श्रद्धांजलि
अपने क्षुद्र उद्देश्यों के लिए प्रेमचंद का उपयोग करने वालों को उन्हें एक बार पढ़ना चाहिए

प्रसंग- प्रेमचंद की जयंती पर उनके विचारों को समझने का एक प्रयत्न।

एक लेखक की सबसे बड़ी इच्छा भाषा की सेवा होती है और इस माध्यम से समाज में परिवर्तन लाने की इच्छा। लेखक राजनीति को प्रभावित तो करना चाहता है, राजनीति नहीं करना चाहता। इस सूक्ष्म विरोधाभास को समझना संभवतः उनके लिए ही संभव है जो केवल इसलिए लिखते हैं क्योंकि उनके लिए बंद कलम बंद नब्ज़ का पर्याय है। जिस प्रकार परिवारवादी राजनेता राजनीति के मूल तत्व की समझ से वंचित रह जाता है, कुछ हद तक यही समस्या वंशवादी लेखकों के साथ भी हो जाती है, विशेषकर तब जब उनकी लेखनी मसि वंशवादी राजनीति के प्याले से उठाती हो।

साहित्य के राजनीतिकरण का सबसे बड़ा शिकार साहित्य ही होता है। राजनीतिज्ञ लेखकों के लिए भाषा और लेखक दोनों ही शस्त्र होते हैं। इसी कारण प्रेमचंद की 139वीं जन्मशती को 125 बना दिया जाता है और मज़दूरों की लापरवाही से कटी बिजली को प्रशासन पर थोप दिया जाता है; 14 वर्षों से न चुकाए गए बिल पर सब चुप्पी साध लेते हैं।

मुंशी प्रेमचंद जिनके फटे जूते श्री हरिशंकर परसाई जी के लेख से एक किंवदंती बन गए, इतनी तो रीढ़ रखते थे कि बिजली की उधारी रखने वाले महोत्सव के आयोजकों को पास न फटकने देते। जिन्होंने कहानियों से दीगर प्रेमचंद के लेख पढ़े हैं वे भी इतना तो मानेंगे कि हिंदी की मूर्धन्य लेखिका की पुत्री जो राजनैतिक उद्देश्यों से हिंदी विरोध का परचम लहराती हुई दो महीने पूर्व मंच तलाश रही थीं, उनकी आज प्रेमचंद के घर की कटी बिजली को लेकर छद्म संवेदना को स्वयं प्रेमचंद लिफाफा खोले बिना वापस लौटा देते।  

प्रेमचंद, एक लेखक को प्रेमचंद एक व्यक्ति से नीचे रखना मेरे मत में प्रेमचंद का सबसे बड़ा अपमान है। आज जब मृणाल पाण्डे जी मुंशी जी के प्रति झूठा प्रेम बताते हुए शासन पर प्रहार करती हैं तो शरद जोशी जी का लेख “न इंदिरा, न प्रतिभा, न प्रतिष्ठा” याद हो आता है, जिसमें वे लिखते हैं-

“आम आदमी की बात करते हुए कमलेश्वर खास आदमियों से भी ऊपर उठकर एक कुर्सी पर बैठ जाते हैं और देश को पता चलता है कि हर यात्रा चाहे वह कथा यात्रा ही क्यों न हो, उसकी अंतिम मज़िल कुर्सी ही है।…. अधनंगे निराला और अधभूखे प्रेमचंद के नाम पर निर्मल वर्मा और शमशेर बहादुर सिंह सिंह को लम्बे समय तक विश्व विद्यालय में पीठ टिकाने योग्य कुर्सियाँ दी जाती हैं।”

एक अन्य लेख ‘प्रेमचंद के बासी आलोचक‘ में प्रेमचंद के लेखन को इतर रखकर व्यक्तित्व के दैवीकरण के खतरे से आगाह करते हुए शरद जी कहते हैं- “जो बेचारा उर्दू के किस्से कहानियों से लिखना सीखा हो, जिसने बहुत कष्टमय जीवन जिया हो और जो अपनी आँखों से देखी सच्चाई को सहज भाव से लिखने में व्यस्त रहा हो, वह आपकी सनक निभाए, ऐसी दुनियादारी वृत्ति की अपेक्षा उससे क्यों की जाती है।” किन्तु जिन्होंने अपने जीवन का सार ही नेहरू-गाँधी परिवार के महिमामंडन में ढूँढ लिया हो उनसे यह समझने की अपेक्षा स्वयं के और उनके साथ ज्यादती है। 

जो मृणाल जी आज प्रेमचंद के घर में बिजली काटने के झूठी खबर पर झूठी संवेदना का प्रलाप कर रहीं हैं, वे उन्हीं प्रेमचंद के विचारों को रौंदते हुए अंग्रेज़ी में लिखित, अंग्रेज़ी समर्थक और तथाकथित तौर पर हिंदी थोपने के विरोध में लिखे लेखों के समर्थन में कोई दो महीने पहले ही लामबंद थीं।  उनका कहना था कि हिंदी को संविधान के निर्देशक सिद्धांतों को दरकिनार करते हुए हमें हिंदी के स्थान पर अंग्रेज़ी और स्थानीय भाषा का द्विभाषा नियम मानना चाहिए।

