हरा दिया

कुछ व्यक्ति अपने जीवन में व्यक्ति से विचार एवं विचार से विचारधारा बन जाते हैं। ऐसी महान विभूतियों को समय-कुसमय, इतिहास और वर्तमान की परिसीमाओं में बांधा नहीं जा सकता है। राम प्रसाद बिस्मिल (जन्म 11 जून 1897) मेरे लिए ऐसे ही महान व्यक्तित्व हैं।

यह तथ्य है कि बिस्मिल को भारतीय इतिहास में वह स्नेह और सम्मान नहीं मिला जो उन्हें मिलना चाहिए था। अपने छोटे-से कोई 30 वर्ष के जीवनकाल ने बिस्मिल ने उस संघर्ष की भूमिका रखी जिसकी परिणति भारत की स्वतंत्रता में हुई।

ब्रिटिश साम्राज्य के साथ समीकरण स्थापित करके जॉर्ज पंचम के सम्मान में भक्ति गीतों के गायन के साथ प्रारंभ होने वाले कांग्रेस अधिवेशनों में अंग्रेज़ों को भगाने की कितनी सामर्थ्य थी, इसपर बहुत कुछ स्वयं ब्रिटिश राजनेताओं ने लिखा है।

मन्मथनाथ गुप्त अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि 1942 की क्रांति की सफलता का कारण यह था कि जनता ने कांग्रेस के हाथ से नियंत्रण ले लिया था, और नेताजी की आज़ाद हिंद फ़ौज ने सरकार को एक सशस्त्र क्रांति के संभावना के प्रति आशंकित कर दिया था।

आज बिस्मिल के जन्मदिवस पर मेरा प्रश्न इसपर नहीं है कि हमें आज़ादी बिना खड्ग-बिना ढाल मिली या नहीं, या क्रांतिकारियों के बलिदान को विस्मृत करके हमने कैसी खोखली राजनीति को देश में पनपने दिया है जो यह मानती है कि यदि यह राष्ट्र उसे सत्ता में नहीं बैठा सकता है तो उसे समाप्त ही हो जाना चाहिए।

बिस्मिल ने अपने अंतिम दिनों में लिखी आत्मकथा में युवाओं को हिंसा त्यागकर, एक होकर कांग्रेस का हाथ सशक्त करने की सलाह दी। अब इसमें ध्यान रखने योग्य दो बातें हैं-
प्रथम तो यह कि बिस्मिल के समय की कांग्रेस एक भिन्न-भिन्न राजनीतिक दर्शनों का छत्र था, अपने आप में एक राजनैतिक दल नहीं था, दूसरी बात यह है कि जो परिपक्वता और वैचारिक सहृदयता ‘क्रांतिकारी पंडित जी’ में थी, वह ‘कांग्रेसी पंडित जी’ में कभी नहीं रही जो अपनी आत्मकथा में चंद्रशेखर आज़ाद को आतंकवादी संबोधित करते हैं।

वैचारिक स्थिरता का यह अभाव ही हमें पंडित राम प्रसाद बिस्मिल के कारावास के अंतिम दिनों में और पंडित जवाहरलाल के नाभा कारावास के एक सप्ताह में दिखता है। जहाँ बिस्मिल और अश्फ़ाक क्षमा-पत्र ब्रिटिश न्याय और सहृदयता की पोल खोलने के लिए लिखते हैं, वहाँ नेहरू अपनी आत्मकथा में नाभा पर लज्जित ही होते रह जाते हैं।

बिस्मिल अपनी क्षमाशीलता और दार्शनिक परिपक्वता में एक महामानव के रूप में उभरते हैं, जब वे युवाओं को कांग्रिस को सशक्त करने को कहते हैं, बावजूद इसके कि कांग्रेस के ही बनवारीलाल का सरकारी गवाह के रूप में दिया वक्तव्य और जगत नारायण मुल्ला के ब्रिटिश सरकार के वकील के रूप में की गई पैरवी ही सबूतों के अभाव में क्रांतिकारियों को मृत्युदंड तक ले गई थी।

जब अहमदाबाद सम्मेलन में गांधी मौलाना हसरत मोहानी के पूर्ण स्वराज्य की माँग का विरोध कर रहे थे, बिस्मिल और उनके क्रांतिकारी मित्र स्वतंत्र भारत के संग्राम में उतर चुके थे। 1929 के पहले कांग्रेस की माँग ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर ही स्व-नियंत्रण की थी।

जैसे नीतिगत रूप से भारत की राजनीति स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी पक्ष को मिटाती गई है, आज मन्मथनाथ की पुस्तक में क्रांतिकारी कन्हाई लाल की अंतिम यात्रा में 1908 में एक लाख और क्रांतिकारी यतींद्रनाथ दास की अंतिम यात्रा में छह लाख लोगों के जुटाने की बात अविश्वसनीय लगती है।