मुंशी प्रेमचंद के इस विषय में विचार स्पष्ट थे। 26 दिसंबर 1934 को मुंशी जी मद्रास में कहते हैं- “हमारी पराधीनता का सबसे अपमानजनक, सबसे व्यापक और सबसे कठोर अंग अंग्रेजी भाषा का प्रभुत्व है।… इस प्रभुत्व को अगर हम तोड़ सके तो पराधीनता का आधा बोझ हमारे कंधों से उतर जाएगा।

प्रेमचंद यह भी मानते हैं कि राष्ट्रभाषा की विजय उसकी अन्य भारतीय भाषाओं को सन्निहित करने की सफलता में निहित है। आज भाषायी अलगाववादी राष्ट्रीय भाषा के सिद्धांत का विरोध करते हैं; प्रेमचंद कहते हैं-

“राष्ट्र की बुनियाद राष्ट्र की भाषा है। नदी, पहाड़ और समुद्र राष्ट्र नहीं बनाते। भाषा ही वह बंधन है जो चिरकाल तक एक राष्ट्र को बांधे रहता है और उसका शीराज़ा बिखरने नहीं देता।”

प्रेमचंद राष्ट्रभाषा के पक्षधर हैं किन्तु क्षेत्रीय भाषा के विरोधी नहीं हैं। वे कहते हैं- “भाषा सुंदरी को कोठरी में बंद कर के उसका सतीत्व तो बचा सकते हैं, लेकिन उसके जीवन का मूल्य दे कर।” प्रेमचंद कहते हैं कि राष्ट्र भाषा में क्षेत्रीय भाषा को भी सम्मान और स्थान प्राप्त हो।  वे कहते हैं कि राष्ट्रभाषा बोर्ड में तमिल, तेलुगु, कन्नड़ आदि प्रांतीय भाषा के विद्वानों को स्थान मिले ताकि भाषा अधिक से अधिक धनी हो और अधिक से अधिक उपयोग में लाई जा सके।

आज की परिस्थति में प्रेमचंद को मृणाल जी हिंदी के विद्वान् नहीं, संघी कहती और विशुद्धिवादी संघी लेखक उन्हें उर्दू का जासूस घोषित कर देते। सार्वभौमिक अविश्वास प्रेमचंद की वैचारिक सत्यता और बौद्धिक ईमानदारी का प्रमाण है। भाषा का उद्देश्य संवाद है और भाषायी मुगदर उठाए हुए वीरों को यह समझना चाहिए।

आज जब कलम का उपयोग विद्वेष, विरोध और असंतोष को हवा देने के लिए हो रहा है, प्रेमचंद की यह बात अत्यधिक प्रासंगिक हो जाती है जब वे लिखते हैं-

“साहित्य सामाजिक आदर्शों का सृष्टा है। जब आदर्श ही भ्रष्ट हो गया, तो समाज के पतन में बहुत दिन नहीं लगते। … हम अक्सर साहित्य का मर्म समझे बिना ही लिखना शुरू कर देते हैं। शायद हम समझते हैं कि मज़ेदार, चटपटी और ओजपूर्ण भाषा में लिखना ही साहित्य है। भाषा भी साहित्य का अंग है, पर स्थायी साहित्य विध्वंस नहीं करता, निर्माण करता है। साहित्यकार को आदर्शवादी होना चाहिए। अमर साहित्य के निर्माता विलासी प्रवृत्ति के मनुष्य नहीं थे। वाल्मीकि और व्यास दोनों तपस्वी थे। सूर और तुलसी भी विलासिता के उपासक न थे। हमारा साहित्य अगर आज उन्नति नहीं करता तो उसका कारण यह है कि हमने उसके लिया कोई तैयारी नहीं की; दो चार नुस्खे याद कर के हक़ीम बन बैठे।” 

आज साहित्य के कॉकटेल सर्किट की तलाश में भटकते साहित्यकारों को, जो प्रेमचंद के कन्धों पर बैठकर राजनैतिक विरोधियों का कान काटना चाहते हैं, उन्हें प्रेमचंद का इस्तेमाल क्षुद्र उद्देश्यों के लिए करने से पूर्व प्रेमचंद को एक बार पढ़ ही लेना चाहिए। महान लेखक और राष्ट्रवादी चिंतक को उनके 139वीं जयंती पर यह सबसे उचित श्रद्धांजली होगी।

लेखक के लिए साहित्यिक सत्यनिष्ठता, संवेदना और सत्यपरकता की आवश्यकता के उसी भाव की ओर प्रेमचंद भी इंगित करते हैं संभवतः जिसे परिलक्षित करते हुए ग़ालिब ने लिखा था- “कहते हैं जब रही न मुझे ताक़त-ए-सुख़न, जानूँ किसी के दिल की मैं क्यों कहे बगैर”। तात्पर्य यह कि एक साहित्यकार को किसी के हृदय के भाव समझने की शक्ति तब ही तक उचित है जब तक वह कलम की शक्ति से मूक हृदयों को शब्द दे सके। साहित्य का उद्देश्य न राजनीति हो सकती है न शब्दों की सामर्थ्य का ध्येय अन्य को चुप कराना, और निशब्द को शब्द देने का यह निर्दोष हुनर प्रेमचंद को अन्य साहित्यकारों से भिन्न स्थापित करता है।

साकेत सूर्येश स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। वे  @saket71 द्वारा ट्वीट करते हैं।