इस लेख में जब मैं बिस्मिल के बाद उनके अंत समय और उसके पश्चात के समय को देखता हूँ तो यह सब एक निर्दोष उपेक्षा नहीं लगता है। मुझे लगता है कि बिस्मिल-अश्फ़ाक जैसे क्रांतिकारियों का धार्मिक स्थायित्व बाद के राजनेताओं के नास्तिक नेतृत्व के साथ बैठता नहीं है, यह भी इस थोपी हुई सरकारी विस्मृति का कारण है।
चंद्रशेखर आज़ाद के जन्मस्थान पर उनकी स्मारिका भी बनते बनते 60-70 वर्ष लग गए।

वर्तमान धारा में प्रवृत्ति-सी बन गई है- एक परिवार विशेष के चाटुकारों में इतिहास के महामानवों को वर्तमान की तुला पर तौलकर अपमानित करने की तो वे सावरकर का भी क्षमा-पत्र उठा लेंगे और बिस्मिल का भी। इस प्रश्न का उत्तर मैं मन्मथनाथ गुप्त जी से बेहतर नहीं दे सकता हूँ, जब वे लिखते हैं –

‘इतिहास केवल एकत्र किए हुए मुर्दा तथ्यों का ढेर नहीं है। जब तक तथ्यों की अंतर्निहित शक्तियों का उद्घाटन नहीं होता, तब तक तथ्य केवल निष्प्राण विवरणमात्र हैं।’

इतिहास को राजनीति से बाधित करके पढ़ने से हम हटेंगे तो पाएँगे कि जहाँ पंडित जगत नारायण मुल्ला ब्रिटिश सरकार की ओर से थे, वहीं पंडित गोविंद वल्लभ पंत, गणेश शंकर विद्यार्थी, मोहनलाल सक्सेना आदि कांग्रेस नेता डिफ़ेन्स कमिटी में भी थे।
तब राजनीति इतनी बँटी भी ना थी और कुछ राष्ट्रनायक राजनीतिक द्वेष से इतर ही समझे जाते थे। संभवतः उसका कारण, वैचारिक ऐक्य ना होने पर भी राष्ट्र के प्रति प्रेम था।

बिस्मिल, 19 दिसंबर को संध्या वंदन से निवृत्त होकर माता को पत्र लिखते हैं और पुनः इसी भारत में जन्म लेकर मातृभूमि की सेवा की इच्छा व्यक्त करते हैं। बिस्मिल लिखते हैं-

‘माँ! मुझे विश्वास है कि तुम यह समझकर धैर्य धारण करोगी कि तुम्हारा पुत्र माताओं की माता ‘भारत माता’ की सेवा में अपने जीवन को बलि-वेदी की भेंट कर गया और उसने तुम्हारी कुक्षि को कलंकित न किया, अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहा। जब स्वाधीन भारत का इतिहास लिखा जाएगा, तो उसके किसी पृष्ठ पर उज्ज्वल अक्षरों में तुम्हारा भी नाम लिखा जाएगा।’

एक सन्यासी के निर्विकार भाव से 16 दिसंबर को बिस्मिल लिखते हैं-

‘आज जब 16 दिसम्बर 1927 को निम्नलिखित पंक्तियों का उल्लेख कर रहा हूँ, जबकि 19 दिसंबर सोमवार को साढ़े छह बजे प्रातः काल इस शरीर को फाँसी पर लटका देने की तिथि निश्चित हो चुकी है। अतएव नियत समय पर इहलीला संवरण करनी होगी। यह सर्वशक्तिमान प्रभु की लीला है।’

आगे वे लिखते हैं- ‘यह है ही क्या? केवल शरीर का परिवर्तन मात्र है। मुझे विश्वास है कि मेरी आत्मा मातृभूमि और उसकी दीन संतति के लिए नए ओज और उत्साह के साथ काम करने के लिए शीघ्र वापस लौट आएगी।’

आधुनिक युवाओं के लिए क्रांति के मानक चे गुआवारा जो वामपंथ के प्रमुख नायक रहे हैं और मरणोपरांत पूंजीवाद के द्वारा बेचे गए हैं, उनमें और बिस्मिल के जीवन में कितना भेद है। जहाँ बिस्मिल अंतिम समय देशवासियों की सेवा में विचार मग्न हैं, चे का प्रसिद्ध कथन है- घृणा संघर्ष का मूल तत्व है।

बिस्मिल अपनी आत्मकथा में लिखते हैं किस प्रकार बूढ़े जेलर पंडित चंपालाल के सम्मान की रक्षा के लिए वे साधन उपलब्ध होने पर भी भागने का विचार त्याग देते हैं। चे के पास हिंसा एवं घृणा थी, बिस्मिल के पास प्रेम और दर्शन था।

प्रत्यक्षदर्शी जहाँ चे के अंत के विषय में उसे भयाक्रांत बताते हैं, बिस्मिल का अंत एक असीमित वीरता का प्रमाण बनकर भावी पीढ़ियों के लिए प्रस्तुत होता है। इतनी अल्पायु में भी बिस्मिल एक स्नेहमय नेता के रूप में अंत समय पर अपने अंतिम यात्रा के सहयात्रियों को संबोधित करते हुए लिखते हैं –

‘मरते बिस्मिल, रोशन, लाहिरी, अश्फ़ाक अत्याचार से,
होंगे पैदा सैकड़ों उनके रूधिर की धार से।’

जिस समय हाथ में गीता ले कर, ‘मैं ब्रिटिश साम्राज्य के अंत की कामना करता हूँ’ का साहसिक वचन बोलते हुए बिस्मिल गोरखपुर जेल में फाँसी पर चढ़ते हैं, उधर फ़ैज़ाबाद में क़ुरान शरीफ़ को गले में टाँगे, वन्दे मातरम का उद्घोष करते अश्फ़ाक फाँसी पर चढ़ते हैं, शेर कहते हुए-

‘तंग आकर हम भी उनके जुल्म के बेदाद से,
चल दिए सू-ए-अदम जिंदान-ए-फ़ैज़ाबाद से।’

बिस्मिल के बाद क्या हुआ, यह प्रसंग एक प्रतिभाशाली, देशभक्त और अत्यंत मेधावी युवक के असामायिक अंत से भी अधिक दुखद है। क्रांतिकारी शिव वर्मा बिस्मिल से अंत समय उनकी माताजी के साथ मिलने वाले सौभाग्यशाली व्यक्तियों में से थे जिन्हें पंडितजी की माँ भांजा बनाकर जेल में ले गईं थीं।

1946 में स्वतंत्रता के एक वर्ष पूर्व शिव वर्मा बिस्मिल की माताजी से मिले। वर्मा बताते हैं कि कैसे बिस्मिल की मृत्यु के पश्चात राजनीति उनकी स्मृतियों को हाशिए पर धकेलती गई। माताजी की आँखों की रोशनी जा चुकी थी। लोगों ने पुलिस के भय से आना-जाना छोड़ दिया था। भाई रमेश तपेदिक से इलाज के अभाव में वीर-प्रसविनी माता को निपूती छोड़कर चला गया।

यह उस समय की बात है जब एक ब्रिटिश अत्याचारों का सामना करता महान् नेता अपनी पत्नी को स्विट्ज़रलैंड भेज पा रहा था, उनकी देख-रेख के लिए एक युवक को छह वर्ष लंदन में रख सका था और पुत्री को यूरोप में वर्षों रख सका था। शिव वर्मा गोरखपुर जेल में माता की बिस्मिल से मुलाक़ात पर लिखते हैं –

‘माँ को देखकर बिस्मिल रो पड़े, किंतु माँ की आँखों में आँसुओं का लेश भी ना था। उन्होंने ऊँचे स्वर में कहा-
“मैं तो समझती थी कि मेरा बेटा बहादुर है, जिसके नाम से अंग्रेज़ी सरकार भी काँपती है। मुझे नहीं पता था कि वह मृत्यु से डरता है। तुम्हें यदि रोकर ही मरना था तो व्यर्थ इस काम में आए।
बिस्मिल ने आश्वासन दिया था- “आँसू मृत्यु के भय से नहीं, माता के मोह के थे। मौत से मैं नहीं डरता, माँ, तुम विश्वास करो।”

शिव वर्मा कहते हैं उस दिन समय पर माँ ने विजय पाई थी, आज माँ पर विजय पाई है समय ने। वे लिखते हैं- एक ओर ‘बिस्मिल ज़िंदाबाद के नारे और चुनाव में वोट लेने के लिए बिस्मिल द्वार का निर्माण और दूसरी ओर उनके घरवालों की परछाई तक से भागना। क्या यही है शहीदों का आदर और उनकी पूजा?’

बिस्मिल की बहन शास्त्री देवी के पत्र में बिस्मिल के बाद का समय और भी वीभत्स रूप में दिखता है। बिस्मिल ने अपने जिस मित्र के साथ कपड़ों के कारखाने को चलाया था और बाद में चलाने को दिया, उसे परिवार की सहायता के लिए लिखा, उसने 1 रुपया ना भेजा।

मुक़दमे में गणेश शंकर विद्यार्थी ने 2,000 रुपये चंदे से जमा किए थे। विद्यार्थी बिस्मिल के जाने के बाद परिवार को 15 रुपये महीने भेजते रहे, परंतु कानपुर दंगों में उनकी भी मृत्यु हो गई। फिर जवाहरलाल नेहरू ने एक बार 500 रुपए भेजे।

क्रांतिकारी विष्णु शर्मा जब 14 वर्ष बाद जेल से आए तो बिस्मिल की माता को ठंड से ठिठुरते देख चकित रह गए और अपना कंबल देकर गए। बिस्मिल के परिवार के लिए हम कुछ ना कर सके, बिस्मिल की स्मृतियों के लिए भी क्या कुछ ना कर सकेंगे?

साकेत लेखक व ब्लॉगर हैं जो @saket71 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।